वे जो हर सांस में भारत को ही जीते हैं / नरेश भारतीय


प्रवासी भारतीयों के सम्बन्ध में यदा कदा यह टिप्पणी देखने को मिलती है कि “वे लोग तो अपने सुख के लिए देश छोड़ कर भाग गए थे. इसलिए उन्हें क्या हक है कि भारत में जो कुछ हो रहा है उस पर कुछ भी कहें?” यह आक्षेप उन प्रवासियों की अंतरव्यथा को बढ़ाता है जो बरसों विदेश में बिता कर भी भारत के साथ अपना नाता पूर्ववत अटूट बनाए हुए हैं. जो मन से अपने देश से कभी अलग हुए ही नहीं. जिन्होंने भारत को हर पल जीया है. भारतमाता की पूजा अर्चना की है. सागर महासागरों के हर छोर पर अपने आस्थास्थलों का निर्माण किया है. अपने दूर देश में जरा सी भी हलचल होती है तो विदेश में बसे भारतीयों में तुरंत उसकी प्रतिक्रिया होती है. भारत में आतंकवादी हमले हों या सीमा पार शत्रु देशों के साथ हुए युद्ध, कहीं बाढ़ का प्रकोप, तो कहीं सूखे की मार या फिर भूकम्प, चुनावों की मौसम हो और राजनीति गर्म हो, अर्थव्यवस्था में होने वाली ऊंच नीच और अब भ्रष्टाचार के विरुद्ध खड़े किए जाने वाले जन आंदोलन प्रवासी भारतीय सजगता के साथ अपने देशवासियों के हिताहित की चिंता करता है और उसके द्वारा जो करणीय है उसके लिए यथासंभव सब करने को तत्पर मिलता है. भारत के प्रबुद्ध वर्ग यह सब बखूबी विदित ही है.

जहां तक अपना देश छोड़ कर अपने सुख के लिए विदेश चले जाने की कुछ लोगों के द्वारा बिना गंभीरता के सोचे समझे लगाई जाने वाली तोहमत का प्रश्न तो प्रश्न पूछा जा सकता है कि समयांतर में विश्व की एक आर्थिक महाशक्ति बनने की भारत की क्षमता हो जाने के बावजूद भी अपने देशवासियों में विदेश जा कर जीवन को बेहतर बनाने की धुन कम क्यों नहीं हुई? ऐसा क्यों है कि उच्च शिक्षा भारत में प्राप्त करने के बाद अधिकांश युवा आज भी अमरीका जाने का स्वप्न पूरा करने के किए जुट जाते हैं? जो नहीं जा पाते निराश और व्यथित क्यों होते हैं? यदि ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्हें लगता है कि वे अपने देश की अपेक्षा विदेश में अधिक सफल हो सकते हैं और उन्हें अवसर मिलना चाहिए तो फिर उनमें जो पचास वर्ष पहले विदेश गए थे और जो आज भी जाना चाहते हैं उनमें अंतर क्या है? महत्व इस बात का अधिक है कि हम भारतीय जहां कहीं भी हों हम अपनी मातृभूमि के प्रति अपने कर्तव्य निर्वहन को न भूलें.

निस्संदेह, सबसे अधिक संख्या भारत में उन लोगों की है जिन्हें भारत को छोड़ कर अन्यत्र कहीं जाने की न तो कोई सम्भावना ही लगती है और न ही उन्होंने इसकी कभी कोई आवश्यकता ही समझी है. मैं ऐसे भारतीयों को भाग्यशाली मानता हूँ और उनका अभिनंदन करता हूँ. इसलिए क्योंकि वे देश की धरती पर बने रहते हुए हर दिन उभरने वाली नई चुनौतियों के साथ जूझते हैं, समस्याओं के हल खोजते हैं, देश के कर्णधारों को चुनते हैं और अब उन्हें सतर्क और सचेत करते हुए देश में सर्वत्र व्याप्त भ्रष्टाचार जैसी अनेक गंभीर समस्याओं के समाधान में सही व्यवस्था बिठाने के लिए विवश कर रहे हैं. निश्चय ही उनकी तपश्चर्या अवश्य सफल होगी और तब सच में लहर पलटेगी. उनकी इस तपश्चर्या में किसी न किसी तरीके से यदि प्रवासी भारतीय जुड़ने को उत्सुक रहते हैं तो उनका स्वागत होना चाहिए क्योंकि वे इसे अपने देश और अपने देश वासियों के प्रति अपना कर्तव्य मानते हैं.

