धर्म-अध्यात्म पर्व - त्यौहार

प्यार भरा एक आत्मिक सफ़र रिश्तों की डोर से डिजिटल युग तक 

रक्षाबंधन : पुराणों से डिजिटल तक अटल राखी

डॉघनश्याम बादल

रक्षाबंधन केवल कलाई पर राखी बांधने और मिठाई खिलाने का पर्व नहीं है। यह उस रिश्ते का उत्सव है जिसमें प्रेम के साथ विश्वास, स्नेह के साथ जिम्मेदारी और अधिकार के साथ कर्तव्य भी जुड़ा है। बदलते समय में राखी का धागा भले ही रेशम से डिजिटल युग की चमक तक पहुंच गया हो, लेकिन उसके भीतर छिपी भावना आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। बल्कि आधुनिक जीवन की आपाधापी, अकेलेपन और रिश्तों में बढ़ती औपचारिकता के बीच रक्षाबंधन पहले से अधिक जरूरी हो गया है।

भारतीय पौराणिक और ऐतिहासिक आख्यानों में रक्षा-सूत्र का विशेष महत्व मिलता है। भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी का प्रसंग इसका सबसे लोकप्रिय उदाहरण है। शिशुपाल-वध के समय श्रीकृष्ण की उंगली से रक्त निकलने पर द्रौपदी ने अपने वस्त्र का टुकड़ा बांध दिया। इसके प्रत्युत्तर में श्रीकृष्ण ने द्रौपदी की रक्षा का संकल्प निभाया। यह प्रसंग हमें बताता है कि रक्षा केवल एकतरफा जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रेम और विश्वास से जन्म लेने वाला पारस्परिक संकल्प है।

रक्षाबंधन की परंपरा से जुड़े अन्य आख्यान भी इसी भाव को पुष्ट करते हैं। इंद्राणी द्वारा इंद्र की कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधने का प्रसंग हो अथवा ऐतिहासिक-सांस्कृतिक स्मृतियों में राजपूत रानियों और राजाओं के बीच रक्षा-सूत्र का भाव—हर जगह राखी केवल धागा नहीं, बल्कि संकट के समय साथ खड़े होने का प्रतीक दिखाई देती है।

इसीलिए आज राखी का अर्थ केवल यह नहीं होना चाहिए कि भाई बहन की रक्षा करेगा। आज की बहन शिक्षित, आत्मनिर्भर और सक्षम है। वह भी भाई के सुख-दुःख में उतनी ही मजबूती से साथ खड़ी होती है। इसलिए आधुनिक रक्षाबंधन का संदेश होना चाहिए—‘हम एक-दूसरे की रक्षा करेंगे, एक-दूसरे का सम्मान करेंगे और जीवन की कठिनाइयों में एक-दूसरे का सहारा बनेंगे।’

डिजिटल युग ने रक्षाबंधन मनाने के तौर-तरीके बदल दिए हैं। दूर रहने वाले भाई-बहन वीडियो कॉल पर एक-दूसरे को राखी दिखाते हैं, डिजिटल शुभकामनाएं भेजते हैं और ऑनलाइन उपहार मंगाते हैं। यह सुविधा अच्छी है, लेकिन त्योहार को केवल ‘ऑनलाइन ट्रांजेक्शन’ बना देना उसके भावनात्मक पक्ष को कमजोर कर सकता है। इसलिए जरूरी है कि डिजिटल सुविधा के साथ मानवीय स्पर्श भी बना रहे।

आज भाई को बहन के लिए ऐसा उपहार चुनना चाहिए जो केवल महंगा न हो, बल्कि उपयोगी और भावनात्मक भी हो। मोबाइल, टैबलेट, ई-बुक रीडर, स्मार्टवॉच या अच्छी गुणवत्ता का हेडफोन जैसे डिजिटल उपकरण उपयोगी हो सकते हैं, यदि वे बहन की जरूरत और रुचि के अनुरूप हों लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है किसी ऑनलाइन पाठ्यक्रम की सदस्यता, किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए अध्ययन सामग्री, पसंदीदा पुस्तकें, स्वास्थ्य संबंधी सदस्यता अथवा उसके किसी अधूरे शौक को पूरा करने में सहयोग।

यदि बहन उद्यम शुरू करना चाहती है तो भाई उसे आर्थिक सहयोग दे सकता है। यदि वह कोई नया कौशल सीखना चाहती है तो उसके लिए प्रशिक्षण का खर्च उठाया जा सकता है। यदि वह नौकरी करती है तो उसके कार्यक्षेत्र से जुड़ा उपयोगी उपकरण दिया जा सकता है। इस तरह उपहार केवल वस्तु नहीं रहेगा, बल्कि भाई की ओर से यह संदेश बनेगा—‘मैं तुम्हारे सपनों के साथ हूं।’

