क़िस्सा-ए-अरविन्द केजरीवाल और उनकी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का

डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

download (2)अरविन्द केजरीवाल का किस्सा अब धीरे धीरे खुलता जा रहा है । वे पिछले कुछ अरसे से दिल्ली में भ्रष्टाचार से लड़ने की अपनी इच्छा ज़ाहिर करते रहे । यह इच्छा और इसका प्रदर्शन उन्होंने अन्ना हज़ारे के कुनबा में रह कर ज़ाहिर किया था । अन्ना के कारण कुनबे की इज़्ज़त भी थी और लोगों को उन पर विश्वास भी था । इसलिये आम लोगों ने और कुनबे वालों ने अरविन्द केजरीवाल पर भी सहज भाव से विश्वास कर लिया । यह तो बाद में पता चला कि अन्ना के इस कुनबे में अग्निवेश नाम के तथाकथित स्वामी से लेकर शशि भूषण और प्रशान्त भूषण नाम के बाप बेटे तक घुसे हुये हैं । जैसे जैसे इन घुसपैठियों के असली इरादों की पहचान होती गई वैसे वैसे वे बाहर निकलते गये या निकाल दिये गये । भूषण परिवार के टैक्स के मामले को यदि छोड़ भी दिया जाये तो बाद में प्रशान्त तो कश्मीर को भारत से अलग होने देने की वकालत को भी भ्रष्टाचार हटाने से ही जोड़ने लगे । इससे अन्ना समेत आम देशवासी भी चौंके । क्योंकि ग़ुलाम नबी फ़ाई मामले की चर्चा भी फैलती जा रही थी , ऐसे समय में प्रशान्त भूषण द्वारा कश्मीर की आजादी का समर्थन उत्तेजना पैदा करने वाला ही था । इसलिये उनके लिये भी अन्ना हजारे के कुनबे में रहना संभव नहीं हो सका । तभी अरविन्द केजरीवाल ने इच्छा ज़ाहिर कर दी कि वे देश में भ्रष्टाचार दिल्ली का मुख्यमंत्री बन कर ही समाप्त करेंगे । शायद कुनबे के लोग उनकी इच्छा के भीतर की इच्छा को जल्दी पहचान गये , इसलिये उन्होंने अरविन्द की इस चाल में फँसने से इंकार कर दिया । अरविन्द ने भी अन्ना का कुनबा छोड़ कर अपना अलग कुनबा गठित किया । अब वे अपना अलग शो चलाने लगे और दिल्ली के जंतर मंतर पर मंतर मार कर भ्रष्टाचार से लड़ने का प्रदर्शन करने लगे । राजनैतिक नेताओं और उनके नित नये उजागर हो रहे कारनामों के प्रति आम जनता की अनास्था उस सीमा तक पहुँच गई थी कि उसने अरविन्द के इस जादू टोना नुमा कार्यक्रमों को भी सचमुच भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई समझना शुरु कर दिया । टी. वी चैनलों ने बहती गंगा में हाथ धोने के लिये अरविन्द केजरीवाल के नये कुनबे के इन कारनामों को भी , मैं तुलसी तेरे आँगन की, की तरह धारावाहिक शैली में प्रसारित करना शुरु कर दिया । यह भारतीय राजनीति का स्टिंग आप्रेशनकाल कहा जा सकता है । लेकिन भूगोल के लोग शुरु से ही चिल्लाते रहे हैं कि धरती गोल है । इसलिये जब कोई आदमी एक स्थान से चलता है तो वह अन्ततः वहीं पहुँचता है , जहाँ से वह चला था । अरविन्द के साथ भी यही होने वाला है । लेकिन आज जब विश्वविद्यालयों में मैनेजमैंट के पाठ्यक्रमों को ही कैरियर के लिये सर्वाधिक उपयुक्त माना जा रहा है तो ऐसे समय में भूगोल के सिद्धान्तों को समझने का समय किसके पास है ? लेकिन एक दिन दूसरों पर स्टिंग आप्रेशन का काला जादू चलाते चलाते अरविन्द का कुनबा भी एक दूसरे स्टिंग आप्रेशन की जद में आ गया । इस नये तांत्रिक द्वारा किये गये स्टिंग आप्रेशन से स्पष्ट आभास मिल रहा था कि अरविन्द के कुनबे द्वारा जंतर मंतर पर मंतर मार कर भ्रष्टाचार को समाप्त करने के नमूने के तौर पर जो दिखाया जा रहा था , वह एक नाटक था । पैसा लेकर पगड़ियाँ उछालने का नाटक । जंतर मंतर पर किसी की पगड़ी उछलती देख दर्शक समझते थे कि भ्रष्टाचार नंगा हो रहा है लेकिन अब लगता है कि वह तो दरवाज़े के अन्दर सौदा न पट पाने की खुंदक निकाली जा रही थी । लेकिन इन दिनों कुनबा थोड़ा निष्क्रिय है । स्टिंग आप्रेशन पर यदि विश्वास किया जाये ,( न करने का कोई कारण नहीं है क्योंकि इसी प्रकार के स्टिंग आप्रशनों से ही तो अरविन्द के कुनबे ने भी शोहरत हासिल की है ।) तो चुनाव आयोग की सक्रियता के चलते अभी किसी की पगड़ी उछालना थोड़ा मुश्किल है , लेकिन चुनाव का यह झंझट निपट जाने दीजिये उसके बाद सुपारी लेकर पगड़ी उछालने का धंधा फिर चालू हो जायेगा । इस आप्रेशन ने अरविन्द केजरीवाल समेत उसके पूरे कुनबे को दिन दिहाडे नंगा ही नहीं कर दिया बल्कि साधारण झाड़ू को सोने के झाड़ू में बदलने की तिलस्मी तकनीक का भी ख़ुलासा कर दिया ।

