उप्र चुनाव : कुछ आशंकाएं, कुछ संभावनाएं

दीनानाथ मिश्र 

अर्थशास्त्रियों ने कभी उत्तर प्रदेश का नाम बीमारू प्रदेश में शरीक किया था। कई बीमारू प्रदेश थे। कई प्रगति के राह पर चल दिए। जैसे बिहार का उल्लेख किया जा सकता है। जहां तक दक्षिणी राज्यों का सवाल है, वहां कोई बीमारू प्रदेश नहीं थे। उत्तर के भी कुछ राज्य जिसमें पंजाब, हिमाचल और हरियाणा तो अलग थे लेकिन अब उत्तराखंड का भी नाम उस श्रेणी में डाला जा सकता है। गुजरात और महाराष्ट्र तो बहुत आगे निकल गए हैं। अलबत्ता पश्चिम बंगाल कुशासन के तीस-पैंसीत वर्षों में बहुत पिछड़ गया है। राम जाने वर्तमान तृणमूल कांग्रेस के शासन में उसका उद्धार हो पाएगा या नहीं। वैसे तृणमूल आशाजनक तस्वीर पेश करता है।

जहां तक उत्तर प्रदेश का सवाल है, वह आज भी बीमारू राज्यों में अव्वल है। भले ही उत्तर प्रदेश ने देश को 11 प्रधानमंत्री दिए हों। सच पूछा जाए तो उत्तर प्रदेश का यह दुर्भाग्य मुख्यतयः कांग्रेस के प्रधानमंत्रियों की विफलता का द्योतक है। बची-खुची कसर मायावती की मेहरबानी ने पूरी कर दी। जब प्रधानमंत्रियों के खानदान के राजकुमार ने फूलपुर और बाराबंकी की सभाओं में राज्य को भिखारियों का प्रदेश बता दिया। आजादी के वर्ष में उत्तर प्रदेश की यह हालत नहीं थी कि उसे उत्तम प्रदेश कहा जा सके। बीच के काल में उत्तम प्रदेश का सपना भी तैयार हुआ। मंडलोत्तर काल में स्थिति बिगड़ती गई। आज विकास की सारी संभावनाओं के बावजूद निराशाओं के बादल छाए हुए हैं।

आज जब 2012 के चुनाव मुहाने पर खड़े हैं तब आशा की कोई किरण नजर नहीं आ रही है। किसी भी दल का प्राबल्य नहीं आएगा। कैसी खिचड़ी सरकार बनेगी, कहा नहीं जा सकता। चाहे किसी भी पार्टी के आने के आसार हों, उत्तर प्रदेश में कोई भी अंकगणित बहुत आशाजनक तस्वीर पेश नहीं करता। बड़े सपने संजोए थे राहुल गांधी के नाम पर। लेकिन हम लोग समझते हैं कि मिट्टी के माधो से बड़ी उम्मीद नहीं की जा सकती। जब-जब उनके चरण उत्तर प्रदेश में पड़े, तब तब कांग्रेस ने मुंहकी खाई। और आज तो और भी बदतर हालत है। बातों के अलावा केन्द्रीय सरकार महंगाई, भ्रष्टाचार जैसी दर्जनों समस्याओं से उलझी है, निस्तार का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है। ऐसे में भला राहुल क्या बेड़ापार करेंगे? वह तो स्वयं बेचारे हैं। अखबारी सुर्खियों और दिग्विजय सिंह के विफल टोटकों से वह कोई चमत्कार पैदा नहीं कर सकते। गुब्बारा आखिर तो गुब्बारा है। राजनैतिक समझबूझ और नेतृत्व की क्षमता के आधार पर कहा जा सकता है कि वरूण गांधी राहुल के मुकाबले कहीं भारी पड़ते हैं। राजनैतिक गणित का कोई भी पंडित उत्तर प्रदेश के माहौल में कांग्रेस के लिए आंकड़ों का कोई सफल गणित नहीं बना सकता।

जहां तक बसपा का सवाल है, बसपा ने केवल दलितों का शोषण किया है और राजनीति की सत्ता का दुरुपयोग करके किया है। भ्रष्टाचार के मामले में मायावती सरकार के मंत्रियों का नया रिकॉर्ड है। आए दिन मायावती सरकार का कोई न कोई मंत्री किसी न किसी मामले में फंसता जा रहा है। गौरतलब है कि लोकायुक्त की शिकायत पर अब तक मायावती सरकार के पांच मंत्रियों की कुर्सी जा चुकी है और दो दर्जन के खिलाफ शिकायतें लम्बित हैं। मेरा अनुमान है कि बसपा फिर सत्ता में नहीं आएगी। काठ की हंडिया बार बार नहीं चढ़ती। यह सही है कि उसके पास धनबल, बाहुबल और सत्ताबल के अलावा घटता हुआ जनबल है अर्थात वोटबैंक। लेकिन अलोकप्रियता चरम सीमा पर है। ऐसे में बहुमत के आकार की कोई कल्पना नहीं की जा सकती है।

