नज़्म/ मेरे महबूब

मेरे महबूब !

उम्र की

तपती दोपहरी में

घने दरख्त की

छांव हो तुम

सुलगती हुई

शब की तन्हाई में

दूधिया चांदनी की

ठंडक हो तुम

ज़िन्दगी के

बंजर सहरा में

आबे-ज़मज़म का

बहता दरिया हो तुम

मैं

सदियों की

प्यासी धरती हूं

बरसता-भीगता

सावन हो तुम

मुझ जोगन के

मन-मंदिर में बसी

मूरत हो तुम

मेरे महबूब

मेरे ताबिन्दा ख्यालों में

कभी देखो

सरापा अपना

मैंने

दुनिया से छुपकर

बरसों

तुम्हारी परस्तिश की है…

-फ़िरदौस ख़ान

2 thoughts on “नज़्म/ मेरे महबूब

  1. आप की कविता दिल को छु गए वास्तव में इसमें दिल से लिखे शब्द
    झलकते है….

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