पुरुष से ऊंचा स्थान है नारी का हिंदू परंपरा में |
-राजीव त्रिपाठी
भारतीय संस्कृति में नारी का उल्लेख जगत्-जननी आदि शक्ति-स्वरूपा के रूप में किया गया है। श्रुतियों, स्मृतियों और पुराणों में नारी को विशेष स्थान मिला है। मनु स्मृति में कहा गया
है-
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:।
यत्रेतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तफला: क्रिया।।
जहाँ नारी का समादर होता है वहाँ देवता प्रसन्न रहते हैं और जहाँ ऐसा नहीं है वहाँ समस्त यज्ञादि क्रियाएं व्यर्थ होती हैं। नारी की महत्ता का वर्णन करते हुये ”महर्षि गर्ग” कहते
हैं-
यद् गृहे रमते नारी लक्ष्मीस्तद् गृहवासिनी।
देवता: कोटिशो वत्स! न त्यजन्ति गृहं हितत्।।
जिस घर में सद्गुण सम्पन्न नारी सुख पूर्वक निवास करती है उस घर में लक्ष्मी जी निवास करती हैं। हे वत्स! करोड़ों देवता भी उस घर को नहीं छोड़ते।
ज्ञान-ऐश्वर्य-शौर्य की प्रतीक
भारत में सदैव नारी को उच्च स्थान दिया गया है। समुत्कर्ष और नि.श्रेयस के लिए आधारभूत ‘श्री’, ‘ज्ञान’ तथा ‘शौर्य’ की अधिष्ठात्री नारी रूपों में प्रगट देवियों को ही माना गया है। आदिकाल से ही हमारे देश में नारी की पूजा होती आ रही है। यहाँ ‘अर्द्धनारीश्वर’ का आदर्श रहा है। आज भी आदर्श भारतीय नारी में तीनों देवियाँ विद्यमान हैं। अपनी संतान को संस्कार देते समय उसका ‘सरस्वती’ रूप सामने आता है। गृह प्रबन्धन की कुशलता में ‘लक्ष्मी’ का रूप तथा दुष्टों के अन्याय का प्रतिकार करते समय ‘दुर्गा’ का रूप प्रगट हो जाता है। अत. किसी भी मंगलकार्य को नारी की अनुपस्थिति में अपूर्ण माना गया। पुरुष यज्ञ करें, दान करे, राजसिंहासन पर बैठें या अन्य कोई श्रेष्ठ कर्म करे तो ‘पत्नी’ का साथ होना अनिवार्य माना गया।
वेदों के अनुसार सृष्टि के विधि-विधान में नारी सृष्टिकर्ता ‘श्रीनारायण’ की ओर से मूल्यवान व दुर्लभ उपहार है। नारी ‘माँ’ के रूप में ही हमें इस संसार का साक्षात दिग्दर्शन कराती है, जिसके शुभ आशीर्वाद से जीवन की सफलता फलीभूत होती है। माँ तो प्रेम, भक्ति तथा श्रध्दा की आराध्य देवी है। तीनों लोकों में ‘माता’ के रूप में नारी की महत्ता प्रकट की गई है। जिसके कदमों तले स्वर्ग है, जिसके हृदय में कोमलता, पवित्रता, शीतलता, शाश्वत वाणी की शौर्य-सत्ता और वात्सल्य जैसे अनेक उत्कट गुणों का समावेश है, जिसकी मुस्कान में सृजन रूपी शक्ति है तथा जो हमें सन्मार्ग के चरमोत्कर्ष शिखर तक पहुँचने हेतु उत्प्रेरित करती है, उसे ”मातृदेवो भव” कहा गया है।
नारी का सम्मान
हिन्दू धर्म की स्मृतियों में यह नियम बनाया गया कि यदि स्त्री रुग्ण व्यक्ति या बोझा लिए कोई व्यक्ति आये तो उसे पहले मार्ग देना चाहिये। नारी के प्रति किसी भी तरह का असम्मान गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा गया। नारी यदि शत्रु पक्ष की भी है तो उसको पूरा सम्मान देने की परम्परा बनाई। गोस्वामी तुलसीदास जी ने ‘रामचरित मानस’ में लिखा है कि भगवान श्री राम बालि से कहते हैं-
अनुज बधू, भगिनी सुत नारी।
सुनु सठ कन्या सम ए चारी।। इन्हहिं कुदृष्टि विलोकई जोई।
ताहि बधे कछु पाप न होई।।
(छोटे भाई की पत्नी, बहिन, पुत्र की पत्नी कन्या के समान होती हैं। इन्हें कुदृष्टि से देखने वाले का वध कर देना कतई पापनहीं है।)
