है नाट्यशाला विश्व यह !

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है नाट्यशाला विश्व यह, अभिनय अनेकों चल रहे; हैं जीव कितने पल रहे, औ मंच कितने सज रहे ! रंग रूप मन कितने विलग, नाटक जुटे खट-पट किए; पट बदलते नट नाचते, रुख़ नियन्ता लख बदलते ! उर भाँपते सुर काँपते, संसार सागर सरकते; निशि दिवस कर्मों में रसे, रचना के रस में हैं लसे… Read more »

मैं आज तेरा नाम लिख लूँ   

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  प्रेम के इक गीत पर मैं आज तेरा नाम लिख लूँ   पंछियों की चहक मीठी शहद जैसे मन में घोले कोकिला की मृदु कुहुक पर आज तेरा नाम लिख लूँ   रंग हर ऋतु का अलग है ढंग भी उसका नया है धूप के हर क़तरे पर मैं आज तेरा नाम लिख लूं… Read more »

क्योंकि  मोबाइल है…

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घड़ी पहनने की आदत छूट गई, पहले पैन साथ लेके चलते थे वो आदत भी छूट गई अब तो क्योंकि मोबाइल है……,, कैमरे की भी ज़रूरत नहीं है अब, पहले वीडियो बनाना मुश्किल था, अब स्टिंग इतने होते हैं क्योंकि मोबाइल है…………. पहले कैसेट सी डी से गाने सुनतेथे साथ बैठकर रेडियो भी सुनते थे… Read more »

सोने नहीं देते……

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  कभी कभी कुछ शब्द, सोने नहीं देते…… जब तक उन्हे किसी कविता का आकार न दे दूँ।   कभी कभी कोई धुन, सोने नहीं देती….. जब तक उसमे शब्द पिरोकर, गीत का कोई रूप न दे दूँ।   कभी कभी कोई विचार सोने नहीं देते….. जब तक विचारों को संजोकर आलेख का आकार न… Read more »

आदमी

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हज़ारों की भीड़ में भी, अकेला है आदमी! आदमी ही आदमी को, नहीं मानता आदमी! संवेदनायें खो गईं, चोरी क़त्ल बढ़ गये, कोई भी दुष्कर्म करते, डरता नहीं अब आदमी। भगवान ऊपर बैठकर ये सोचता होगा कभी, ऐसा नहीं बनाया था मैने क्या बन गया है आदमी! स्वार्थ की इंतहा हुई , भूल गया दोस्ती… Read more »

तोहफे

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मै नहीं कोई ताल तलैया ना ही मैं सागर हूँ। मीठे पानी की झील भी नहीं, मैं बहती सरिता हूँ। सरल नहीं रास्ते मेरे चट्टनों को काटा है। ऊपर से नीचे आने.में झरने कई बनाये मैने इन झरनों के गिरने पर प्रकृति भी मुस्काई है पर मेरी इक इक बूँद ने  यहाँ हर पल चोट… Read more »

ये ज़रूरी तो नहीं

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मैं ख़ुद से ही रूठी  रहती हूँ, कोई मनाये मुझको आकर, ये ज़रूरी तो नहीं, मैं ख़ुद को ही मना लेती हूँ।   कुछ भी लिखूं या करूँ मैं जब अपनी प्रशंसा भी कर लेती हूँ , कोई और भी मेरा प्रशंसक हो, ये ज़रूरी तो नहीं…………   जो भी काम पूरा कर लेती हूँ,… Read more »

एक क़दम तुम बढ़ाओ……

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एक क़दम तुम बढ़ाओ, दो हम बढ़ायेंगे। फ़ासले जो दरमियां हैं, दूर होते जायेंगे। दूरियाँ मन की नहीं थीं, विचारों के द्वन्द थे, आओ बैठो, बातें करो,मसले सब सुलझ जायेंगे। वक़्त मिलता ही नहीं…,…… कहने से उलझने बढ़ जायेंगी। वक़्त को वक़्त से चुराकर, कुछ वक़्त तो देना पड़ेगा। एक छोर तुम पकड़ना, मैं हर… Read more »

‘आज’ का क्या करूं मै

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वो शाम चुलबुली सी रातें खिली खिली सी वक़्त के समंदर में वो वक़्त ही घुल गया है। अब शांत सी शामें हैं, चादर में नहीं हैं सिलवट नींद से रूठा मनाई, यादें आईं नई पुरानी, बचपन की कोई कहानी या जवानी की नादानी, रातों को आंखो में आकर, नीदें चुराने लगी हैं। भविष्य भी… Read more »

मैं मैं हूँ मैं ही रहूँगी

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मै नहीं राधा बनूंगी, मेरी प्रेम कहानी में, किसी और का पति हो, रुक्मिनी की आँख की किरकिरी मैं क्यों बनूंगी मै नहीं राधा बनूँगी। मै सीता नहीं बनूँगी, मै अपनी पवित्रता का, प्रमाणपत्र नहीं दूँगी आग पे नहीं चलूंगी वो क्या मुझे छोड़ देगा मै ही उसे छोड़ दूँगी, मै सीता नहीं बनूँगी। मै… Read more »