लेख

शिक्षकों के नाम एक पत्र …

साथियों,                                                                       

सप्रेम अभिवादन

मैं सकुशल हूँ और आशा करता हूँ कि आप भी स्वस्थ और आनंदित होंगे। बार-बार वही कक्षा, वही पाठ्यक्रम, वही बातें, वही तथ्य, वही कहानी; हमें बोर कर देते हैं। इन परिस्थितियों में मुझे लगता है कि मैंने ये बात बता दी है, फिर बच्चा क्यों पूछ रहा है। फिर मैं झुँझला जाता हूँ। इसके बाद जो मेरी प्रतिक्रिया होती है वह बच्चे में डर पैदा कर देती है, एक ऐसा डर जो उसकी अगली जिज्ञासा का गला घोंट देता है। बच्चे के प्रश्न पूछने की प्रवृत्ति कुंद होने लगती है। यह कितना सही है?

कक्षा में जब कोई बच्चा पहली बार बिना किसी डर के अपनी बात कहता है तो लगता है कि आज का दिन सार्थक हो गया। हम सब अपने-अपने भूगोल में रोज़ सुबह एक ही तरह के संसार में प्रवेश करते हैं। बाहर मौसम चाहे जैसा हो, कक्षा के भीतर का मौसम हमारे चेहरे के भाव और हमारे मिज़ाज से तय होता है। शुरू में लगता था कि शिक्षक का काम सब कुछ जानना और उसे सामने बैठे बच्चों तक पहुँचा देना है। जब हाथ में पहली बार हाजिरी का रजिस्टर आया था तो सामने बैठे बच्चों को देखकर भीतर एक घबराहट भी हुई थी कि कहीं कोई कमी न रह जाए। बरसों के अनुभव ने धीरे-धीरे सिखाया कि सबसे बड़ी कुशलता सब कुछ जान लेना नहीं, अपनी अनभिज्ञता को स्वीकार करने का साहस जुटाना है। जब हम किसी सवाल पर बच्चे से कह पाते हैं कि इसका उत्तर मुझे अभी नहीं पता, हम मिलकर खोजेंगे, तब हम उस बच्चे को ज्ञान की खोज में अपना सच्चा साझेदार बना लेते हैं।

शिक्षक होना दरअसल अपने अहंकार को रोज़ थोड़ा-थोड़ा गलाने का अभ्यास है। हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि सात या आठ साल का बच्चा अपने साथ अपने घर की मिट्टी, अपने परिवार के सुख-दुख और अपने हिस्से की दुनिया लेकर आता है। जब हम उसकी भाषा को कक्षा में जगह नहीं देते, तो हम अनजाने में उसके पूरे वजूद को नकार रहे होते हैं। मैंने देखा है कि जब बच्चा अपनी बोली में बात करता है, तो उसके विचार में जो मौलिकता होती है, वह किसी रटी हुई भाषा में नहीं आ सकती। हमारी जिम्मेदारी केवल यह है कि हम उस झिझक की दीवार को गिरा दें जो घर और स्कूल के बीच खड़ी हो जाती है।

आजकल हर जगह इस बात की होड़ है कि बच्चों को कितना अधिक सिखा दिया जाए। डायरियाँ भर जाती हैं, नतीजे तय हो जाते हैं, पर इस दौड़ में अक्सर वह हँसी खो जाती है जिसके साथ सीखने की शुरुआत होनी चाहिए थी। अनुशासन के नाम पर पसरा सन्नाटा किसी भी कक्षा का सबसे डरावना पक्ष होता है। जिस कक्षा-कक्ष में सवाल न हो, जहाँ कोई बच्चा अपनी बात कहते हुए हकलाए या जहाँ गलती करने पर चेहरे पर खौफ छा जाए, वहाँ सब कुछ हो सकता है, सीखना नहीं।

गलतियाँ तो सीखने की राह बनाती हैं, वह तरीके सीखातीं हैं जो गलत रास्ते पर जाने से रोकें। जब कोई बच्चा कोई विचित्र सा उत्तर देता है, तो वह उसकी मौलिक सोच होती है। अगर हम उस समय हँसने या डाँटने के स्थान पर यह समझने बैठें कि उसका दिमाग किस दिशा में गया था, तो हमें एक नया रास्ता दिखाई देता है। पढ़ाने की कला किसी किताब में नहीं लिखी, वह तो रोज़ बच्चों के साथ बातचीत में पैदा होती है।

हम जब किसी उदास बच्चे के पास जाकर केवल इतना पूछते हैं कि आज खाना खाया या नहीं, तो वह एक सवाल किसी भी लंबे पाठ से अधिक असर करता है। बच्चे शब्दों से ज्यादा हमारे हाव-भाव को महसूस करते हैं। वे जानते हैं कि कब हम केवल खानापूर्ति कर रहे हैं और कब हम सचमुच उनके साथ खड़े हैं।

यहीं से शुरू होती है आनंदघर की यात्रा। कक्षा में हमें बच्चों के भीतर के कौतूहल को बचाए रखना होगा। हमें बच्चों के साथ मिलकर किसी तितली के पीछे भागना होगा, कागज़ की नाव बनानी होगी, किसी कहानी के मोड़ पर खुद भी हैरान होना होगा, तब हम उनके बीच एक जीवित इंसान की तरह मौजूद हो पाएँगे।

हम दुनिया के चाहे जिस देश में खड़े हों, बच्चों की आँखों की चमक और उनका मन हर जगह एक जैसा ही होता है। हमारा काम रास्ता दिखाना नहीं, बस उनके साथ चलना है ताकि वे खुद अपना रास्ता खोजने का भरोसा पा सकें। मुझे पूर्ण विश्वास है कि हम सभी आनंदघर की इस यात्रा में सहभागी बन सकते हैं।

इसी साझे सफर में आपका हमसफ़र,

दुर्गेश्वर राय