आज के बदलते विश्व परिवेश में किसी का कहीं से भी विदेश जाकर रहना, बसना, जीना और अपने मूल देश के साथ भी सम्बन्ध की निरंतरता को बनाए रखना आम हो गया है. इसे किसी भी दृष्टि से अनैतिक या राष्ट्रहित विरोधी नहीं माना जाता. भारतीयों ने तो विदेशों में जाकर न सिर्फ अपने लिए धन ही कमाया है बल्कि कई तरीकों से भारत का हित साधन भी किया है. क्या कोई माँ अपने किसी बेटे को इसलिए बेटा मानने से इनकार कर देती है क्योंकि उसे धनार्जन के लिए परदेस जाना पड़ा है? नहीं, तो परदेसी भारतीय बेटे बेटियाँ क्या हजारों किलोमीटर दूर रहते हुए क्या अपनी माँ को कभी भूल सकते हैं? वे उसके हर सुख दुःख में शरीक होते हैं. कहीं भी हों अपने मूल देश में भाई बहनों और हमवतनों के साथ सम्बन्ध बनाए रखते हैं. यह स्नेह सम्बन्ध सूत्र निजी परिवार से आगे बढ़ कर उस समाज और राष्ट्र को भी उनके साथ जोड़े रखता है जिसके वे अंगभूत होते हैं. इसमें विश्व के किसी भी देश के लोग अपवाद नहीं हैं. उदाहरणार्थ, यह ध्यान देने योग्य है कि लाखों ब्रिटिश जो गत अनेक वर्षों में ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कनाडा, अमरीका और आस पास के यूरोपीय देशों में जा बसे थे ब्रिटेन को नहीं भूले. और न ही ब्रिटेन ने उन्हें ही भुलाया. पिछले कुछ वर्षों में यूरोपीय समुदाय संगठन बनने के बाद से अनेक यूरोपीय नागरिक एक दूसरे के देशों में लगातार बस रहे हैं भले ही उन्हें तरह तरह की समस्याओं का भी सामना करना पड़ रहा है. इस पर भी उनके पारिवारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सम्बन्ध अपने मूल देश के साथ पूर्ववत बने हुए हैं. इस प्रकार दुनियां का स्वरूप बदल रहा है और निश्चय ही इसके दूरगामी परिणाम हो रहे हैं.

भारतीयों के विदेशवास का एक लम्बा और बहुआयामी इतिहास है. उनके भारत के बाहर जाने के विभिन्न कालखंडों में विविध कारणों का अध्ययन रोचक और महत्वपूर्ण निष्कर्ष देता है. वर्तमान संदर्भ में ५०-६० बरस पहले भारतीयों की जो पीढ़ी विदेशों में गई, विशेष रूपसे यूरोप में, उन्हें स्थानीय लोगों से घोर उपेक्षा और अपमान सहना पड़ा. उनकी दृष्टि में वे विजातीय और भिन्न रंग ढंग के होने के कारण दीन हीन और त्याज्य थे. यद्यपि ब्रिटेन जैसे देशों को अपने उद्योगों के उत्पादन स्तर को बनाए रखने के लिए मानव संसाधनों की आवश्यकता थी इस पर भी ब्रिटेन की सामान्य जनता अपने विगतप्राय: साम्रज्यकालीन गौरव के अहंकार में गोरे काले के बीच भेद की अपनी परम्परागत सोच से मुक्त नहीं हो पाई थी. ऐसे प्रतिकूल वातावरण में भी भारतीय डटे रहे. अपने परिश्रम, इमानदारी और स्थानीय समाज के साथ मधुर सम्बन्ध कायम करने में जुटे रहे. भारत के प्रति पश्चिम की सोच में आमूल चूल परिवर्तन करने के एक महत्वपूर्ण दौर के प्रारम्भ का माध्यम बन गए. मैंने स्वयं अपने प्रवासी जीवन के समस्त बीते वर्षों के संघर्ष में आत्मविश्वास और साहस के साथ कदम बढ़ाते हुए काम भी किया, और अधिक शिक्षा भी ग्रहण की, भारत को समर्पित सामाजिकता को विस्तार दिया और स्थानीय समाज के साथ समानता के आधार पर और एक भारतीय होने के गौरव के साथ अपना सांस्कृतिक जीवन जीने का एक पुष्ट आधार कायम किया.

