जानिए घर में नई बहू के आने से क्यों आने लगती है पारिवारिक रिश्तों में दरार —

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 सही है की कई बार हमें ऐसा देखने और सुनने में आता है, कि किसी परिवार में नई बहू के गृह-प्रवेश के बाद से ही घर में अचानक खूब तरक्की होने लगी या अचानक ही घर के हालात बिगड़ने लगे। ऐसे बदले हालात की स्थिति में उस घर में हो रहे अच्छे या बुरे का… Read more »

जानिए सुखी वैवाहिक जीवन के लिए कुछ विशेष उपाय –

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मनुष्य के पूरे जीवन में कई दफा ऐसी समस्या आ जाती है जो उसके जीवन पर बहुत ही बुरा असर डालती है अक्सर व्यक्ति का वैवाहिक जीवन कई ऐसी समस्याओं का शिकार हो जाता है जिनको उसके साथ किसी भी प्रकार का वास्ता नहीं होता है । पर हम आपके लिए कुछ ऐसे उपायों को… Read more »

भोग से मुक्ति का मार्ग दिखाता है योग

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आज जब सम्पूर्ण विश्व योग के महत्व को समझ रहा है तो हम लोग भी इसे अपने आचरण में उतार कर न सिर्फ अपने स्वयं के स्वास्थ्य बल्कि अपने आस पास के सम्पूर्ण वातावरण में एक नई ऊर्जा का संचार कर सकते हैं। जिस प्रकार हमारे शरीर का कोई भी अंग तभी तक जीवित रहता है जब तक कि वह हमारे शरीर से जुड़ा है,कोई भी फूल, पत्ता या फिर फल जब तक अपने पेड़ से जुड़ा है सुरक्षित एवं संरक्षित है उसी प्रकार हमें भी अपनी सुरक्षा के लिए प्रकृति से जुड़ना होगा यह बात योग हमें सिखाता है।

साम्प्रदायिक सद्भाव एक मृग मरीचिका

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राष्ट्रवाद को झुठलाने की एक और घटना जब सितम्बर 2008 में बटला हाउस (दिल्ली) में आजमगढ़ के आतंकियों को मारा गया तो उसमे दिल्ली पुलिस के शूरवीर इंस्पेक्टर के बलिदान को ही संदेहात्मक बना दिया और (छदम्) धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुस्लिम आतंकियो के घर आजमगढ़ जाने की नेताओं में होड़ ही लग गयी थी। यहा तक समाचार आये थे कि उस समय सत्ता के शीर्ष को नियंत्रित करने वाली सोनिया गांधी ने भी आजमगढ़ के आतंकवादियों पर आंसू बहायें थे ।

हमारा समाज पुरूष प्रधान नही वरन महिला प्रधान

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भारतीय परिदृष्य में यदि बात की जाए तो यह कहा जाता है कि हमारा समाज पूरूष प्रधान है , परंतु यह कहना अर्धसत्य जैसा ही होगा क्योकि वह समाज पूरूष प्रधान केसे हो सकता है जहाॅ पुरूषों की उत्पत्ति का आधार ही महिलाए है। बल्कि यदि यह कहा जाए तो गलत नही होगा कि हमारा समाज पुरूष प्रधान नही वरन महिला प्रधान है वर्तमान परिवेष में जब महिलाओं का समान अधिकार देने व उन्हे आगे बढाने की बाते जोर पकड रही है तो यह ध्यान रखना होगा कि इस प्रकार की बाते सिर्फ मंचो से लोगों की तालिया बटोरने भर के लिए नहीं कही जाए वरन दोहरे व्यक्तित्व को छोडकर राजनैतिक पूरोधाओं को भी नारी शक्ति के अस्तित्व को न सिर्फ मंचो से बल्कि वास्तविक जीवन मे भी सत्यता से स्वीकार व अंगीकार करना होगा।

