उर में आता कोई चला जाता !

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उर में आता कोई चला जाता, सुर में गाता कभी है विचलाता; सुनहरी आभा कभी दिखलाता, कभी बे-रंग कर चला जाता ! वश भी उनका स्वयं पे कब रहता, भाव भव की तरंगें मन बहता; नियंत्रण साधना किये होता, साध्य पर पा के वो कहाँ रहता ! जीव जग योजना विविध रहता, विधि वह उचित… Read more »

हे खाली  बोतल बता 

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सिया अर्पण राम हे खाली बोतल बता तुझे तो होगा पता क्या  था तेरे अंदर ऐसा जिसे पहली बार पीकर ही हो गए वे बावले और छोड़ दिया सब घर-बार दूसरो के हवाले हे खाली बोतल बता तुझे तो होगा पता ऐसी क्या थी वह तरल जवाब तो होगा सरल हे खाली बोतल बता तुझे… Read more »

वाल बहु व्यस्त जगत विच रहता !

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वाल बहु व्यस्त जगत विच रहता, निरीक्षण करना बहुत कुछ होता; जाना पहचाना पुरातन होता, परीक्षण करना पुन: पर होता ! समय से बदलता विश्व रहता, द्रष्टा भी वैसा ही कहाँ रहता; द्रष्टि हर जन्म ही नई होती, कर्म गति अलहदा सदा रहती ! बदल परिप्रेक्ष्य पात्र पट जाते, रिश्ते नाते भी हैं सब उलट… Read more »

ढ़ूँढ़ने में लगाया हर कोई !

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ढ़ूँढ़ने में लगाया हर कोई, बना ऋषि घुमाया है हर कोई; ख़ुद छिपा झाँकता हृदय हर ही, कराता खोज स्वयं अपनी ही ! पूर्ण है पूर्ण से प्रकट होता, चूर्ण में भी तो पूर्ण ही होता; घूर्ण भी पूर्ण में मिला देता, रहस्य सृष्टि का समझ आता ! कभी मन द्रष्टि की सतह खोता, कभी… Read more »

प्रेरणा

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बस्ती – बस्ती गली – गली फैली एक निराशा | कल कल करती बहती नदियां फिर भी मैं हूं प्यासा || जीवन के दुख द्वन्द लिए पागल पथिक सा चलता जाऊं | एक क्षण में रोता हूं दूजे क्षण मैं गाता जाऊं || समझ चुका था जीवन का हर नियम और वो कायदा | तपकर… Read more »

गीत सुनाने निकली हूँ

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भारत माँ की बेटी हूँ और गीत सुनाने निकली हूँ, वीरों की गाथा को जन जन तक पहुँचाने निकली हूँ, भारत माँ के शान के खातिर सरहद पर तुम ड़टे रहे, सर्दी गर्मी बरसातों में भी तुम अड़िग वीर बन खड़े रहे, कोई माँ कहती है कि मेरा लाल गया है सीमा पर, दुश्मन को… Read more »

संस्कार सुर में फुरक कर !

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संस्कार सुर में फुरक कर, ‘सो-हं’ की गंगा लुढ़क कर; ‘हं’ तिरोहित ‘सो’ में हुआ, ‘सो’ समाहित ‘हं’ में हुआ ! वह विराजित विभु में हुआ, अपना पराया ना रहा; अपनत्व पा महतत्व का, था सगुण गुण ले मन रहा ! शाश्वत खिला पा द्युति दिशा, मन महल वत चमका किया; रहना था बस उसका… Read more »

जो रक्तकणों से लिखी गई,जिसकी “जयहिन्द” निशानी है ।

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सुभाष चंद्र बोस*भारत के अमर स्वतन्त्रता सेनानी नेताजी शुभाषचन्द्र बोस के * * जन्मदिवस २३ जनवरी के पुनीत अवसर पर श्रद्धा सुमन -* है समय नदी की बाढ़ कि, जिसमें सब बह जाया करते हैं , है समय बड़ा तूफ़ान , प्रबल पर्वत झुक जाया करते हैं । अक्सर दुनिया के लोग समय में, चक्कर… Read more »

खड़े जब अपने पैर हो जाते !

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खड़े जब अपने पैर हो जाते, आत्म विश्वास से हैं भर जाते; सिहर हम मन ही मन में हैं जाते, अजब अनुभूति औ खुशी पाते ! डरते डरते ही हम ये कर पाते, झिझकते सोचते कभी होते; जमा जब अपने पैर हम लेते, झाँक औरों की आँख भी लेते ! हुई उपलब्धि हम समझ लेते,… Read more »

साथ जो छोड़ कर चले जाते !

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(मधुगीति १७०११४ ब) साथ जो छोड़ कर चले जाते, लौटकर देखना हैं फिर चहते; रहे मजबूरियाँ कभी होते, वक़्त की राह वे कभी होते ! देखना होता जगत में सब कुछ, भोग संस्कार करने होते कुछ; समझ हर समय कोई कब पाता, बिना अनुभूति उर कहाँ दिखता ! रहते वर्षों कोई हैं अपने बन, विलग… Read more »