उसके बाद इस नाटक का दूसरा अंक चालू हुआ । यह अंक खेला जाना बहुत ज़रुरी हो गया था , क्योंकि कोई आदमी केजरीवाल के मंच पर ही उसको टंगडी मार गया था और रिहर्सल रुम में हो रही रिहर्सल को भी दर्शकों को दिखा गया था । जबकि ग्रीन रूम के बाहर साफ़ और स्पष्ट अक्षरों में लिखा रहता है कि इसमें दर्शकों का प्रवेश निषेध है । दिल्ली विधान सभा के लिये वोट डालने का समय नज़दीक़ आता जा रहा है । कुनबे ने तो दिल्ली की दीवारों पर पोस्टर चिपका दिये थे , जिसमें बाकायदा दिल्ली की जनता को सूचित कर दिया गया है कि किस तारीख़ को अरविन्द केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की शपथ , किस स्थान पर लेंगे और किस तारीख़ को दिल्ली विधान सभा उनके नेतृत्व में ‘अन्ना का जन लोकपाल’ बिल पास कर देगी । तब अन्ना हज़ारे ने अत्यन्त विनम्रता से केजरीवाल को कहा कि अपनी इन सारी रणनीतियों में कृपया मेरा नाम प्रयोग न करें और न ही मेरे नाम पर पैसा एकत्रित करें । दिल्ली में चर्चा हो रही थी कि हो सकता है कुमार विश्वास अब अन्ना के खिलाफ भी कोई कविता जारी कर दें । लेकिन अभी कविताई की तैयारियाँ हो ही रहीं थीं कि मंच पर स्टिंग आप्रेशन हो गया । केजरीवाल के कुनबा के घर आकर ही कोई आइना दिखा गया । लेकिन अब तो जो होना था वह हो चुका था और सारी दुनिया ने देख भी लिया था कि भ्रष्टाचार को रोकने के लिये ही भ्रष्टाचार किया जा रहा था । परन्तु ज्ञानी लोग ऐसे संकट काल के लिये रास्ता बता गये हैं । बीती ताही बिसारिए,आगे की सुधा लेहु । स्टिंग आप्रेशन से लगे घावों को लेकर कब तक रोया जा सकता था ? समय हाथ से रेत की तरह फिसलता जा रहा है । इसलिये रातोंरात भ्रष्टाचार से लड़ने के मूल स्क्रिप्ट में परिवर्तन किया गया । मंच पर नये सिरे से जल्दी जल्दी दोबारा पर्दे लगाये गये । कुनबे के मुख्य सूत्रधार अरविन्द केजरीवाल के मंच पर आने की बाकायदा घोषणा की गई । वे सचमुच गंभीर मुद्रा में प्रकट हुये । एक बारगी तो पुराने दर्शक भी गच्चा खा गये । अरविन्द कभी भ्रष्टाचार से समझौता नहीं करेंगे । कुनबे में कोई कोई कितना भी नज़दीक़ी क्यों न हो । अरविन्द ने कहा की सख़्ती से कुनबे में व्याप्त भ्रष्टाचार को समाप्त किया जायेगा और संलिप्तता सिद्ध होने पर कुनबइयों को घर से बाहर कर दिया जायेगा । दर्शकों ने तालियाँ पीटीं और पूछा, जाँच कौन करेगा ? जबाब था , हमीं करेंगे और कौन करेगा ? अब दर्शकों के अपने सिर पीटने की बारी थी । जिन पर दोष हैं , वे ख़ुद ही जाँच करेंगे और ख़ुद ही सजा सुनायेंगे ? अरविन्द केजरीवाल का लोकतंत्र और उनके भ्रष्टाचार से लड़ने के नाटक का पर्दाफ़ाश हो चुका था । लेकिन फिर भी कहीं आशा की एक किरण बची हुई थी कि शायद वे सचमुच जाँच कर कुछ लोगों को पकड़ भी लेंगे । लेकिन हुआ वही जिसका अरविन्द केजरीवाल के भ्रष्टाचार मुक्त समाज हेतु चलाये जा रहे आन्दोलन को देर से देख रहे विशेषज्ञों को अंदेशा था । अरविन्द ने स्वयं ही जाँच कर अपने राजनैतिक कुनबे के लोगों को दोषमुक्त घोषित कर दिया । इतना ही नहीं जिस मीडिया ने अरविन्द बाबू को कभी अतिरिक्त समय देकर भी जनता का हीरो बनाया था, उसी मीडिया की जम कर निन्दा की । मीठा मीठा हड़प, कड़वा कड़वा थू । तो कुल मिला कर यह हुआ अरविन्द केजरीवाल का लोकतंत्र , जन लोकपाल और पारदर्शिता का नमूना । सिपाही भी आप , जाँच कर्ता भी आप और न्यायाधीश भी आप स्वयं ही । इस आदर्श माडल से जो जाँच का परिणाम आ सकता था , वही आया । केजरीवाल अपने इसी लोकतांत्रिक माडल और इसी लोकपाल के बलबूते देश का प्रशासन संभालना चाहते हैं और यह भी चाहते हैं कि लोग उनकी इस बात पर विश्वास कर लें कि वे सचमुच भ्रष्टाचार के खिलाफ लड रहे हैं ।

