लेखक परिचय

तरुण विजय

तरुण विजय

तरुण विजय भारतीय राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत पत्रकार एवं चिन्तक हैं। सम्प्रति वे श्यामाप्रसाद मुखर्जी शोध संस्थान के अध्यक्ष तथा भाजपा के राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता व सांसद हैं। वह 1986 से 2008 तक करीब 22 सालों तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र पाञ्चजन्य के संपादक रहे। उन्होंने अपने करियर की शुरूआत ब्लिट्ज़ अखबार से की थी। बाद में कुछ सालों तक फ्रीलांसिंग करने के बाद वह आरएसएस से जुड़े और उसके प्रचारक के तौर पर दादरा और नगर हवेली में आदिवासियों के बीच काम किया। तरुण विजय शौकिया फोटोग्राफर भी हैं और हिमालय उन्हें बहुत लुभाता है। उनके मुताबिक सिंधु नदी की शीतल बयार, कैलास पर शिवमंत्रोच्चार, चुशूल की चढ़ाई या बर्फ से जमे झंस्कार पर चहलकदमी - इन सबको मिला दें तो कुछ-कुछ तरुण विजय नज़र आएंगे।

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-तरुण विजय

बहुत आसान है वेद, पुराण, मनुस्मृति और अन्य शास्त्रीय ग्रंथ उठाकर सामने रखना और कहना कि इनमें कहीं भी अस्पृश्यता को मान्य नहीं किया गया है और व्यक्ति अपने कर्म के अनुसार समाज में सम्मान पाता है अत: जाति और जन्म के अनुसार जो सामाजिक स्थान का निरुपण करते हैं वे गलत हैं। अक्सर यह कहने के बाद सब वही करने लग जाते हैं जो नहीं करने के लिए कहकर वे मंच से नीचे उतरे होते हैं। इससे बढ़कर चुभने वाली बात और क्या होगी? क्या वेद और पुराण पढ़कर कोई अस्पृश्यता का व्यवहार तय करता है या उसके विरुध्द खड़ा होता है? वेदों में वह लिखा है या नहीं लिखा है, इसकी बहस करने वाले स्वयं अपने जीवन-व्यवहार में अस्पृश्यता का सबसे अधिक व्यवहार करने वाले देखे जाते हैं। हमारे खून में, हमारी रगों में, हमारी मानसिकता में इतने गहरे बैठ गए हैं ये भेद कि सार्वजनिक मंच की आवश्यकता के अनुसार माइक पर हम भले ही समरसता की बात करें या उसके बारे में पुस्तकें लिख दें, लेकिन धरातल पर तो उसका कोई अंश उतरता नहीं। समरसता की पुस्तकें कर्मकांड के नाते सिर्फ उन्हीं वर्गों में लिखी और पढ़ी जाती हैं जो केवल अपनी ही जाति के अहंकारी दायरों में विचरण करते हैं। समरसता के संकल्प भी इन्हीं दायरों में लिए जाते हैं। आप किसी भी ऐसे बड़े कार्यक्रम में जाएं, मंच से लेकर श्रोताओं की अंतिम कुर्सी तक नजर घुमा लीजिए, 95 प्रतिशत तो वही मिलेंगे जिनके कारण जाति भेद और स्पृश्य- अस्पृश्य का व्यवहार जिंदा है।

कहानियां, कथाएं, उद्धरण, गीता, रामायण, महाभारत और वेदों से लिए गए श्लोक तथा ऋचाएं, सब इकट्ठा करके अगर आप यह बता भी दें कि अस्पृश्यता कभी हिन्दू धर्म का अंग नहीं रही है तो भी क्या हरिद्वार, वृंदावन, द्वारका और रामेश्वरम में बैठे संत, महात्मा, प्रवचनकार और विभिन्न संगठनों के नकचढ़े नेता दलितों को अपनाने लगेंगे? उनसे रोटी-बेटी का संबंध वैसा ही स्वाभाविक होगा जैसे व्यापारी, राजपूत, ब्राह्मण आपस में करते हैं? ये तो बहुत दूर की बात है। अपने निजी कार्यक्रमों के निमंत्रण पत्रों की सूची ही देख लीजिए। सच्चाई यह है कि यह हमारे दायरे, पैसा, प्रभाव और अपनी ही जाति का वृत्त परिभाषित करती हैं। निमंत्रण सूची में दलितों का नाम है या नहीं, यह तो इस बात पर निर्भर करेगा कि दलितों में हमारी मित्रता है या नहीं और मित्रता के दो ही कारण होते हैं, स्वाभाविक प्रेम या कामकाज और रिश्तेदारी का साथ। यह स्थिति यदि नहीं है तो आप लाख कहते रहें संग-साथ होगा नहीं और यह बात जबरन नहीं की जा सकती। समझाने और समझने का ही मामला है। मन बदलेगा तो बात बदलेगी।

