मराठी बोलना गर्व की बात, लेकिन हिन्दी से घृणा क्यों ?

अजय जैन ‘विकल्प’

अपनी स्थापना से ही भारत विविधताओं का देश बना हुआ है और भाषा इसकी सबसे खूबसूरत विशेषताओं में से एक है। इसलिए यहाँ अनेकता के बावजूद एकता है, चाहे फिर कोई भी मुद्दा हो, यानी कभी अपने को श्रेष्ठ बताकर किसी अन्य को बुरा नहीं कहा गया, किन्तु इस देश के राज्य महाराष्ट्र की राजधानी मुम्बई में फिलहाल यही बुरा देखा जा रहा है, जो अनुचित है और देश की भाषाई एकता के लिए घातक भी है।
  मुम्बई न केवल आर्थिक राजधानी है, बल्कि भाषाओं, संस्कृतियों और समुदायों का संगम स्थल भी है। इस महानगर में मराठी का बोलबाला होना स्वाभाविक है, यह इस मिट्टी की आत्मा है, लेकिन आज एक चिंताजनक प्रवृत्ति उभर रही है:हिन्दी के प्रति अघोषित घृणा दिख रही है, जिसके पीछे असहिष्णुता, राजनीतिक विद्वेष एवं स्वयं को सर्वश्रेष्ठ बताने की अजीब मानसिकता है। मराठी को सम्मान देने में किसी को भी कोई आपत्ति नहीं हो सकती है। आपत्ति तब होती है, जब इस सम्मान के नाम पर हिन्दी को हाशिए पर धकेला जाता है, हिन्दी भाषियों को ‘बाहरी’ करार दिया जाता है, और उनके साथ दुर्व्यवहार होता है। यह केवल भाषाई टकराव नहीं, एक गहरी राजनीतिक साजिश है, जिसे समझना, उजागर करना और विरोध करते हुए हिन्दी के लिए खड़े रहना बहुत आवश्यक है। यह समझना होगा कि मराठी स्वाभिमान की भाषा है, लेकिन हिन्दी के प्रति संकीर्णता सही नहीं है। मराठी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि सभ्यता, इतिहास और गौरव है। छत्रपति शिवाजी महाराज, संत तुकाराम, लोकमान्य तिलक और बाल गंगाधर तिलक आदि महापुरुषों ने मराठी को जनचेतना और क्रांति का माध्यम बनाया, तो कैद में रहते हुए भी राष्ट्रीय एकता के लिए वीर विनायक सावरकर ने हिन्दी कविताएं रचीं एवं हिन्दी सिखाई। आज भी महाराष्ट्र में मराठी साहित्य, नाटक, संगीत और संस्कृति की धारा बह रही है।
         मराठी बोलना, मराठी में गर्व करना, उस विरासत को आगे बढ़ाना हर मराठीभाषी का हक़ और कर्तव्य है मगर जब यह गर्व दूसरों की भाषा के प्रति घृणा में बदल जाता है, तो यह स्वाभिमान नहीं, संकीर्णता बन जाता है।
   सबको समझना पड़ेगा कि हिन्दी एकता का सेतु और मुम्बई का मौन आधार है। हिन्दी भारत की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है, जो उत्तर भारत से लेकर भारत के कोने-कोने तक संवाद का माध्यम है। मुम्बई जैसे महानगर में हिन्दी केवल उत्तर भारतीयों की नहीं, बल्कि लाखों मराठी, गुजराती, बिहारी, तमिल, मलयाली और बंगालियों के भी दैनिक संवाद की भाषा बनी हुई है।
   मुम्बई यानी बॉलीवुड सहित रेडियो, टेलीविजन, विज्ञापन, सेवा क्षेत्र और मीडिया के अधिकतर प्रमुख उद्योग हिन्दी के दम पर खड़े हैं। यही नहीं, लाखों मेहनतकश मजदूर, वाहन चालक, नौकर, घरेलू कामगार, उद्घोषक, पत्रकार और कलाकार भी हिन्दी के माध्यम से ही रोज़ी-रोटी व पहचान प्राप्त करते हैं, तो बड़ा सवाल है कि इस हिन्दी से इतनी घृणा क्यों, मारपीट क्यों, प्रदर्शन क्यों…?
    स्थानीय राजनीतिक कारण देखें तो पता चलता है कि ‘मराठी बनाम हिन्दी’ की कृत्रिम खाई बनाई गई है, क्योंकि उसी से तो सत्ता प्राप्ति का मार्ग मिलेगा। भाषा का यह संघर्ष अचानक नहीं पनपा है, बल्कि यह कुछ राजनीतिक दलों और संगठनों की योजनाबद्ध रणनीति का परिणाम है। ‘मराठी मानुस’ के नारे के पीछे वर्षों से एक ‘अपराध-बोध’ और ‘भय’ को बोया गया, कि हिन्दी भाषी मुम्बई को ‘हड़प’ रहे हैं, जबकि सत्यता इससे अलग है और धरातल पर ऐसा कुछ भी नहीं है। हिन्दी बोलने वाला अपना काम कर रहा है, तो मराठी एवं अन्य भाषा बोलने वाला अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है, इनमें कोई झगड़ा नहीं है। राज्य और मुम्बई को निगलने के ऐसे विचार न केवल झूठे हैं, बल्कि सामाजिक सौहार्द के लिए खतरा हैं, क्योंकि मुम्बई की आत्मा में तो हिन्दी हमेशा रही है। १९५० के दशक में भी जब बम्बई राज्य बना था, तब भी हिन्दीभाषी इसके विकास में बराबरी से सहभागी थे।
