डॉ. शैलेश शुक्ला
कृत्रिम मेधा यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब भविष्य की कोई दूर की तकनीक नहीं रह गई है। यह हमारे आसपास के जीवन, कामकाज, व्यापार, शोध, संचार और शिक्षा को तेजी से प्रभावित कर रही है। कुछ वर्ष पहले जिस काम को पूरा करने में घंटों लगते थे, आज वही काम कुछ मिनटों में किया जा सकता है। लिखने, अनुवाद करने, जानकारी व्यवस्थित करने, चित्र बनाने, कोड तैयार करने और अनेक प्रकार के विश्लेषण में कृत्रिम मेधा का उपयोग हो रहा है। ऐसे समय में यदि उच्च शिक्षा की व्यवस्था पुराने तरीके से ही चलती रहे तो यह युवाओं को उस दुनिया के लिए तैयार नहीं कर पाएगी, जिसमें उन्हें आगे काम करना है।
भारत में उच्च शिक्षा के सामने यह चुनौती और भी बड़ी है, क्योंकि हमारे विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या बहुत अधिक है। इन विद्यार्थियों के सामने केवल डिग्री हासिल करने की चुनौती नहीं है, बल्कि ऐसी योग्यता हासिल करने की जरूरत भी है जिससे वे बदलती हुई दुनिया में अपने लिए जगह बना सकें। इसलिए अब यह सोचने का समय है कि हम विद्यार्थियों को क्या पढ़ा रहे हैं, कैसे पढ़ा रहे हैं और पढ़ाई के बाद वे उस ज्ञान का उपयोग किस तरह कर पाएंगे।
इसका अर्थ यह नहीं है कि हर विद्यार्थी को कृत्रिम मेधा का विशेषज्ञ बना दिया जाए। हर व्यक्ति का काम मशीन बनाना नहीं है। लेकिन आज के समय में यह समझना जरूरी है कि कृत्रिम मेधा क्या कर सकती है, उसकी सीमाएं क्या हैं, उससे मिलने वाली जानकारी को कैसे जांचना है और उसका जिम्मेदारी के साथ उपयोग कैसे करना है। विश्वविद्यालयों को विद्यार्थियों में यही समझ विकसित करनी होगी।
कृत्रिम मेधा के आने से शिक्षा के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा हुआ है। यदि विद्यार्थी किसी विषय पर निबंध, उत्तर, प्रस्तुति या प्रारंभिक शोध सामग्री कुछ ही मिनटों में तैयार कर सकता है, तो फिर शिक्षक उससे क्या करवाएगा? केवल लिखित असाइनमेंट देकर यह मान लेना कि विद्यार्थी ने स्वयं अध्ययन किया है, अब पर्याप्त नहीं होगा। शिक्षा व्यवस्था को अपने मूल्यांकन के तरीकों में बदलाव करना पड़ेगा।
विद्यार्थियों से ऐसे प्रश्न पूछने होंगे जिनके उत्तर केवल इंटरनेट या कृत्रिम मेधा से प्राप्त न किए जा सकें। उन्हें किसी समस्या का समाधान स्वयं समझाकर बताना होगा, अपने विचारों का कारण देना होगा, किसी स्थानीय समस्या का अध्ययन करना होगा, वास्तविक आंकड़ों का विश्लेषण करना होगा और अपने निष्कर्षों पर चर्चा करनी होगी। कक्षा में बातचीत, बहस, प्रस्तुति, परियोजना, प्रयोग और वास्तविक परिस्थितियों पर आधारित कार्य का महत्व बढ़ाना होगा। इससे यह पता चलेगा कि विद्यार्थी ने केवल उत्तर प्राप्त किया है या वास्तव में विषय को समझा भी है।
यह बदलाव केवल विद्यार्थियों के लिए नहीं है। शिक्षकों की भूमिका भी बदलनी होगी। शिक्षक अब केवल जानकारी देने वाला व्यक्ति नहीं रह सकता, क्योंकि जानकारी तक पहुंच पहले की तुलना में बहुत आसान हो गई है। शिक्षक की भूमिका विद्यार्थियों को सही जानकारी चुनने, गलत जानकारी पहचानने, सवाल पूछने, तर्क करने और ज्ञान का उचित उपयोग करने में मदद करने की होनी चाहिए। शिक्षक को यह भी सिखाना होगा कि कृत्रिम मेधा द्वारा तैयार सामग्री को आंख बंद करके सही नहीं माना जा सकता।