बहन की ओर से राखी भी बदलते समय के अनुरूप हो सकती है। आज बाजार में अनेक आकर्षक राखियां उपलब्ध हैं, लेकिन सबसे सुंदर राखी वह है जिसमें भाई के प्रति बहन का भाव दिखाई दे। पर्यावरण के प्रति सजग बहन बीज वाली राखी, मिट्टी, कपड़े, लकड़ी या पुनर्चक्रित सामग्री से बनी राखी चुन सकती है। ऐसी राखी त्योहार के बाद पौधे में बदलकर जीवन का संदेश दे सकती है।

भाई की रुचि के अनुसार राखी में छोटा-सा उपयोगी आकर्षण भी जोड़ा जा सकता है—जैसे साधारण लेकिन सुरुचिपूर्ण ब्रेसलेट शैली की राखी, नाम या अक्षर अंकित राखी, हस्तनिर्मित धागे की राखी अथवा ऐसी राखी जिसे बाद में कलाई-बैंड की तरह इस्तेमाल किया जा सके। यदि भाई तकनीक-प्रेमी है तो बहन राखी के साथ छोटा डिजिटल संदेश या पारिवारिक तस्वीरों का ‘क्यूआर कोड’ भी दे सकती है। इससे परंपरा और तकनीक का सुंदर मेल हो सकता है।

लेकिन यहां सावधानी भी जरूरी है। राखी जितनी महंगी होगी, प्रेम उतना ही बड़ा होगा—यह धारणा गलत है। कई बार बहन द्वारा अपने हाथ से बनाई गई साधारण राखी और साथ में लिखा दो पंक्तियों का संदेश किसी महंगे उपहार से अधिक मूल्यवान हो सकता है। उसी प्रकार भाई द्वारा दिया गया छोटा-सा पौधा, पुस्तक या बहन के नाम एक पत्र भी वर्षों तक स्मृति में रह सकता है।

रक्षाबंधन हमें उपभोक्तावाद से संवेदनशीलता की ओर लौटने का अवसर भी देता है। त्योहार का अर्थ यह नहीं कि हम बाजार में जाकर सबसे महंगी वस्तु खरीदें। त्योहार का अर्थ है—रिश्ते को समय देना। इसलिए भाई-बहन एक-दूसरे के साथ कुछ घंटे बिताएं, पुरानी यादें साझा करें, माता-पिता के साथ बैठें, परिवार की तस्वीरें देखें और भविष्य की योजनाओं पर बात करें। यही रक्षाबंधन की वास्तविक मिठास है।

आज जब सोशल मीडिया पर हजारों ‘हैप्पी रक्षाबंधन’ संदेश कुछ ही सेकंड में भेजे जा सकते हैं, तब एक हाथ से लिखी छोटी-सी चिट्ठी शायद अधिक प्रभावी हो सकती है। जब वीडियो कॉल संभव है, तब भी यदि भाई-बहन आमने-सामने बैठकर बात कर सकें तो उसका कोई विकल्प नहीं। डिजिटल माध्यम दूरी मिटा सकता है, लेकिन रिश्ते की गर्माहट मनुष्य ही दे सकता है।

रक्षाबंधन इसलिए केवल भाई की कलाई पर बंधा धागा नहीं, बल्कि परिवार की स्मृतियों, भारतीय संस्कृति और भावनात्मक जिम्मेदारियों को जोड़ने वाला सूत्र है। पौराणिक आख्यान हमें इसके भाव की जड़ें बताते हैं और आधुनिक तकनीक हमें उसे नए रूप में जीने की सुविधा देती है। जरूरत इस बात की है कि तकनीक साधन बनी रहे, संबंधों का स्थान न ले।

इस रक्षाबंधन पर बहन ऐसी राखी बांधे जो भाई को हर बार देखकर उसके चेहरे पर मुस्कान लाए और भाई ऐसा उपहार दे जो बहन के जीवन को थोड़ा और आसान, सुंदर या सार्थक बनाए। क्योंकि अंततः सबसे बड़ा उपहार वस्तु नहीं, विश्वास है; सबसे सुंदर राखी धागा नहीं, प्रेम है; और सबसे बड़ी रक्षा कलाई की नहीं, रिश्ते की होती है। रक्षाबंधन का नया संकल्प हो—‘राखी की डोर रहे मजबूत,रिश्तों में रहे विश्वास;डिजिटल हो जाए दुनिया,पर दिल रहें हमेशा पास।’