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क्या यही हकीकत है ‘सच्चे मुसलमानों’ की? / तनवीर जाफ़री


-तनवीर जाफरी

समानता, सहयोग, भाईचारा, समर्पण, त्याग, संतोष तथा क्षमा और बलिदान जैसी विशेषताओं का पाठ पढाने वाले इस्लाम धर्म का लगता है कुछ धुर इस्लाम विरोधी विचारधारा रखने वालों ने संभवत: किसी बड़ी इस्लाम विरोधी साजिश के तहत अपहरण कर लिया है। अन्यथा गत् तीन दशकों में इस्लाम के नाम पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किए जाने वाले कत्लो ग़ारत तथा इसी के नाम पर फैलाई जाने वाली नफरत व विद्वेष की ऐसी आंधी चलते पहले कभी नहीं देखी गई। जेहाद के नाम पर आत्मघाती हमलावरों में लगातार होता आ रहा इजाफा पहले ऐसा कभी नहीं देखा गया। मरो और मारो जैसा रक्तरंजित मिशन कई मुस्लिम या मुंगल शासकों द्वारा तो भले ही सत्ता को छीनने, कब्‍जा जमाने या उसे सुरक्षित रखने के नाम पर तो भले ही मध्ययुगीन काल में क्यों न चलाया गया हो। परंतु वर्तमान दौर में इस्लाम के नाम पर इस्लाम को बदनाम व शर्मिंदा करने वाले घृणित अपराध तो उन लोगों द्वारा अंजाम दिए जा रहे हैं जो दुर्भाग्यवश स्वयं को ही सच्चा व वास्तविक मुसलमान बता रहे हैं, ऐसा अंधेर कम से कम इस्लाम के इतिहास में तो कभी देखने को नहीं मिला।

इन तथाकथित स्वयंभू इस्लामी ठेकेदारों की नारों में ईसाई, हिंदू, बौद्ध,सिख तथा यहूदी व पारसी आदि धर्मों के अनुयायी तो अविवादित रूप से कांफिर की हैसियत रखते ही हैं। लिहाजा इन सिरफिरों का इस्लाम इन समुदायों के लोगों को इन्हें गोया हर वक्त ज़हां भी चाहे मौत के घाट उतार देने का ‘अधिकार पत्र’ प्रदान करता है। इन ‘सच्चे मुसलमानों’ की सीख व शिक्षा इन्हें यह बताती है कि तुम इन्हें मार कर भी विजेता कहलाओगे और तुम्हारी जन्नत पक्की होगी और यदि इन्हें मारने के दौरान तुम खुद मारे गए तो भी तुम शहीद समझे जाओगे। और ऐसे में भी जन्नत तुम्हारी ही है। इनके जुल्‍मो-सितम की सूची में केवल उपरोक्त समुदायों के लोग ही शामिल नहीं हैं। दुनिया में मुसलमानों का एक कांफी बड़ा वर्ग जिन्हें हम सूफीवादी मुसलमानों के नाम से जानते हैं वे भी इनके निशाने पर हैं। इनको भी मारना या इनको मारते समय ख़ुद मर जाना भी इन ‘सच्चे मुसलमानों के लिए जन्नत का सबब बनता है। बरेलवी मुसलमान, शिया मुसलमान, कादियानी(अहमदिया) इन सभी इस्लामी वर्ग से जुड़े लोगों के यह ‘सच्चे व वास्तविक मुसलमानों’ के स्वयंभू ठेकेदार वैसे ही दुश्मन हैं जैसे कि गैर मुस्लिमों के।