बचपन हुआ नशे में चूर

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तम्बाकू उत्पाद के कुप्रभाव को रोकने के लिए सार्वजनिक स्थानांे पर धूम्रपान को अपराध घोषित किया गया है। जिसके उलंघन पर 200 रूपये के जुर्माने का प्राविधान है। दुकानों पर निर्धारित आकार में हानियों को प्रदर्शित करने वाला बोर्ड़ भी लगा होना चाहिए। कम आयु वर्ग को अथवा उसके द्वारा तम्बाकू उत्पाद बेचने को अपराध घोषित किया गया है। नियम तो यहां तक है कि तम्बाकू उत्पाद बिक्री स्थान पर नाबालिग दिखाई भी न पडे़। और शिक्षण संस्थानो के 100 गज के दायरे में ऐसे उत्पादो की बिक्री अपराध है।

अनोखा मदरसा ‘मुईन उल इस्लाम’ में सद्भावना का पाठ

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आगरा देवरैठा का मदरसा हिंदू-मुस्लिम एकता की किसी मिसाल से कम नहीं है। यहां धर्म की दीवार तोड़ बच्चे उर्दू और संस्कृत दोनों विषयों की शिक्षा एकसाथ गृहण कर रहे हैं। मुस्लिम बच्चे संस्कृत के श्लोकों का उच्चारण जबकि हिंदू बच्चे कुरान की आयतें पढ़ते हैं। शिक्षक हों या बच्चे, सभी कहते हैं, मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना। कक्षा आठ की छात्रा निशा खान के मुंह से गायत्री मंत्र का उच्चारण सुन लगेगा मानो इस बच्ची की जुबां पर स्वयं सरस्वती मां विराजमान हो गई हैं। मासूम से चेहरे पर न तो किसी धर्म की परछाई दिखाई पढ़ती है और न ही किसी प्रकार का धार्मिक भेदभाव। कक्षा सात के छात्र ऋषभ उर्दू सीखता है और कुरान की आयतें भी पढ़ता है।

डा. अम्बेदकर को पूर्व जन्म के महान् संस्कारों ने उच्च स्थान प्राप्त कराया

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  मनमोहन कुमार आर्य डा. अम्बेदकर जी के जन्म दिवस 14 अप्रैल को 4 दिन व्यतीत हो चुके हैं। उस दिन हम उन पर कुछ लिखना चाहते थे परन्तु लिख नहीं सके। हमारा मानना है कि किसी महापुरुष के जीवन पर चिन्तन करना केवल जन्म दिन व पुण्य तिथि पर ही उचित नहीं होता अपितु… Read more »

हमारे मुसलमान भी क्या मुसलमान हैं?

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तीन तलाक, निकाह हलाला, बहुपत्नीवाद, पशु-बलि, बुर्का, मांसाहार, ताबीज, आदि ये सब बातें किसी भी धर्म के शाश्वत और सार्वदेशिक लक्षण नहीं हो सकते। इन्हें देश-काल के मुताबिक बदलते रहना चाहिए। यही बात शरिया, रोमन और ग्रीक लॉ पर भी लागू होती है। आज स्त्री-पुरुष समानता का युग है। इसमें यदि आदमी तीन बार बोलकर औरत को तलाक दे सकता है तो औरत भी तीन बार बोलकर आदमी को

नारी मुक्ति की यन्त्रणा

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औद्योगिक समाज में पुरुष और नारी के बीच का समीकरण बदला। औरत और मर्द के बीच समानता की अवधारणा उभड़ी। लिंग आधारित श्रम-विभाजन की अवधारणा पर सवाल उठने लगे। और नारी पुरुष का सम्पर्क पूरक होने के बजाय योगात्मक होने लग गया। स्त्रियों का कर्मक्षेत्र घर की चाहरदीवारी से बाहर भी प्रतिष्ठित हुआ और पारस्परिक निर्भरशीलता की बाध्यता में कमी आई। औरतों के हाथ में आर्थिक क्षमता आने के साथ परम्परा से सम्मानित पितृसत्ता में दरारें पड़ने लगीं।