बालक तिण्ण की कथा है। आंध्र में एक पर्वत में शिव मंदिर था। हर रोज पुजारी पूजा करता, साफ सफाई करता और रात को घर लौटता। कुछ दिनों से वह देखने लगा कि हर रोज शिवलिंग पर सुअर का मांस चढ़ा होता है। शिव-शिव कहते हुए पुजारी ने कान पकड़ लिए, प्रभु यह तो घोर अनर्थ हो गया। आपका घोर अपमान हो गया। खूब चौकीदारी करता, बैठा रहता लेकिन फिर भी जरा सी आंख लग जाती। घर जाकर लौटता तो वापस सुअर का मांस और गंदा सा पानी वहां चढ़ा दिखता। यह जन्म तो मेरा गया ही यह सोचकर पुजारी ने ठान लिया कि दिन रात वहीं कहीं छुपकर बैठा रहेगा और देखेगा कि कौन पापी यह अधर्म कर रहा है। और फिर अचानक सुबह 4 बजे के अंधेरे में उसे दिखा कि एक वनवासी बालक दोनों हाथों में कुछ लिए आया वह उसने शिव लिंग पर चढ़ाया और अपने मुंह में भरा पानी शिव पर अर्पित कर दिया। पुजारी का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया। तुरंत उतरा और लगा उस वनवासी बालक को पीटने। अरे मूर्ख, अधर्मी तू यह क्या कर रहा है। वनवासी बालक हतप्रभ होकर हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। पुजारी ने उसे कभी न आने की हिदायत दी। मंदिर की सफाई की और शिव शिव करता घर लौटा। दुख के मारे भोजन भी नहीं किया और सो गया। रात को शिव जी ने दर्शन दिए और कहा कि अरे मूर्ख उस वनवासी बालक को तुमने पीट कर मुझे चोट पहुंचाई। वह जितनी श्रध्दा से मांस लाता था और जब उसके पास कोई पात्र नहीं तो प्रेम के कारण अपने मुंह में ही नदी का जल भरकर नियमित रुप से सुबह ब्रह्ममर्ूहुत्त में चढ़ाने आता तो उसकी भक्ति से मैं बहुत प्रसन्न होता था। जाओ उससे क्षमा मांगो।

इस कथा का मर्म क्या? यह क्या तथाकथित ऊंची जाति का अहंकार रखते हुए सिर्फ और सिर्फ बुध्दि विलास, वाणी विलास और शब्द विलास करने वाले तीर्थयात्रियों को गंगा तट पर ही धर्महीन लूट से संत्रस्त करने वाले पंडे और नकचढ़े समझेंगे? आज तक वे काशी में तो न शिव मंदिर के आसपास सफाई रख सके न गंगा तट पर। कभी उन्होंने सोचा है कि दुनिया भर से तीर्थ दर्शन के लिए आने वाले हिन्दू यात्रियों पर क्या बीतती है? जब तक हम शिव मार्ग से वंचित दलितों का पाद पूजन कर उन्हें गंगा के अभिषेक का चंदन नहीं बनाएंगे तब तक हमारा प्रायश्चित भी पूरा नहीं होगा और न काशी न हिन्दू समाज विषमता के दंश से मुक्त होगा।

हमारे यहां उदाहरणों की कमी नहीं है। आदि शंकर ने श्वान, श्वपच, वंचित और ब्राह्मण में गज और अश्व में एक ही गोविंद के दर्शन किए और उन्हीं गोविंद के अनुयायियों ने समाज को सनातन सत्य की मुख्य धारा में समाहित करते हुए आगे बढ़ने की अपेक्षा रुढ़ियों और कर्मकांडों की बेड़ियों में जकड़ दिया। दुख इस बात का है कि जो लोग फिल्म में विद्रूपता के विरोध में खड़े हुए वे मंदिरों में स्वच्छता, सामान्य तीर्थयात्री के लिए सुव्यवस्था, मंदिर तक जाने वाली गली को तो कम से कम थोड़ा साफ सुथरा और नंगे पांव पैदल चलने लायक बनाने की ओर ध्यान देने का काम जरुरी क्यों नहीं मानते? उनके लिए सौंदर्य प्रतियोगिताओं और वेलेनटाइन डे का विरोध जरूरी है, पर दहेज हत्याओं, कन्या भ्रूण हत्याओं, जानवरों की तरह पढ़े-लिखे लड़कों की शादी में नीलामी का विरोध महत्वपूर्ण क्यों नहीं? हमें सावधान रहना होगा कि समरसता की बात गोहत्या पर विरोध की तरह पर्चों और बयानों का विषय मात्र बनकर न रह जाए। इस देश में गोहत्या में सर्वाधिक संलिप्तता सवर्ण हिन्दुओं की है। भले ही उनका कामकाज, आचरण अक्सर घिनौने अपराधों का हो, लेकिन हम तो इतने गिर चुके हैं कि कई बार अपराधी की जात देखकर सजा के फैसले तय करते हैं। वह तो ‘छोटी जात’ का है ‘शडूलकास्ट’ है, ‘आदिवासी’ है इतना भर नाक सिकोड़कर फुसफुसाहट के साथ कहना पीढ़ियों को लांछित और मर्माहत कर देता है इसका अहसास तक नहीं किया जाता।