सवाल यह है कि इन मौत के सौदागरों को इस बात का अधिकार किसने दिया कि वे यह प्रमाणित करते फिरें कि सच्चा मुसलमान कौन है, जन्नत में कौन और कैसे जाएगा तथा किस व्यक्ति को कौन सी पूजा पद्धति अथवा विश्वास पर अमल करना चाहिए। जिन बरेलवी व सूंफी इस्लामपरस्तों को यह ‘सच्चे मुसलमान’ अपना दुश्मन तथा गैर मुस्लिम मानते हैं, यह वर्ग इस्लाम के सूफीवाद के पहलू की पैरवी करता है। पीरी-फकीरी तथा सूंफीवाद इस्लाम के उस पक्ष की रहनुमाई करते हैं जिसमें कि सभी को समान समझना, सभी के प्रति सहिष्णुता से पेश आना तथा अल्लाह के प्रति अपनी सच्ची आस्था रखते हुए किसी दूसरे धर्म व विश्वास के अनुयाईयों का दिल न दुखाना भी शामिल है। एक ओर जहां यह समुदाय अपनी इसी फकीरी व सूंफीवाद की राह पर चलते हुए अपने पीरो मुर्शिद के माध्यम से स्वयं को अल्लाह तक पहुंचता हुआ देखता है वहीं मौत के सौदागर बने बैठे यह ‘वास्तविक मुसलमान’ उन्हें इस्लाम का दुश्मन होने का प्रमाण पत्र जारी कर देते हैं। इसी प्रकार शिया समुदाय के भी यह ‘वास्तविक मुसलमान’ वैसे ही दुश्मन हैं। पाकिस्तान में शिया समुदाय की दर्जनों मस्जिदों पर इसी इस्लाम विरोधी विचारधारा रखने वाले तथाकथित ‘सच्चे मुसलमानों’ ने कई बार कभी आत्मघाती हमला किया तो कभी उनपर गोलियां बरसा कर हमले किए। केवल पाकिस्तान में शिया समुदाय के सैकड़ों लोग इनके हाथों मारे जा चुके हैं।

अब जरा उस शिया समुदाय का संक्षिप्त परिचय भी सुन लीजिए जिन्हें यह ‘सच्चे मुसलमान’कभी इस्लाम विरोधी, तो कभी गैर मुस्लिम या प्राय: कांफिर तक बता देते हैं। शिया समुदाय, हजरत मोहम्मद को इन्हीं ‘सच्चे मुसलमानों’ की ही तरह आंखिरी नबी तो अवश्य मानता है। परंतु उनके बाद यह समुदाय इमामत की उस परंपरा को स्वीकार करता है जिसके पहले इमाम हजरत अली थे। उनके पश्चात उनके बेटे हसन और हुसैन से होता हुआ यह सिलसिला 12 इमामों तक पहुंच कर समाप्त हुआ। और बारहवें इमाम हजरत इमाम मेंहदी पर जाकर ख़त्म हुआ। इस्लामी तारींख में हजरत मोहम्मद की एकमात्र बेटी हजरत फातिमा के विषय में तमाम ऐसी अविवादित बातों का उल्लेख है जिन्हें सभी मुस्लिम वर्गों के लोग निर्विवादित रूप से मानते हैं। गोया हजरत फातिमा के रुतबे से कोई भी मुस्लिम वर्ग इंकार नहीं कर सकता। उस हजरत फातिमा तथा उनके पति हजरत अली जोकि मोहम्मद साहब के भतीजे भी थे,का गुणगान करने वालों तथा उनके प्रति अपनी अटूट आस्था व विश्वास रखने वाले शिया समुदाय को इन मौत के सौदागरों द्वारा कांफिर या गैर मुस्लिम होने का प्रमाण पत्र जारी कर दिया गया है। यानि इन्हें भी चाहे मस्जिद में मारो या इमामबाड़ों में, या फिर इनके द्वारा करबला के शहीदों की याद में निकाले जाने वाले जुलूसों के दौरान। गत् वर्ष पाकिस्तान में मोहर्रम के जुलूस में आत्मघाती हमलावरों द्वारा शिया समुदाय के सैकड़ों लोगों का मारा भी गया। इन ‘सच्चे मुसलमानों’ की ऐसी कारगाुारियों से भी इनकी जन्नत पक्की हो जाती है।

