आत्ममंथन से व्यंग्यमंथन तक

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समीक्षक : एम. एम. चन्द्रा वरिष्ठ व्यंग्यकार हरीश नवल की पुस्तक “कुछ व्यंग्य की कुछ व्यंग्यकारों की ” जब मेरे हाथों में उन्होंने सौंपी, तो कुछ समय के लिए तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ. बस दो पल का आत्मीय मिलन सदियों पुराना बन गया. यह पुस्तक आत्म मंथन से व्यंग्य मंथन तक का सफ़र… Read more »

अपना आसमान तराशना

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जीवन में वृद्धि प्रतिबद्धता पर निर्भर करती है, निश्चित पराजय के सामने रहते हुए भी वृद्धि में अवरोध नहीं आता। । अपनी पसन्द और नापसन्दी के कारण हम चीजों को उनके सही परिप्रेक्ष्य में नहीं देख पाते, क्योंकि हमारी समझ हमेशा लगाव और विमुखता से रंजित रहती है। सम्यक सफाई की जाने की जरूरत होती है ताकि चीजें वैसी ही नजर आएँ जैसी वे होती हैं।

‘सेक्युलर्टाइटिस’- एक ऐसा उपन्यास, . जिसकी पूरी कहानी हो गई घटित

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धारा ३७० को आधार बना कर लिखे गये इस उपन्यास में धर्मनिरपेक्षता पर व्यापक विमर्श हुआ है और देश के तमाम धर्मनिरपेक्ष दलों की भिन्न-भिन्न धर्मनिरपेक्षी नीतियों-करतुतों को उजागर करते हुए उन्हें तरह-तरह की व्यंग्यात्मक संज्ञा देकर चूभनेवाले विशेषण प्रदान किये गये है । मसलन- कांगेस की जजिया, हजिया, सफेद, रंगीन, दुधारु, गोधरी, निर्माणकारी व तीन सौ सतरी धर्मनिरपेक्षता, तो जदयू के नीतीश की

“शतपथ ब्राह्मण का महत्वपूर्ण लघु परिचयात्मक ग्रन्थ शतपथ सुभाषित”

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  मनमोहन कुमार आर्य शतपथ ब्राह्मण पर स्मृति-शेष प्रतिष्ठित आर्य विद्वान पं. वेदपाल जी ने ‘शतपथ सुभाषित’ नाम से एक लघु पुस्तक लिखी है। इस पुस्तक का प्रकाशन सन् 1998 में हुआ। डा. भवानीलाल भारतीय जी ने इस ग्रन्थ पर अपनी सम्मति दी है जिसे हम प्रस्तुत कर रहे हैं। वह लिखते हैं कि शतपथ… Read more »

‘उत्तर प्रदेश – विकास की प्रतीक्षा में’ पुस्तक समीक्षा

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Bloomsbury प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक में पिछले 15 सालों में सपा-बसपा द्वारा उत्तर प्रदेश में किये गए कु-शासन को विस्तार से व्यापक रिसर्च करके प्रस्तुत किया गया है. इस पुस्तक के लेखक है, शान्तनु गुप्ता, जिन्होंने लंदन से पॉलिसी और राजनीति की पढ़ाई की है। और लम्बे समय से भारत में डिवेलप्मेंट रीसर्च में… Read more »

शिकारी का अधिकार – (व्यंग्य संग्रह) आरिफा एविस

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समीक्षा – बी एन गोयल एक प्रसिद्ध दोहा है – शब्द सम्हारे बोलिए शब्द के हाथ न पांव एक शब्द करे औषधि एक शब्द करे घाव , इस दोहे में एक सलाह दी गयी है कि जब भी कुछ बोलो नाप तोल कर बोलो. सोच समझ कर बोलो. यह सलाह यद्यपि सब के लिए हैं… Read more »

व्यंग्य नव लेखन में ऊँचे दर्जे का अधिकार : शिकारी का अधिकार

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समीक्षक : वरिष्ठ व्यंग्यकार सुरेशकांत पिछले दिनों आयोजित तीन दिवसीय ‘व्यंग्य की महापंचायत’ में कई अनोखी बातें हुईं। पहली तो यही कि बन्दा ‘अट्टहास’ के प्रोग्राम में पहली बार शामिल हुआ । व्यंग्य में गाली-गलौज के प्रयोग और सपाटबयानी पर मेरे विचारों से सभी अवगत हैं, क्योंकि मैं इन पर बहुत कह और लिख चुका… Read more »

दुश्वारियों में यह जो मीडिया है

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अमित राजपूत “जितनी तेज़ी से मीडिया के विविध आयाम विस्तार ले रहे हैं, उतनी ही तेज़ी से उस पर से विश्वास हटने की बात भी सामने आ रही है। ‘कॉरपोरेटिव मीडिया’ नाम की नई खेप हमारे संग है तो ‘ख़बरों’ को ग़ायब करके ‘बहस दर बहस’ करते जाने का मुद्दा भी ज़ोरदार ढंग से उठाया… Read more »

सिंहस्थ की सनातन परंपरा और अमृत की एक बूंद सी – ‘सिंहस्थ”

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समीक्षक – डॉ. विकास दवे सिद्धार्थ शंकर गौतम की पुस्तक सिंहस्थ हाथों में है। ‘प्रभात प्रकाशन” की अपनी गौरवशाली परंपरा का निर्वाह करती-सी यह पुस्तक भी एक ही दृष्टि में अपने भौतिक कलेवर से मन मोह लेती है। आकर्षक आवरण सर्वप्रथम आकर्षित करता है। तत्पश्चात् हमारे समक्ष परत दर परत खुलने लगती है विश्व के… Read more »

पांचो नौबत बाजती –(समीक्षा)

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बी एन गोयल   कल्पना कीजिये- कल्पना क्यों – ये दो वास्तविक प्रकरण हैं. मंच पर कुमार गन्धर्व का गायन चल रहा है – ….उड़ जायेगा ……हंस अकेला ……..भक्ति की रस धार बह रही है, गायक के स्वर सीधे ब्रह्म से जुड़े हैं श्रोता वर्ग मंत्र मुग्ध है, आँखें बंद हैं, कुछ मुंडियां हिल रही… Read more »