वे भूल जाते हैं कि राम ने शबरी के झूठे बेर खाए थे और जिन रामानुजाचार्य ने मोक्षदायी मंत्र छत पर चढ़कर दीन दलितों को सुनाया था और जिन मीरा ने जूते बनाने वाले संत कवि रैदास को अपना गुरु माना, उनका भक्त होने का अर्थ यह नहीं होता कि हम सवा रुपए का प्रसाद चढ़ाकर अपनी मनोकामनाएं पूरी करवाते रहें। जो सौदेबाजी का मामला है वह धर्म नहीं है बल्कि क्षुद्र और संकीर्ण कर्मकांड है। धर्म तो वह है जो चर्म के भेद को नकार कर कर्म के मर्म से रिश्ता जोड़े। एक दिन तो इसी अग्नि में स्वयं को परम पावन प्रात: स्मरणीय मानने वाले भी समर्पित होंगे और श्मशान में काम करने वाले सेवक भी। सिर्फ चमड़ी और जन्म के भेद को जो माने वह न कान्हा का हो सकता है न रघुवर का। तय आपको करना है कि आप किसके हैं?

हमारी शूरता, वीरता, समाज के प्रति चिंता सिर्फ शब्दों के गलियारों तक सिमट गई है। इस अंक के लिए हमने अनेक प्रांतों से जानकारी चाही कि क्या उनके क्षेत्र में कोई ऐसा मंदिर है जहां सामान्यत: गांव, नगर के सभी लोग जाते हों लेकिन जहां का पुजारी वह पूर्वकालीन हरिजन हो जो मंदिर का कामकाज भी संभाल रहा हो। हमें इस जानकारी की अभी तक प्रतीक्षा है।

पैसा और पद आ जाए तो समाज में सब कुछ ठीक हो जाता है ऐसा भी कहा जाता है। कुछ स्थितियों में ऐसे बहुत अच्छे उदाहरण भी हमें मिलते हैं लेकिन वे उदाहरण अपवाद ही बने हुए हैं।

ऐसा नहीं है कि काम नहीं हो रहा है या लोगों के मन नहीं बदल रहे या विषमता के खिलाफ हिन्दू समाज में उबाल नहीं उठ रहा है।

परिवर्तन के इस दौर में अग्रगामी ध्वजवाहक निश्चय ही रा0स्व0संघ के साधारण स्वयंसेवक हैं। आज भी भारत में जाति भेद से परे उठकर दहेज रहित सर्वाधिक विवाह स्वयंसेवक परिवारों में ही होते हैं। वे स्वयंसेवक ही हैं जो जाति का आग्रह छोड़ते हुए केवल भारत भक्ति के आधार पर एक धर्म हिन्दू, एक जात हिन्दू, एक गोत्र हिन्दू, एक पथ हिन्दू, एक स्वप्न, समरस समृध्द सशक्त हिन्दू समाज का भाव लेकर चल रहे हैं। एक ओर जहां विश्व हिन्दू परिषद् के माध्यम से गांव-गांव में शिक्षा, समरसता और रामकथाओं के अमृत संदेश पहुंचाए जा रहे हैं वहीं वनवासी कल्याण आश्रम समरसता के अमृत अधिष्ठान के रुप में उभर कर सामने आया है। पूर्वांचल से पश्चिमांचल तक और लेह से लोहरदगा और लोहरदगा से पोर्टब्लेयर तक जनजातीय और गैर जनजातीय समाज के मध्य सेतुबंध का दूसरा नाम कल्याण आश्रम स्वाभाविक रुप से कहा जा सकता है। इस प्रकार माता अमृतानंदमयी जो स्वयं मछुआरा जाति से होते हुए भी विश्व भर में सनातन धर्म के संदेश की सर्वाधिक प्रमुख व्याख्याता बनी हैं समरस हिन्दू समाज का अमृतोपम उदाहरण है। साध्वी ऋतम्भरा का वात्सल्य ग्राम समरसता का प्रकाश स्तम्भ बना है। स्वामिनारायण पंथ तथा स्वाध्याय परिवार, निरंकारी समाज और श्री श्री रविशंकर की प्रखर हिन्दू निष्ठ समरस जीवन दृष्टि का नूतन स्वरुप ही एक आशादायी भविष्य का संकेत देता है। काशी में विश्व हिन्दू परिषद् ने डोम राजा का स्वागत किया, उनके घर पर देश के पूज्यपाद संतों ने भोजन किया, शंकराचार्य जी ने नागपुर में दीक्षाभूमि जाकर डा. अम्बेडकर को भावपुष्प अर्पित किए- यह सब सत्य सनातन समरस जीवन के सूर्योपम उदाहरण हैं जिनकी पृष्ठभूमि में एक ही नाम है-माधवराव सदाशिवराव गोलकर। ये सभी उदाहरण हमें परम पूज्य श्री गुरुजी के समरस हिन्दू समाज के स्वप्न को साकार करने का बल देते हैं। परंतु अभी भी ये उदाहरण ही हैं। हमें प्रयास तो यह करना है कि ऐसे उदाहरण बताए जाने की आवश्यकता भी न रहे।

