“समान नागरिक संहिता” क्यों आवश्यक है…?

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“समान नागरिक संहिता” ऐसी होनी चाहिये जिसका मुख्य आधार केवल भारतीय नागरिक होना चाहिये और कोई भी व्यक्ति किसी भी धर्म, जाति व सम्प्रदाय का हो सभी को सहज स्वीकार हो। जबकी विडम्बना यह है कि एक समान कानून की मांग को साम्प्रदायिकता का चोला पहना कर हिन्दू कानूनों को अल्पसंख्यकों पर थोपने के रुप में प्रस्तुत किया जाने का कुप्रचार किया जा रहा है। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि 1947 में हुए धर्माधारित विभाजन के पश्चात भी हम आज लगभग 70 वर्ष बाद भी उस विभाजनकारी व समाजघाती सोच को समाप्त न कर सकें बल्कि उन समस्त कारणों को अल्पसंख्यकवाद के मोह में फंस कर प्रोत्साहित ही करते आ रहे है। हमारे मौलिक व संवैधानिक अधिकारो व साथ में पर्सनल लॉ की मान्यताए कई बार विषम परिस्थितियां खड़ी कर देती है , तभी तो उच्चतम न्यायालय “समान नागरिक संहिता” बनाने के लिए सरकार से बार-बार आग्रह कर रहा है।

अज़ान पर फिजूल की बहस

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क्या लाउडस्पीकर पर जोर-जोर से चिल्लाना इस्लाम है? इस्लाम का जन्म हुआ तब कौन से लाउडस्पीकर चल रहे थे? सच्ची प्रार्थना तो वहीं है, जो मन ही मन की जाती है। ईश्वर या अल्लाह बहरा नहीं है कि उसे कानफोड़ू आवाज़ में सुनाया जाए। शायद इसलिए कबीर ने कहा हैः
कांकर-पाथर जोड़ि के मस्जिद लई चुनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, बहरा हुआ खुदाय।।

 मेहताब (चाँदनी) बाग आगरा की खासियत

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हाल ही में की गई खुदाई से एक विशाल अष्टकोणीय टैंक 25 फव्वारे, एक छोटे से केंद्रीय टैंक और पूर्व में एक बरादरी के साथ सुसज्जित का पता चला। साइट भी काले ताज के मिथक के साथ जुड़ा हुआ है, लेकिन खुदाई के एक उद्यान परिसर के लिए पर्याप्त सबूत उपलब्ध कराई है। नदी के बाँये तट पर ताजमहल के विपरीत दिशा में स्थित बगीचे के परिसर को मेहताब बाग या ‘चाँदनी बाग’ के नाम से जाना जाता है। पहले

जानिए चाकू और वास्तु का सम्बन्ध–

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नुकीले चीजों का नुकीला हिस्सा हमेशा अंदर की ओर ही रखना चाहिए। इससे जहां किसी को चोट या कट लगने की संभावनाएं कम हो जाती हैं वहीं कई अन्य फायदे भी हैं। नुकीला हिस्सा बाहर रखने पर वातावरण की नकारात्मक ऊर्जा को बल मिलता है और सकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव कम हो जाता है। इससे परिवार के सदस्यों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इसी वजह से नुकीला हिस्सा हमेशा अंदर की ओर रखना चाहिए और चाकू या कैंची जैसे धारदार औजार बच्चों की पहुंच से दूर रखने चाहिए।

‘नोटबंदी’ के बाद ‘बत्ती बंदी’ यानी बड़ा फैसला…

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अब बात करें राज्य सरकारों की तो, केन्द्र की भांति राज्य सरकार इस पर फैसला खुद लेगी,लेकिन माना जा रहा है कि केन्द्रीय फैसले के बाद राज्यों पर इसे लागू करने का दबाव रहेगा। दरअसल खासकर भाजपा शासित राज्यों पर इसका सीधा असर आएगा। हालांकि,पहले बहुत सारे मंत्री ‘लालबत्ती’ होने के पक्ष में बयान देते रहे हैं,तो अब इसे छोड़ने से उनके दिल में कसक तो रहेगी,पर इसे जनहित में सही समय पर लिया गया स्वस्थ निर्णय मानना इनकी भी मजबूरी है। यदि फैसले की खिलाफत की तो सम्भव है कि,पीएम ऐसे मंत्रियों को पुराने नोट की तरह अनुपयोगी कर दें।

क्या सचमुच ईश्वर/प्रभु/भगवान/अल्लाह की आराधना करने के लिए लाउडस्पीकर पर चिल्लाने की जरुरत होती हैं ??

