शौर्य, स्वाभिमान और पराक्रम के प्रतीक: महाराणा प्रताप

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महाराणा प्रताप जयंती (29 मई) विशेष-

संदीप सृजन

महाराणा प्रताप का जीवन एक ऐसी प्रेरक गाथा है जो हर भारतीय को गर्व से भर देती है। उन्होंने अपने जीवन में कभी हार नहीं मानी और स्वतंत्रता के लिए अंतिम सांस तक संघर्ष किया। उनकी जयंती हमें न केवल उनके बलिदान को याद करने का अवसर देती है, बल्कि यह हमें अपने जीवन में साहस, स्वाभिमान और देशभक्ति के मूल्यों को अपनाने के लिए प्रेरित करती है। महाराणा प्रताप का नाम हमेशा भारतीय इतिहास के पन्नों में अमर रहेगा, और उनकी गाथा आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेगी।

महाराणा प्रताप का जन्म जेष्ठ शुक्ला तृतीया, (9 मई 1540) को राजस्थान के कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ था। उनके पिता महाराणा उदय सिंह द्वितीय मेवाड़ के शासक थे, और उनकी माता रानी जीवत कंवर थीं। प्रताप सिसोदिया राजवंश के गौरवशाली वंशज थे, जो अपनी वीरता और स्वतंत्रता की भावना के लिए प्रसिद्ध थे। बचपन से ही प्रताप में नेतृत्व, साहस और देशभक्ति के गुण दिखाई देने लगे थे। उन्हें युद्ध कला, घुड़सवारी, तलवारबाजी और धनुर्विद्या में प्रशिक्षित किया गया। उनके गुरुओं ने उन्हें न केवल शारीरिक बल, बल्कि मानसिक दृढ़ता और नैतिकता का पाठ भी पढ़ाया।

प्रताप का बचपन उस समय बीता जब मेवाड़ मुगल शासक अकबर की बढ़ती शक्ति के साये में था। उनके पिता उदय सिंह ने चित्तौड़गढ़ को मुगलों के अधीन होने से बचाने के लिए कड़ा संघर्ष किया, लेकिन 1568 में चित्तौड़गढ़ मुगलों के हाथों में चला गया। इस घटना ने युवा प्रताप के मन पर गहरा प्रभाव डाला और उन्होंने मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए जीवन समर्पित करने का संकल्प लिया।

1572 में उदय सिंह की मृत्यु के बाद प्रताप मेवाड़ के महाराणा बने। उस समय मेवाड़ की स्थिति अत्यंत नाजुक थी। मुगल सम्राट अकबर ने अधिकांश राजपूत रियासतों को अपने अधीन कर लिया था, और मेवाड़ भी उनके निशाने पर था। अकबर ने मेवाड़ को अपने साम्राज्य में मिलाने के लिए कई बार राजनयिक प्रयास किए, लेकिन प्रताप ने मुगलों की अधीनता स्वीकार करने से स्पष्ट इनकार कर दिया। उनके लिए स्वाभिमान और स्वतंत्रता सर्वोपरि थी।

प्रताप का यह निर्णय केवल एक राजनैतिक कदम नहीं था, बल्कि यह उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति और मातृभूमि के प्रति उनकी निष्ठा का प्रतीक था। उन्होंने कहा था, “मैं अपने पूर्वजों की स्वतंत्रता की विरासत को कभी नहीं छोडूंगा।” इस संकल्प ने उन्हें मुगल साम्राज्य के खिलाफ एक अडिग योद्धा के रूप में स्थापित किया।

महाराणा प्रताप की वीरता का सबसे प्रसिद्ध अध्याय है हल्दीघाटी का युद्ध, जो 18 जून 1576 को लड़ा गया। यह युद्ध मेवाड़ और मुगल सेना के बीच हुआ, जिसमें मुगल सेना का नेतृत्व मानसिंह और आसफ खान कर रहे थे। मुगल सेना की संख्या और संसाधन मेवाड़ की तुलना में कहीं अधिक थे। अनुमान के अनुसार, मुगल सेना में लगभग 80,000 सैनिक थे, जबकि प्रताप की सेना में केवल 20,000 योद्धा थे। फिर भी, प्रताप ने अपने साहस और रणनीति से इस युद्ध को इतिहास में अमर कर दिया।

