ऋषिभक्त आर्यों, नेताओं व विद्वानों का राग-द्वेष से मुक्त होना आवश्यक

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सत्यार्थप्रकाश को ऋषि दयानन्द सरस्वती जी का सबसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ कह सकते हैं। इसके उत्तरार्ध के चार समुल्लासों में अन्तर्देशीय व दूर विदेशों में उत्पन्न मतों की समालोचना की गई है। ऋषि ने इन सभी चार समुल्लासों की पृथक भूमिका लिखी है। चतुर्दश समुल्लास की भूमिका में उन्होंने लिखा है कि उनका यह लेख हठ, दुराग्रह, ईष्र्या, द्वेष, वाद-विवाद और विरोध घटाने के लिये किया गया है, न कि इनको बढ़ाने के अर्थ क्योंकि एक दूसरे की हानि करने से पृथक् रह, परस्पर को लाभ पहुंचाना हमारा मुख्य कर्म है। अब यह विवेच्य मत विषय सब सज्जनों के सामने निवेदन करता हूं। विचार कर, इष्ट का ग्रहण, अनिष्ट का परित्याग कीजिये। हमारे विद्वानों को इसी भावना से ही अन्य विद्वानों की आलोचना करनी चाहिये। हमारी आलोचना पढ़कर कोई विद्वान हमसे क्षमा याचना ही करे, इसकी अपेक्षा करना उचित नहीं है।

पूजनीय प्रभो हमारे……भाग-15

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इस श्लोक को देश के राजा (राष्ट्रपति) की पीठिका (गद्दी) के पीछे लिखने का उद्देश्य है कि यह देश आज भी सत्य का अनुसंधान करने वाला और सत्योपासक देश है। यह देश सत्य को छल-छदमों में लपेटकर कहने की साधना करने वाला देश नही है यह तो सत्य को जैसा है वैसा ही परोसने वाला देश है। सत्य से कोई समझौता यह देश नही करेगा। इसके विपरीत सत्य को धारण करेगा और ‘सत्यमेव जयते’ की परंपरा को विश्व परंपरा बनाकर आगे बढ़ेगा।

आर्यसमाज के प्रचार की धीमी गति के कारणों पर विचार

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आर्यसमाज के प्रचार की धीमी गति में आर्यसमाज में पदाधिकारियों व सदस्यों की गुटबाजी व उसके पीछे कुछ लोगों के निहित स्वार्थ यथा लोकैषणा, वित्तैषणा तथा पुत्रैषणा भी सम्मिलित हैं। इस कारण योग्य लोग पदाधिकारी न चुने जाकर तिकड़मी व कम योग्यता वाले लोग पदाधिकारी बन जाते हैं। इससे एक हानि यह होती है कि बहुत से सज्जन व निष्पक्ष लोग आर्यसमाज में आना ही छोड़ देते हैं।

दिग्भ्रमित विश्व के लिए वेदों की उपेक्षा अहितकर एवं हानिकारक

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मनमोहन कुमार आर्य मनुष्य जीवन को संसार के वेदेतर सभी मत अद्यावधि प्रायः समझ नहीं सके हैं। यही कारण है कि यह जानते हुए कि सत्य एक है, संसार में आज के आधुनिक व उन्नत युग में भी एक नहीं अपितु सैकड़ो व सहस्राधिक मत-मतान्तर प्रचलित हैं जिनकी कुछ बातें उचित व अधिकांश असत्य एवं… Read more »

वट सावित्री व्रत 25 मई, 2017

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ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को सावित्री का व्रत किया जाता है. ऐसी मान्यता है कि जो भी स्त्री इस व्रत को करती है उसका सुहाग अमर हो जाता है। जिस तरह से सावित्री ने अपने अपने पति सत्यवान को यमराज के मुख से बचा लिया था उसी प्रकार से इस व्रत को… Read more »