भारत में हिन्दू धर्म की परम्परा रही है कि छोटी आयु में पिता को बड़े होने (विवाह) के बाद पति को तथा प्रौढ़ होने पर पुत्र को नारी की रक्षा का दायित्व है। यही कारण था कि हमारी संस्कृति में प्राचीन काल से ही महान नारियों की एक उज्ज्वल परम्परा रही है। सीता, सावित्री, अरून्धती, अनुसुइया, द्रोपदी जैसी तेजस्विनी; मैत्रेयी, गार्गी अपाला, लोपामुद्रा जैसी प्रकाण्ड विदुषी, और कुन्ती,विदुला जैसी क्षात्र धर्म की ओर प्रेरित करने वाली तथा एक से बढ़कर एक वीरांगनाओं के अद्वितीय शौर्य से भारत का इतिहास भरा पड़ा है। वर्तमान काल खण्ड में भी महारानी अहल्याबाई, माता जीजाबाई, चेन्नमा, राजमाता रूद्रमाम्बा, दुर्गावती और महारानी लक्ष्मीबाई जैसी महान नारियों ने अपने पराक्रम की अविस्मरणीय छाप छोड़ी । इतना ही नहीं, पद्मिनी का जौहर, मीरा की भक्ति और पन्ना के त्याग से भारत की संस्कृति में नारी को ‘धु्रवतारे’ जैसा स्थान प्राप्त हो गया। भारत में जन्म लेने वाली पीढ़ियाँ कभी भी नारी के इस महान आदर्श को नहीं भूल सकती। हिन्दू संस्कृति में नारी की पूजा हमेशा होती रहेगी।
तेजस्विता की प्रतिमूर्ति
विधर्मियों ने हमारी संस्कृति आधारित जीवन पद्धति पर अनेकों बार कुठाराघात किया है लेकिन हमारे देश की महान् नारियों ने उनको मुँहतोड़ जवाब दिया है। अपने शौर्य व तेजस्विता से यह बता दिया कि भारत की नारी साहसी व त्यागमयी है।
प्राचीन भारत की नारी समाज में अपना स्थान माँगने नहीं गयी, मंच पर खड़े होकर अपने अभावों की माँग पेश करने की आवश्यकता उसे कभी प्रतीत ही नहीं हुई। और न ही विविध संस्थायें स्थापित कर उसमें नारी के अधिकारों पर वाद-विवाद करने की उसे जरूरत हुई। उसने अपने महत्वपूर्ण क्षेत्र को पहचाना था, जहाँ खड़ी होकर वह सम्पूर्ण संसार को अपनी तेजस्विता, नि.स्वार्थ सेवा और त्याग के अमृत प्रवाह से आप्लावित कर सकी थी। व्यक्ति, परिवार, समाज, देश व संसार को अपना-अपना भाग मिलता है- नारी से, फिर वह सर्वस्वदान देने वाली महिमामयी नारी सदा अपने सामने हाथ पसारे खड़े पुरुषों से क्या माँगे और क्यों माँगे?
वह हमारी देवी अन्नपूर्णा है- देना ही जानती है लेने की आकांक्षा उसे नहीं है। इसका उदाहरण भारतीय नारी ने धर्म तथा देश की रक्षा में बलिदान हो रहे बेटों के लिए अपने शब्दों से प्रस्तुत किया है।
”इस धर्म की रक्षा के लिए अगर मेरे पास और भी पुत्र होते तो मैं उन्हें भी धर्म-रक्षा, देश-रक्षा के लिए प्रदान कर देती।” ये शब्द उस ‘माँ’ के थे जिसके तीनों पुत्र दामोदर, बालकृष्ण व वासुदेव चाफेकर स्वतंत्रता के लिये फाँसी चढ़ गये।
अक्षय प्रेरणा का स्रोत
यदि भारतवर्ष की नारी अपने ‘नारीधर्म’ का परित्याग कर देती तो आर्यावर्त कहलाने वाला ‘हिन्दुस्थान’ अखिल विश्व की दृष्टि में कभी का गिर गया होता। यदि देखा जाय तो हमारे देश की आन-बान-शान नारी समाज ने ही रखी है। हमारे देश का इतिहास इस बात गवाह है कि युध्द में जाने के पूर्व नारी अपने वीर पति और पुत्रों के माथे पर ”तिलक लगाकर” युध्दस्थल को भेजती थी। लेकिन वर्तमान में पाश्चात्य शिक्षा के प्रचार-प्रसार के प्रभाव से भारत में नारी के अधिकार का आन्दोलन चल पड़ा है। वस्तुत. नारी का अधिकार माँगने और देने के प्रश्न से बहुत ऊपर है। उसे आधुनिक समाज में स्थान अवश्य मिला है पर वह मिला है लालसाओं की मोहावृत प्रतिमूर्ति के रूप में, पूजनीय माता के रूप में नहीं।
अवश्य ही युग परिवर्तन के साथ हमारे आचार-विचार में और हमारे अभाव-आवश्यकताओं में परिवर्तन होना अनिवार्य है। परन्तु जीवन के मौलिक सिद्धान्तों से समझौता कदापि ठीक नहीं। सृष्टि की रचना में नारी और पुरुष दोनों का महत्व है। वे एक दूसरे के पूरक हैं और इसी रूप में उनके जीवन की सार्थकता भी है। यदि नारी अपने क्षेत्र को छोड़कर पुरुष के क्षेत्र में अधिकार माँगने जायेगी तो निश्चित ही वह नारी जीवन की सार्थकता को समाप्त कर देगी।
ग्रा-पो: रसिन, जिला:चित्रकूट(उत्तर प्रदेश)
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परिवारों में रिश्ते बनते भले ही शरीर से हैं, लेकिन रिश्तों को निभाने के लिए शरीर से अलग हटना पड़ता है। भारतीय परिवारों में भी बदलते दौर में एक बड़ा परिवर्तन आया है। हमारे यहां पहले रिश्तों को महत्व दिया गया, शरीर को गौण रखा गया।