हल्दीघाटी का युद्ध केवल एक सैन्य टकराव नहीं था, बल्कि यह स्वतंत्रता और स्वाभिमान की लड़ाई थी। प्रताप ने अपने प्रिय घोड़े चेतक के साथ युद्ध में अद्भुत पराक्रम दिखाया। चेतक ने अपने स्वामी को युद्ध के मैदान में सुरक्षित रखने के लिए अपनी जान तक न्यौछावर कर दी। एक प्रसिद्ध घटना में, चेतक ने घायल होने के बावजूद प्रताप को युद्धभूमि से सुरक्षित निकाला और एक नाले को पार करने के बाद दम तोड़ दिया। चेतक की यह वफादारी और बलिदान आज भी लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

हल्दीघाटी युद्ध का परिणाम विवादास्पद रहा। कुछ इतिहासकार इसे मुगलों की जीत मानते हैं, क्योंकि मेवाड़ की सेना को पीछे हटना पड़ा, लेकिन प्रताप की रणनीति और साहस ने मुगलों को मेवाड़ पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करने से रोक दिया। युद्ध के बाद भी प्रताप ने हार नहीं मानी और गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाकर मुगलों को लगातार चुनौती दी।

हल्दीघाटी युद्ध के बाद प्रताप ने मेवाड़ के जंगलों और पहाड़ों को अपना ठिकाना बनाया। उन्होंने गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई, जिसमें छोटी-छोटी टुकड़ियों के साथ मुगल सेना पर आकस्मिक हमले किए जाते थे। इस रणनीति ने मुगलों को मेवाड़ के अधिकांश हिस्सों पर कब्जा करने से रोका। प्रताप की सेना में भील और अन्य जनजातीय योद्धा भी शामिल थे, जिन्होंने अपनी स्थानीय जानकारी और युद्ध कौशल से मेवाड़ की रक्षा में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

इस दौरान प्रताप को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उनके परिवार को जंगलों में भटकना पड़ा, और कई बार भोजन की कमी के कारण उन्हें घास की रोटियां खाकर गुजारा करना पड़ा। एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, जब प्रताप की बेटी भूख से रो रही थी, तब उनकी पत्नी ने घास की रोटी बनाई, जिसे देखकर प्रताप की आंखें नम हो गईं। लेकिन इन कठिन परिस्थितियों में भी प्रताप का संकल्प कभी नहीं डगमगाया।

महाराणा प्रताप न केवल एक योद्धा थे, बल्कि एक आदर्श नेता भी थे। उन्होंने अपने सैनिकों और प्रजा के साथ हमेशा सम्मान और सहानुभूति का व्यवहार किया। उनके नेतृत्व में मेवाड़ की जनता ने मुगलों के खिलाफ एकजुट होकर संघर्ष किया। प्रताप ने कभी भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया, भले ही उन्हें कितनी भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण पहलू था उनकी धार्मिक सहिष्णुता। प्रताप ने सभी धर्मों का सम्मान किया और अपने शासनकाल में किसी भी समुदाय के साथ भेदभाव नहीं किया। उनके दरबार में हिंदू, मुस्लिम और अन्य समुदायों के लोग एक साथ काम करते थे। यह उनकी उदारता और समावेशी दृष्टिकोण को दर्शाता है।

1597 में एक शिकार के दौरान लगी चोट के कारण महाराणा प्रताप की मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु मेवाड़ के लिए एक बड़ा आघात थी, लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है। मृत्यु से पहले उन्होंने अपने पुत्र अमर सिंह को मेवाड़ की स्वतंत्रता की रक्षा करने का दायित्व सौंपा।

महाराणा प्रताप की गाथा केवल मेवाड़ तक सीमित नहीं है। वे भारतीय इतिहास में स्वतंत्रता, स्वाभिमान और साहस के प्रतीक बन गए। उनकी कहानी आज भी स्कूलों, कविताओं, गीतों और नाटकों के माध्यम से लोगों तक पहुंचती है। राजस्थान में उनकी स्मृति में कई स्मारक और प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं, जो उनकी वीरता को जीवित रखती हैं।

महाराणा प्रताप केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व ही नहीं बल्कि हमारे समाज के लिए आदर्श है, जो स्वाभिमान से जीवन जीने की  प्रेरणा देते है। आज के समय में, जब हम आधुनिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, प्रताप का जीवन हमें सिखाता है कि दृढ़ संकल्प और साहस के साथ किसी भी कठिनाई को पार किया जा सकता है।महाराणा प्रताप का नाम भारतीय इतिहास के स्वर्ण पृष्ठों पर सदैव चमकता रहेगा, और उनकी यशगाथा आने वाली पीढ़ियों को उर्जा प्रदान करती रहेगी।

संदीप सृजन

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