जाहिर है जब यह शिया व बरेलवी मुसलमानों को मुसलमान नहीं मानते तो उन कादियानी अथवा अहमदियों को यह मुसलमान कैसे मानेंगे जिनका वजूद ही भारत के पंजाब स्थित कादियान कस्बे में हुआ। अहमदी समुदाय के संस्थापक गुलाम अहमद कादियानी ने 1889 में इस पंथ की बुनियाद डाली। वैसे तो निश्चित रूप से अहमदिया पंथ, शांति, प्रेम, सद्भाव व भाईचारा जैसी उन सभी शिक्षाओं को प्रचारित व प्रसारित करता है जोकि इस्लाम धर्म की बुनियादी शिक्षाएं हैं। परंतु उनके प्रमुख द्वारा स्वयं को हजरत ईसा अथवा हजरत इमाम मेंहदी का रूप घोषित करना ‘सच्चे मुसलमानों’ को रास नहीं आता। और इसी की साा इस समुदाय को समय-समय पर भुगतनी पड़ती है।

अहमदिया समुदाय के प्रति इनकी नंफरत कोई पाकिस्तान तक ही सीमित नहीं है। बल्कि यह विश्वव्यापी है। इंडोनेशिया में इन्हीं ‘सच्चे इस्लाम’ समर्थकों के कठमुल्लाओं की भीड़ ने अहमदिया समुदाय की एक मस्जिद को तोड़कर खंडहर बना दिया था। बंगलादेश में भी इनके विरुद्ध यही ताकतें प्राय:अपने विरोध स्वर बुलंद करती रहती हैं। इसी नफरत ने 1974 में पाकिस्तान में संसद द्वारा इन्हे ग़ैर मुस्लिम घोषित किए जाने की नौबत तक पहुंचा दिया था। उसके पश्चात जिया-उल- हंक के शासन में तो गोया अहमदिया समेत सभी मुस्लिम वर्गों के विरुद्ध ‘सच्चे मुसलमानों’ ने स्वयं को कांफी माबूत व संगठित कर लिया। और नंफरत की यही आग फैलते-फैलते पिछले दिनों अर्थात् 28मई 2010 शुक्रवार को यहां तक पहुंची कि उस दिन पाकिस्तान के लाहौर शहर में अहमदी समुदाय की दो मस्जिदों पर जुम्मे की नमाज के दौरान ‘सच्चे मुसलमानों’ के आतंकी तथा आत्मघाती दस्तों ने धावा बोल दिया। मौत और जन्नत के इस ख़ूनी खेल में आत्मघाती हमलावर तो ‘जन्नत की राह’ सिधारे ही साथ-साथ लगभग 80 अहमदी समुदाय के नमााियों को भी न चाहते हुए भी अपने साथ ही समय से पूर्व जन्नत में ले गए।

असहिष्णुता तथा कट्टरवादी इस्लाम के प्रदर्शन की ऐसी पराकाष्ठा क्या इस्लाम धर्म को मान-सम्मान और इात बख्श रही है? जो ताकतें आज स्वयं को सच्चा मुसलमान अथवा इस्लाम का सच्चा रहबर अथवा अनुयायी बता रही हैं उन्हें इतिहास के उन पन्नों को भी पलटकर सबक लेना चाहिए जो हमें यह बताते हैं कि चंद मुंगल व मुसलमान शासकों के बलपूर्वक सत्ता संघर्ष के परिणामस्वरूप इस्लाम धर्म को अब तक कितनी शर्मिंदगी उठानी पड़ रही है। पेशेवर इस्लाम विरोधियों को जहां इतिहास की वह घटनाएं उर्जा प्रदान करती हैं वहीं इन स्वयंभू सच्चे मुसलमानों के काले कारनामे भी उसी इस्लाम को बदनाम करने में अपना कम किरदार अदा नहीं करते। लिहाजा इन तथाकथित वास्तविक मुसलमानों द्वारा हर जगह मौत बांटे जाने तथा ख़ून की होलियां खेले जाने के सिलसिले से तो अब इनकी हकीकत कुछ ऐसी ही प्रतीत हो रही है गोया यह शक्तियां स्वयं इस्लाम कीसबसे बड़ी दुश्मन हैं तथा यह किसी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चलने वाली इस्लाम विरोधी साजिश का एक बहुत बड़ा हिस्सा हैं और यही इन सच्चे मुसलमानों की हकीकत है।