इसीलिए भारत के परिवार के सदस्य एक-दूसरे से भावनात्मक रूप में रहते हैं। धीरे-धीरे घर-गृहस्थी का विस्तार हुआ। बाहर की दुनिया में लोगों का समय अधिक बीतने लगा। लक्ष्य परिवार से हटकर संसार हो गया और यहीं से शरीर का महत्व बढ़ गया।
जैसे ही हम रिश्तों में शरीर पर टिकते हैं, हमारा आदमी या औरत होना भारी पड़ने लगता है, उनका अहं टकराने लगता है। बाप और बेटे का एक रिश्ता है। जब तक इसमें केवल रिश्ता काम कर रहा होता है, प्रेम और सम्मान भरपूर रहेगा, लेकिन जैसे ही दोनों अपने शरीर पर टिकेंगे, तो भीतर का पुरुष जाग जाता है और यहीं से फिर बाप-बेटे नहीं, दो पुरुष नजर आने लगते हैं।
ठीक यही स्थिति पति-पत्नी के बीच बन जाती है। स्त्री हो या पुरुष, जब तक रिश्ते की डोर से बंधे हैं, दोनों एक-दूसरे के प्रति अत्यधिक सम्मानपूर्वक रहेंगे, लेकिन इनके भीतर का आदमी, औरत जागते ही रिश्ते बोझ बन जाते हैं।
यही स्थिति हर संबंध में काम करती है। पत्नी के रूप में रिश्ता एक दायित्व, एक स्नेह का होता है, लेकिन यदि वह स्वयं भी अपने भीतर की स्त्री को ही जाग्रत कर ले, पुरुष भी केवल शरीर ही देखने लगे, तो फिर सारी अनुभूतियां कामुकता, अपेक्षा, महत्वाकांक्षा और लेन-देन पर टिक जाती हैं।
जिन रिश्तों में शरीर गौण हों और भावनाएं प्रमुख हों, वहां जिंदगी मीठी होने लगती है। यह सही है कि शरीर के बीज से ही रिश्ते अंकुरित होते हैं, लेकिन जो लोग वापस शरीर की ओर लौटेंगे, वे रिश्तों का वृक्ष नहीं बना पाएंगे।
रिश्तों से जुड़ने पर ऐसा लगता है, जैसे पत्थर में से मूर्ति संवारी गई। छुपा हुआ निखरकर आता है। हमें आज के दौर में यह ध्यान रखना होगा कि रिश्ते शुरू तो शरीर से हों, पर धीरे-धीरे शरीर से हटकर भावना, संवेदना,
” Ham aourat ko fakat ek jism samjh lete hai,
Uasme RUH bhi hoti hai ye kanha samjhate hai.”……Av
त्रिपाठीजी का यह लेख एक एतिहासिक दस्तावेज की तरह है क़ि प्राचीन भारत में स्त्रिओं की क्या दशा थी उसके समर्थन में अच्छे उद्धरण भी दिए गए है पर यह बहुत पुरानी बात है श्री राम का युग और उसके बाद महाभारत का युग स्त्रियों क़ि स्थिति इसी नहीं थी हम सीता क़ि व्यथा और द्रोपदी क़ि विवशता के प्रकाश में देखें तो ऐसी बात नहीं थी पुरुष वर्चस्व साफ दीखता है राम एक मर्यादा पुरुष कहलाते है और उस मर्यादा को अच्छुन रखने के लिए सीता के मान क़ि बलि चदा दी दो दो बार उनकी अग्नि परिच्छा ली गई मैंने इसका कारण जानने क़ि कोशिश क़ि पर मन उनके उत्तरों से संतुष्ट नहीं हुआ द्रोपदी का हाहाकार सम्पूर्ण महाभारत में गूंजता है धर्मराज विवश है धरम निबाहने के लिए भीष्म अपनी नपुंशक प्रतिज्ञा से बंधे है उनका भी बडबोलापन युद्ध के समय सामने आ जाता है पर द्रोपदी के क्रंदन और अभय क़ि भिक्षा के सामने उनकी जुबान बंद हो जाती है भीस्म तो शुरुआती दौर में ही अपनी प्रकृति को प्रकट कर देते है क़ि उनके मन में नारीओं के प्रति क्या भाव है और क्या स्थान वे अपने ह्रदय में देते है इसका परिचय वे कशी नरेश क़ि पुत्रियों का अपहरण कर के देते है यहाँ में अपहरण कह रहा हूँ हरण नहीं ,अपहरण मर्जी के खिलाफ होता है और हरण में स्वीकार होता है अस्तु भीष्म ने काशीनरेश क़ि कन्याओं का अपहरण कर के स्त्रिओं केप्रति अपनी मानसिकता भी जाहिर कर दी आज क़ि मनोवैज्ञानिक भाषा में इसे अनुवाद किया जाये तो भीष्म का व्यक्तित्व विखंडित व्यक्तित्व कहा जायेगा ,सिजोफ्रेनिक महाभारत एक काव्य ही नहीं है वह उस काल के इतिहास का दर्पण भी है सामाजिक और राजनीतिक दोनों स्थितिओं का जहाँ तक पूर्व वैदिक काल क़ि बात है वह समय मातरि सत्ता का था परन्तु उत्तर वैदिक काल में स्थिति बदल चुकी थी या बदल रही थी गौतम बुद्ध के ज़माने में भी देखा जाये स्थिति बेहतर नहीं थी इसका प्रमाण संघ में स्त्रिओं के प्रवेश पर निषेध काल क्रम में आगे बढ़ने पर सामंतयुग में स्त्रिओं का स्थान गिरता ही गया
