” हिंदुस्तान ” हारने की तैयारी में राहुल

राकेश कुमार आर्य

कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस बार अमेठी के साथ – साथ केरल की वायनाड लोकसभा सीट से भी अपना नामांकन पत्र दाखिल किया है। श्री गांधी को उसी प्रकार एक से अधिक लोकसभा क्षेत्रों से अपना नामांकन पत्र दाखिल करने का अधिकार है जिस प्रकार देश के किसी अन्य राजनीतिक दल के किसी अन्य नेता को है । वह वायनाड से चुनाव लड़ सकते हैं , परंतु वायनाड में जाकर उन्होंने जो कुछ बोला है वह आपत्तिजनक है । उन्होंने कहा है कि वह दक्षिण भारत के साथ खड़े होने का संदेश देने के लिए यहां पर आए हैं । श्री गांधी के इस कथन को हम किस प्रकार ग्रहण करें या इसके क्या अर्थ निकालें ? – यह कुछ समझ में नहीं आ रहा ।
राहुल गांधी संभवत कह रहे हैं कि अब देश के अलग-अलग भागों के साथ खड़ा होने के लिए वहां से चुनाव लड़ा जाना आवश्यक हो गया है । यदि ऐसा है तो फिर उन्हें दक्षिण से ही क्यों, पूरब और पश्चिम से भी 2 सीटों पर नामांकन पत्र दाखिल करना चाहिए। वैसे इस देश के लोकसभा चुनावों का यह इतिहास रहा है कि देश का नायक चाहे जहां से चुनाव लड़े ,उसको सारे देश की मान्यता मिलती है । ऐसा जननायक जब देश का प्रधानमंत्री बन जाता है तो अपवादों को छोड़कर न्यूनाधिक प्रधानमंत्रियों ने अपने आप को पूरे देश का प्रधानमंत्री सिद्ध करने का प्रयास भी किया है । तब ऐसी स्थिति कहां आ गई कि श्री गांधी को वायनाड जाकर चुनाव लड़ने के लिए यह कहना पड़ा कि वह एकता का संदेश देने के लिए यहां पर आए हैं।
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं और केरल में राहुल गांधी ने माकपा के विरुद्ध विषवमन किया है , परंतु केरल में जाकर उन्होंने कहा है कि वह माकपा के विरुद्ध कुछ भी नहीं कहेंगे , एक शब्द भी नहीं । 
ऐसा कहकर राहुल गांधी ने अपने कार्यकर्ताओं को क्या संदेश दिया ? – विशेषकर तब जबकि उन्हीं की पार्टी के कार्यकर्ता माकपा के हिंसक व्यवहार का सामना करते रहे हैं । ऐसे में क्या राहुल गांधी ने अपने कार्यकर्ताओं के साथ हो रही हिंसक घटनाओं को स्वीकार कर लिया है , या वह अपने निहित स्वार्थ के लिए अब कुछ बोलना नहीं चाहते ? – यह नहीं हो सकता कि माकपा के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार के कामकाज से उन्हें कुछ शिकायत नहीं हो । यदि राहुल गांधी के मन में माकपा के प्रति सचमुच मैत्री का भाव है तो उन्हें यह मैत्रीभाव माकपा के प्रति पश्चिम बंगाल में भी दिखाना चाहिए । 
राहुल गांधी ने कुछ समय पहले एक बयान दिया था। जिसमें उन्होंने संसद में प्रधानमंत्री एक महिला मंत्री (उनका संकेत विदेश मंत्री की ओर था ) के पीछे छुप कर अपना बचाव कर रहे हैं । श्री गांधी के बयान पर उस समय काफी बवाल मचा था । क्या अब यह नहीं कहा जा सकता कि इस समय राहुल गांधी स्वयं अमेठी में खड़ी एक भाजपा महिला प्रत्याशी अर्थात स्मृति ईरानी से डर कर भाग गए हैं , और वह अपने लिए सुरक्षित से सुरक्षित निर्वाचन क्षेत्र खोजते हुए वायनाड पहुंच गए हैं । जहां से उन्हें यह संभावना है कि वह निश्चित ही लोकसभा पहुंच जाएंगे । 
स्वतंत्र भारत के चुनावी इतिहास में यह पहली घटना है जब कांग्रेस के किसी नेता को और विशेषकर प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी को इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग का समर्थन लेकर अपने लिए संसद पहुंचने का रास्ता सुरक्षित करने के लिए विवश होना पड़ा है। इसके उपरांत भी कांग्रेस के नेता या राहुल गांधी स्वयं को यदि सेकुलर कहते हैं तो अब उनकी स्थिति सचमुच हास्यास्पद ही हो गई है । इसमें कोई बुरी बात नहीं है कि वह दक्षिण भारत से जाकर चुनाव लड़ें । स्वयं उनकी दादी चिकमगलूर से और उनकी माता सोनिया गांधी बेल्लारी से पूर्व में चुनाव लड़ चुकी हैं ।