लेकिन असली दुख तो इस बात का है कि सिस्टम के फ़ेल हो जाने से व्याप्त हो रहे शून्य को भरने के लिये , लोगों में फैली निराशा और हताशा का लाभ उठा कर अरविन्द केजरीवाल जैसे अनेकों समूह या कुनबे आगे आ रहे हैं । यदि स्थिति यही रही तो देश भर में ऐसे छोटे छोटे समूह , इस का लाभ उठा कर , स्थापित हो सकते हैं । उनकी इस पलांटेशन में मीडिया भी भरपूर सहायता करेगा, जिस प्रकार उसने केजरीवाल के समूह को पलांट करने में की थी । दरअसल आजकल मीडिया में जिन लोगों का पैसा लगा हुआ है, या फिर इस पैसे की वजह से जिन के हाथों में मीडिया का नियंत्रण खिसकता जा रहा है , उनकी पृष्ठभूमि आपराधिक स्तर तक पहुँचती हुई देखी जा सकती है । मीडिया के पर्दे में छिपे ऐसे व्यवसायिक घराने , इन छोटे समूहों को स्थापित करके , अपने व्यवसायिक हितों के लिये राजनीतिक सत्ता का प्रयोग करेंगे । इससे देश में अव्यवस्था फैल सकती है । इसलिये ऐसे कुनबों से सावधान होना बहुत ज़रुरी है ।