     हिन्दी को ‘बाहरी भाषा’ कहने वाले यह भूल जाते हैं कि संविधान में यह राजभाषा घोषित है और इसे पूरे भारत में समान सम्मान प्राप्त है। ऐसा भी लगता है कि असल डर हिन्दी से नहीं, बल्कि उस जनसांख्यिकी बदलाव से है, जो उत्तर भारत से आए श्रमिकों और युवाओं के कारण मुम्बई में हो रहा है। बेरोज़गारी, शिक्षा में गिरावट और स्थानीय युवाओं को नौकरियों नहीं मिलने का दोष भी हिन्दी भाषियों पर डाल देना आसान बहाना बन गया है, लेकिन इसका उचित समाधान खोजने की अपेक्षा हिन्दी को रोककर गुंडागर्दी करना कहाँ से सही हो गया है ? क्या हिन्दी भाषियों को निकाल देने से, हिन्दी नहीं बोलने देने से, राजनीति करने से एवं सिर्फ मराठी की जिद लगाने से युवाओं को रोज़गार मिल जाएगा ? राज्य तरक्की कर लेगा, हिन्दी और मराठी का स्नेह बना रहेगा ?
    उत्तर साफ़ है-नहीं, क्योंकि विकास की कुंजी भाषाओं को सीमित करने में नहीं, बल्कि उन्हें सर्वव्यापी व समावेशी बनाने में है। राजनीति के चक्कर में यह भूलना घातक है कि हिन्दी को अपमानित करना आसान है। वास्तव में यह संविधान का अपमान है, क्योंकि संविधान की धारा ३४३ हिन्दी को राजभाषा घोषित करती है। अनुच्छेद १९ हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, तो कोई भी राज्य, नगर या संस्था किसी भाषा विशेष को किसी को बोलने से कैसे रोक सकता है। मुम्बई में हिन्दी बोलने वाले पर तंज कसना, दुकानों के बोर्ड बदलवाना या हिन्दी में सेवा देने से इनकार करना सीधे तौर पर संविधान का सीधा उल्लंघन यानी राष्ट्रद्रोह है।
     मुम्बई में हिन्दी का विरोध करने वालों एवं भाषा के बँटवारे पर मौन रहने वालों को भाषाई सौहार्द के उदाहरण दक्षिण भारत से सीख लेनी चाहिए। तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक जैसे राज्यों ने अपनी भाषाओं को मज़बूत किया, लेकिन कभी हिन्दी को दुश्मन नहीं बनाया। बेंगलुरु जैसे शहर में भी कन्नड़ प्रमुख है, लेकिन हिन्दी स्वीकार है। वहाँ के लोग हिन्दी सीखते हैं, सिखाते हैं और साथ रहते हैं।
      मुम्बई, जो देश का सबसे बड़ा समावेशी शहर कहलाता है, वहाँ से हिन्दी फ़िल्म और टी.वी. उद्योग निकाल दिया जाए, तो कल्पना करें कि क्या बचेगा ? अगर हिन्दी बोलने वाला अपने ही देश में पराया महसूस करे, तो यह केवल शर्मनाक नहीं, बड़ा जहर है।
सबको इस बात को महसूस करना होगा कि भाषाई टकराव से कुछ नहीं सधेगा। मराठी और हिन्दी दोनों समृद्ध भाषाएं हैं। दोनों में साहित्य, संस्कृति, ज्ञान और इतिहास की गहराइयाँ हैं। इसलिए कुछ सकारात्मक कदम एवं उदारता लेकर विद्यालयों में मराठी और हिन्दी दोनों को सम्मानजनक स्थान दिया जाए। सार्वजनिक बोर्डों में मराठी प्रमुख हो, लेकिन हिन्दी को न हटाया जाए। सरकार ऐसे कार्यक्रम चलाए, जो भाषाई सौहार्द को बढ़ावा दें। यानी नेता ‘वोट बैंक’ के लिए भाषा को हथियार न बनाएं।
       राजनीति से पनपाए गए इस विवाद का समाधान बनाम निष्कर्ष यही है कि मुम्बई की आत्मा मराठी और हिन्दी का संगम है, यानी मुम्बई केवल मराठी या हिन्दी की नहीं, बल्कि पूरे भारत की है। जैसे कश्मीर भारत का स्वर्ग है, ऐसे ही महाराष्ट्र और मुम्बई का असली सौंदर्य विविधता-अनेकता में है। हिन्दी से घृणा करके हम न तो मराठी को मजबूत कर सकते हैं, न मुम्बई को।
   मराठी और हिन्दी २ भाषाएं नहीं, २ आत्माएं हैं-जिन्हें जोड़कर ही भारत एकता और शक्ति की मिसाल बनेगा। कारण कि किसी भी भाषा से प्रेम करना अच्छी बात है, लेकिन किसी भाषा से घृणा करना अपने ही देश और उसके नियम-कायदों से घृणा करने जैसा है।
       यह भी तय है कि मुम्बई और राज्य के अन्य हिस्सों में मराठी बनाम गैर-मराठी भाषा विवाद को लेकर चल रहे राजनीतिक और सामाजिक तनाव, प्रदर्शन, गुंडागर्दी और जबरदस्ती से भाषा एवं क्षेत्रीय अस्मिता का मुद्दा हल नहीं होगा, बल्कि इससे आमजन के बीच विश्वास घटकर विष फैलेगा। बेहतर यह है कि सरकार और सभी को राज्य-देश हित में इस घमासान को टालते हुए देशप्रेम दिखाकर दोनों भाषा का सम्मान स्वीकारना चाहिए।

अजय जैन ‘विकल्प’

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