वर्त्तमान में उसी अवनति के अवशेष मिलते है आज लड़की के पैदा होने पर ख़ुशी नहीं मनाई जाती घर परिवार में समाज में लड़के और लड़की का भेद बरक़रार है इसका जवलंत उदहारण है दहेज़ क़ि प्रथा लडकिया योग्य हों पढ़ी लिखी हों सब प्रकार से कुशल हों यह अपेछा होती है परन्तु लड़कों के लिए दहेज़ jaroori होता है यह है हमारे हिन्दू समाज में स्त्रिओं की स्थिति
विपिन कुमार सिन्हा
बहूत अच्छा आपको धन्यवाद्
आप लोगो की बातो से मै सहमत हू इस बारे में मै जगतगुरु शंकराचार्य निश्छालानंद सरस्वती से बात की थी हम सहयोग करे तो बात बन सकती है वेद उपनिषद विदेशो के पुस्तकालय में आज भी है और उनपर शोध हो रहा है हमारे लोग उसे विकृत करने में लगे है हिन्दू धर्म के सद्साहित्य पर तो काम होना ही चाहिए कपूर जी ने सही कहा धर्मपाल जी पुस्तक पढ़ने से ही भारत समझ में आ जाता है ये पुस्तके ०७१२५३२२६५५ पर बात कर मगाई जा सकती है कपूर जी भारतीय इतिहास का पुनर लेखन एक प्रवंचना कहा प्राप्त ओ पायेगी प्रकाशन का नंबर भी मिल जाये तो अच्छा है
आदरणीय श्री जीत भार्गव जी,
नमस्कार।
आपने जो सकारात्मक टिप्पणी की है और समरसता की बात कही है, उसका स्वागत है।
आपकी सभी सकारात्मक बातों से मैं सहमत हूँ, लेकिन दूसरे धर्मों में की आन्तरिक स्थिति क्या है, इससे हिन्दू होने के नाते मुझे सीधे तौर पर कोई सरोकार नहीं है और मेरा मानना है कि किसी भी हिन्दू को होना भी नहीं होना चाहिये।
आदरणीय श्री जीत भार्गव जी, हाँ एक मानव होने के नाते अवश्य हमें प्रत्येक मानव की बात करनी चाहिये, लेकिन जब हम मानव के रूप में सोचने और चिन्तन करने की योग्यता अर्जित कर लेते हैं तो धर्मों की दीवार नहीं दिखनी चाहिये। दोनों बातें एक साथ नहीं चल सकती।
आदरणीय श्री जीत भार्गव जी, यहाँ पर हिन्दू धर्म की बात करना श्रेयस्कर होगा, क्योंकि मैं हिन्दू हूँ और मुझे हिन्दू धर्म में अन्तर्निहित अच्छी या बुरी बातों से निश्चित तौर पर फर्क पडता है। जिनके कारण मेरे और हर हिन्दू के जीवन का प्रत्येक क्षण प्रभावित होता है। जबकि दूसरे धर्मों की आन्तरिक व्यवस्था से या कमियों से मौटे तौर मेरे जीवन पर, सीधे तौर पर कोई असर नहीं पडता।
आदरणीय श्री जीत भार्गव जी, मुझसे विरोध रखने वाले कुछ टिप्पणीकार एवं लेखकों का कहना है कि मैं हिन्दू धर्म की कमियों को तो रेखांकित और उजागर करता हूँ, जबकि इस्लाम या ईसाई धर्म की कमियों की ओर मेरा ध्यान नहीं जाता है। आदरणीय श्री जीत भार्गव जी, ऐसा कहने वालों का अपना दृष्टिकोंण है, जिससे मैं तनिक भी सहमत नहीं हूँ। इस बारे में मेरे दृष्टिकोंण को समझने के लिये एक उदाहरण देना जरूरी समझता हूँ :-
एक शिक्षक एक विद्यार्थी को प्रताड़ित करता है, जिसकी वह प्रधानाध्यापक को शिकायत करता है, क्योंकि शिक्षक की प्रताडना से विद्यार्थी आहत होता है और वह अपमानित भी अनुभव करता है। कार्यवाही या सुधार नहीं होने पर विद्यार्थी शिक्षक के बारे में सार्वजनिक रूप से सबको बतला देता है। जिसके प्रतिउत्तर में शिक्षक कहता है कि मैंने तो इस विद्यार्थी को कुछ भी प्रताड़ित नहीं किया, दूसरे स्कूलों में जाकर देखो वहाँ के शिक्षक अपने विद्यार्थी को कितना प्रताड़ित करते हैं। मारपीट तक करते हैं और यह विद्यार्थी तो अपने स्कूल का दुश्मन है, जो अपने शिक्षक को तो बदनाम कर रहा है, जबकि दूसरे स्कूल के शिक्षकों के बारे में एक शब्द भी नहीं कहता है?
