कैसे बचेगी बेटी

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म0प्र0 की शिवराज सिंह सरकार कहती है, ” बेटी बचाओ। और वहीं जिला अस्पतालों को परिवार नियोजन का लक्ष्य भी निर्धारित कर दिया है कि इतनें अदद पुरूष-महिलाओं का परिवार नियोजन करके बताओ।सवाल साफ है कि जब परिवार नियोजन होगा, तो बेटी तो पैदा होंनें से रही, बेटा भी पैदा नही होगा। यह तो ठीक है कि भ्रूंण हत्या न हो, लेकिन लेकिन परिवार नियोजन क्यों हो ? बेटी बचेगी तो सृष्टि होगी, बेटी बचेगी तो उसके लिए वर कहां से आयेगा ? फिर एक स्कीम लागू होगा, कि ”आपरेशन खोलवाओ, और बेटों की पैदाइस बढाओ। सृष्टि तो स्त्री-पुरूष के संयोग से ही संभव है ? फिर आप सृष्टि के पर्यावरण के साथ छेडखानीं क्यों करते हैं ?अकेले बेटी से सृष्टि नही होगी, उसके लिए एक वर की भी जरूरत होगी, और इधर आलम यह है कि बेटा-बेटी दोनों सरकार की परिवार नियोजन योजना की बलि चढ गये। अगर बेटी बचाना है, तो परिवार नियोजन का गोरखधन्धा बन्द होना चाहिए।

अजीब बात है कि सरकार बेटी तो बचाना चाहती है लेकिन परिवार नियोजन भी बन्द नहीं कराना चाहती। यह दोहरी नीति बन्द कोना चाहिए।उधर समाज में चिल्लाहट मची है कि पुरूषों की अनुपात में महिलाएं कम हैं। क्यो ? इसलिए कि एक जमानें से हमारे यहां बेटी की आमद को बोझ समझा जाता रहा है। क्यों कि हम हजारों साल से सामंती परिवेश में जी रहे हैं। राजपूतों-क्षत्रियों सम्पन्नता के बावजूद बेटी की पैदाइस को भार स्वरूप माना जाता था,अधिकांश लोग तो बेटी की पैदाइस के बाद उसे राख और माठा पिला कर उसको मरवा देते थे, अथवा दार्इ से ही गला घोटवा कर मरवा देते थे। आज वही परिपाटी चली आ रही है, विज्ञान के अविष्कार नें अब सब कुछ सम्भव बना दिया है। सिटी स्केन से देखो कि लडका है, या लडकी ? अगर लडकी है तो गर्भपात करा दो। उस कमजोरी का लाभ शासक वर्ग नें उठाया, और परिवार नियोजन की योजना क्रियानिवत करके यह बताना चाहा कि जनसंख्या बढनें से राष्ट्र को आर्थिक बोझ उठाना पडता है, परिवार को सुखी बनानें के लिए मात्र दो ही बच्चे, हम और हमारे दो। इत्यादि का नारा देकर इन राजनीति के नटवर लालों नें जनता के समाज को कमजोर कर दिया। जब सरकार जनता का बोझ नही उठा सकती तो कौन कहता है कि शासन करो ? छोड दो कुर्सी । इधर बगैर कुर्सी के नींद भी नहीं आती उधर जनसंख्या बोझ लगता है।

शासक वर्ग की मंशा है कि जनसंख्या का बोझ नही होगा तो उनकी बदइंतजामीं छिपी रहेगी, और वह जीवन भर ऐश करेंगे।शासक वर्ग की मंशा है कि बेटियां हों तो अधिकारियों कर्मचारियों के घर में। क्योंकि राजनेताओं ,अधिकारियों कर्मचारियों का परिवार नियोजन करानें का आदेश सरकार नहीं देती। सिर्फ जनता को इस योजना में बलि का बकरा बनाया जाता है, जब शिवराज सिंह सरकार मुसलमानों को हज सब्सीडी दिये जानें पर हिन्दुओं को सरकारी खर्च से तीर्थ कराना चाहती है तो मुसलमान का परिवार नियोजन नही होता तो हिन्दुओं का परिवार नियोजन क्यों करवाते हो ? अगर उनके ग्रन्थ में नहीं लिखा है, तो हिन्दुओं के ग्रन्थ में कहां लिखा है ? ऐसी हालत में महिलाओं की कमीं तो होगी ही। और बेटी बचेगी कैसे ?? महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है,तो क्या उसमें पुरूष के बराबर अधिकार नहीं है ? अगर है,, तो जब महिला बेटी पैदा करे ,तो परिवार के लोग उसे पुरूष की मंशा समझ कर स्वीकार क्यों नहीं करते ? फिर ससुराल वाले उसे भार मान कर प्रताडना के शिकार क्यों बनाते हैं ? साथ ही उसको हेय दृषिट से देखते हैं।

जरूरत के हिसाब से देखें तो महिलाओं की हर क्षेत्र में जरूरत है। शिक्षा का क्षेत्र हो,मेडिकल में हो, दफ्तरों सेकेट्रीयेट,विधान सभा, संसद में हो, व्यापारिक काउंटर, अथवाटीवी, रेडियो, फिल्म और काल सेंटरों ,वारों और युद्ध में अथवा फैसन परेड मे और हर जगह,जब बालाओं की जरूरत है,तो परिवार नियोजन क्यों ?

क्या जमानें की इस जरूरत पर हमारी निगाह है ? अरे भार्इ ! बालाएं चलता-फिरता गुलदस्ता है, किताबें हैं बगीचा और नर्सरी हैं। इन्हें सवांरनें की जरूरत है, या इन्हे उजाडना चाहिए ? जिस प्रकार हरियाली देखकर हमें रूहानीं सुकून मिलता है, उसी प्रकार बालाओं को देख कर हमें आनंदित और रूहानीं सुकून मिलना चाहिए।

हाल यह है कि एम टी पी एक्ट बन जानें के बाद कोंखें कपडे की तरह धोये जा रहे हैं किसी भी हालत में भ्रूण हत्या की इजाजत नहीं होनीं चाहिए। लेकिन इधर सब होता है। बाकायदे सरकार को चाहिए कि हर महिला को बालाएं पैदा करनें का टारगेट दिया जाना चाहिए। यह आज की जरूरत है।बेटी तब बचानें की बात हो, तो हम मान भी लें। इतनीं सारी जो खामियां हें उन्हें बगैर ठीक-ठाक किये बेटी बचाना तो ऐसा ही नारा है जैसे इन्द्रा जी का गरीबी हआओ का नारा था, कि गरीबी हटाओ और गरीबों को फुटपाथ से खदेड कर शहर से भगाओ।

बालाएं बहुत ससुराल गर्इं, बहुत जलाइ्र गर्इ, बहुत दमन हुआ।अब समय आ गया है कि बर ससुराल जाये। बालाओं को ससुराल में संरक्षित किया जाना चाहिए।बालाओं की पैदाइस को राष्ट्रीय नीति से जोड दिया जाना चाहिए। तभी सदियों से बिगडे संतुलन को सुधारा जा सकता है।बालाओं का आयात तो किया नहीं जा सकता।आयात से हमारी नस्ल में गलत असर पड सकता है। बेहतर यही होगा कि बालाओं के उत्पादन के प्रोजेक्ट्स चलाये जांय, इस उतपादन में यधपि लागत कम आयेगी,गुणवत्ता भी बेहतर होगी।

इसके बाद म0प्र0 की सरकार कहे कि बेटी बचाओ, तो हम मान भी लें।

– जगदीश पांडे

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