पूजनीय प्रभो हमारे……भाग-14

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राकेश कुमार आर्य  वेद की बोलें ऋचाएं सत्य को धारण करें गतांक से आगे…. किसी कवि ने कितना सुंदर कहा है :- ओ३म् है जीवन हमारा, ओ३म् प्राणाधार है। ओ३म् है कत्र्ता विधाता, ओ३म् पालनहार है।। ओ३म् है दु:ख का विनाशक ओ३म् सर्वानंद है। ओ३म् है बल तेजधारी, ओ३म् करूणाकंद है।। ओ३म् सबका पूज्य… Read more »

अपनी राशि अनुसार ज्योर्तिलिंग की पूजा का महात्‍म, तथ्‍ाा फल प्राप्‍‍‍त होने का महात्‍म पढे—-

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जानिए किस राशि के व्यक्ति को किस ज्योर्तिलिंग पर पूजा करने से विशेष फल प्राप्त होता है— देवाधिदेव भगवान् महादेव सर्वशक्तिमान हैं\ भगवान भोलेनाथ ऐसे देव हैं जो थोड़ी सी पूजा से भी प्रसन्न हो जाते हैं |संहारक के तौर पर पूज्य भगवान शंकर बड़े दयालु हैं. उनके अभिषेक से सभी प्रकार की मनोकामनाएं पूरी… Read more »

पूजनीय प्रभो हमारे……भाग-13

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कोई भी भजन, प्रवचन, गीत या मंत्र आदि हम इसीलिए बोलते हैं कि वह कंठस्थ होते-होते हमारे कार्य व्यवहार में उतरकर हमारे साथ इस प्रकार रम जाए कि हम और वह भजन, प्रवचन, गीत या मंत्र इस प्रकार एकाकार हो जाएं कि हमारा अस्तित्व ढूंढऩा या खोजना भी असंभव हो जाए। ऐसी अवस्था में जाकर ही कोई गीत, भजन, प्रवचन या मंत्र आदि हम पर वास्तविक प्रभाव डाल सकते हैं। इसलिए ‘छोड़ देवें छल कपट को’ केवल गाते ही नही रहना है, अपितु उसे अपने व्यावहारिक जीवन में उतारना भी है।

नारद पत्रकार ही नहीं, जनउद्धारक थे

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२६वें श्लोक में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने इनकी महत्ता को स्वीकार करते हुए कहा है देवर्षियों में मैं नारद हूं। वायुपुराण में देवर्षि के पद और लक्षण का वर्णन है- देवलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करनेवाले ऋषिगण देवर्षि नाम से जाने जाते हैं। भूत, वर्तमान एवं भविष्य-तीनों कालों के ज्ञाता, सत्यभाषी, स्वयं का साक्षात्कार करके स्वयं में सम्बद्ध, कठोर तपस्या से लोकविख्यात, गर्भावस्था में ही अज्ञान रूपी अंधकार के नष्ट हो जाने से जिनमें ज्ञान का प्रकाश हो चुका है, ऐसे मंत्रवेत्ता तथा अपने ऐश्वर्य (सिद्धियों) के बल से सब लोकों में सर्वत्र पहुँचने में सक्षम, मंत्रणा हेतु मनीषियों से घिरे हुए देवता, द्विज और नृपदेवर्षि कहे जाते हैं।

ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज ने विश्व के करोड़ों लोगों को वैदिक धर्म द्वारा सच्चे आध्यात्मिक एवं सांसारिक जीवन जीने का मार्गदर्शन दिया

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-मनमोहन कुमार आर्य मनुष्य सभी प्राणियों में सबसे श्रेष्ठ प्राणी व योनि है। मनुष्य के पास जो मन है वह अन्य प्राणियों की तुलना में विशिष्ट गुणों व शक्तियों से सम्पन्न है। मनुष्य अपने मन से मनन, विचार व चिन्तन कर सकता है जबकि अन्य पशु, पक्षी आदि प्राणी ऐसा नहीं कर सकते। मनुष्य किसी… Read more »