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अज्ञेय जन्म शताब्दी वर्ष पर विशेष- बलाओं की मां है साम्प्रदायिकता

अज्ञेय जन्म शताब्दी वर्ष पर विशेष- बलाओं की मां है साम्प्रदायिकता -जगदीश्‍वर चतुर्वेदी स.ही.वा.अज्ञेय हिन्दी के बड़े साहित्यकार हैं। उनकी प्रतिष्ठा उनमें भी है जो उनके विचारों से सहमत नहीं हैं। अज्ञेय के बारे में प्रमुख समस्या है कि उन्हें किस रूप में याद करें ? क्या उन्हें धिक्कार और अस्वीकार के साथ देखें ? क्या वे सचमुच में ऐसा कुछ लिख ...

November 22nd, 2010 | लेखक : जगदीश्‍वर चतुर्वेदी | 147 views | 1 Comment »
Posted in Category: आलोचना | Tags: communalism, साम्प्रदायिकता

उत्तर आधुनिकतावाद के विभ्रम और अस्मिता

उत्तर आधुनिकतावाद के विभ्रम और अस्मिता -जगदीश्‍वर चतुर्वेदी इन दिनों वास्तव और अवास्तव, व्यक्ति और अव्यक्ति, जीवन और मृत्यु, उपस्थित और अनुपस्थित आदि के बारे में सवाल नहीं किए जाते। जो कुछ भी कहा जाता है वह खास सीमा में रहकर ही कहा जाता है। इसी प्रसंग में देरिदा की प्रसिद्ध किताब ‘स्पेक्टेटर ऑफ मार्क्स’ का जिक्र ...

November 21st, 2010 | लेखक : जगदीश्‍वर चतुर्वेदी | 119 views | No Comments »
Posted in Category: आलोचना | Tags: modernism, उत्तर आधुनिकतावाद

चेग्वेरा क्यों नहीं बने नामवर सिंह

चेग्वेरा क्यों नहीं बने नामवर सिंह -जगदीश्‍वर चतुर्वेदी सवाल टेढ़ा है लेकिन जरूरी है कि चेग्वेरा क्यों नहीं बन पाए नामवर सिंह। उन्होंने क्रांतिकारी की बजाय बुर्जुआमार्ग क्यों अपनाया ? क्रांति का मार्ग दूसरी परंपरा का मार्ग है। जीवन की प्रथम परंपरा है बुर्जुआजी की। नामवरजी को पहली परंपरा की बजाय दूसरी परंपरा पसंद है। सवाल ...

October 10th, 2010 | लेखक : जगदीश्‍वर चतुर्वेदी | 100 views | 3 Comments »
Posted in Category: आलोचना | Tags: Namwar Singh, चे ग्‍वारा, नामवर सिंह

नागार्जुन जन्मशती पर विशेष- मुस्लिम आर्थिक नाकेबंदी और हम

नागार्जुन जन्मशती पर विशेष- मुस्लिम आर्थिक नाकेबंदी और हम -जगदीश्‍वर चतुर्वेदी भगवान से भी भयावह है साम्प्रदायिकता। साम्प्रदायिकता के सामने भगवान बौना है। साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक दंगे दहशत का संदेश देते हैं। ऐसी दहशत जिससे भगवान भी भयभीत हो जाए। जैसाकि लोग मानते हैं कि भगवान के हाथों (यानी स्वाभाविक मौत) आदमी मरता है तो इतना भयभीत नहीं होता जितना ...

October 9th, 2010 | लेखक : जगदीश्‍वर चतुर्वेदी | 138 views | 5 Comments »
Posted in Category: आलोचना | Tags: नागार्जुन

नागार्जुन जन्मशती पर विशेष-हिन्दी में कीर्त्ति फल के उपभोक्ता

-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी नागार्जुन पर जो लोग शताब्दी वर्ष में माला चढ़ा रहे हैं। व्याख्यान झाड़ रहे हैं। नागार्जुन के बारे में तरह-तरह का ज्ञान बांट रहे हैं ऐसे हिन्दी में 20 से ज्यादा लेखक नहीं हैं। ये लेखक कम साहित्य के कर्मकाण्डी ज्यादा लगते हैं। आप इनमें से किसी को भी ...

