सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राज्यपाल विधेयकों को नहीं रोकेगें?

                          रामस्वरूप रावतसरे

   सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और आर. महादेवन की बेंच ने तमिलनाडु सरकार बनाम तमिलनाडु के राज्यपाल (आर एन रवि) मामले में यह फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल के पास राज्य विधानसभा की तरफ से भेजे गए विधेयकों पर वीटो का अधिकार नहीं है। वे किसी बिल को अनिश्चितकाल के लिए रोक नहीं सकते। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के पास कोई विवेकाधिकार नहीं है और उन्हें मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर अनिवार्य रूप से कार्य करना होता है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा था कि राज्यपाल सहमति को रोककर ‘पूर्ण वीटो’ या ‘आंशिक वीटो’ (पॉकेट वीटो) की अवधारणा को नहीं अपना सकते।

    शीर्ष अदालत के अनुसार राज्य विधानसभा द्वारा विधेयक को पुनः पारित किए जाने के बाद उसे पेश किए जाने पर राज्यपाल को एक महीने की अवधि में विधेयकों को मंजूरी देनी होगी। राज्यपाल के पास कोई विवेकाधिकार नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल द्वारा अपने कार्य निर्वहन के लिए कोई स्पष्ट समय सीमा निर्धारित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु विधानसभा द्वारा पास किए गए 10 लंबित विधेयकों को राज्यपाल द्वारा मंजूर मान लिया है। कोर्ट ने भविष्य के सभी विधेयकों पर कार्रवाई के लिए समय सीमा भी तय कर दी है। संविधान के अनुच्छेद 200 में यह प्रावधान नहीं था।

जानकारी के अनुसार तमिलनाडु सरकार और राज्यपाल के बीच काफी समय से विवाद चल रहा था। राज्यपाल विधानसभा द्वारा पास किए गए विधेयकों को मंजूरी देने में देरी कर रहे थे। कुछ बिल तो 2020 से ही लंबित थे। ज़्यादातर बिलों में राज्यपाल को विश्वविद्यालयों के चांसलर के तौर पर मिलने वाले अधिकारों को कम करने की बात थी। इससे राज्यपाल और सरकार के बीच टकराव बढ़ गया था। आरोप लगाया जाता है कि राज्यपाल जानबूझकर विधायी प्रक्रिया को रोकने की कोशिश करते हैं। तमिलनाडु ही नहीं, छत्तीसगढ़, हरियाणा, बंगाल और केरल जैसे राज्यों में भी राज्यपालों के साथ ऐसे ही विवाद हुए। पुडुचेरी में भी एलजी (लेफ्टिनेंट गवर्नर) और सरकार के बीच मतभेद थे। तेलंगाना, पंजाब और केरल के राज्यपाल भी लंबित विधेयकों को पास नहीं करने के कारण कोर्ट में गए।

     संविधान के अनुच्छेद 153 में हर राज्य के लिए एक राज्यपाल का प्रावधान है। अनुच्छेद 154 के तहत कार्यकारी शक्तियां राज्यपाल के पास होती हैं लेकिन संविधान में उनकी भूमिका और शक्ति सीमित है। अनुच्छेद 163(1) के अनुसार, राज्यपाल को अपने मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करना होता है। संविधान में राज्यपाल को कुछ मामलों में अपने विवेक से काम करने की शक्ति दी गई है लेकिन, यह शक्ति भी सीमित है। सुप्रीम कोर्ट ने 1974 में शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य मामले में फैसला दिया था कि राज्यपाल सिर्फ एक संवैधानिक प्रमुख हैं। राज्य की कार्यकारी शक्तियां वास्तव में मंत्रिपरिषद द्वारा इस्तेमाल की जाती हैं।

अनुच्छेद 200 के मुताबिक विधानसभा द्वारा पास किए गए सभी विधेयकों को राज्यपाल की मंजूरी चाहिए होती है। राज्यपाल के पास चार विकल्प होते हैं- विधेयक को मंजूरी देना, मंजूरी रोकना, विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखना या विधेयक को पुनर्विचार के लिए विधानसभा को वापस भेजना। यह अनुच्छेद भारत सरकार अधिनियम, 1935 की धारा 75 पर आधारित है। इसमें इन विकल्पों का इस्तेमाल करने के लिए कोई समय सीमा नहीं दी गई है।

