मेरा एकालाप

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बोल उठी तब त्रिपुरसुंदरी
तू डूबे क्यों,क्यों पार तरे?

तेरे समस्त गान, रुदन औ’ हास
ऊँ नमो मणिपद्मे हुं का पाठ
तेरा प्रचलन मेरी प्रदक्षिणा
तेरा कुछ भी मेरा सबकुछ

ओ मेरे प्यारे अबोध शिशु
गोद भरे,तू मुझमें नित-नूतन मोद भरे।

रेलवे स्टेशन पर: बारिश की एक शाम

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आशुतोष माधव भीग-भीग कर सड़ता एक पीला उदास स्टेशन. जर्जर सराय सा, हाँफ-हाँफकर पहुँचते जाने कितने कलावंत गर्जन तर्जन लोहित देह; कुछ श्रीमंत केवल छूकर कर जाते छि:, चलन ऐसा मानो मैनाक को धन्य कर रहे हों हनुमान. यह प्रौढ़ा चिर-सधवा पीली देह उदास तार तार उतारती रहती पार-पार नाविक तरणी पतवार मँझधार शहरी गँवार… Read more »

सुकमा और कुपवाड़ा में शहीद हुए अमर शहीदों को श्रद्धांजलि

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व्यथित है मेरी भारत माँ, कैसे छंद प्यार के गाऊँ कैसे मैं श्रृंगार लिखुँ, कैसे तुमको आज हँसाऊ कलम हुई आक्रोशित, शोणित आखर ही लिख पाऊँ वीर शहीदों की शहादत को , शत शत शीश झुकाऊँ   सिंदूर उजड़ गया माथे का, कंगना चूर चूर टूटे शहीद की विधवा के, पायल बिंदिया काजल छूटे हृदय… Read more »

किलकि चहकि खिलत जात !

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किलकि चहकि खिलत जात ! किलकि चहकि खिलत जात, हर डालन कलिका; बागन में फागुन में, पुलक देत कहका ! केका कूँ टेरि चलत, कलरव सुनि मन चाहत; मौन रहन ना चहवत, सैनन सब थिरकावत ! चेतन जब ह्वै जावत, उर पाँखुड़ि खुलि पावत; अन्दर ना रहि पावत, बाहर झाँकन चाहत ! मोहत मोहिनी होवत,… Read more »

आज मेरे देश की ज़मीं जी भर के रोई है,

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हिमांशु तिवारी आत्मीय   अपने लाल की फिक्र में वो न रात सोई है, हौले से उठाती है वो अपना आंचल, सूखे हुए आंसुओं से भी तलाश लेती है हर दर्द उसका, वो उंगलियां थामकर चलता था, हर तकलीफ में उसे मां याद आती थी, नींद न आती तो मां उसे लोरियां सुनाती थी, कई… Read more »

धरती बेहद उदास है..

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२२ अप्रैल – पृथ्वी दिवस पर विशेष कहते हैं, इन दिनों धरती बेहद उदास है इसके रंजो-गम के कारण कुछ खास हैं। कहते हैं, धरती को बुखार है; फेफङें बीमार हैं। कहीं काली, कहीं लाल, पीली, तो कहीं भूरी पङ गईं हैं नीली धमनियां। कहते हैं, इन दिनों…. कहीं चटके… कहीं गादों से भरे हैं… Read more »

उठे कहाँ मन अब तक !

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शब्द परश रूप गंध, रस हैं तन्मात्रा;
छाता जब श्याम भाव, होता मधु-छत्ता !

राधा भव-बाधा हर, मिल जाती भूमा;
अणिमा महिमा गरिमा, भा जाती लघिमा !
तनिमा तरती जड़ता, सुरभित कर उर कलिका;
झंकृत तन्त्रित झलका, सुर आता रस छलका !

नन्हीं जी

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आज हमारी नन्हीं जी ने, रोटी सुन्दर गोल बनाई। कई दिनों से सीख रही थी, रोटी गोल बनेगी कैसे। बन जाता आकार चीन सा, कभी बना रशिया के जैसे। बहुत दिनों के बाद अधूरी, साध आज पूरी हो पाई। हँसा गैस का चूल्हा,काला, गूँगा ,गोल तवा मुस्काया। पटा और बेलन ने उससे, हलो कहा और… Read more »

कुलभूषण जाधव की फाँसी पर सवाल करती कविता

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ना मानेगा धूर्त पड़ौसी ,  शांति की वार्ताओं से अब हल नहीं निकलेगा , सिर्फ कड़ी निंदाओ से कुलभूषण की फाँसी पर ,क्यों मौन साधना साधे हो अफजल के चाचाओं ,क्या सिर्फ दुश्मन के प्यादे हो सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर , रतजागा सा कर डाला एक आतंकी की फांसी पर , रोये थे जो… Read more »