खान-पान

भरोसे का सौदा : भारत में विदेशी ‘नेस्ले’ का भारतीय उपभोक्ताओं के साथ धोखा !

डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भारतीय खाद्य सुरक्षा नियामक  ने देश के सबसे बड़े और बहुराष्ट्रीय ब्रांड्स में से एक, नेस्ले इंडिया लिमिटेड के खिलाफ शिशु पोषण उत्पादों में खाद्य सुरक्षा मानकों का उल्लंघन करने पर तीन अलग मामले दर्ज किए हैं। यह कानूनी कार्रवाई देश के उन मासूम नवजातों की सेहत से जुड़ी है, जो खुद बोलकर अपनी तकलीफ बयां नहीं कर सकते। वस्‍तुत: यह उस लंबी फेहरिस्त की एक और कड़ी है, जो समय-समय पर यह सोचने को मजबूर करती है कि क्या भारत जैसे विशाल विकासशील देश को बहुराष्ट्रीय कंपनियां सिर्फ एक बड़ा ‘मुनाफा कमाने का बाजार’ मानती हैं? 1912 से शुरू हुई ये कंपनी 114 साल से अधिक लंबी यात्रा में आज ₹23,194.95 करोड़ से अधिक का वार्षिक टर्नओवर पर जा पहुंची है।

नेस्ले के व्यापारिक सफर की सबसे बड़ी कड़वी सच्चाई यह है कि वह विकसित यूरोपीय देशों के नागरिकों के लिए उच्च स्वास्थ्य मानक रखती है, जबकि भारत जैसे विकासशील देशों के उपभोक्ताओं के लिए बिल्कुल अलग और हानिकारक नीति अपनाती है। एक स्विस खोजी एनजीओ की रिपोर्ट में यह पहले ही खुलासा हो चुका है कि नेस्ले अपने सबसे प्रसिद्ध शिशु आहार ब्रांड ‘सेरेलैक’ के निर्माण में दोहरी नीति अपनाता है।

कंपनी जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस और स्विट्जरलैंड जैसे अमीर यूरोपीय देशों में जो सेरेलैक बेचती है, उसमें ऊपर से एक ग्राम भी अतिरिक्त चीनी नहीं मिलाई जाती। इसके विपरीत, वही सेरेलैक जब भारत के माता-पिता अपने छह महीने के मासूम बच्चे के लिए खरीदते हैं, तो उसमें प्रति सर्विंग 2.7 ग्राम से तीन ग्राम तक अतिरिक्त रिफाइंड चीनी छिपी होती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की गाइडलाइंस कहती हैं कि शिशुओं को दो साल की उम्र तक किसी भी तरह की अतिरिक्त चीनी नहीं दी जानी चाहिए। नेस्ले ने भारतीय बच्चों के स्वाद ग्रंथियों को जानबूझकर चीनी का आदी बनाया ताकि उनके उत्पाद की बिक्री लगातार बढ़ती रहे, भले ही इसके परिणामस्वरूप बच्चों में बचपन का मोटापा, दांतों की सड़न और भविष्य में डायबिटीज का खतरा पैदा हो जाए। यानी कि आज भारत में जिन बच्‍चों के दांत खराब हो रहे हैं, आप मान सकते हैं कि इसके लिए कहीं न कहीं ये एवं इस जैसी अन्‍य कंपनियां जिम्‍मेदार हैं।

भ्रामक मार्केटिंग और ममता का बाजारीकरण

भारत का कानून इन्फेंट मिल्क सब्स्टीट्यूट्स (आईएमएस) एक्ट, 1992 और एफएसएसएआई रेगुलेशन, 2020 नवजात शिशुओं के फॉर्मूला मिल्क के किसी भी प्रकार के व्यावसायिक विज्ञापन या उसे स्तनपान से बेहतर बताने वाले दावों पर पूरी तरह रोक लगाता है। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण यह है कि मां का दूध ही शिशु के लिए सर्वोत्तम है। इसके बावजूद, नेस्ले इंडिया ने भारतीय उपभोक्ताओं को गुमराह करने के लिए भ्रामक विज्ञापनों का सहारा लिया।

कंपनी ने अपने नैन एक्सेला प्रो स्टेज-1 उत्पाद पर ‘5 एचएमओ’ और ‘व्हे प्रोटीन’ के बड़े-बड़े दावे करके माताओं को यह भरोसा दिलाने की कोशिश की कि यह डिब्बाबंद दूध मां के प्राकृतिक दूध जैसा ही शक्तिशाली है। इसी तरह, लैक्टोजन प्रो-1के प्रचार में गैर-प्रमाणित रूप से लिखा गया कि इसका व्हे प्रोटीन “पचने में बेहद आसान” होता है. एक मां अपने बच्चे के स्वास्थ्य के लिए सबसे अच्छी चीज खरीदना चाहती है, किंतु नेस्ले ने अपनी भारी-भरकम और भ्रामक वैज्ञानिक शब्दावली के जरिए भारतीय माताओं के मन में यह भ्रम पैदा किया, जोकि पूरी तरह से गैर-कानूनी प्रचार स्टंट और उपभोक्ता अधिकारों का हनन है।