    सरकारिया आयोग (1987), राष्ट्रीय संविधान समीक्षा आयोग (2002) जिसके अध्यक्ष जस्टिस वेंकटचलैया थे, और जस्टिस एम.एम. पुंछी आयोग (2010) ने सिफारिश की थी कि राज्यपालों को विधेयकों पर फैसला लेने के लिए एक समय सीमा तय की जानी चाहिए। कर्नाटक विधि आयोग की 22वीं रिपोर्ट ’’विधेयकों पर सहमति-देरी की समस्याएं (भारत के संविधान के अनुच्छेद 200 और 201)’’ में जस्टिस वी.एस. मलीमठ ने कहा था कि यह अजीब होगा कि राज्य के प्रमुख को एक विधेयक पर सहमति देने में उतना ही समय लगे जितना कि विधानसभा को उसे पास करने में लगता है। यह अच्छी तरह से स्थापित है कि हर राज्य कार्रवाई उचित होनी चाहिए। शक्ति का उचित प्रयोग एक उचित समय के भीतर किया जाना चाहिए। ऐसा न करना अनुचित होगा।

     सुप्रीम कोर्ट के अनुसार राज्यपाल किसी भी बिल को हमेशा के लिए नहीं रोक सकते। उन्हें बिल पर फैसला लेना ही होगा। कोर्ट ने तमिलनाडु को कहा कि उन्हें बिलों को जल्दी पास करना चाहिए। कई राज्यों में राज्यपाल और सरकार के बीच झगड़ा चल रहा है। राज्यपाल बिलों को पास करने में देरी करते हैं जिससे सरकार का काम रुक जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने अब इस पर लगाम लगा दी है। संविधान में लिखा है कि राज्यपाल को सरकार की सलाह पर काम करना चाहिए लेकिन, कई बार राज्यपाल अपनी मनमानी करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यह गलत है। राज्यपाल को संविधान के हिसाब से चलना चाहिए। आयोगों ने भी कहा है कि राज्यपाल को बिलों पर फैसला लेने के लिए एक समय सीमा होनी चाहिए। इससे सरकार का काम आसानी से चलेगा।

  पिछले 40 वर्षों (1985 से 2025 तक) में भारत में कई राज्यपाल ऐसे रहे हैं जिनके कार्यों ने राज्यों के साथ विवादों को जन्म दिया। ये विवाद अक्सर विधायी देरी, राज्य सरकारों के साथ टकराव, या संवैधानिक सीमाओं के कथित उल्लंघन से जुड़े रहे। नीचे कुछ प्रमुख राज्यपालों की सूची दी गई है जिन्हें उनके कार्यकाल के दौरान विवादों के लिए जाना गया।

केरल के राज्यपाल और सरकार के बीच मनमुटाव का मामला काफी विवादों में रहा था। केरल के तत्कालीन राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने कहा था कि केरल सरकार कई ऐसे काम करती है जो कानून के मुताबिक नहीं होते। दरअसल एपीजे अब्दुल कलाम प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (केटीयू) के कुलपति का चयन करने के लिए कुलाधिपति के नामित व्यक्ति के बिना चयन समिति बनाने को लेकर आरिफ मोहम्मद नाराज थे। उन्होंने कहा था कि सरकार पर निर्भर करता है कि वे क्या करना चाहते हैं। वे कई ऐसे काम कर रहे हैं जो कि कानून के मुताबिक नहीं हैं। राज्य के विश्वविद्यालयों में कुलपतियों सहित नियुक्तियों के मुद्दे पर आरिफ मोहम्मद खान और केरल सरकार लंबे अरसे तक आमने-सामने थे।

इसी प्रकार उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रोमेश भंडारी के एक विवादित निर्णय से जुड़ा है, जो 1998 में हुआ था। राज्यपाल रोमेश भंडारी ने मध्यरात्रि में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को पद से हटा दिया और जगदंबिका पाल को नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिला दी। सुप्रीम कोर्ट ने बाद में राज्यपाल के निर्णय को अवैध घोषित किया और कल्याण सिंह को बहाल कर दिया। इस घटना ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा विवाद पैदा कर दिया और राज्यपाल की शक्तियों पर प्रश्नचिन्ह उठाया।