स्मृति ईरानी ने न केवल कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी को संसद में घेरने का सफल प्रयास किया ,बल्कि उन्होंने बार-बार अमेठी जा – जा कर वहां भी अमेठी की जनता को बार-बार यह भरोसा दिलाया कि उनके जनप्रतिनिधि का ध्यान अमेठी की ओर उतना नहीं है जितना उनका स्वयं का है । स्मृति ईरानी अपने इस प्रयास में भी सफल होती दिखाई दीं , इस बात का आभास स्वयं राहुल गांधी को भी हो गया कि वह जितना ही झूठ की राजनीति का सहारा लेते जा रहे हैं और मतदाताओं को बरगलाने या भ्रमित करने का प्रयास कर रहे हैं ,उतना ही उनके हाथ से अमेठी छूटती जा रही है ,इसलिए उन्होंने अमेठी से भागकर वायनाड की शरण ली ।
वहां जाकर भी वह मुस्लिम लीग की शरण में पहुंच गए है , और ऐसी सीट को अपने लिए चयनित किया है जहां से मुस्लिम मतदाता उन्हें देश की संसद में भेज सकते हैं । यह तुष्टिकरण की कांग्रेस की वर्त्तमान राजनीति का घिनौना उदाहरण है । लगता है कांग्रेस के नेताओं ने अपनी पुरानी भूलों से कोई शिक्षा नहीं ली है और वह तुष्टीकरण की राजनीति को छोड़ने को तैयार नहीं है । चुनावी घोषणापत्र को जारी करते हुए कांग्रेस ने जिस प्रकार अफस्पा जैसे कानून को जम्मू कश्मीर से समाप्त करने की बात कही है और साथ ही देशद्रोह संबंधी भारतीय दंड संहिता की धारा 124 को समाप्त करने का वचन देश के आतंकवादियों और देश में तोड़फोड़ की गतिविधियों में संलिप्त रहने वाले लोगों को दिया है , उससे भी देश में आतंकवाद को भविष्य में बढ़ावा मिलने की पूरी संभावना है ।
यदि केंद्र में राहुल गांधी की सरकार आती है तो यह आज ही मान लेना चाहिए कि जम्मू कश्मीर में खून खराबा और हिंसा की घटनाओं में और भी अधिक वृद्धि होगी । वहां पर फिर से देशभक्त लोगों का जीना कठिन हो जाएगा , उन्हीं के सुर में सुर मिलाते हुए जिस प्रकार महबूबा मुफ्ती , उमर अब्दुल्ला और उनके पिता फारूक अब्दुल्लाह कश्मीर से धारा 370 व 35a को हटाने की प्रक्रिया में वहां पर हिंसक घटनाओं की चेतावनी दे रहे हैं और जम्मू कश्मीर के अलग होने के लिए भी धमकी भरे स्वर निकाल रहे हैं , – उससे भी यह स्पष्ट होता है कि कांग्रेस और देश तोड़ने वाली शक्तियों में कोई गुप्त गठबंधन हो चुका है । इस गठबंधन को इस दृष्टिकोण से भी देखने की आवश्यकता है कि राहुल गांधी को इस समय ऐसे चुनाव क्षेत्र का चयन क्यों करना पड़ा जहां पर मुस्लिम मतदाता अधिक है ? 
यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि देश में आज तक राष्ट्रवाद की कोई परिभाषा नहीं गढ़ी गई है। हर राजनीतिक दल राष्ट्रवाद की अपनी-अपनी परिभाषा करता है। टुकड़े-टुकड़े गैंग को समर्थन देना और देश में भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देश तोड़ने वाले लोगों को भी प्रोत्साहित करना कुछ राजनीतिक दलों ने अपना राष्ट्रवाद मान लिया है । कांग्रेस ने प्रारंभ से ही राजनीति में शासन को अपने हाथों में लेकर देश के इतिहास को कम्युनिस्टों के द्वारा लिखने के लिए उन्हें सौंप दिया । यह सब तो सर्वविदित है कि कम्युनिस्टों ने देश के इतिहास के तथ्यों के साथ किस प्रकार खिलवाड़ किया ? उन्होंने इतिहास की मनमानी व्याख्या