आदरणीय श्री भार्गव जी विद्यार्थी को जिस शिक्षक से तकलीफ है, वह उसके बारे में शिकायत कर पा रहा है, यह क्या कम है और यदि विद्यार्थी दूसरे स्कूलों के शिक्षकों की शिकायत कर सकने में सक्षम होता तो क्या उसके अपने स्कूल के शिक्षक की इतनी हिम्मत हो सकती थी कि वह उस विद्यार्थी को तंग कर पाता?
आदरणीय श्री जीत भार्गव जी, मैं उन सभी आदरणीय विसम्मत विद्वान साथियों से कहना चाहता हूँ, जो मुझे या अन्य मेरे जैसे विचारों के लोगों को हिन्दू धर्म का दुश्मन, राष्ट्रद्रोही, ईसाईयों या इस्लाम का ऐजेण्ट या कुछ भी कहते रहते हैं, कि मैं हिन्दू हूँ और चाहे कारण कुछ भी रहे हों, लेकिन यह सर्वस्वीकार्य तथ्य है कि हिन्दू धर्म में वर्णवाद, जातिवाद, वर्गवाद आदि के आधार पर भेदभाव और हिन्दू द्वारा हिन्दू का शोषण सदियों से होता रहा है ओर आज भी सतत जारी है। जिसके कारण जो लोग व्यथित हैं, उनकी पीडा को दूर करने के लिये हिन्दू धर्म के धर्माचार्यों, आचार्यों और शंकराचार्यों को आगे आना चाहिये था, लेकिन दिखावे के अलावा कुछ नहीं किया गया। जिसके कारण ऐसे लोगों के प्रति व्यथित लोगों के मनोमस्तिष्क में वितृष्णा या घृणा या दुश्मनी या नफरत पैदा होना स्वाभाविक क्रिया का प्रतिफल है। इसके लिये मेरी राय में व्यथित लोग जिम्मेदार नहीं हैं। इसके लिए उनका दमित और प्रताड़ित अवचेतन मन जिम्मेदार है!
आदरणीय श्री जीत भार्गव जी, ऐसे व्यथित लोगों के हालातों का लाभ उठाने के लिये वे लोग आगे आते हैं, जिनके नाम आपने अपनी टिप्पणी में गिनाये हैं। दु:ख तो तब होता है जबकि आप जैसे प्रबुद्ध एवं संवेदनशील कहलाने और समझे जाने वाले लोग भी, व्यथित लोगों की हजारों साल की पीडा को समझते हुए भी उसका स्थायी संवैधानिक निदान करने के बजाय, इन्हें कुरूति, कुप्रथा, सामाजिक बुराई जैसे हल्के शब्दों में आलोचना करके किनारा कर लेते हैं और बीच में ले आते हैं-हिन्दुस्तान और हिन्दू धर्म की अस्मिता को!
आदरणीय श्री जीत भार्गव जी, क्या हिन्दुस्तान का मतलब देश की दबी-कुचली और हजारों सालों से विभेद का सामना कर रही आबादी नहीं है? यदि हाँ तो हिन्दुत्व के सबसे अग्रणी पैरोकार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एवं संघ द्वारा संचालित भारतीय जनता पार्टी के ऐजेण्डे के पहले दस मुद्दों में देश की आधी से अधिक आबादी की पीडा के निराकरण का दर्द क्यों नहीं है? इनके ऐजेण्डे में हिन्दुओं के मन में मुसलामानों के प्रति विरोध पैदा करने वाले तीन मुद्दे-राम मन्दिर, कश्मीर और समान नागरिक संहिता ही क्यों हैं? इनके स्थान पर आदिवासी, दलित और स्त्री को सामाजिक एवं धार्मिक सम्मान और सत्ता तथा देश के संसाधनों में समान भागीदारी प्रमुख मुद्दे क्यों नहीं है?