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मैं नास्तिक नही हूं लेकिन मेरा धर्म को लेकर किसी भी तरह की मॉब प्रैक्टिस (भीड़ में प्रार्थना) में भरोसा नहीं है। सोनू निगम को ट्विटर पर ट्रेंड करते देख कर लगा कि शायद कोई नया म्यूजिक अलबम आया है। लेकिन जब चेक किया तो पता चला उन्होंने मेरी दुखती रग पर हाथ रख दिया… Read more »

उत्तराखंड में जल संकट :चुनोतियाँ व समाधान की दिशा में प्रयास

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वास्तव में पेयजल संकट आगामी भविष्य के लिए एक चुनोतिपूर्ण विषय है । इस जटिल समस्या के निवारण के लिए हमें केवल सरकारी नीतियों के भरोशे न बैठकर जनता को भी जागरूक करना होगा जिससे हम प्रकृति द्वारा प्रदत्त इस मूल्यवान संसाधन को अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए संजोकर रख पाएं। गाँवो से शहरो की तरफ होने वाले तीव्र पलायन के कारण शहरो पर अतरिक्त जनसंख्या दवाब बढ़ रहा है इस जनसंख्या दवाब के कारण शहरो में पेयजल की किल्लत साफ़ नज़र आती है । उत्तराखंड के अनेक इलाके ऐसे है जहाँ पानी भरने के लिए लोगो को घण्टों भर लाइन में रहना पड़ता है यह समस्या केवल शहरो में ही नही बल्कि उत्तराखंड के अनेक पहाड़ी गाँवो की भी है जहा आज भी महिलाए किलोमीटर दूर पैदल चलकर पानी लाकर अपनी आवश्यकताओ को पूरा करती है ।

गांधीवाद की परिकल्पना-7

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नैतिक मूल्यों के आधार बनाकर भी गांधीवाद का एक धूमिल चित्र भारत में गांधीवादियों ने खींचने का प्रयास किया है। गांधीजी भारतीय राजनीति को धर्महीन बना गये। वह उसे संप्रदाय निरपेक्ष नहीं बना सके, अपितु उसे इतना अपवित्र करन् दिया है कि वह सम्प्रदायों के हितों की संरक्षिका सी बन गयी जान पड़ती है। इससे भारतीय राजनीति पक्षपाती बन गयी। जहां पक्षपात हो वहां नैतिक मूल्य ढूंढऩा ‘चील के घोंसले में मांस ढूढऩे के बराबर’ होता है। नैतिक मूल्य, नीति पर आधारित होते हैं नीति दो अक्षरों से बनी है-नी+ति। जिसका अर्थ है एक निश्चित व्यवस्था। नीति निश्चित व्यवस्था की संवाहिका है, ध्वजवाहिका है और प्रचारिका है।

ध्वनि प्रदूषण न हिन्दू न मुस्लिम,केवल हानिकारक

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धर्मस्थलों पर नियमित रूप से निर्धारित समय-सारिणी के अनुसार होने वाले इस शोर-शराबे से लगभग पूरा देश दु:खी है। ध्वनि प्रदूषण बच्चों की पढ़ाई खासतौर पर परीक्षा के दिनों में उनकी परीक्षा की तैयारी में अत्यंत बाधक साबित होता है। मरीज़ों तथा वृद्ध लोगों के लिए ध्वनि प्रदूषण किसी मुसीबत से कम नहीं। आए दिन होने वाले जगराते,कव्वालियां या दूसरे शोर-शराबे से परिपूर्ण धार्मिक आयोजन यह सब हमारे समाज के स्वास्थय पर बुरा असर डालते हैं।

गांधीवाद की परिकल्पना-6

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”जब सिद्घांत का प्रश्न होता था, तब गांधीजी हिंदुओं की भावनाओं का रंचमात्र भी ध्यान रखे बिना अत्यंत दृढ़ रहते थे, परंतु मुसलमान यदि उसी सिद्घांत का उल्लंघन करें, तो वह बहुत नरमी बरतते थे। मुझे यह बात किसी तरह समझ नहीं आती थी कि अपने देश में करोड़ों लोगों को अपनी नग्नता ढांपने के साधन (कपड़ों) से वंचित करने और उन्हीं कपड़ों को एक दूरस्थ देश तुर्की भेज देने में गांधीजी की ऐसी कौन सी नैतिकता थी?”