पोषक तत्वों में कटौती और गुणवत्ता के साथ खिलवाड़

जब बात बच्चों या आम जनता के भोजन की हो, तो शुद्धता के मानकों पर 100 फीसद खरा उतरना अनिवार्य है, लेकिन नेस्ले इंडिया का ट्रैक रिकॉर्ड बताता है कि उसने कई मौकों पर भारतीय मानकों को हल्के में लिया। एफएसएसएआई की प्रयोगशाला जांच रिपोर्ट में नेस्ले इंडिया के एक इन्फेंट मिल्क (फॉलो-अप फॉर्मूला) का सैंपल पूरी तरह मानकों से कम पाया गया है।  इस प्रोडक्ट में बच्चों के दिमागी और शारीरिक विकास के लिए आवश्यक विटामिन बायोटिन (बायोटिन यानी विटामिन बी-7) की मात्रा तय भारतीय कानूनी सीमा से काफी कम मिली।

उपभोक्ता डिब्बे पर लिखी न्यूट्रिशन वैल्यू को सच मानकर पूरी कीमत चुकाता है, किंतु डिब्बे के अंदर बंद पाउडर में वह पोषण होता ही नहीं है जिसका वादा किया गया था, वस्‍तुत: यह सीधे तौर पर भारतीय ग्राहकों की जेब काटने और उनके बच्चों को कुपोषण की ओर धकेलने जैसा धोखा है।

भारत में नेस्ले द्वारा किए गए उपभोक्ताओं के भरोसे के सबसे बड़े कत्ल के रूप में साल 2015 का मैगी विवाद हमेशा याद किया जा सकता है। 1983 में भारत में लॉन्च होने के बाद मैगी ने भारतीय घरों में ‘दो-मिनट’ के जादुई स्लोगन से अपनी जगह बनाई थी और बाजार के एक बहुत बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था, पर जब जांच हुई तो सामने आया कि उत्तर प्रदेश के खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की जांच में मैगी के सैंपल्स में लेड (शीशा) की मात्रा तय सुरक्षित सीमा (2.5 पीपीएम) से कई गुना अधिक थी।

लेड इंसान के शरीर, विशेषकर बच्चों के लिवर, किडनी और मस्तिष्क विकास के लिए एक खतरनाक न्यूरोटॉक्सिन (धीमा जहर) है। इसके अलावा, मैगी के हर पैकेट पर लिखा होता था- “नो एडेड एमएसजी”, मगर प्रयोगशालाओं की जांच में इसमें मोनोसोडियम ग्लूटामेट (एमएसजी) की मौजूदगी पाई गई। इस बड़े धोखे के बाद एफएसएसएआई ने देशव्यापी प्रतिबंध लगाते हुए नेस्ले को 38,000 टन मैगी बाजार से वापस मंगाकर नष्ट करने पर मजबूर किया था और भारत सरकार ने कंपनी के खिलाफ ₹640 करोड़ का मुकदमा भी दायर किया था।

यह आरोप सिर्फ भारतीय नियामकों का नहीं है,  स्‍वयं नेस्ले के वैश्विक नेतृत्व ने इस सच को स्वीकारा है। साल 2021 में नेस्ले के सामने आए आंतरिक दस्तावेज में कंपनी ने खुद कबूल किया कि उसके मुख्यधारा के खाद्य और पेय पोर्टफोलियो (जैसे नूडल्स, चॉकलेट, कन्फेक्शनरी) के 60 फीसद से अधिक उत्पाद स्वास्थ्य की स्थापित अंतरराष्ट्रीय परिभाषाओं पर खरे नहीं उतरते हैं।  

कंपनी ने माना था कि उनके कुछ श्रेणियों के उत्पादों को वे चाहे जितनी कोशिश कर लें, कभी भी ‘न्यूट्रिशियस या पूरी तरह हेल्दी’ नहीं बनाया जा सकता। इसके बावजूद, भारतीय बाजारों में आकर्षक विज्ञापनों के जरिए इन उत्पादों को ‘खुशियों का जरिया’ और ‘बच्चों के टिफिन का सबसे अच्छा साथी’ बताकर धड़ल्ले से परोसा जाता है। ऐसे में नेस्ले इंडिया की यात्रा यह साफ दर्शाती है कि कोई भी कॉर्पोरेट ब्रांड तब तक पूरी तरह जवाबदेह नहीं बनता, जब तक कि उपभोक्ता खुद जागरूक न रहे ।

वस्‍तुत: नेस्ले द्वारा भारत में लगातार किए जा रहे ये उल्लंघन इस बात का प्रमाण हैं कि कंपनियां ढीले कानूनी मुकदमों और जुर्माने की राशियों को अपने व्यापार के खर्च का हिस्सा मान चुकी हैं। जब तक उपभोक्ता इन भ्रामक दावों को खुद नकारना शुरू नहीं करेंगे, तब तक मुनाफे का यह खेल हमारी सेहत की कीमत पर खेला जाता रहेगा!