क्षणजन्मा डॉक्टर हेनरी नॉर्मन बेथुन

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किताब चलते रहने का हौसला पैदा करती है, रास्ता दिखाती है और कभी कभी हमारा रास्ता रोककर खड़ी हो जाती है। — अनाम   कभी कभार ही ऐसा होता है कि आपके हाथ ऐसी किताब लग जाए जो सालों बीत जाने पर भी आपकी चेतना को संस्कार-मण्डित करती रहती है और सदा के लिए महत्वपूर्ण… Read more »

बटेश्वर के मंदिरों का खतरों से भरा जीर्णोद्धार कार्य

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चम्बल की घाटी में लगभग 10 एकड़ जगह में बने इन मंदिरों के बारे में जब पता चला कि एक मुस्लिम अधिकारी डॉ के. के. मुहम्मद ने इनके जीर्णोद्धार करने का बीड़ा उठाया है तो सबको बहुत ही आश्चर्य हुआ। उस समय मुश्किल यह थी कि वहां आसपास चम्बल के डकैतों का डर व्याप्त था। इसलिए न तो कोई अधिकारी आगे बढ़ रहा था और न काम करने वाले मजदूर।

ब्रह्मा विष्णु और रुद्र के संयुक्त स्वरुपवाली विश्व की पहली स्मार्ट सिटी है अयोध्या

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डा. राधेश्याम द्विवेदी वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, “अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या” और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन (लगभग 144कि.मी) लम्बाई तीन योजन (लगभग 36 कि.मी.) चौड़ाई में… Read more »

आजादी के महानायक बिरसा मुंडा

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9 जून विशेषः- मृत्युंजय दीक्षित आजादी के महानायक और मुंडा आदिवासियों के भगवान बिरसा मुंडा । बिरसा मुंडा ने अंग्रेजों से जबर्दस्त संघर्ष करते हुए 9 जून 1900 को अंतिम संास ली थी। ज्ञातव्य है कि तत्त्कालीन झारखंड राज्य अंग्रेजांे के आधीन हो चुका था और अंग्रेजों ने आदिवासियों के साथ काफी निर्ममतापूर्वक व्यवहार किया… Read more »

भारत के राष्ट्रपुरुष शिवाजी महाराज

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ललित कौशिक जब देश परतंत्र में जाता है तब शासनकर्ता की जमात का अनुकरण और अनुसरण लोग करने लगते हैं और समाज का नेतृत्व करने वाले विद्वतजन, सेनानी, राजधुरंधर परानुकरण में धन्यता मानने लगते हैं. जिससे  समाज भी इन्हीं लोगों का अनुकरण करना शुरू कर देता है जिसके कारण धर्म की ग्लानि होती है, परधर्म… Read more »

कौन कहता है कि हम एक हजार वर्ष गुलाम रहे

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झूठे चाटुकारों से और लेखनी को बेचकर व आत्मा को गिरवी रखकर लिखने वाले इतिहासकारों से स्वतंत्रता के अमर सैनानियों के ये पावन स्मारक यही प्रश्न कर रहे हैं। समय के साथ हम इन प्रश्नों को जितना उपेक्षित और अनदेखा करते जा रहे हैं-उतना ही बड़ा प्रश्नचिन्ह लगता जा रहा है।

महाकवि रंगपालजी की लोक रचनाएं

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डा. राधेश्याम द्विवेदी (स्रोत : डा. मुनिलाल उपाध्याय कृत “बस्ती जनपद के छन्दकारों का साहित्यिक योगदान” भाग 1) रंगपाल नाम से विख्यात महाकवि रंग नारायण पाल जूदेश वीरेश पाल का जन्म सन्तकबीर नगर (उत्तर प्रदेश) के नगर पंचायत हरिहरपुर में फागुन कृष्ण 10 संवत 1921 विक्रमी को हुआ था। ‘बस्ती जनपद के छन्दकारों का सहित्यिक… Read more »

1857 की क्रांति की 160वीं जयंती

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कई इतिहासकारों ने यह भी कहा है कि इस युद्ध में पूरा देश शामिल नहीं था। इसलिए इसे राष्ट्रीय युद्ध की संज्ञा देना अनुचित होगा। तो प्रश्न उठता है कि किसी स्थान विशेष में किया गया युद्ध राष्ट्रीय क्यों नहीं हो सकता। इस पर यदि गहराई से विचार करें तो बीसवीं शताब्दी के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी ऐसे अनेक आंदोलन हुए जो किसी स्थान विशेष तक ही सीमित रह गए। यहां तक कि 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की तीव्रता भी सारे देश में एक समान नहीं थी।

अपदीपो भव ………….

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भगवान बुद्ध ने कहा कि वही सुखी है जो जय-पराजय की भावना का त्याग करता है। वजह यह कि जय की भावना से बैर उत्पन्न होता है, पराजय से दुःख उत्पन्न होता है। उनका मानना था – अक्रोध के द्वारा क्रोध को, साधुता के द्वारा असाधु भाव को, दान के द्वारा कदर्प और सत्य के द्वारा मृषावाद या झूंठ को जीतना चाहिए। उनके अनुसार जिसका किसी से बैर नही है और जो सभी प्राणियों से मैत्री करता है वही सुखी होता है।

आदि पत्रकार देवर्षि नारद

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12 मई पर विशेष:- मृत्युंजय दीक्षित सृष्टिकर्ता प्रजापति ब्रहमा के मापस पुत्र पारद। महान तपस्वी तेजस्वी सम्पूर्ण वेदान्त शास़्त्र के ज्ञाता तथा समस्त विद्वाओं में पारंगत नारद। ब्रहमतेज से संपन्न हैं। नारद जी क महान कृतित्व व व्यक्तित्व पर जितनी भी उपमाएं लिखी जायें बेहद कम हैं। देवर्षि नारद ने अपने धर्मबल से परमात्मा का… Read more »