तेलंगाना पर घिरती कांग्रेस…………….

शादाब जफर “शादाब’’

आंध्र प्रदेश से दिल्ली तक तेलंगाना के मुद्दे पर देश में एक बार फिर से चुनावी आग भडकाई जा रही है। आंध्र प्रदेश में रोज रोज बंद, हिंसक रेल रोको आन्दोलन, अहम यह है कि तेलंगाना अलग राज्य का मसला आज आंध्र प्रदेश के लोगो के लिये एक गंभीर राजनीतिकआर्थिक-सामाजिक मुद्दा बन चुका है। ये सच है कि ये सारी कि सारी आग केंद्र सरकार की लगाई हुई है। लेकिन आज तेलंगाना मुद्दे पर कुछ सवाल ऐसे है जिन का जवाब आज खुद सरकार के पास भी नही है। 2जी मामले में जिस प्रकार आज एक के बाद एक केंद्र सरकार के मंत्री तिहाड़ जा रहे है। पूर्व संचार मंत्री ए.राजा, गृहमंत्री पी चिदंबरम से होते हुए 2जी की ये आंच आज प्रधानमंत्री की कुर्सी तक आ पहॅुची है। सन 2009 में तेलंगाना के मसले पर सिर्फ चार घंटे में सरकार ने जिस प्रकार से बिना आगा पीछा सोचे जिस तरह से ऐतिहासिक फैसला किया था आज उस के भयानक नतीजे सामने आने लगे है। किसी भी गंभीर मुद्दे पर सरकार द्वारा हड़बड़ी में लिया गया फैसला और धीरे धीरे ज्वलंत होते इस मुद्दे पर टालमटोल भरा रवैया अपनाना देश को कितना महंगा पड़ सकता है इस का सब से ताजा तरीन उदाहरण तेलंगाना है। 2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने जिस प्रकार से तेलंगाना राष्ट्रीय समिति के साथ दो शर्ता पर समझौता किया था कि सरकार बनने पर राज्य पुर्नगठन आयोग का गठन किया जायेगा और तेलंगाना को नये राज्य का दर्जा दिया जायेगा। मगर सरकार बन जाने पर कांग्रेस ने ये दोनो ही वादे पूरे नही किये मजबूर होकर तेलंगाना की मॉग को लेकर टीआरएस नेता चंद्रशोखर राव को आमरण अनशन पर बैठना पडा पर यहा भी तेलंगाना मुद्दे पर यूपीए ने अपनी राजनीतिक रोटिया सेंकने की कोशिश की और चंद्रशोखर राव की हालत बिगड़ने पर केंद्रीय गृहमंत्री ने तेलंगाना अलग राज्य बनाने की घोषणा कर दी। जाहिर है कांग्रेस के इस गैर जिम्मेदाराना बयानो और फिर इस मुद्दे का गम्भीरता से न लेने के कारण ये मामला पेचीदा होता चला गया।

आज तेलंगाना का मसला, मसलाए-कश्मीर बनता नजर आने लगा है। इस के भयानक नतीजे भी हिंसक आन्दोलनो के रूप में नजर आने लगे है। कांगे्रस तेलंगाना राज्य बनाने का आंध्र की जनता से वादा तो कर गई पर शायद प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को ये याद आ गया की 1953 में क्या हुआ था तब भी सरकार की ओर से एक भीषण भूल हुई थी। पहली बार भाषा के आधार पर अलग आंध्र प्रदेश बनाने के लिये आंदोलन हुआ था। मद्रास में 58 दिनो की भूख हड़ताल के बाद पोट्टी श्रीरामुलु की मौत हो जाने के बाद हिंसक आंदोलन शुरू हो जाने के बाद सरकार को झुकना पड़ा था। और आंघ्र प्रदेश भाषा के आधार पर देश का पहला राज्य बनाया गया था। इस के बाद तो अलग राज्य बनाने की मांगो की बा सी आ गई। नतीजन राज्य पुर्नगठन आयोग बना और पहली बार माना गया की भाषा के आधार पर राज्यो का बंटवारा किया जा सकता है। आंध्र प्रदेश के गठन के बाद भाषा के आधार पर एक एक कर गुजरात, महाराष्ट्र, केरल, तमिलनाडू, और पंजाब और कर्नाटक अलग राज्य बनाये गये, ठीक उसी तरह तेलंगाना को अलग राज्य बनान के बाद पूर्वांचल, हरित प्रदेश, बुंदेलखण्ड, गोरखालैंड, विदर्भ, रायलसीमा आदि कई राज्य कतार में खड़े है। तेलंगाना के मुद्दे पर स्वतंत्र राज्य की मांग को लेकर तेलंगाना झेत्र के तेलुगुदेशम पार्टी के विधायको ने अपने इस्तीफे सौंप दिये है। इस्तीफो का ये खेल पिछली बार भी हुआ था। तब तेलंगाना के कांग्रेसी सांसदो ने भी इस्तीफे दिये थे। तेलंगाना झेत्र के विधायको, सांसदो और मंत्रियो के इन इस्तीफो को सिर्फ दबाव का हथकंड़ा कह कर नजर अंदाज नही किया जा सकता, भले ही आंध्र प्रदेश में इस तरह के इस्तीफो और इस की आड़ में की जाने वाली राजनीति का अतीत क्यो न रहा हो। पर तेलंगाना के रूप में देखे तो इस बार का मामला अलग है। क्यो कि वहा अब तेलंगाना अलग राज्य की मांग को लेकर बड़ी तादात में हिसंक आन्दोलन शुरू हो चुके है। इस के साथ ही राज्य में सत्तारू कांग्रेस पार्टी के साथ ही विपक्षी तेलुगुदेशम पार्टी तेलंगाना को लेकर हाल के वर्षो में सब से ज्यादा मुखर रही तेलंगाना राष्ट्रीय समिति जैसे सभी प्रमुख दल अलग राज्य के मसले पर एकजुट है।