आदरणीय श्री जीत भार्गव जी, संघ की ओर से कहा जाता है कि संघ के अनेक ऐसे प्रकल्प हैं जो दलित-आदिवासियों और स्त्रियों के उत्थान के लिये बहुत बडे-बडे कार्य कर रहे हैं, लेकिन ऐसा कहते समय वे यह भूल जाते हैं कि संघ स्वयं और भाजपा दलित, आदिवासी, पिछडे और स्त्रियों के संवैधानिक आरक्षण के खिलाफ हैं या कहो मजबूरी में लोकतान्त्रिक मंचों पर समर्थन करते हैं!
आदरणीय श्री जीत भार्गव जी, एक ओर संवैधानिक समानता और सामाजिक न्याय के सिद्धान्तों का खुलेआम सडकों पर उतर कर विरोध किया जाता है, दूसरी ओर दलित-आदिवासियों के क्षेत्रों में जाकर उनकी सेवा करने का दिखावा (क्षमा करें मेरे पास इस कार्य के लिये इससे अधिक उपयुक्त और सरल कोई शब्द नहीं है) किया जाता है।
आदरणीय श्री जीत भार्गव जी, क्या आप समझते हैं कि किसी भी समाज के लोगों में समानता एवं सम्मान के भाव के पैदा हुए बिना एकजुटता और समरसता पैदा हो सकती है? यदि हाँ तो आप बतायें कि कैसे? मैं खुले दिल से आपका और आपके विचारों का स्वागत करने को तैयार हूँ!
शुभाकांक्षी
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’
डॉ. मीणा साहब और डॉ. राजेश जी, आपका धन्यवाद.
मीणा साहब आप एक प्रबुद्ध लेखक और समाज सेवी है. आपको कई बार पढ़ता रहता हूँ. हिन्दू समाज में समरसता के लिए आपकी चिंताओं से अवगत होता रहता हूँ.
आज हिन्दू समाज काफी हद तक जातिवाद की सीमाओं से कही आगे बढ़ चुका है. और जहां भी जातिवाद चरम पर है वहां समाज का ताना-बाना गर्त में है, चाहे वह तथाकथित सवर्ण हो या तथाकथित दलित.
इसलिए समरसता आज दोनों की जरूरत ही नहीं बल्कि मजबूरी भी है.
अब सवाल ये है की यह समरसता आये कैसे. किसी कथित अगड़े द्वारा कथित पिछड़े को गाली देने या कथित पिछड़े द्वारा कथित अगड़ो को गाली देने से समरसता आने से रही.
इसके लिए हमें अपनी शंकाओं का समाधान और संवाद का माहौल कायम करना होगा. अपने धर्म ग्रंथो को सही परिपेक्ष्य में देखना होगा. हमें अंग्रेजो और गैर-हिन्दुओ के नजरियों से धर्म ग्रंथो को नहीं देखना चाहिए. क्योंकि अंग्रेजो समेत गैर-हिन्दुओ के निहित स्वार्थ रहे है. वह हमेशा विभाजन का खेल खेलकर हिन्दू समाज को एक-दूसरे के सामने खडा करने की साजिश करते रहे है. अंग्रेज तो चले गए लेकिन बदले में मिशनरिया आ गयी है. मिशनरियो के जरिये गुमराह हुए हिन्दू दलित ईसाई बनाने के बाद भी वहा जलालत के शिकार है. इस्लाम के भी सय्यद, पठान,मुग़ल या शेख ही राज कर रहे है, और अंसारी, जुलाहे आदि पिछड़ी जातिया कतार में पीछे ही है. महिलाओं का शोषण इस्लाम में आये दिन होता रहता है. चर्च भी यौन शोषण में सबसे आगे है.
यहाँ इस्लाम और ईसायत का उदाहरण देकर मै हिन्दू समाज में व्याप्त बुराइयों को जायज नहीं ठहरा रहा हूँ, लेकिन सिर्फ कहना चाहता हूँ की जाती और लिंग के नाम पर सर्वत्र थोड़ी बहुत बुराइया है. ऐसे में हिन्दू समाज में व्याप्त बुराइयों को दुरुस्त करने की बजाय हम एक दूसरे को कोसते रहे तो कब उद्धार होगा.
यहाँ हम में से कई पाठक इसा लेख के लेखाका समेत डॉ. राजेश कपूर और पुरोहितजी को कोस रहे है. क्या इससे समाज ठीक हो जाएगा. अगर गाली देने से किसी का भला होता तो मायावती-पासवान-उदयराज-कामराज और रणवीर सेना कभी के देश और समाज का कल्याण कर लेते.
आशा है आप मेरे मंतव्य को समझेंगे और इस दिशा में सकारात्मक नजरिया रखते हुए समरसता का मार्ग प्रशस्त करेंगे.