October 9th, 2010 | लेखक : जगदीश्‍वर चतुर्वेदी | 65 views | 1 Comment »
Posted in Category: आलोचना | Tags: hindi, नागार्जुन, हिन्दी

कवि चतुष्टयी जन्मशती पर- विभूतिनारायण राय का साम्राज्यवादी आख्यान

कवि चतुष्टयी जन्मशती पर- विभूतिनारायण राय का साम्राज्यवादी आख्यान -जगदीश्‍वर चतुर्वेदी बाबा नागार्जुन,केदारनाथ अग्रवाल, अज्ञेय और शमशेर का यह जन्मशती वर्ष है। यह समारोह ऐसे समय में आरंभ हुआ है जब देश भयानक मंदी की मार और नव्य-उदार आर्थिक नीतियों की मार से गुजर रहा है। सवाल उठता है क्या इसे तिलांजलि देकर कवि चतुष्टयी की जन्मशती मनायी जा सकती ...

October 7th, 2010 | लेखक : जगदीश्‍वर चतुर्वेदी | 96 views | 2 Comments »
Posted in Category: आलोचना | Tags: Makhanlal Chaturvedi Patrakarita Vishwavidyalay, महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय

कवि चतुष्टयी जन्मशती पर विशेष – कौन पा रहा है, कौन खो रहा है?

कवि चतुष्टयी जन्मशती पर विशेष - कौन पा रहा है, कौन खो रहा है? -जगदीश्‍वर चतुर्वेदी वर्धा में महात्मा गांधी विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित कवि चतुष्टयी जन्मशती पर आलोचक नामवर सिंह ने जो कहा वह कमाल की बात है। अब हमारे गुरूवर बिना परिप्रेक्ष्य के सिर्फ विवरण की भाषा बोलने लगे हैं। परिप्रेक्ष्यरहित आख्यान और रिपोर्टिंग का नमूना देखें- "इस कार्यक्रम के उद्घाटन भाषण में नामवर ...

October 7th, 2010 | लेखक : जगदीश्‍वर चतुर्वेदी | 80 views | 2 Comments »
Posted in Category: आलोचना | Tags: University, महात्मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय

सैलीबरेटी नामवर सिंह

सैलीबरेटी नामवर सिंह -जगदीश्‍वर चतुर्वेदी हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह लंबे समय से ‘गायब’ हैं। कोई नहीं बता रहा वे कहां चले गए। वैसे व्यक्ति नामवर सिंह साक्षात इस धराधाम में हैं और मजे में हैं। गड़बड़ी यह हुई है कि ‘आलोचक नामवर सिंह’ गायब हो गए हैं। उनका गायब होना एक ...

September 20th, 2010 | लेखक : जगदीश्‍वर चतुर्वेदी | 206 views | 8 Comments »
Posted in Category: आलोचना | Tags: Namwar Singh, नामवर सिंह

कबीर के बहाने नामवरसिंह का पुंसवादी खेल

कबीर के बहाने नामवरसिंह का पुंसवादी खेल -जगदीश्‍वर चतुर्वेदी अभी एक पुराने सहपाठी ने सवाल किया था कि आखिरकार तुम नामवरजी के बारे में इतना तीखा क्यों लिख रहे हो ? मैंने कहा मैं किसी व्यक्तिगत शिकायत के कारण नहीं लिख रहा। वे अहर्निश आलोचना नहीं विज्ञापन कर रहे हैं और आलोचना को नष्ट कर रहे हैं। आलोचना ...

September 20th, 2010 | लेखक : जगदीश्‍वर चतुर्वेदी | 193 views | 3 Comments »
Posted in Category: आलोचना | Tags: Namwar Singh, नामवर सिंह

छिनाल के आगे की बहस

छिनाल के आगे की बहस -डा. सुभाष राय उत्तर भारत के हिंदीभाषी ग्रामीण इलाकों का एक बहुप्रचलित शब्द है छिनाल। इस शब्द ने हाल ही में हिंदी जगत में बड़ा बवाल मचा दिया। इसका प्रयोग अमूमन उन महिलाओं के लिए किया जाता है, जो अपने पति के प्रति वफादार नहीं होती और उसकी जानकारी के ...