June 6th, 2010 | 4,530 views | Print This Post Print This Post | Email This Post Email This Post
Category: जरूर पढ़ें, धर्म-अध्यात्म | Tags: Muslim, इस्‍लाम, मुसलमान
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  • ranbeer

    मुसलमानों को दूसरी कोमो को तबाह करना और उनसे नफरत करना ख़तम करना होगे. उन्हें अपने बर्बर मानसकिता को ख़तम करना होगा. kyonki जभी ये लोग santi से जी पायगे . औरो को भी जीने देगे . जय हिंद जय भारत.

    May 06 2012
    CommentsLikeUnlike
    • Akhil Pandey

      मुसलमान कितना सान्ती पसंद है ! इसका पता सारी दुनिया को है , आतंकवाद क्यों करता है हिन्दू क्या जाफरी साहब ! कश्मीर मे १५०००० हिन्दू का कतल किया गया , उनकी औरतो का बलात्कार कर उनकी छतिया काट कर फैक दी गयी , उनके बच्चो का स्टील से गला काट दिया गया , २४ hrs का बच्चा तक मार दिया गया ! ३५०००० हिन्दू को अपना ही घर छोड़ कर भागना पड़ा यह सुब मुसलमानों की करामत नही है तो क्या है ? और आप कहते है की इस्लाम अमन पसंद है :) ? www .hindurashtra .wordpress .com. पर जरा जाकर देखेये की इस्लाम कितना अमन पसंद है

      April 24 2012
      CommentsLikeUnlike
      • Gyan

        मुसलमानों को ही मुसलमानों को रास्ते पर लाने की पहल करनी होगी.और कट्टरपंथियों व फतवा से डर निकालना होगा. तभी ये अपने समाज को कोई रास्ता दे पायंगे. और गैरमुस्लिमों से अच्छे रिश्ते भी बना पाएंगे.

        April 23 2012
        CommentsLikeUnlike
        • yamuna shankar panday

          ukt lekhon ke pratiuttar me islam ke lie bas itana kahugan ki , islam shanti kapaigam bhaichare ka sandesh deta hai,, mujhe mere agraj bandhu bataen ki vah desh kaun hai jahan islam ne shanti, bhaichara sthapit kiya hai, vah sansaar me kaun saa mulk hai,! jo aaj islam ke karan aur musalmano ke karan shant hai???

          April 09 2012
          CommentsLikeUnlike
          • s.m.farid bharti

            सवाल एक पैदा होता है क्या हम लोगों को यह पहचान है के यह हकीक़त मैं मुस्लिम है या कोए और आज सिर्फ धरी और नाम को सुनकर मुसलमान कहा जाता है ? मेरा यह एक सवाल के सवालों को जनम देगा और हकीकत बहुत ही कर्वी होती है मैं आपको बता दूं के जब कश्मीर के लिए हिन्दुस्तानी आर्मी रवाना हुए थी तब सरकारी आक्रों के हिसाब से वहां आतंक वादियों की तादाद १०००० के आस पास थी और उसके एक साल के बाद ही वहां यह तादाद १२००० हो गए और आज कश्मीर मैं जहाँ ८ लाख ५०,००० आर्मी है तब वहां आतंवादियों की तादाद करीब ६५,००० है क्यूँ ? किस मकसद से आर्मी वहां गयी थी मेरी समझ मैं यह आज तक नहीं आया है क्या कोए है जो मेरे सवाल का सही जवाब दे सके ? मुझको आपके जवाब का इंतज़ार रहेगा … आपका नाचीज़ दोस्त एस.एम फरीद भारती एडिटर / मानवाधिकार कर्येकर्ता ०९८०८१२३४३६