उत्तर प्रदेश के किसी भी राजनैतिक दलों के अंकगणित के आधार पर कोई भी दल सौ से सवा सौ सीटों का आंकड़ा पार करता नजर नहीं आता। यह सही है कि राज्य की बसपा सरकार ने आम जनता को घोर निराश कर दिया है। फिर भी आज मुख्यमंत्री मायावती की सरकार है लेकिन आक्रोश इतना अधिक है कि मायावती के स्वजातीय वोटबैंक में पंचर लगने के आसार हैं। निराशा के घोर क्षणों में मायावती ने फटा हुआ तुरूप का पत्ता फेंका है। कम से कम इस चुनाव में तो चार राज्यों के बंटवारे की चाल का कोई भी खरीदार नजर नहीं आता। मुझे तो लगता नहीं कि उत्तर प्रदेश के चुनाव में यह चुनावी मुद्दा भी बन पाएगा।

मैं बहुत विश्वास से कह सकता हूं कि आंकड़ों के अंकगणित में कोई भी दल सौ सवा सौ को मुश्किल से पार करेगा। बहुमत की बात तो संभव नहीं है। लेकिन चुनाव होंगे तो कोई तो जीतेगा। जहां तक राज्य के जातीय ध्रुवीकरण का सवाल है, समीकण बनते रहेंगे। बिखरते रहेंगे। अलबत्ता सपा के पास बाहुबलियों की एक ताकत है। लेकिन सत्ता के कारण बसपा टक्कर दे सकने की स्थिति में है। वैसे हर पार्टी कोई न कोई अपनी बड़ी रणनीति बनाकर चल रही है। बहुत दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि कौन सी पार्टी सौ सवा सौ का आंकड़ा पार कर सकती है। वैसे चुनाव में अभी बाकी स्थिति साफ नहीं है। अलबत्ता बसपा, कांग्रेस, लोकदल, के समीकरण के आधार पर कुछ कहा जा सकता है। मगर चुनाव बहुत करीब हैं फिर भी अभी पत्ते खुलने बाकी हैं।

वैसे कभी भाजपा के हौसले बुलंद थे। लेकिन अभी कोई बुलंदी का संकेत नहीं है। अलबत्ता आरोपों-प्रत्यारोपों की धमाचौकड़ी बची है और स्वाभाविक भी है। वैसे सपा भी ताल ठोंक कर मैदान में खड़ी है। एक बड़ी हद तक उसका मुस्लिम समर्थन घटा है। मायावती, कांग्रेस और सपा मुस्लिम वोटों पर दावेदारी ठोंक रही है। उन्हें अपनी तरफ मोड़ने के लिए प्रलुब्ध किया जा रहा है। कभी भाजपा भी सत्ता का सपना देखती रही है। लेकिन सीटों के अंकगणित में भाजपा भी सौ सवा सौ से ज्यादा की उम्मीद नहीं कर सकती। हालांकि आकांक्षी नेताओं की भीड़भाड़ में यह कहना कठिन है कि इस जोर आजमाइश का क्या नतीजा निकलेगा।

जहां तक मेरा आकलन है कि उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक संभावनाएं कलराज मिश्र की हैं। एक तो वह संगठन के चप्पे-चप्पे को जानते हैं। दूसरे धमाचौकड़ी से बचते रहे हैं। संगठन की पकड़ रही है। जातीय आधार पर वह बहुत मजबूत हैं। गुटबाजी से भी वह स्वयं बचते रहे हैं। अनुभवी हैं। जातिवादी प्रदेश में भी उनमें सब को साथ लेकर चलने की क्षमता भी है। कोई ताज्जुब नहीं हो अगर अंत में कलराज का घोड़ा आगे निकलता दिखाई दे। वैसे उत्तर प्रदेश के अनेक क्षेत्रों में अलग अलग प्रभारी गुट हैं। कहीं जाट हैं, कहीं कुर्मी हैं, कहीं राजपूत हैं। सब की अपनी अपनी खूबियां और खामियां हैं। राज्य में नज़र लगी है। कम्युनिस्ट पार्टी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, अपना दल, जैसे बहुत से समूह हैं। उनकी भी चुनावी आकांक्षाएं हैं। और सब के अपने अपने प्रभाव क्षेत्र हैं। कुछ सीटों पर उनको जीत हासिल भी हो सकती है।

ऐसे में उत्तर प्रदेश के मामले में सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि किसी भी दल का बहुमत भले ही नहीं होगा मगर आशंका यह है कि त्रिशंकु विधानसभा भी बन सके। वैसे अभी समय है, समीकरण बनने और बिगड़ने के। अभी तो त्रिशंकु विधानसभा की आशंका लगती है। आगे जोड़-तोड़ हो जाए तो बात अलग है। अभी तक तो बांझ चुनाव के आसार नज़र आ रहे हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राज्यसभा के पूर्व सदस्य हैं।)

2 COMMENTS

  1. ऐसे बीमारू शब्द बना था अंग्रेजी में उत्तर प्रदेश, ,बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश के नामों को जोड़कर,जिसमें वर्तमान उतराखंड,झारखंड और छत्तीसगढ़ भी शामिल थे..यह इतिफाक ही कहा जा सकता है की येराज्य जो हिंदी भाषी नागरिकों के मुख्य गढ़थे,,विकास के मामले में पिछड़े हुए थे अतः यह इतिफाक इन पर सटीक बैठा.ऐसे अब इनमें से तीन अन्य राज्य निकल चुके हैअतः यह संक्षिप्तिकरण उतना सटीक नहीं रह गया है

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