August 8th, 2010 | लेखक : डॉ. सुभाष राय | 688 views | 9 Comments »
Posted in Category: आलोचना | Tags: Narayan Rai, छिनाल, विभूति नारायण राय

चाक्षुषभाषा के रचनाकार उदयप्रकाश

चाक्षुषभाषा के रचनाकार उदयप्रकाश -जगदीश्‍वर चतुर्वेदी उदयप्रकाश पर लिखना मुश्किल काम है। इसके कई कारण हैं पहला यह कि वह मेरे दोस्त हैं। दूसरा उनका जटिल रचना संसार है। उदयजी को मैं महज एक लेखक के रूप में नहीं देखता। बल्कि पैराडाइम शिफ्ट वाले लेखक के रूप में देखता हूँ। हिन्दी कहानी की परंपरा में ...

July 3rd, 2010 | लेखक : जगदीश्‍वर चतुर्वेदी | 266 views | 3 Comments »
Posted in Category: आलोचना | Tags: Udayprakash, उदयप्रकाश

उत्तर आधुनिकतावाद क्या है?

-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी उत्तर-आधुनिकतावाद को वृद्ध पूंजीवाद की सन्तान माना जाता है। पूंजीवाद के इजारेदाराना दौर में तकनीकी प्रोन्नति को इसका प्रमुख कारक माना जाता है। विश्व स्तर पर साम्राज्यवादी दखलंदाजी के बढने के बाद से आर्थिकतौर पर अमरीकी प्रशासन की दुनिया में दादागिरी बढी है। इसके अलावा जनमाध्यमों; संस्कृति; सूचना प्रौद्योगिकी, और ...

July 1st, 2010 | लेखक : जगदीश्‍वर चतुर्वेदी | 476 views | 1 Comment »
Posted in Category: आलोचना | Tags: North Modernism, उत्तर आधुनिकतावाद

फि‍नोमि‍ना नामवर सिंह

फि‍नोमि‍ना नामवर सिंह -जगदीश्‍वर चतुर्वेदी वह साहि‍त्‍य में जि‍तना चर्चित है। नेट पाठकों में भी उतना ही चर्चित है। ‍वह व्‍यक्‍ति‍ नहीं फि‍नोमि‍ना है। वह आलोचक है, शि‍क्षक है, श्रेष्‍ठतम वक्‍ता है, हि‍न्‍दी का प्रतीक पुरूष है, वह जि‍तना जनप्रि‍य है उतना ही अलोकप्रि‍य भी है, वह सत्‍ता के साथ है तो प्रति‍वादी ताकतों ...

June 14th, 2010 | लेखक : जगदीश्‍वर चतुर्वेदी | 726 views | 13 Comments »
Posted in Category: आलोचना | Tags: Namwar Singh, नामवर सिंह

श्रद्धालु आलोचना के प्रतिवाद में

श्रद्धालु आलोचना के प्रतिवाद में -जगदीश्‍वर चतुर्वेदी आधुनिक हिन्दी आलोचना इन दिनों ठहराव के दौर से गुजर रही है,आलोचना में यह गतिरोध क्यों आया? आलोचना में जब गतिरोध आता है तो उसे कैसे तोड़ा जाए? क्या गतिरोध से मुक्ति के काम में परंपरा हमारी मदद कर सकती है? क्या परंपरागत आलोचना के दायरे को तोड़ने की ...

June 11th, 2010 | लेखक : जगदीश्‍वर चतुर्वेदी | 183 views | No Comments »
Posted in Category: आलोचना | Tags: Criticism, आलोचना

डिजिटल युग में लघुपत्रिकाओं की चुनौतियां

डिजिटल युग में लघुपत्रिकाओं की चुनौतियां -जगदीश्‍वर चतुर्वेदी डिजिटल की दुनिया ने हमारे रचना संसार के सभी उपकरणों पर कब्जा जमा लिया है। लघुपत्रिका अथवा साहित्यिक पत्रकारिता जब शुरू हुई थी तो हमने यह सोचा ही नहीं था कि ये पत्रिकाएं क्या करने जा रही हैं। हमारी पत्रकारिता और पत्रकारिता के इतिहासकारों ने कभी गंभीरता से मीडिया ...