            January 10 2012
            CommentsLikeUnlike
            • Jeet Bhargava

              सारी आफत की जड़ ‘वहाबी’ हैं. और दुःख की बात है की दुनियाभर में वहाबी जहालियत अपने पैर पसार रही है. हाल ही के इंडिया टूडे में कश्मीर में में बढ़ाते वहाबी प्रभाव और सूफी /उदार इस्लाम के घटते प्रभाव के बारे में विस्तृत लेख छापा है. जिसे मेरे ब्लॉग पे भी मैंने डाला है.
              किसी वहाबी और देवबंदियों से मिलने पर आपको अंदाजा लग जाएगा कि अहमदिया, शिया, कादियानी, बोहरा, इस्माइली जैसे उदार मुस्लिमो के प्रति उनमे कितना जहर भरा हुआ है. कई बार तो वह ख्वाजा गरीब नवाज (अजमेर) और एनी महान सूफियो के खिलाफ अनर्गल बकवास करने से भी नहीं चूकते हैं.
              दुःख इस बात का है कि ना तो भारत की राजनीति ने , ना ही मीडिया ने और ना ही सेकुलर हिन्दुओं ने उदार मुस्लिम नेतृत्व को उनका हक़ दिया है ना ही सम्मान.
              पहले मुहर्रम पर शहर के ताजिये में हिन्दू लोग भी पवित्र भाव से जाते थे. लेकिन अब वहाबी लोगो के लगातार बढ़ते हमलो और फसादों के कारण ताजिये में जाने से खुद शिया लोग भी आशंकित रहते हैं.

              January 06 2012
              CommentsLikeUnlike
              • KAPIL DEV SHARMA

                खुदा.. NE AAJTALAK US KOUM KI HAALAT नही बदली..NA JISKO KHUD KHYAAL HO APNI HAALAT KE BADLNE का!

                January 05 2012
                CommentsLikeUnlike
                • ramprakash agrawal

                  जाफरी साहेब आपके लेख में सचाई है ज्यादा लिखोगे तो आपके खिलाफ मौत का फतवा जरी न होजये ., दूसरी बात देश भक्त सचे मुस्लमान की देश में कोई वोइस नहीं है , सचे मुस्लिम की हिम्मत ही नहीं की दुर्जन मुस्लमान का विरोध करे बल्कि उनका समर्थन करते हुए भी देखे जाते है ,कही न कही इस्लामवाद आड़े आजाता होगा

                  November 18 2011
                  CommentsLikeUnlike
                  • vimlesh

                    इक़बाल जी आपसे मै सहमत हू .

                    इस्लाम के नाम पर लोगो को गुमराह करनेवालों पर यदि मुस्लमान ही प्रतिबन्ध लगाये तो ज्यादा उचित है .

                    हिन्दू धर्म में एक ज़माने में पोंगा पंडितो का एकक्षत्र एकाधिकार था किन्तु हिन्दू जनमानस धीरे धीरे ही सही अन्धविश्वासो सेदूरी बना रहा है

                    इस्लाम में बहुत कम लोग है जो आपने लोगो को अच्छाई सच्चाई की राह दिखा रहे है

                    आपकी साहसिक टिप्पणी के लिए हार्दिक बधाई .

                    November 14 2011
                    CommentsLikeUnlike
                    • इक़बाल हिंदुस्तानी
                      iqbal hindustani

