भगवा और हरा

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राष्ट्रीय ध्वज के शीर्ष में लगा, भगवा को आदर हमने दिया।
विदेशी हमले से ही आकरके, हरा रंग यहां फहराती है ।।
भारत का मूल स्वरूप चेतना, औ गरिमा को गिरा दिया।
हरा को बढ़ाचढ़ा करके, सभ्यता संस्कार धुलवाती है ।।4।।

मोदी विश्व का नेता बन, योगी गुरु जगत कहायेगा।।

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यूपी में ना शासन था, सब हाथ पर हाथ धरे रहे।
योगीजी के आते ही, सब द्रुत गति से बदल रहे।।
वह वक्त एक दिन आयेगा, योगी मोदी बन जाएगा।
मोदी विश्व का नेता बन, योगी गुरु जगत कहायेगा।।

इन रंगन से अब का डरनो, अब तो आ गई होरी

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कुछ रंगन में भंग परी है, कुछ रंगन में हाला, कुछ रंगन में गोरी, कुछ रंग गड़बड़ झाला। वीरू-जय औ पप्पू-टीपू ले रंगन को प्याला, हाथी, झाडू़, सीटी, नारियल हर रंग शतरंज वाला। कौन रंग वोटर मन भावे, जो रंगरेज़, सोई जाने ईवीएम को तो कमीशन जाने, हम तो जाने रंग तिरंगो वाला। इन रंगन… Read more »

आओ खेलें वैदिक होली

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विमलेश बंसल ‘आर्या’ होली को पावन त्यौहार आज कछु ऐसे मनाऊँगी। लगाकर सबके चंदन माथे, सौम्य हो जाऊंगी। बड़ों को करके ॐ नमस्ते, छोटों को हृदय लगाऊंगी। नवान्न आटे की गुजिया बना, प्रसाद बनाऊंगी। वृहद यज्ञ सामूहिक कर के नौत खिलाऊंगी। उंच नीच का भेद भुलाकर, प्रीति निभाऊंगी उत्तम पेय पिला ठंडाई, फाग गवाऊँगी। पूरे… Read more »

सत्य पथ का मुसाफिर

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कुमार विमल कोई पथ जाती है धन को, कोई सुख साधन को, और कोई प्रेमिका के मधुर चितवन को। पर छोड़ ये सारे सुलभ पथ को तूने चुना है  सत्य को नमन है तेरे त्याग और तप को।   पग-पग है संग्राम जिस पथ का, मापदंड साहस जिस पथ का , इंतिहान तप,तेज और बल… Read more »

उर में आता कोई चला जाता !

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उर में आता कोई चला जाता, सुर में गाता कभी है विचलाता; सुनहरी आभा कभी दिखलाता, कभी बे-रंग कर चला जाता ! वश भी उनका स्वयं पे कब रहता, भाव भव की तरंगें मन बहता; नियंत्रण साधना किये होता, साध्य पर पा के वो कहाँ रहता ! जीव जग योजना विविध रहता, विधि वह उचित… Read more »

हे खाली  बोतल बता 

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सिया अर्पण राम हे खाली बोतल बता तुझे तो होगा पता क्या  था तेरे अंदर ऐसा जिसे पहली बार पीकर ही हो गए वे बावले और छोड़ दिया सब घर-बार दूसरो के हवाले हे खाली बोतल बता तुझे तो होगा पता ऐसी क्या थी वह तरल जवाब तो होगा सरल हे खाली बोतल बता तुझे… Read more »

वाल बहु व्यस्त जगत विच रहता !

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वाल बहु व्यस्त जगत विच रहता, निरीक्षण करना बहुत कुछ होता; जाना पहचाना पुरातन होता, परीक्षण करना पुन: पर होता ! समय से बदलता विश्व रहता, द्रष्टा भी वैसा ही कहाँ रहता; द्रष्टि हर जन्म ही नई होती, कर्म गति अलहदा सदा रहती ! बदल परिप्रेक्ष्य पात्र पट जाते, रिश्ते नाते भी हैं सब उलट… Read more »

ढ़ूँढ़ने में लगाया हर कोई !

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ढ़ूँढ़ने में लगाया हर कोई, बना ऋषि घुमाया है हर कोई; ख़ुद छिपा झाँकता हृदय हर ही, कराता खोज स्वयं अपनी ही ! पूर्ण है पूर्ण से प्रकट होता, चूर्ण में भी तो पूर्ण ही होता; घूर्ण भी पूर्ण में मिला देता, रहस्य सृष्टि का समझ आता ! कभी मन द्रष्टि की सतह खोता, कभी… Read more »