हमारा समाज पुरूष प्रधान नही वरन महिला प्रधान

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भारतीय परिदृष्य में यदि बात की जाए तो यह कहा जाता है कि हमारा समाज पूरूष प्रधान है , परंतु यह कहना अर्धसत्य जैसा ही होगा क्योकि वह समाज पूरूष प्रधान केसे हो सकता है जहाॅ पुरूषों की उत्पत्ति का आधार ही महिलाए है। बल्कि यदि यह कहा जाए तो गलत नही होगा कि हमारा समाज पुरूष प्रधान नही वरन महिला प्रधान है वर्तमान परिवेष में जब महिलाओं का समान अधिकार देने व उन्हे आगे बढाने की बाते जोर पकड रही है तो यह ध्यान रखना होगा कि इस प्रकार की बाते सिर्फ मंचो से लोगों की तालिया बटोरने भर के लिए नहीं कही जाए वरन दोहरे व्यक्तित्व को छोडकर राजनैतिक पूरोधाओं को भी नारी शक्ति के अस्तित्व को न सिर्फ मंचो से बल्कि वास्तविक जीवन मे भी सत्यता से स्वीकार व अंगीकार करना होगा।

नारी मुक्ति की यन्त्रणा

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औद्योगिक समाज में पुरुष और नारी के बीच का समीकरण बदला। औरत और मर्द के बीच समानता की अवधारणा उभड़ी। लिंग आधारित श्रम-विभाजन की अवधारणा पर सवाल उठने लगे। और नारी पुरुष का सम्पर्क पूरक होने के बजाय योगात्मक होने लग गया। स्त्रियों का कर्मक्षेत्र घर की चाहरदीवारी से बाहर भी प्रतिष्ठित हुआ और पारस्परिक निर्भरशीलता की बाध्यता में कमी आई। औरतों के हाथ में आर्थिक क्षमता आने के साथ परम्परा से सम्मानित पितृसत्ता में दरारें पड़ने लगीं।

अनचाही बेटियाँ

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समाज में लिंग अनुपात संतुलन लगातार बिगड़ रहा है. वर्ष 1961 से लेकर 2011 तक की जनगणना पर नजर डालें तो यह बात साफ तौर पर उभर कर सामने आती है कि 0-6 वर्ष आयु समूह के बाल लिंगानुपात में 1961 से लगातार गिरावट हुई है पिछले 50 सालों में बाल लिंगानुपात में 63 पाइन्ट की गिरावट दर्ज की गयी है. लेकिन पिछले दशक के दौरान इसमें सांसे ज्यादा गिरावट दर्ज की गयी है

माँ, ममता और महिला

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‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:’ की आध्यात्मिक ताक़त वाला राष्ट्र जिसकी रगों में नारी का सम्मान बसा हुआ है, किंतु दुर्भाग्य इस कलयुगी पौध का जो यौवन के मदमास में अपने गौरवशाली इतिहास की किताबो को कालिख पोतते हुए अपमान के नए अंगवस्त्र तैयार कर रही है, वो भूल गई ‘यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्रफला: क्रिया’ अर्थात जिन घरों में स्त्रियों का अपमान होता है, वहां सभी प्रकार की पूजा करने के बाद भी भगवान निवास नहीं करते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस

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माता का हमेशा सम्मान हो मां अर्थात माता के रूप में नारी, धरती पर अपने सबसे पवित्रतम रूप में है। माता यानी जननी। मां को ईश्वर से भी बढ़कर माना गया है, क्योंकि ईश्वर की जन्मदात्री भी नारी ही रही है। मां देवकी (कृष्ण) तथा मां पार्वती (गणपति/ कार्तिकेय) के संदर्भ में हम देख सकते हैं इसे। किंतु बदलते समय के हिसाब से संतानों ने अपनी मां को महत्व देना कम कर दिया है। यह चिंताजनक पहलू है।

कौन कहता है कि तुलसी की नारी है ताडऩ की अधिकारी

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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च पर विदेश राकेश कुमार आर्य तुलसी के राम बाल्मीकि के राम से कई रूपों में भिन्न हैं। ऐसा प्रक्षेपों के कारण तो हुआ ही है साथ ही अर्थ का अनर्थ कर देने से भी हुआ है। असंगत अर्थों को और अतार्किक बातों को हमने पत्थर की लकीर मान लिया और… Read more »

आधी दुनिया के हिस्से को पूरा हक

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विश्व महिला दिवस पर 8 मार्च पर विशेष एक अनजाना सा गांव पुलवाही देश ही नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय फलक पर चमक उठा है. ग्राम फलवानी डिंडोरी जिले के मेहदवानी विकासखंड में आता है. भौगोलिक रूप से यह गांव, विकासखंड और जिला मध्यप्रदेश में है लेकिन इस पर कभी मध्यप्रदेश का अविभाज्य अंग रहे छत्तीसगढ़ की… Read more »

मातृशक्ति को अपने अधिकारों और शक्ति को पहचानने की जरुरत

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आज जरूरत है कि समाज में महिलाओं को अज्ञानता, अशिक्षा, कूपमंण्डुकता, संकुचित विचारों और रूढिवादी भावनाओं के गर्त से निकालकर प्रगति के पथ पर ले जाने के लिए उसे आधुनिक घटनाओं, ऐतहासिक गरिमामयी जानकारी और जातीय क्रियाकलापों से अवगत कराने के लिए उसमे आर्थिक ,सामजिक, शैक्षिक, राजनैतिक चेतना पैदा करने की। जिससे की नारी पुरुषों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर समाज को आगे बढाने में सहयोग कर सके।

नारी अस्तित्व एवं अस्मिता पर धुंधलके क्यों?

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-ललित गर्ग- सम्पूर्ण विश्व में नारी के प्रति सम्मान एवं प्रशंसा प्रकट करते हुए 8 मार्च का दिन उनकी सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक उपलब्धियों के उपलक्ष्य में, उत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन से पहले और बाद में हफ्ते भर तक विचार विमर्श और गोष्ठियां होंगी जिनमें महिलाओं से जुड़े मामलों जैसे… Read more »

आत्मनिर्भर महिलाओं की नई दुनिया

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महिलाएं आत्मनिर्भर कैसे होती हैं? इसका जीता-जागता मिसाल देखना है तो आपको छत्तीसगढ़ आना पड़ेगा. एक नगर, एक कस्बा या एक गांव में एक आत्मनिर्भर महिला की संख्या आप अंगुलियों पर नहीं गिन पाएंगे. कहीं पूरा का पूरा गांव महिलाओं के आत्मनिर्भरता की पहचान बन गया है तो कहीं समूह आत्मनिर्भर है. कुछ ऐसी जगह… Read more »