8 thoughts on “क़िस्सा-ए-अरविन्द केजरीवाल और उनकी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का

  1. रामेश्वर नाथ तिवारी सक्रिय सदस्य भाजपा 72लोकसभा बलिया says:

    बहुतरुपियो को पहचानना बहुत कठिन है।

  2. मेरा स्पष्ट विचार रहा है ८ दिसंबर के पहले से ही की किसी को भी कम या व्यर्थ नहीं आकना चाहिइ .
    आज आपलोग सोचने पर जरूर बाध्य होंगे की जनता मुर्ख नहीं होती -अपमे गधों को फिर से बचाना कफे इनही है नइ दिल्ली के लिए – संगीन अपराधियों और भ्रष्ट करोडपतियोएँ को टिकट देने से परहेज़ करें नाहे ईटीओ जनता झाड़ू लगा देगी चाहे किसी भी दल के हों ( कम स एकं मेरे जैसे आदमी अलग तो बैठ ही सकती हैं – हमारी निष्ठा राष्ट्र से है किसी दल से नहीं – मैं वैसे भी अराजनीतिक हूँ और अपनको गोलवलकर- दीनदयाल युग का बुऊतौर्व स्वयंसेवक समझता हूँ

  3. प्रजातंत्र में किसी को भी अपनी बात रखने की आजादी है और यदि ऐसा दुस्साहस किसी ने दो महारथियों के सामने किया है तो उसे देखिये – मैं समझता हूँ न केवल श्री आर सिंह से मैं सहमत हूँ मैं यह भी कहूंगा की सभी प्रतिष्ठित दलों को अपने व्यवहार में परिवर्त्तन कर अपराधियों, भ्रस्टाचारियों को टिकट नहीं देना चाहिए नही तो यह स्थिति सभी प्रान्तों में आयेगी

  4. बड़े दलों के द्वारा शासन में असफलता , भ्रस्टाचार,महंगाई दिन प्रतिदिन की समस्याओं से जूझता आदमी परेशां हो कर इस प्रकार के दलों की और आशा भरी नज़रों से देखता है.यदि कांग्रेस व भा ज पा ने अपने उत्तरदायित्व को ढंग से निभाया होता तो देश में यह हालत न होती.कांग्रेस दोनों हाथों लूट मचती रही भा ज पा ने भी अपने हित पुरे न होने पर ही विरोध किया अन्यथा उसने भी विपक्ष की जिम्मेदारी नहीं निभाई.इसीलिए ये क्षेत्रयीदल पनपे व आप जैसे दल दल भी क्या एक तरह के दवाब समूह सामने आये,ये भी मोका आने पर अपने हाथ धोने में पीछे नहीं रहे.जनता बेचारी मुहं ताक रही है. व हर बार ठगी जाती है , और एक बार फिर ऐसा ही होता लगता है.