जीत भार्गव जी आप की सार्थक व बुधिमत्तापूर्ण टिपण्णी पढ़ कर विश्वास बढ़ा कि कुछ लोग हैं जो बात को सही ढंग से समझते हैं. बड़े महत्व की बात यह है कि इतिहास की सही जानकारी के बिना घटनाओं का सही आकलन कभी भी संभव नहीं हो सकता. देश का दुर्भाग्य यह है की एक तो इतिहास का अध्ययन करने वाले ही बहुत कम लोग हैं. और अगर हैं भी तो उन्हें देश के दुश्मनों द्वारा लिखा, भारत के दुश्मनों-आक्रमणकारियों, भारत को बरबाद करने वालों का इतिहास यह कह कर थमा दिया जाता है की यह भारत का इतिहास है. अब ऐसे झूठे इतिहास को पढ़ कर कोई कैसे सही निष्कर्ष निकाल सकता है. यही कारण है कि विदेशी आक्रमण कारियों की प्रशंसा व भारत की आलोचना से भरा JHUTHAA इतिहास पढ़ कर अनेक देशभक्त भी भ्रमित हो जाते हैं.
सही इतिहास की जानकारी के लिए मुझे अपने इतिहास अध्ययन के ३०-४० साल के जीवन काल में जो सर्वोत्तम पुस्तक मिली है वह है———————–
” भारतीय इतिहास का पुनर लेखन एक प्रवंचना ” इतनी सरल, सम्पूर्ण व ज्ञान वर्धक पुस्तक मैंने अपने जीवन में इससे पहले कभी नहीं देखी. इसके इलावा इतिहास पर कोई सबसे प्रमाणिक और सबसे महत्वपूर्ण काम हुआ है तो वह है गांधीवादी विचारक श्री धर्मपाल जी का दस पुस्तकों का संच. यूरोपीय और मुस्लिम इतिहास के षड्यंत्रों को इतने ठोस ढंग और प्रमाणिक ढंग से उधेडा है की कोई इसके तथ्यों को हिला नहीं सकता. अंग्रेज़ी से गुजराती व हिन्दी में इन १० पुस्तकों का अनुवाद हो चुका है. SARW SEWAA SANGH, WAARAANASEE से मुझे यह साहित्य MILAA है.
धर्मपल जी का साहित्य विद्वानों के लिए अधिक उपयोगी और भाषा में थोड़ा जटिल है. पर रघुनन्दन प्रसाद द्वारा लिखित ‘ भारतीय इतिहास का पुनर लेखन एक प्रवंचना’ की भाषा बड़ी सरल और प्रवाहमान है. केवल यह एक पुस्तक पढ़ कर फिर कोई BHRAM भारत के इतिहास को समझने में नहीं रह जाता. खेद यह है की अभी यह पुस्तक समाप्त है, उपलब्ध नहीं. बाबासाहेब अप्ते स्मारक समिति, झंडेवालान से यह पुस्तक छपी है.
तमाम टिप्पनिकारों ने मूल आलेख की ऐसी दुर्गति करी है की अब एक दूसरे से कह रहे हैं की ये मेरा नहीं है, जिसका है {त्रिपाठी जी } वे मौन हैं .
श्री जीत भार्गव जी,
नमस्कार।
आपने बहुत ही तार्किक तरीके से वेदों के अनुवाद को गलत सिद्ध करने और डॉ. राजेश कपूर जी से एक हजार प्रतिशत सहमत होने का उल्लेख किया है। जबकि सौ प्रतिशत सहमत होने और एक करोड प्रतिशत सहमत होने में मेरे विवेक और ज्ञान से कोई अन्तर नहीं हैं। अपनी बात कहने का सबका अपना-अपना तरीका होता है।
आपके माध्यम से मैं उन सभी विद्वजनों से विनम्रतापूर्वक कहना चाहता हूँ, जो कथित रूप से वेदों के अनुवाद को गलत या भ्रामक मानते हैं कि वे स्वयं ही सभी वेदों, पुराणों, उपनिषदों और अन्य हिन्दू धर्मग्रन्थों का आम बोलचाल की, आमजन के बीच वर्तमान में प्रचलित भारतीय भाषाओं में सरल अनुवाद क्यों नहीं करते हैं? जिससे कथित रूप से अंग्रेजों द्वारा भ्रामक एवं गलत अनुवादित इन ग्रन्थों से आज की पीढी दिग्भ्रमित नहीं हो। भारत की आजादी को इतना समय गुजर चुका है, जिसमें यह कार्य सैकडों बार किया जा सकता था।
यदि ऐसा किया जाता है कि हिन्दू एकता में उल्लेखनीय सुधार होगा और वेदों एवं धर्मग्रन्थों के आधार पर जो विचार भिन्नता है, उसमें स्वत: ही मतैक्य पैदा होगा।
मैं तो यहाँ तक कहना चाहूँगा कि इन धर्मग्रन्थों का अनुवाद ऐसे तटस्थ लोगों के एक समूह से करवाया जाये, जिस पर किसी भी पक्ष या वर्ग या वर्ण के समर्थक होने का कभी भी आरोप नहीं लग सके। क्योंकि वर्तमान में हर वर्ग और हर वर्ण में संस्कृत को जानने वाले हैं। जिससे यह विवाद हमेशा को समाप्त हो जाये।
यदि इस कार्य में आर्थिक समस्या है तो इसके लिये एक कोष की स्थापना की जावे। जिसमें सभी हिन्दुओं का अंशदान संग्रहित किया जावे, इससे भी हिन्दू एकता एवं समरसता में वृद्धि होगी। हमें नकारात्मक के बजाय सकारात्मक पहल भी करनी चाहिये।
आशा है विद्वजन सकारात्मक रूप से इस विचार को आगे बढाने के लिये चिन्तन करेंगे।
शुभकामनाओं सहित।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’
०९८२८५-०२६६६
डॉ. राजेश कपूर से १०००% सहमत..