ऐसा ही मामला बिहार के राज्यपाल बूटा सिंह के इस्तीफे से जुड़ा है, जो 2005 में बिहार विधानसभा के विघटन से संबंधित एक मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा फटकार लगाए जाने के बाद हुआ था। 2005 में बिहार विधानसभा को भंग कर दिया गया था, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया। राज्यपाल बूटा सिंह पर आरोप लगा कि उन्होंने केंद्र सरकार को गलत जानकारी दी, जिसके आधार पर विधानसभा को भंग किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने बूटा सिंह की भूमिका की आलोचना की और कहा कि उन्होंने केंद्र सरकार को गलत जानकारी दी।

हंसराज भारद्वाज के राज्यपाल कार्यकाल के दौरान कई विवाद हुए जिनमें से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं। केंद्रीय कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने कर्नाटक के राज्यपाल हंसराज भारद्वाज के एक निर्देश को सही ठहराया जिसमें राज्यपाल ने विधानसभा अध्यक्ष केजी बोपय्या को निर्देश दिए थे। इस निर्देश के बारे में कुछ लोगों ने सवाल उठाए थे।

कमला बेनीवाल राज्यपाल विवाद 2009-2014 के बीच हुआ, जब उन्होंने गुजरात, त्रिपुरा और मिजोरम के राज्यपाल के रूप में कार्य किया। इस दौरान, उनका तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ कई मुद्दों पर टकराव हुआ। कमला बेनीवाल ने राज्यपाल रहते हुए आरए मेहता को लोकायुक्त नियुक्त किया जिसे गुजरात सरकार ने विवादित माना। उनका नरेंद्र मोदी के साथ कई मुद्दों पर टकराव हुआ जो राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहा।

बंगाल में सीएम ममता और राज्यपाल जगदीप धनखड़ के बीच विवाद काफी चर्चा में रहा है। दोनों कई मुद्दों पर टकराते रहे हैं। जगदीप धनखड़ जब बंगाल के राज्यपाल थे तब बंगाल की सीएम ममता बनर्जी धनखड़ पर केंद्र के आदेश थोपने का आरोप लगाती रही हैं तो वहीं, राज्यपाल कहते रहे हैं कि वह जो भी कार्य करते हैं वह संविधान के मुताबिक होता है। चाहे बात विधानसभा का सत्र बुलाने की हो या किसी नए विधायक को शपथ दिलाने की, बंगाल में तकरीबन हर मामले पर सीएम गवर्नर के बीच सियासी विवाद पैदा हो जाता था। चुनाव के बाद राज्य में हुई हिंसा को लेकर भी सीएम और राज्यपाल में टकराव हुआ था। हालांकि, सीवी आनंद बोस का पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनकर आना भी सीएम ममता बनर्जी  को रास नहीं आ रहा है। राज्यपाल सीवी आनंद बोस और ममता सरकार में शुरू से जंग लगातार जारी है।

2021 में पंजाब के राज्यपाल बने बनवारी लाल पुरोहित का कार्यकाल काफी विवादित था। पंजाब में उनका कार्यकाल आम आदमी पार्टी सरकार के साथ लगातार टकराव भरा रहा। खासकर पंजाब राजभवन द्वारा विभिन्न विधेयकों को मंजूरी नहीं मिलने के मुद्दे पर। हर बार जब भी राज्यपाल पुरोहित ने चिंता जताई या स्पष्टीकरण मांगा, तो मुख्यमंत्री, कैबिनेट मंत्री और आधिकारिक प्रवक्ता सहित आम आदमी पार्टी ने कड़ा जवाब दिया। उन्होंने अक्सर पुरोहित पर भाजपा से प्रभावित होने और उनकी सरकार के खिलाफ साजिश रचने का आरोप लगाया।

 प्रायः यह देखा गया है कि राज्यपाल की नियुक्ति केन्द्र सरकार करती है। केन्द्र चाहता है कि राज्य का शासन उसकी रीतिनीति के अनुसार चले। ऐसे में राज्य में विपक्ष की सरकार होने के कारण अक्सर टकराव रहता ही है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद संभव है इसमें कमी आयेगी और आपसी सकारात्मकता की भावना से जनहित के मामले जल्दी निस्तारित होगें।

रामस्वरूप रावतसरे

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