शिकारी का अधिकार – (व्यंग्य संग्रह) आरिफा एविस

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समीक्षा – बी एन गोयल एक प्रसिद्ध दोहा है – शब्द सम्हारे बोलिए शब्द के हाथ न पांव एक शब्द करे औषधि एक शब्द करे घाव , इस दोहे में एक सलाह दी गयी है कि जब भी कुछ बोलो नाप तोल कर बोलो. सोच समझ कर बोलो. यह सलाह यद्यपि सब के लिए हैं… Read more »

व्यंग्य नव लेखन में ऊँचे दर्जे का अधिकार : शिकारी का अधिकार

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समीक्षक : वरिष्ठ व्यंग्यकार सुरेशकांत पिछले दिनों आयोजित तीन दिवसीय ‘व्यंग्य की महापंचायत’ में कई अनोखी बातें हुईं। पहली तो यही कि बन्दा ‘अट्टहास’ के प्रोग्राम में पहली बार शामिल हुआ । व्यंग्य में गाली-गलौज के प्रयोग और सपाटबयानी पर मेरे विचारों से सभी अवगत हैं, क्योंकि मैं इन पर बहुत कह और लिख चुका… Read more »

दुश्वारियों में यह जो मीडिया है

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अमित राजपूत “जितनी तेज़ी से मीडिया के विविध आयाम विस्तार ले रहे हैं, उतनी ही तेज़ी से उस पर से विश्वास हटने की बात भी सामने आ रही है। ‘कॉरपोरेटिव मीडिया’ नाम की नई खेप हमारे संग है तो ‘ख़बरों’ को ग़ायब करके ‘बहस दर बहस’ करते जाने का मुद्दा भी ज़ोरदार ढंग से उठाया… Read more »

सिंहस्थ की सनातन परंपरा और अमृत की एक बूंद सी – ‘सिंहस्थ”

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समीक्षक – डॉ. विकास दवे सिद्धार्थ शंकर गौतम की पुस्तक सिंहस्थ हाथों में है। ‘प्रभात प्रकाशन” की अपनी गौरवशाली परंपरा का निर्वाह करती-सी यह पुस्तक भी एक ही दृष्टि में अपने भौतिक कलेवर से मन मोह लेती है। आकर्षक आवरण सर्वप्रथम आकर्षित करता है। तत्पश्चात् हमारे समक्ष परत दर परत खुलने लगती है विश्व के… Read more »

पांचो नौबत बाजती –(समीक्षा)

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बी एन गोयल   कल्पना कीजिये- कल्पना क्यों – ये दो वास्तविक प्रकरण हैं. मंच पर कुमार गन्धर्व का गायन चल रहा है – ….उड़ जायेगा ……हंस अकेला ……..भक्ति की रस धार बह रही है, गायक के स्वर सीधे ब्रह्म से जुड़े हैं श्रोता वर्ग मंत्र मुग्ध है, आँखें बंद हैं, कुछ मुंडियां हिल रही… Read more »

ऊँटेश्वरी माता का महंत

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मदर टैरेसा पर उठा विवाद अभी थमा भी नही है कि एक ईसाई संगठन से जुड़े कैथोलिक विश्वासी पी.बी.लोमियों की हालही में आई पुस्तक ‘‘ ऊँटेश्वरी माता का महंत” ने ईसाई समाज के अंदर चर्च की कार्यशैली पर कई गंभीर सवाल उठा दिये है। “ऊँटेश्वरी माता का महंत”  र्शीषक से लिखी गई यह पुस्तक एक… Read more »

पुराने दिनों के गायब होते लोगों के किस्से

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संजय पराते हिन्दी-साहित्य पाठकों के लिए राजेश जोशी जाना-पहचाना नाम है। वे एक साथ ही कवि-कहानीकार-आलोचक-अनुवादक-संपादक सब कुछ हैं। हाल ही में उनकी रचना ‘कि़स्सा कोताह’ (राजकमल प्रकाशन) सामने आयी है। राजेश जोशी के ही अनुसार, न यह आत्मकथा है और न उपन्यास। यह एक गप्पी का रोज़नामचा भर है- जो न कहानी है और… Read more »

अन्तर-पथ – एक समीक्षा

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बिपिन किशोर सिन्‍हा  ‘अन्तर-पथ’ एक कविता संग्रह है जिसे शब्द-भाव दिए हैं, डा. रचना शर्मा ने और प्रकाशित किया है पिलग्रिम्स पब्लिशिंग, वाराणसी ने। सामान्यतः पिलग्रिम्स पब्लिशिंग नए साहित्यकारों की रचनाएं कम ही छापता है। परन्तु डा. रचना शर्मा का यह काव्य-संग्रह प्रकाशित करके, प्रकाशक ने अपनी पुरानी छवि तोड़ने का सराहनीय प्रयास किया है।… Read more »

मातृसत्ताक समाज और ‘वोल्गा से गंगा’– सारदा बनर्जी

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राहुल सांकृत्यायन की कृति ‘वोल्गा से गंगा’ मातृसत्ताक समाज में स्त्री वर्चस्व और स्त्री सम्मान को व्यक्त करने वाली बेजोड़ रचना है। इस रचना में यदि स्त्रियों के ओवरऑल पर्फ़र्मेंस और प्रकृति पर नज़र दौराया जाए तो पता चलता है कि मातृसत्ताक समाज में स्त्री कितनी उन्मुक्त, आत्मनिर्भर और स्वच्छंद थीं। स्त्री किसी की संपत्ति… Read more »

चर्च में दलित र्इसाइयों के शोषण का आर्इना है उपन्यास ‘बुधिया…….

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झांसी:- नगर के जनवादी लेखक पीबी लोमियो के उपन्यास ‘बुधिया एक सत्यकथा का विमोचन राजकीय संग्रहालय सभागार में एससी कुल्हारे के मुख्य आतिथ्य व वरिष्ठ स्तम्बकार दिनेश बैस की अध्यक्ष्ता में हुआ। पुअर क्रिशिचयन लिबरेशन मूवमेंट के राष्ट्रीय अध्यक्ष आर एल फ्रांसिस व वरिष्ठ पत्रकार रमेश चौबे कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि रहे। एससी कुल्हारे ने… Read more »