सैंतालीस वर्ष पूर्व, लन्दन में किराए के एक छोटे से कमरे की चारदीवारी में एक दीप जला कर दीवाली मनाई थी. उसी दीप के टिमटिमाते प्रकाश में पहले से वहाँ बसे भारतीयों को ढूँढने और भारत के साथ हम सबके जुड़े रहने के लिए प्रयास शुरू किए थे. भारत की सामाजिक एवं सांस्कृतिक छवि को स्थापित और वर्धमान करने का संकल्प अनेक भारतीयों के मन में जगा था. भारतीयों की परस्पर सामाजिकता का आधार बने थे वही उत्सव त्यौहार जो हम भारत में मनाते चले आए थे. इस प्रकार हर वर्ष दीवाली पर जलने वाले दीपों की संख्या में अनवरत वृद्धि होती चली गई. उसी के परिणाम-स्वरूप आज ब्रिटेन और अमरीका के अनेक बड़े नगरों में दीवाली ही नहीं अन्य प्रमुख भारतीय त्यौहार भी उसी हर्षोल्लास और स्थानीय समाज की सहभागिता के साथ मनाए जाते हैं जैसे भारत में. विश्व के कोने कोने में बसा भारत आज ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भारतीय अवधारणा को अर्थ प्रदान कर रहा है. यदि भारतीय देश से बाहर ही न निकलते तो क्या यह संभव होता?

भारतीयों ने अपनी योग्यता, क्षमता और परिश्रम के बल पर विदेशों में धनार्जन किया. अपने भारतीय संस्कारों के बल पर आतिथेय देश के समाज के विरोधों और अनेक अवरोधों के बीच अपना स्थान बनाया. अपनी धार्मिकता को बरकरार रखते अनेक भारतीय परम्पराओं को अक्षुण्ण बनाए रखा और स्थानीय समाज की धार्मिकता को भी आंच नहीं आने दी. ऐसी अद्भुत क्षमता उनकी भारतीयता की ही देन है जो अन्यत्र सहजता से उपलब्ध नहीं है. प्रवासी भारतीयों ने अपनी आतिथेय चयनित कर्मभूमि के कानूनों का सम्मान किया और व्यवस्था को बनाए रखने में सहायता की. अपने भद्र व्यवहार से जिस प्रकार सर्व सामाजिक सदभाव की भारतीय अवधारणा को प्रतिष्ठित किया उनका ऐसा आचरण में देख कर ही तो आज विश्व भारत के प्रति कहीं अधिक सहज होता दिखाई देता है. विदेशवासी भारतीयों ने जिस प्रकार बेहद कठिन स्थितियों में से गुजरते हुए अपने परिश्रम के बल पर अमरीका और ब्रिटेन जैसे देशों में अपनी प्रतिभा का सिक्का जमाया है वह उनके भारत की ही जीत है.

मानवता को एक तंग सोच से निकाल कर व्यापकता का आधार प्रदान करने का एक सफल प्रयोग जो ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की अवधारणा के अनुरूप समग्र मानवता की साँझा सुरक्षा, विकास और परस्पर संपर्क, सहयोग के साथ विश्व की अनेकविध समस्याओं के समाधान का आधार प्रदान करने को सक्षम है. लेकिन आज भारत को ऐसी विसंगतियों से बचने की आवश्यकता है जो उसे पश्चिम में उसके प्रतिस्पर्धियों के समक्ष छोटा बनाने की स्थिति में पहुंचा देती हैं. उनमें इस समय सबसे बड़ा मुद्दा है देश में सर्वव्याप्त भ्रष्टाचार. इसे समाप्त करने की दिशा में सशक्त उपाय करने से न सिर्फ देश के लोगों को ही राहत मिलेगी बल्कि विश्व में भारत की आर्थिक विश्वसनीयता को और पुष्ट करने में भी सहायता होगी. पश्चिम इस समय जहां चीन और भारत को कदम आगे बढ़ाते हुए देख रहा है वहाँ अपने व्यापारिक एवं व्यावसायिक हिताहित की सोच के तहत अभी भी अपना हाथ ऊपर रखने को सचेष्ठ है. प्रवासी भारतीयों को उनके अपने भारत के कदम आगे बढ़ते देखने की उत्सुकता से प्रतीक्षा है क्योंकि कोई भी प्रवासी भारतीय भारत से दूर बसे होने पर भी अपने मूल देश की दशा, दिशा, मान, अपमान, उन्नति, अवनति और उस भूखंड पर होने वालीं छोटी बड़ी राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक हलचल से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता. अपने हर सांस में वे भारत को ही जीते हैं.

5 comments for “वे जो हर सांस में भारत को ही जीते हैं / नरेश भारतीय

  1. February 4, 2012 at 12:44 am

    शत प्रतिशत एक ‘भारतीय’ दिल की बात. हार्दिक साधुवाद.