की और जो देश के इतिहास के नायक हैं- उनको भुलाकर देश के इतिहास को कलंकित करने वाले लोगों को महिमामंडित करने का राष्ट्रघाती कार्य किया । टुकड़े-टुकड़े गैंग के कन्हैया जैसे युवाओं को इसी प्रकार की मानसिकता वाले इतिहास ने तैयार किया है । इसमें हमारा मानना है कि कन्हैया जैसे युवकों को इतना अधिक दोषी नहीं मानना चाहिए , जितना कांग्रेस और कम्युनिस्ट इतिहासकारों के षडयंत्र को दोषी माना जाए । जिसमें उन्होंने भारत के इतिहास की मनमानी व्याख्या कर देश की युवा पीढ़ी को बिगाड़ने का कार्य किया है।
कांग्रेस के नेता राहुल गांधी चाहे जहां से चुनाव लड़ लें ,लेकिन वह देश में इस समय चल रही राष्ट्रवाद की बहस पर खुलकर अपने विचार प्रकट करें और यह स्पष्ट करें कि वह देश की मूल विचारधारा अर्थात मूल धर्म , संस्कृति और इतिहास का संरक्षण करने का हर संभव प्रयास करेंगे । साथ ही भारत की वैदिक संस्कृति के संरक्षण के लिए उचित प्रयास करेंगे , भारत के बारे में यह स्वीकार करें कि यह सर्वसमन्वयी संस्कृति का आदिस्रोत है । जिसकी सर्व समन्वयी संस्कृति के विनाश का किसी भी संप्रदाय को ठेका नहीं दिया सकता । वे यह भी स्पष्ट करें कि भारत में बाहर से आने वाले मजहब के पादरियों या मुल्ला मौलवियों को भारत के मौलिक धर्म को विकृत करने का ठेका नहीं दिया जाएगा और जो लोग इस कार्य में संलिप्त हैं, उनके विरुद्ध कठोर कार्यवाही की जाएगी । श्री गांधी को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि भारत में हिंदू आतंकवाद जैसी कोई बीमारी नहीं है , और हिंदू अपने मूल स्वरूप में उदार होता है । यदि राहुल गांधी ऐसी सोच को लेकर आगे बढ़ते हैं और लोगों के बीच उतरते हैं तो सचमुच यह उनका नया अवतार होगा । पर लगता नहीं कि वह देश की नब्ज पर हाथ रख कर बोलने का साहस कर पाएंगे । वह बनावटी साहस दिखा रहे हैं और अपने चेहरे को बिगाड़कर जितनी भाव भंगिमाएं मोदी के विरुद्ध प्रकट कर रहे हैं मोदी उतना ही लोकप्रिय होते जा रहे हैं । कांग्रेस के घोषणा पत्र से यह स्पष्ट हो गया है कि वायनाड से तो राहुल जीत सकते हैं, लेकिन हिंदुस्तान को वह हारने की तरफ बढ़ रहे हैं। क्योंकि उनके वचनपत्र में कहीं पर भी हिंदुस्तान की आत्मा को छूता हुआ कोई मुद्दा नहीं रखा गया है । मुद्दाविहीन विपक्ष के नेता के रूप में राहुल गांधी आगे बढ़ रहे हैं। इसे सही अर्थों में बढ़त नहीं कहा जा सकता है , परंतु यदि वह आतंकवादियों या देश तोड़ने वाली गतिविधियों में संलिप्त लोगों का समर्थन करके आगे बढ़ रहे हैं तो वास्तव में वह पीछे भाग रहे हैं और यह स्थिति किसी भी नेता के लिए अच्छी नहीं कही जा सकती। 

1 thought on “” हिंदुस्तान ” हारने की तैयारी में राहुल

  1. राहुल की राजनीति का कोई तर्कशुद्ध पैंतरा नहीं होता।
    इस लिए उनका पैंतरा सदैव डाँवाडोल रहता है; कभी आँख मारेगा, कभी चोर कहेगा, कभी चिठ्ठी फाडेगा।
    निर्णय भी बदलते रहता है।
    पर भोली, अनपढ और मूर्ख जनता, और साथ भ्रष्टाचारी समवाय (कॉर्पोरेशन) निजी स्वार्थों और भ्रष्टताओं के जालमें साथ निभा रहे हैं।
    पकडे जाने का भय सता रहा है।
    बाकी बिकाऊ मीडिया एक वेश्या जैसा धंधा कर रहा है।
    जुडे हुए रिश्वतखोर मिलकर पैंतरा ले रहे हैं।
    साथ देनेवाला मतदाता भी निजी स्वर्थों के कारण और कुछ अंधश्रद्धा से उनके साथ जुड जाते हैं।
    ढपोल शंख बज रहा है…बुद्धिमान चेत जाए।
    लेखक को धन्यवाद।

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