                      जाफरी साहब बेशक वरिष्ठ लेखक हैं। उनकी क़लम को हम सलाम करते हैं। सच्चे मुसलमानों की हकीकत का जो सवाल उन्होंने उठाया है वह बहुत गंभीर और सामयिक है। उन्होंने समस्या को तो विस्तार से बयान किया लेकिन उसकी जड़ और हल पर प्रकाश नहीं डाला। क्या यह नहीं सोचा जाना चाहिये कि भले ही इस्लाम इस खून ख़राबे के लिये ज़िम्मेदार न ठहराया जाये लेकिन यह आतंकवाद, आत्मघाती विस्फोट और जेहाद के नाम पर मस्जिदों में नमाज़ पढ़ते लोगों पर बम फैंकना, स्कूल जाते बच्चो का दुनियावी तालीम लेने पर अपहरण, पर्दा न करने पर औरतों को कोड़े मारना और तस्वीर, फिल्म व टीवी का इस्तेमाल करने वालों पर तेज़ाब फैंकना कहां से आया? गैर मुस्लिम तो आमतौर पर ऐसा नहीं करते और कहीं इक्का दुक्का घटनायें होती भी हैं तो कानून अपना काम करता है। बाकी समाज भी उन कट्टरपंथियों को सपोर्ट नहीं करता लेकिन मुसलमानों में अकसर बुध्दिजीवी भी डरकर चुप्पी साधे रहते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं मज़हब में एक से अधिक विवाह, जिन्न भूत, जादू , महिला का अधिकार कम होना और ब्याज, निकाह, तलाक़ और कड़े नियमों में परिवर्तन की इजाज़त नहीं होने से मुसलमानों की यह हालत हो गयी हो ? किसी भी रोग के इलाज के लिये सबसे पहले यह मानना पड़ता है कि आप बीमार हैं। अगर आप अपनी अयोग्यता, कमियों और बुराइयों के लिये किसी दूसरे की साज़िश को खासतौर पर अमेरिका, ईसाइयांे, हिन्दुओं व यहूदियों को ज़िम्मेदार ठहराकर केवल कोसते रहेंगे तो कभी समस्या का हल नहीं हो पायेगा। यह तो मानना ही पड़ेगा कि अगर मुसलमानों का एक हिस्सा आज पूरी दुनिया मंे आतंकवाद और जेहाद के लिये कसूरवार ठहराया जा रहा है तो उसमें कुछ सच्चाई तो होगी ही। तिल का ही ताड़ बनता है। बिना सुई के फावड़ा कहां बनता है? यह आरोप लगाना बहुत आसान है कि हमारे साथ पक्षपात होता है। अगर आज मुसलमान शिक्षा, व्यापार, राजनीति, अर्थजगत, विज्ञान, तकनीक, शोध कार्यों, सरकारी सेवाओं और उद्योग आदि क्षेत्रों में पीछे है तो इसके लिये उनको अपने गिरेबान मंे झांककर देखना होगा न कि दूसरे लोगों को दोष देकर इसमें कोई सुधार होगा। समय के साथ बदलाव जो लोग स्वीकार नहीं करते उनको तरक्की की दौड़ में पीछे रहने से कोई बचा नहीं सकता। अंधविश्वास, स्वर्ग और भाग्य के भरोसे ही पड़े रहने से जो कुछ आपके पास है उसके भी खो जाने की आशंका अधिक हैं। हम यह नहीं कहते कि प्रगति और उन्नति के लिये हम अपने मज़हब को छोड़कर आधुनिकता और भौतिकता के नंगे और स्वार्थी रास्ते पर आंखे बंद करके चल पड़ें लेकिन यह तो मानना ही पड़ेगा कि आज के दौर में जो लोग आगे बढ़कर अपना हक़ खुद हासिल करने को संगठित और परस्पर सहयोग और तालमेल का रास्ता दूसरे लोगों के साथ नहीं अपनायेंगे उनको पिछड़ने से कोई बचा नहीं सकता। मुसलमानों को यह सोचना होगा कि समाज के दूसरे वर्गों के साथ कैसे मिलजुलकर कट्टरपंथ को छोड़कर आगे बढ़ना है।
                      0 दूसरों पर जब तब्सरा किया कीजिये,
                      आईना सामने रख लिया कीजिये ।।
                      इक़बाल हिंदुस्तानी,संपादक, पब्लिक ऑब्ज़र्वर, नजीबाबाद।

                      November 13 2011
                      CommentsLikeUnlike

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                      • लेखक परिचय

                        तनवीर जाफरी
                        तनवीर जाफरी

                        पत्र-पत्रिकाओं व वेब पत्रिकाओं में बहुत ही सक्रिय लेखन,
                      • ‘प्रवक्‍ता’ एक नजर में

                        6,000 से अधिक लेख / 500 से अधिक लेखक / 68,534 एलेक्‍सा रैंकिंग / 51,281 पेजव्‍यू प्रतिदिन (जनवरी 2012)
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