यह बात विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि कृत्रिम मेधा हमेशा सही उत्तर नहीं देती। वह कभी-कभी गलत जानकारी को भी बहुत आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत कर सकती है। इसलिए विद्यार्थी को यह आदत डालनी होगी कि किसी महत्वपूर्ण जानकारी को विश्वसनीय स्रोत से जांचे। यही वैज्ञानिक सोच और डिजिटल साक्षरता का हिस्सा है। यूनेस्को ने भी शिक्षा में जनरेटिव एआई के उपयोग के लिए मानव-केंद्रित दृष्टिकोण, सुरक्षा, समान अवसर, डेटा गोपनीयता और नैतिक उपयोग पर जोर दिया है।
उच्च शिक्षा में पाठ्यक्रमों को भी समय के साथ बदलना होगा। इसका मतलब यह नहीं है कि पुराने विषयों को हटा दिया जाए और हर जगह केवल एआई पढ़ाई जाए। इतिहास, साहित्य, दर्शन, समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान, अर्थशास्त्र और अन्य मानविकी विषयों का महत्व कम नहीं हुआ है। बल्कि कृत्रिम मेधा के दौर में इन विषयों की जरूरत कई मायनों में और बढ़ सकती है, क्योंकि मशीन जानकारी को व्यवस्थित कर सकती है, लेकिन समाज के नैतिक प्रश्नों, मानवीय संवेदनाओं और मूल्यों पर अंतिम निर्णय मनुष्य को ही लेना होगा।
इसलिए हमें ऐसे पाठ्यक्रम चाहिए जिनमें तकनीकी ज्ञान और मानवीय समझ दोनों का संतुलन हो। उदाहरण के लिए साहित्य का विद्यार्थी डिजिटल उपकरणों और एआई आधारित भाषा तकनीकों को समझ सकता है, लेकिन साथ ही उसे भाषा की संवेदना और सांस्कृतिक संदर्भ भी समझना होगा। वाणिज्य का विद्यार्थी डेटा और डिजिटल वित्त को समझे, लेकिन उसके साथ आर्थिक नैतिकता और मानवीय व्यवहार को भी समझे। पत्रकारिता का विद्यार्थी एआई से जानकारी व्यवस्थित करना सीख सकता है, लेकिन तथ्य की जांच, स्रोत की विश्वसनीयता और पत्रकारिता की जिम्मेदारी को उससे भी अधिक गंभीरता से समझे।
भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने भी बहुविषयक शिक्षा, तकनीक के उपयोग, उद्योग और उच्च शिक्षा संस्थानों के बीच सहयोग तथा कृत्रिम मेधा, मशीन लर्निंग और बिग डेटा जैसे क्षेत्रों में शिक्षा को बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया है। अब आवश्यकता इस बात की है कि इन विचारों को केवल नीतिगत दस्तावेजों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि कॉलेजों की कक्षाओं और प्रयोगशालाओं तक पहुंचाया जाए।
विश्वविद्यालयों को उद्योग और रोजगार की बदलती जरूरतों से भी अपना संबंध मजबूत करना होगा। UGC के संस्थागत विकास संबंधी दिशानिर्देशों में भी एआई, मशीन लर्निंग, डेटा एनालिटिक्स, साइबर सुरक्षा, क्लाउड कंप्यूटिंग और दूसरी उभरती तकनीकों से जुड़े कौशल को पाठ्यक्रम में शामिल करने की आवश्यकता बताई गई है। साथ ही व्यावहारिक और उद्योग की जरूरत के अनुसार शिक्षा तथा डिजिटल और मिश्रित शिक्षा पर भी जोर दिया गया है।
लेकिन यहां एक सावधानी भी जरूरी है। केवल इसलिए कि कोई तकनीक लोकप्रिय हो गई है, उसे शिक्षा में बिना सोचे-समझे शामिल कर देना उचित नहीं होगा। हर एआई उपकरण उपयोगी नहीं होता और हर तकनीक हर विषय के लिए जरूरी नहीं है। विश्वविद्यालयों को पहले यह तय करना होगा कि किसी तकनीक से विद्यार्थी की सीखने की क्षमता वास्तव में बढ़ रही है या नहीं। शिक्षा का उद्देश्य तकनीक का प्रदर्शन करना नहीं, बल्कि विद्यार्थी को बेहतर तरीके से सीखने में मदद करना है।
डेटा की सुरक्षा भी गंभीर विषय है। विद्यार्थी और शिक्षक जब एआई उपकरणों का उपयोग करते हैं, तो वे कई बार निजी या शैक्षणिक जानकारी उसमें डाल देते हैं। ऐसी जानकारी का उपयोग कैसे होता है, कहां सुरक्षित रहती है और उसका भविष्य में क्या किया जा सकता है, इसे समझना आवश्यक है। यूनेस्को ने शिक्षा में जनरेटिव एआई के संदर्भ में डेटा गोपनीयता और सुरक्षित उपयोग को महत्वपूर्ण विषय माना है। इसलिए विश्वविद्यालयों को विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए स्पष्ट नियम बनाने चाहिए।