June 10th, 2010 | लेखक : जगदीश्‍वर चतुर्वेदी | 221 views | 2 Comments »
Posted in Category: आलोचना | Tags: Small Magazine, लघु पत्रिका

रामचरितमानस की काव्यभाषा में रस का विवेचन

रामचरितमानस की काव्यभाषा में रस का विवेचन -वंदना शर्मा कविता भाषा की एक विधा है और यह एक विशिष्ट संरचना अर्थात् शब्दार्थ का विशिष्ट प्रयोग है। यह (काव्यभाषा) सर्जनात्मक एक सार्थक व्यवस्था होती है जिसके माध्यम से रचनाकार की संवदेना, अनुभव तथा भाव साहित्यिक स्वरूप निर्मित करने में कथ्य व रूप का विषिष्ट योग रहता है। अत: इन ...

June 9th, 2010 | लेखक : वंदना शर्मा | 773 views | 5 Comments »
Posted in Category: आलोचना | Tags: Ramcharitmanas, रामचरितमानस

अभिव्यक्ति का मतलब अश्लीलता तो नहीं…

अभिव्यक्ति का मतलब अश्लीलता तो नहीं... -गिरीश पंकज अपने देश में इन दिनों अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर जिस तरह की लंपटताई का खेल चल रहा है, उसे देख कर खीझ होती है। कुछ तथाकथित प्रगतिशील लोगों के कारण समाज का एक नया बौद्धिक वर्ग अश्लील अभिव्यक्तियों को ही आधुनिक होने की गारंटी समझ रहा है। ...

June 3rd, 2010 | लेखक : गिरीश पंकज | 430 views | 7 Comments »
Posted in Category: आलोचना | Tags: Obscenity, अभिव्यक्ति, अश्लीलता

कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर की 150 जयन्ती पर विशेष- दीन-हीन का सम्मान पद है धर्म

कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर की 150 जयन्ती पर विशेष- दीन-हीन का सम्मान पद है धर्म -जगदीश्‍वर चतुर्वेदी हिंदी के बुद्धि‍जीवि‍यों में धर्म 'इस्‍तेमाल करो और फेंको' से ज्‍यादा महत्‍व नहीं रखता। अधि‍क से अधि‍क वे इसके साथ उपयोगि‍तावादी संबंध बनाते हैं। धर्म इस्‍तेमाल की चीज नहीं है। धर्म मनुष्‍यत्‍व की आत्‍मा है। मानवता का चरम है। जि‍स तरह मनुष्‍य के अधि‍कार हैं, लेखक के भी अधि‍कार ...

May 13th, 2010 | लेखक : जगदीश्‍वर चतुर्वेदी | 641 views | 1 Comment »
Posted in Category: आलोचना | Tags: Rabindranath Tagore, कविवर, धर्म, रवीन्द्रनाथ टैगोर

पितृसत्ता से भागते तुलसीदास के आलोचक

पितृसत्ता से भागते तुलसीदास के आलोचक -जगदीश्‍वर चतुर्वेदी हिन्दी की अधिकांश आलोचना मर्दवादी है।इसमें पितृसत्ता के प्रति आलोचनात्मक विवेक का अभाव है।आधुनिक आलोचना में धर्मनिरपेक्ष आलोचना का परिप्रेक्ष्य पितृसत्ता से टकराए, उसकी मीमांसा किए बगैर संभव नहीं है। मसलन्, अभी तक तुलसी पर समीक्षा ने लोकवादी जनप्रिय नजरिए से विचार किया है और पितृसत्ता को स्पर्श तक ...

May 4th, 2010 | लेखक : जगदीश्‍वर चतुर्वेदी | 404 views | 1 Comment »
Posted in Category: आलोचना | Tags: Tulsidas, तुलसीदास, पितृसत्ता

देरिदा का वायनरी अपोजीशन और तुलसीदास

देरिदा का वायनरी अपोजीशन और तुलसीदास जगदीश्‍वर चतुर्वेदी• तुलसीदास ने अभिव्यक्ति की शैली के तौर पर रामचरित मानस में वायनरी अपोजीशन की पद्धति का कई प्रसंगों में इस्तेमाल किया है। इस क्रम में रावण और राम दोनों के गुण और अवगुणों की प्रस्तुति को रखा जा सकता है। रावण का राम के प्रत्येक कार्य और अवस्था में ...

May 3rd, 2010 | लेखक : जगदीश्‍वर चतुर्वेदी | 318 views | 1 Comment »
Posted in Category: आलोचना | Tags: Tulsidas, तुलसीदास, देरिदा

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