”* अंग्रेजों को हिन्दुओं को धर्मान्तरित करने में सफलता नहीं मिल रही थी. तब उन्होंने इसके कारणों को जानने का प्रयास किया तो पता चला की हिन्दू समाज ब्राह्मणों के कहने से चलता है. तब हमारेब्राह्मण बड़े ज्ञानी, तपस्वी, त्यागी और संयमी होते थे. सारा हिन्दू समाज ब्राह्मणों की तपस्या, ज्ञान व त्याग के कारण उनके कहे अनुसार चलता था. इस बात से ईसाई मिशनरी बड़े चिढ़ते थे. तब ब्राह्मणों को अपमानित, प्रताड़ित और पतित बनाने के प्रयासों की शुरुआत हुई. उस शत्रु-षड्यंत्र का शिकार बन कर अगर हम ब्राह्मणों को अपमानित करें तो यह तो अपने समाज के शत्रुओं की सहायता करना हुआ. वैसे भी अकारण किसी समाज या वर्ग को अपमानित करने वाली भाषा बोलना असभ्यता, अन्याय और मुर्खता व दुष्टता की बात नहीं है क्या? बिना किसी आधार या प्रमाण के ब्राह्मणों को अपमानित करना सरासर अन्याय पूर्ण है. कुछ कहना ही है तो ये विद्वेष, घृणा फैलाने वाली फतवों की भाषा बंद करके ; जो भी कहना है प्रमाणों और तथ्यों के आधार पर सही भाषा में कहना चाहिए. वैसे भी सच तो यह है न कि सारा समाज जिस अनुपात में बला बुरा है, ब्राहमण भी उसी अनुपात में अछे या बुरे हैं. इस बात में कोई गलती है तो प्रमाण के साथ बात करें अन्यथा ये समाज तोड़क देश के दुश्मनों की भाषा बोलनी बंद करें .
#हिन्दू धर्म, हमारे ग्रंथों व ब्राह्मणों को बदनाम करने के सुनियोजित प्रयास हमारे देश के दुश्मनों ने किये हैं, अपनी बात के प्रमाण दे रहा हूँ ———–
*वेदों का अनुवाद करने वाले मैक्स्मुलर की नीयत क्या थी और उसकी नियुक्ती करने वालों की नीयत क्या थी, ये देखें,
-ईसाई पंथ के प्रचार के लिए स्थापित बोडन चेयर पर मैक्समुलर की नियुक्ती की सिफारिश करते हुए कलकत्ता के बिशप काटन ने लिखा था, ”…हमारे मिशनरियों को संस्कृत जानने और हिन्दू धर्म शास्त्रों तथा दर्शनों को समझने और हिन्दू पंडितों से उनकी अपनी ही धरती पर उन्हें चुनौती देने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है.” ईसाईकरन से जुड़े आक्सफोर्ड के एक सक्रीय सदस्य ‘डा.ई.बी.पुसी’ ने मैक्समुलर को लिखा था,
”…आपका कार्य भारतीयों को ईसाई बनाने के प्रयत्नों में नवयुग लाने वाला होगा और और आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय को अपने को धन्य समझाने का अवसर होगा जिसने आपको आश्रय देकर भारत को ईसाई बनाने के प्राथमिक और दूरगामी प्रभाव वाले कार्य को सरल बना दिया है.” आप समझ रहे हैं न कि आक्सफोर्ड जैसा सम्मानित समझे जाने वाला विश्वविद्यालय भी धर्मांतरण के कट्टरपंथी कार्यों का संचालक , पोषक है.
स्वयं मैकाले ने वेदों के अनुवाद के अपने गुप्त उद्देश्य को प्रकट करते हुए अपनी पत्नी को पत्र लिखा था कि उसके द्वारा किया वेदों का यह अनुवाद हिन्दू धर्म की जड़ें उखाड़ने वाला प्रमाणित होगा. तब भी इसाईयत का प्रसार न हो तो ये किसका दोष है.
साफ़ है कि वेदों का अनुवाद केवल हिन्दू धर्म को समाप्त करने के लिए करवाया गया था. ये भी साफ़ हो जाता है कि वेदों के अर्थ जान-बूझकर गलत और बुरे किये गए. इसके बिना उनके गुप्त अजेंडे की पूर्ती कैसे होती ?
इसी गलत नीयत से ब्राह्मणों, हमारे धर्म ग्रंथो को सच-झूठ मिला कर बदनाम करने का षड्यंत्र अनेक दशकों से चल रहा है. अतः अगर हम भी उस षड्यंत्र का एक हिस्सा नहीं तो गैरजिम्मेवार, असभ्यता पूर्ण टिप्पणियों से हमें बचना चाहिए.”