हमें एआई को रोकने की कोशिश करने के बजाय उसे समझदारी से इस्तेमाल करना सीखना होगा। यदि विद्यार्थी एआई का इस्तेमाल केवल अपना गृहकार्य करवाने या बिना पढ़े उत्तर तैयार करने के लिए करेगा, तो इससे उसकी सीखने की क्षमता कमजोर हो सकती है। लेकिन यदि वह एआई का उपयोग किसी कठिन विषय को समझने, अलग-अलग दृष्टिकोण देखने, प्रारंभिक विचार प्राप्त करने या अपनी लिखी सामग्री की भाषा सुधारने के लिए करता है और अंतिम निर्णय स्वयं करता है, तो वही तकनीक उसके लिए उपयोगी सहायक बन सकती है।
इसी कारण परीक्षा और मूल्यांकन की पूरी व्यवस्था पर भी फिर से विचार करने की जरूरत है। विश्वविद्यालयों को यह देखना होगा कि परीक्षा विद्यार्थी की याददाश्त को माप रही है या उसकी समझ को। यदि कोई विद्यार्थी पुस्तक में लिखी बात को याद करके परीक्षा में लिख देता है, लेकिन वास्तविक जीवन में उसका उपयोग नहीं कर पाता, तो शिक्षा का उद्देश्य अधूरा रह जाता है। अब मूल्यांकन में समझ, तर्क, रचनात्मकता, समस्या समाधान, संवाद और वास्तविक परिस्थितियों में ज्ञान के उपयोग को अधिक महत्व देना होगा।
यह बदलाव आसान नहीं होगा। इसके लिए शिक्षकों का प्रशिक्षण, बेहतर डिजिटल सुविधाएं, विश्वसनीय इंटरनेट, आधुनिक प्रयोगशालाएं और विश्वविद्यालयों में नई सोच की जरूरत होगी। हर विद्यार्थी के पास समान तकनीकी सुविधा भी नहीं है। इसलिए यह भी सुनिश्चित करना होगा कि एआई के कारण शिक्षा में नया असमानता का अंतर पैदा न हो। जिन विद्यार्थियों के पास महंगे उपकरण और बेहतर डिजिटल साधन हैं, वे बाकी विद्यार्थियों से बहुत आगे न निकल जाएं। शिक्षा में तकनीक का उपयोग समान अवसर बढ़ाने के लिए होना चाहिए, असमानता बढ़ाने के लिए नहीं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें यह तय करना होगा कि शिक्षा के केंद्र में मनुष्य रहेगा या मशीन। कृत्रिम मेधा कितनी भी विकसित क्यों न हो जाए, शिक्षा का उद्देश्य केवल तेज काम करना नहीं है। शिक्षा मनुष्य को विचारशील, जिम्मेदार, संवेदनशील और स्वतंत्र सोच वाला नागरिक बनाने का माध्यम भी है। यदि विद्यार्थी हर सवाल का जवाब मशीन से लेने लगे और खुद सवाल पूछना ही भूल जाए, तो तकनीकी सुविधा शिक्षा की कमजोरी बन जाएगी।
इसलिए उच्च शिक्षा में परिवर्तन का सही रास्ता तकनीक और मनुष्य के बीच संतुलन बनाने का है। हमें ऐसे युवा चाहिए जो कृत्रिम मेधा का इस्तेमाल कर सकें, लेकिन उसके गुलाम न बनें। वे मशीन से सहायता ले सकें, लेकिन अंतिम निर्णय अपने विवेक से करें। वे तेज जानकारी प्राप्त कर सकें, लेकिन उसकी सत्यता की जांच भी कर सकें। वे नई तकनीक सीख सकें, लेकिन अपने मानवीय मूल्यों को न छोड़ें।
कृत्रिम मेधा उच्च शिक्षा के लिए खतरा तभी बनेगी, जब शिक्षा व्यवस्था बदलाव से बचती रहेगी। यदि विश्वविद्यालय समय के साथ अपने पाठ्यक्रम, शिक्षण पद्धति, परीक्षा प्रणाली और शिक्षक प्रशिक्षण में बदलाव करते हैं, तो यही तकनीक शिक्षा को अधिक उपयोगी, व्यक्तिगत और प्रभावी बनाने में मदद कर सकती है। अब सवाल यह नहीं है कि कृत्रिम मेधा शिक्षा में आएगी या नहीं। वह आ चुकी है। असली सवाल यह है कि हमारी उच्च शिक्षा व्यवस्था उसके साथ कितनी समझदारी, सावधानी और दूरदृष्टि के साथ आगे बढ़ती है।
भारत को ऐसी उच्च शिक्षा व्यवस्था की जरूरत है जो केवल डिग्री देने वाली व्यवस्था न हो, बल्कि बदलती दुनिया को समझने और उसमें सम्मान के साथ आगे बढ़ने की क्षमता पैदा करे। कृत्रिम मेधा के युग में यही समय की सबसे बड़ी मांग है।
डॉ. शैलेश शुक्ला