  2. डॉ. मधुसूदन
    December 24, 2011 at 3:03 am

    (१) प्रवासी भारतीयों ने अमरिका से आपात्काल (Emergency ) को हटाने में बडा काम किया था।
    (२) परदेशी दृष्टि से भारत का मूल्यांलन कर उचित योगदान भारत को सहायता ही करता है।
    (३) संसार से सम्बंध या सम्पर्क विच्छेद हमें आत्म सम्मोहित (सेल्फ गिओनोटाइज़्ड) कर के धोका दे सकता है। आंखों पर ऐसा परदा भी एक प्रकार की दासता है।
    (४) आज देरसे ही भले, भारत के उत्थान की जो सम्भावनाएं दिख रही है, उसका एक प्रभावी कारण मैं प्रवासी भारतीयों का योगदान मानता हूं।
    (५) पर ऐसे भी प्रवासी भारतीय भी है, जो भारत के नाम पर कलंक है, यह स्च्चाई भी अवमानित नहीं जी जा सकती।
    (६) वैसे बहुत कुछ कहने योग्य है, पर यह है टिप्पणी का संक्षेप।
    नरेश जी आप के नाम में “भारतीय” शत प्रतिशत सार्थक है।

    • Naresh Bharatiya
      December 26, 2011 at 3:05 am

      आपने मेरे आलेख पर अपनी जो प्रतिक्रिया दी है उसके लिए आभारी हूँ. निश्चय ही मैं इस विषय पर आपसे असहमत नहीं हूँ कि ऐसे भी प्रवासी भारतीय हैं जो भारत के नाम पर कलंक हैं. वे कौन हैं इसका अंदाज़ लगाया जा सकता है क्योंकि उनके अनेक कारनामों से देश और समाज की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचती है, ठीक वैसे ही जैसे देश में अनेक हैं जो मात्र अपने हित को देखते हैं देश की चिंता उन्हें नहीं होती. हमारी लड़ाई ऐसे सभी राष्ट्रविरोधी तत्वों के विरूद्ध केन्द्रित होना आवश्यक है भले ही वे कहीं भी हों.

      नरेश भारतीय

  3. Rekha singh
    December 24, 2011 at 2:18 am

    कोई भी बालक अपनी माता से दूर तभी जाता है , या तो उसकी बड़ी मजबूरी हो या कोई बड़ा उदेश्य, अथवा दोनों ही | प्रवासी भारतीयों ने अपनी भारत माता से दूर रहकर उसको जाना है, जिया है और महसूस किया है | मुझे तो कभी कभी ऐसा लगता है कि उसके पास रहकर लोग उसकी कीमत नहीं समझते वरना मुट्ठी भर लोग भारत का ४०० लाख करोड़ खाकर भारत को बर्बाद नहीं कर पाते . मुट्ठी भर भ्रष्ट्र नेता देश को आस्था और बिश्वास के नाम पर बांटकर वोट बैंक कि राजनीती करके १०० करोड़ से भी ज्यादा लोगो को बेवाकूफ बना रहे है |प्रवासी भारतीयों का देशप्रेम और अपने देश से दूर रहने का अनुभव और अपने देश के लिए कुछ कर गुजरने की चाह उन्हे भारत से जोड़ती है |विज्ञान ने आज वह दूरी बहुत कम कर दी है |मेरी ७६ साल की माँ अकेले रहती है भारत मे लेकिन स्काइप पर बात करके हम एक दूसरे से जुडे हुए है |एक दूसरे का ध्यान रखते है |अपनी मात्रभूमी से जुड़कर बिभिन्न तरीके से अपनी मात्र भूमि की सेवा मे लगे रहते है |हम प्रवासियों का जीवन दुःख और सुख का ऐसा मिश्रण है जो हमे भारत माता की सच्ची संतान बनने की क्षमता प्रदान करता है एवं हम जिस देश मे भी बसे है उस देश की आर्थिक सामाजिक सांस्कृतिक उन्नति मे भरपूर योगदान करते है |हमारे जीवन की कठिन परिस्थतिया ने हमे एक बहुत नेक इंसान बनने की प्रेणना दी है जिसके आलोक से हमने भारत की सभ्यता और संस्कृति को समस्त दिशाओ मे प्रचारित और प्रसारित किया है |

    • Naresh Bharatiya
      December 26, 2011 at 3:19 am

      प्रिय रेखा सिंह जी
      निस्संदेह आपने जो कुछ कहा है न सिर्फ अत्यंत भावपूर्ण है, अपितु आज का ध्रुव सत्य भी बन चूका है. देश से बाहर रह कर देश की याद ही नहीं आती उसके लिए सब कुछ क्र गुजरने की इच्छा भी बलवती होती है. मां से दूर जाकर उसके ममतामय सानिध्य में बिताया हर क्षण ताज़ा हो उठता है, संघर्ष में संबल बनता है और उनमें जीतने पर उसकी जय जयकार के लिए तडपता है. आप भी मेरे इन निष्कर्षों से सहमत हैं और आप में भी वैसी ही तडप है जो अनेक प्रवासी भारतीयों के मन में है. प्रसन्नता हुई.
      धन्यवाद.
      नरेश भारतीय

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