  5. कभी कभी सोचता हूँ हूँ कि क्या यस्थास्थिति से उबरना सचमुच इतना कठिन है? क्यों हम लिपटे रहते है,अपनी सड़ी गली परम्परा गत सोचोमें?दिल्ली के राज्य का दर्ज दिए जाने के बाद बीजेपी का कब्ज़ा हुआ था इस राज्य पर,बाद में तो कांग्रेस ने ऐसा दबदबा जमाया कि बीजेपी को १५ वर्षों का बनवास दे दिया. मदनलाल खुराना और साहिब सिंह वर्मा के जमाने की सबसे बड़ी उपलब्धि जो मुझे ज्ञात है,वह यह है कि उन्होंने एड़ी छोटी का जोड़ लगा दिया कि दिल्ली के सार्वजनिक वाहनों में सीएनजी का प्रयोग न हो. उन्होंने तो इसके खिलाफ राम नायक के द्वारा अध्यादेश तक लाने की ठानी थी,पर जब मेडिया ने खुलासा किया कि सीएनजी के आने से इन लोगों का प्रत्यक्ष व्यक्तिगत नुकशान हो रहा है,जिसके चलते वे इसके विरुद्ध हैं,तब इनका मुंह बंद हुआ. बाद में शीला दीक्षित ने जिसके लिए वाह वाही लूटी,वह भी वास्तव में सुप्रीम कोर्ट के दबाव के कारण सम्भव हुआ.
    १९६७-६८ में जनसंघ का नारा था कि जब दिल्ली में स्वच्छ शासन तो अन्य स्थानों में क्यों नहीं? यह स्वच्छ शासन उस समय के दिल्ली में जो प्रशानिक व्यवस्था थी,उसमे उन्होंने अच्छा काम किया था. क्या बीजेपी वही नारा आज दोहराने कि स्थिति में है? क्या वह कह सकता है कि दिल्ली नगर निगम में स्वच्छ शासन तो दिल्ली राज्य में क्यों नहीं?
    यह तो हुआ, दिल्ली राज्य के सन्दर्भ में आज तक की किस्सा कुर्सी का. अब अवतरित होते हैं अपनी नयी पार्टी लेकर अरविन्द केजरीवाल. पता नहीं लोगो को भूलने की बीमारी क्यों है? वह भी उनलोगों को जो अपने रिसर्च के बल पर डाक्टर की उपाधि से विभूषित हैं., क्या हुआ था ३ अगस्त २०१२ को और उसके पहले भी ? क्या अन्ना हज़ारे ने बिना शर्त अपना और अपने सहयोगियों का अनशन तोड़ते और तुड़वाते समय यह नहीं कहाथा कि अब हमें विकल्प देना पड़ेगा? अब विकल्प के आने पर इतनी हाय तौबा क्यों? इसके पहले भी अन्ना का संसद से बाहर और संसद के भीतर जो मजाक उड़ाया गया था,पता नहीं आम जनता की कौन कहे बड़े बड़े विद्वान् भी क्यों उसको भूल गए? आपलोग क्या सोचते थे?वे सब जो भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए सर पर कफ़न बाँध कर निकले थे,यों हो सड़क के चंद लोग समझे जाते रहें? इतिहास गवाह है क़ि जो कुछ नया करने को निकलते हैं,उनकी आरम्भ में भर्तस्ना ही होती है.पर धीरे धीरे लोग उनका लोहा मानने लगते है, आज पूरा भ्रष्ट समूह इनको समाप्त करने पर तुला हुआ है,पर कम से कम वे लोग तो इनका साथ दें या तथस्ट रहे जो इस भ्रष्ट व्यवस्था से लाभान्वित नहीं हो रहे हैं. रही बात आरोपों की तो उसके बारे में मेरा आलेख प्रवक्ता में आ चूका है” अन्ना की जान को खतरा?”

  6. जिंदगी मौत न बन जाये यारों …खो रहा …सब कुछ ,
    हालात देखते हुए … आँख करो बंद और ” AAP ” का दबाओ बटन ,
    ” बेईमान हो या ईमानदार ,”AAP” को ही देख लो इस बार ,
    कारण -: अपना फायदा चाहिये तो तीसरा विपक्ष खड़ा करना जरुरी है। …बाकी आप खुद
    [ स्वयं ] जानो ,,,,,,,,,,जब तक “AAP” पार्टी पर आरोप नहीं लगे थे विश्वास करना दोस्तों मैं खुद “मोदी” BJP – समर्थक था ,,,?मगर अब नहीं ,{कम से कम इस चुनाव में तो नहीं } Dekho-Padho-
    http://www.pravakta.com/aana-ki-jaan-ko-khatra

  7. यदि पिछले पैंसठ वर्षों में नेहरू और गांधी कुनबे की सत्ता में कपडे तक उतर चुके हैं तो अरविन्द केजरीवाल का नया कुनबा नंगों से और क्या छीन लेगा? अग्निहोत्री जी, मत रोकिये इस कुनबे को क्योंकि यदि अरविन्द केजरीवाल दिल्ली में प्रधानमंत्री पद पर आ भ्रष्टाचार के विरूद्ध कदम उठाते हैं तो पुराने कुनबे अपनी अपनी दूकान समेट भागते दिखाई देंगे| मेरे विचार में केंद्र में मोदी जी के होते देश में राष्ट्रवादियों का बोल बाला होगा और भारत में पहली बार सच्ची स्वतंत्रता की लहर उठेगी|

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