आज सवाल ये उठता है कि तेलंगाना के मुद्दे पर अब भी कांग्रेस गहरी नींद से नही जागी तो कांग्रेस के लिये सब से बडा संकट अपनी ही पार्टी से खड़ा हो सकता है। जिस प्रकार केंद्र सरकार में भ्रष्टाचार में डूबे मंत्रियो ने आज केद्र सरकार को मृत्यु शय्या तक पहुॅचा दिया। यह बड़ी हैरानी वाली बात है कि कांग्रेस ने इस संकट का अंदाजा नही लगाया। आंध्र प्रदेश विधानसभा में कांग्रेस के 156 सदस्य है जिस में 106 विधायक रायलसीमा और तटीय आंध्र से आते है। ये वो इलाक है जो तेलंगाना को राज्य से अलग नही होने देना चाहते। ऐसे में कांग्रेस आंध्र प्रदेश विधानसभा में तेलंगाना राज्य के लिये प्रस्ताव कैसे पारित करवा पायेगी सोचा जा सकता है। हालाकि कांग्रेस के इन्ही विधायको ने पिछले दिनो सोनिया गांधी को तेलंगाना पर कोई भी फैसला लेने के लिये अधिकृत कर दिया था। पर जब इन विधायको ने टीआरएस नेता चंद्रशोखर राव के कर्थित आमरण अनशन की ब्लैकमेलिंग के सामने केंद्र को झुकते देखा तो इन के होश उड़ गए। अब सवाल ये है कि क्या इन हालातो में कांग्रेस के लिये आंध्र विधानसभा में तेलंगाना मुद्दा पर प्रस्ताव ला पाना टेी खीर लगता है। अगर देखा जाये तो दिन प्रतिदिन तेलंगाना का ये मुद्दा केंद्र के टालमटोल के कारण गंभीर होने के साथ ही केंद्र के लिये गले की हड्डी बनता जा रहा है। क्योकि यदि वह तेलंगाना को अलग राज्य बनाने की पहल करती है तो तटीय आंध्र और रायलसीमा क्षेत्र से नये तरह का दबाव पड़ सकता है। दूसरा बडा सकट हैदराबाद का है। हैदराबाद कहा जायेगा? तेलंगाना में या आंध्र प्रदेश में ? भौगोलिक दृष्टि से देखा जाये तो हैदराबाद तेलंगाना में आता है, इस लिये उसे तेलंगाना में ही होना चाहिये। लेकिन हैदराबाद सिर्फ एक नगर ही नही, वह उससे ज्यादा आईटी क्षेत्र में भारत की पहचान से जुड़ा है।

आज यदि काग्रेस को आंध्र में अपनी छवि बचानी और बनानी है तो इस वक्त समय का तकाजा है कि एक और राज्य पुर्नगठन आयोग अस्तित्व में आये। ठीक उसी प्रकार का जिस प्रकार का 1953 में पहला आयोग बना था। दरअसल उस आयोग ने केवल भाषा के आधार पर राज्य बनाने की सिफारिश की थी लेकिन अब राज्य गठन के दूसरे पैमाने हो सकते है। आज राज्यो की अपनी अपनी जरूरते हो सकती है। हमे ये भी नही भूलना चाहिये कि सदियों की अपेक्षा और पिछड़े के कारण ही आज नये राज्यो की मांगे सामने आ रही है उन में चाहे तेलंगाना हो विदर्भ या बुंदेलखण्ड़। दरअसल हमारे देश में कई राज्य बड़े विशाल है जैसे महाराष्ट्र में यूरोप के लगभग 17 और उत्तर प्रदेश जैसे देश के बडे राज्य में यूरोप के 15 देश समा सकते है। आज सवाल नये राज्य बनाने का नही बल्कि नये राज्यो के बंटवारे के तरीके पर है। ऐसे में एक नये राज्य पुर्नगठन आयोग की स्वाभाविक ही जरूरत दिखाई दे रही है जो लोगो की अपेक्षाओ, जरूरतो, और क्षेत्रीय संतुलन, शिक्षा, रोज़गार आदि जरूरतो को ईमानदारी से समझते हुए अपनी सिफारिश्ो दे ताकि चंद्रशोखर राव, जसवंत सिॅह, अजित सिॅह, और मायावती जैसे वोट की राजनीति करने वाले राजनेताओ को राज्यो के बंटवारे के तवे पर अपनी अपनी रोटी सेंकने का मौका न मिले।

वैसे बात अभी इतनी बिगड़ी भी नही है आंध्र में अब तक जो हुआ कांग्रेस उसे भूल जाये और नये सिरे से राज्य पुर्नगठन आयोग की घोषणा करे। वही देश में नये राज्य बनाने पर विपक्ष को भी कोई ऐतराज नही होना चाहिये। छोटे राज्य बनाने से देश छोटा नही होगा परन्तु ये हकीकत है कि बडे राज्य की समस्याए जरूर छोटी हो जायेगी। इस से कोई फर्क नही पड़ता कि आज देश में 28, 29, 30 या फिर 50 राज्य भी हो जाये। बल्कि छोटे छोटे राज्य होने से एक आम हिन्दुस्तानी को सुविधा होगी। मिसाल के तौर पर उत्तराखण्ड़, झारखण्ड़ और छत्तीसग हमारे सामने है जो दिन रात तरक्की कर देश की प्रगति में अपना अपना भरपूर योगदान दे रहे है।

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