3 Responses to “आपका व्यवहार और जीवन दृष्टि”

  1. BHOOPENDER

    tarun ji
    aapke uper teen paragraph k vichar to bahut hi sunder hai.aise vicharo ke liye dhanyawad kintu neeche phir vahi dhak ke teen paat wali baat kah diya aapne r.s.s. ki mool bhawna bahut acchi ho sakti hai lekin log r.s.s ka prayog sirf brahmanwadi samaj ki raksha k liye saare hinduo ko jodna hai.
    ucch jatiyo k pakhand ko rastrwad ka roop de dete hai.logo ko dharm ke sankat ki duhai dekar sankat se muh mod lete hai.
    hindutvwadi sangthan velentine day freindship day k virodh me nanga naach karte hai lekin sarab dukano kabhi todfod nahi karte jo poore manav samaj ko gart me le ja rahi hai kyo?
    aapke r.s.s. ke karyakarta khud to jarur tyag ka jeevan jeete honge lekin jaha bhi aapki sarkar hai waha apne bhai bandhuo ko thekedari me tender jarur dilwate hai aap mat sochiye ki iske madhyam se wo samaj sewa karte honge.
    aapjaise vichark ye baate likhne ke liye chhama chahta hu par ye baate sach hai mein jaanu ya na jaanu aapko jarur janana chahiye kyoki aap log vichro se pariwartan laate ho aur ye pariwartan desh ke sabhi logo k liye accha ho……………

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  2. Anil Sehgal

    मान्य तरुण विजय जी,
    समरस हिन्दू समाज के स्वप्न को साकार करने के लिए, मेरी राय में, आप यदि केवल single-point program, namely,

    – जाति भेद से उठकर दहेज रहित विवाह के लिए (एक धर्म हिन्दू, जात हिन्दू, गोत्र हिन्दू, पथ हिन्दू के आधार पर)

    * आर. एस. एस.
    * विश्व हिन्दू परिषद्
    * साध्वी ऋतम्भरा का वात्सल्य ग्राम
    *स्वामिनारायण पंथ
    *निरंकारी समाज
    *आर्य समाज, स्वामी अग्निवेश, स्वामी योग ऋषि राम देव
    * श्री श्री रविशंकर
    * अन्य एसे संगठन
    से आग्रह कर जाति भेद से उठकर दहेज रहित विवाह का एक संयुक्त अभियान चलवायें तो हिन्दू समाज में समरसता स्वयं ही आ जाईगी.

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  3. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    aapke pavitr vicharon ki roshnee men hm saamaajik smrasta ka hrek pryaas karenge .kintu jo bhi karenge kaanoon ke daayre men hi karenge .
    shriram ne shabri geedh nishaadh ka udhar kiya .krishnji nen uska badla chukaya we pichhde varg ke the or agde bhikhmange sudama ke muththi bhar chaval bhi nahi chhode .raamaanuj ne daliton ko chela banaya .gandhi ne pair pakhare fir bhi dalit jahaan khada tha wahin pr hai .dalit or shoshit ke naam pr tathakathit yaduvanshi .ab pichhde kyon ho gaye ?
    desh ki upjaau bhoomi jiske haath men hai whi desh ka maalik hai .rss ki rah pr to ek bhi dalit ka uddhar nhin hone wala .
    bhoomi sudhaar kaanoon wanwaao or laagu karo .desh ki 70 feesdee janta gramo men vastee hai aap mahanagron ke pridrushy pr kaam kar rahe hain .aapki sadechh se log unch neech ka dayra ghatane ko taiyyar nahin hain .agar aap aarthik roop se pratek bharat vashi ko barabar kar do to desh ke saare dalidder door ho jaawenge

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