खड़े जब अपने पैर हो जाते !

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खड़े जब अपने पैर हो जाते, आत्म विश्वास से हैं भर जाते; सिहर हम मन ही मन में हैं जाते, अजब अनुभूति औ खुशी पाते ! डरते डरते ही हम ये कर पाते, झिझकते सोचते कभी होते; जमा जब अपने पैर हम लेते, झाँक औरों की आँख भी लेते ! हुई उपलब्धि हम समझ लेते,… Read more »

साथ जो छोड़ कर चले जाते !

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(मधुगीति १७०११४ ब) साथ जो छोड़ कर चले जाते, लौटकर देखना हैं फिर चहते; रहे मजबूरियाँ कभी होते, वक़्त की राह वे कभी होते ! देखना होता जगत में सब कुछ, भोग संस्कार करने होते कुछ; समझ हर समय कोई कब पाता, बिना अनुभूति उर कहाँ दिखता ! रहते वर्षों कोई हैं अपने बन, विलग… Read more »

बोन्साई

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मेरी ज़ड़ों को काट छाँट के, मुछे बौना बना दिया, अपनी ख़ुशी और सजावट के लिये मुझे, कमरे में रख  दिया। मेरा भी हक था, किसी बाग़ मे रहूँ, ऊँचा उठू , और फल फूल से लदूँ। फल फूल तो अब भी लगेंगे, मगर मै घुटूगाँ यहीं तुम्हारी, सजावट के शौक के लिये, जिसको तुमने… Read more »

आज नया कुछ लिख ही दूँ

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कुछ नया करने की चाह में, अपनी ही कविताओं के, अंग्रेज़ी में अनुवाद कर डाले, या उन्हे ही उलट पलट कर, दोहे कुछ बना डाले। जो कल नया था आज पुराना सा लगने लगा है अब….. तो सोचा….. आज कुछ नया ही लिख दूँ। रोज़ होते रहे बलात्कार, उनपर टीका टिप्पणी और विश्लेषण तो अब… Read more »

दिल्ली पुस्तक मेला

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प्रगति मैदान लग गया,पुस्तक का भण्डार अपना अपना शोर है, अपनी अपनी रार! बड़े-बड़े लोगों के ,अपने अपने स्टाल, वे ही सब ले जायेंगे,पुरुस्कार या शाल! बड़े बड़े अब रचयिता, आये दिल्ली द्वार, किसकी किताब ने किया,सर्वाधिक व्यापार? कवि व्यापारी से लगें,जब बेचते किताब, आज एक से लग रहे, आफ़ताब महताब! मेला किताब का लगा,होगा… Read more »

माँ तुम्हें पुकारती, माँ तुम्हें पुकारती ।।

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एक आह्वान एवं भावांजलि – वीर सेनानियों को । देश के सपूतों ! मातृभू के रक्षकों ! शूरवीर सैनिकों ! क्रान्तिवीर बन्धुओं ! साहसी सेनानियों ! माँ तुम्हें पुकारती , माँ तुम्हें पुकारती ।। * आज सब आतंकियों को, आक्रमणकारियों को, और देशद्रोहियों को , भेज दो यमलोक को । माँ तुम्हें पुकारती, माँ तुम्हें… Read more »

याद तुम्हारी

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मधु शर्मा कटिहा खुश बहुत थी याद तेरी अब मुझे आती नहीं, डूबकर इक अक्स में अब मैं खो जाती नहीं। उफ़! भूलते ही याद आ गया फिर से तू क्यों? कोई रिश्ता ही नहीं तो दर्द भी देते हो क्यों?   चल रही हवा तो पत्ते चुप से हैं मायूस क्यों? रोशनी सूरज की… Read more »

यादेँ व उम्मीद :-सौरभ चतुर्वेदी

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मयस्सर डोर से फिर एक मोती झड़ रहा है , तारीखों के जीने से दिसम्बर उतर रहा है | कुछ चेहरे घटे , चंद यादें जुड़ीं गए वक़्त में, उम्र का पंछी नित दूर और दूर उड़ रहा है |… गुनगुनी धूप और ठिठुरती रातें जाड़ो की, गुजरे लम्हों पर झीना-झीना पर्दा गिर रहा है।… Read more »

ऐसा ही कुछ करना होगा

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लम्बे अर्से बीत चले हैं, इनसे कुछ सबक लेना होगा, उम्मीदों की सतत् कड़ी में, इस बार नया कुछ बुनना होगा, अपने समाज के अन्तिम जन को, अब तो बेहतर करना होगा, शिक्षित और जागरूक बनाकर, इनके हक में लड़ना होगा, कुछ न कुछ पाने का सबका, अपना अपना सपना होगा, सूख चुके आँसुओं को… Read more »

इस साल न हो पुर-नम आँखें

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“इस साल न हो पुर-नम आँखें, इस साल न वो खामोशी हो इस साल न दिल को दहलाने वाली बेबस-बेहोशी हो इस साल मुहब्बत की दुनिया में, दिल-दिमाग की आँखें हों इस साल हमारे हाथों में आकाश चूमती पाँखें हों ये साल अगर इतनी मुहलत दिलवा जाए तो अच्छा है ये साल अगर हमसे हम… Read more »