रामस्वरूप रावतसरे
बलूचिस्तान की जिस जमीन के नीचे सोना, तांबा और गैस का विशाल भंडार होने पर भी यहां के आधे लोग गरीबी रेखा के नीचे जीने को मजबूर हैं। पाकिस्तान का बलूचिस्तान प्रांत आज इसी बड़े विरोधाभास से जूझ रहा है। कड़े सैन्य अभियानों के बावजूद यहां असंतोष कम नहीं हो रहा, क्योंकि बुनियादी सुविधाओं और हक की पाकिस्तानी सरकार द्वारा अनदेखी बरसों से जारी है।
अफगान डायस्पोरा नेटवर्क में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान की संघीय सरकार बलूचिस्तान को सिर्फ एक सुरक्षा समस्या मानती है, जबकि इसके पीछे की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक वजहों को पूरी तरह से अनदेखा कर रही है। बलूचिस्तान में अस्थिरता की सबसे बड़ी वजह संसाधनों की अमीरी और स्थानीय लोगों की गरीबी के बीच का भारी अंतर है। स्थानीय लोगों में इसलिए आक्रोश है क्योंकि उनकी जमीन से होने वाली कमाई की मलाई पाकिस्तान और चीन खा रहा है, जबकि उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज किया जा रहा है। जब बलोच जनता अधिकारों की मांग करती है, तो सरकार सामाजिक-आर्थिक समाधान निकालने के बजाय इसे सिर्फ एक सुरक्षा संकट मानकर सैन्य बल से उन्हें दबाने की कोशिश करती है, जिससे बलूचिस्तान में असंतोष और हिंसा लगातार बढ़ती जा रही है।
बलूचिस्तान के चागाई जिले में रेको डिक और सैंदक जैसी दुनिया की सबसे बड़ी खदानें मौजूद हैं। इन खदानों से मिलने वाला सोना और तांबा पाकिस्तान के लिए विदेशी मुद्रा कमाने का बड़ा जरिया है। बलूचिस्तान में अरबों टन कोयले के समृद्ध भंडार बताए जा रहे हैं। इस कोयले का इस्तेमाल पाकिस्तान के सीमेंट कारखानों, ईंट-भट्ठों और थर्मल पावर प्लांटों में बड़े पैमाने पर होता है।
रिर्पोट के अनुसार पाकिस्तान के कुल खनिज उत्पादन का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अकेले बलूचिस्तान से आता है। साथ ही विशाल लोह अयस्क के भंडार पाकिस्तान के स्टील उद्योग की नींव हैं। खनिजों के अलावा बलूचिस्तान का गहरे पानी वाला ग्वादर पोर्ट पाकिस्तान की सबसे बड़ी आर्थिक संपत्ति है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के जरिए चीन और मध्य एशिया से व्यापार इसी तट पर टिका है।
जानकारों के अनुसार बलूचिस्तान की सबसे बड़ी विरोधाभासी स्थिति यह है कि यह तांबा, सोना और प्राकृतिक गैस जैसे अमूल्य संसाधनों से भरा हुआ है, फिर भी यह पाकिस्तान का सबसे गरीब प्रांत है। यहां की लगभग 47 प्रतिशत से अधिक आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने को मजबूर है। पूरे देश को ऊर्जा देने वाले इस क्षेत्र के अपने निवासियों के पास पीने का साफ पानी, बिजली और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं।
अफगान डायस्पोरा नेटवर्क की रिपोर्ट में पाकिस्तान की ’’सुरक्षा-केंद्रित’’ नीति की आलोचना की गई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि पाकिस्तानी सरकार बलोचिस्तान के संकट को केवल आतंकवाद और सुरक्षा का मुद्दा मानती है, जबकि इसके पीछे की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक वजहों जैसे नागरिक अधिकार, विकास और संसाधनों के निष्पक्ष बंटवारे को पूरी तरह अनदेखा कर देती है।
बलूचिस्तान में स्थित ’’ग्वादर पोर्ट’’ और ’’सैंदक कॉपर-गोल्ड प्रोजेक्ट’’ जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स से होने वाला आर्थिक मुनाफा स्थानीय बलोच लोगों को नहीं मिल रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, इन संसाधनों और विकास परियोजनाओं का लाभ मुख्य रूप से चीन तथा पाकिस्तान के पंजाब और सिंध प्रांत के हितधारकों को मिल रहा है। बलूचिस्तान में ग्वादर बंदरगाह और सैंदक तांबा और सोना की खदान को चीन चलाता है। इनमें काम करने वाले भी बलूचिस्तान के नहीं है। इस प्रांत की अवाम रोजगार से भी महरूम है।
पाकिस्तान द्वारा समय समय पर चलाये जा रहे सैन्य अभियानों को लेकर जानकारों का कहना है कि सैन्य अभियान सिर्फ अल्पकालिक सफलता दे सकते हैं या उग्रवादियों को मार सकते हैं, लेकिन जब तक गरीबी, शिक्षा, रोजगार , खराब गवर्नेंस, अधिकारों के हनन और संसाधनों की लूट जैसे मूल मुद्दों का समाधान नहीं किया जाता, तब तक सैन्य बल के दम पर बलूच प्रांत में स्थायी शांति स्थापित नहीं की जा सकती।
बलूचिस्तान में उग्रवाद और अलगाववाद के पीछे मुख्य वजह बुनियादी सुविधाओं का अभाव, मानवाधिकारों की अनदेखी और अपने ही संसाधनों से बेदखल किए जाने के चलते बलूचिस्तान के युवाओं में भारी आक्रोश है। रोजगार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व न मिलने की वजह से कई युवा हथियार उठा लेते हैं और विदेशी व बाहरी लोगों की मौजूदगी के खिलाफ विद्रोह करने लगते हैं। यही यहां हो रहा है।
हाल ही में ’’बलोच रिपब्लिकन गार्ड्स’’ (बीआरजी) ने नासिराबाद में ओच पावर प्लांट से पंजाब जाने वाले दो 220 केवी बिजली टावरों को विस्फोट से उड़ा दिया था। संगठन के प्रवक्ता दूस्तीन बलूच ने इस हमले की जिम्मेदारी लेते हुए कहा कि जब तक बलूचिस्तान को स्वतंत्रता नहीं मिलती, तब तक सरकारी बुनियादी ढांचे पर ऐसे हमले जारी रहेंगे। यह घटना दर्शाती है कि सुरक्षा बलों के कड़े रुख के बावजूद प्रांत में उग्रवाद थम नहीं रहा है।
दरअसल, बलूचिस्तान के चागाई जिले में स्थित सैंदक कॉपर-गोल्ड प्रोजेक्ट सबसे बड़ा उदाहरण है। चीनी कंपनी एमसीसी इसे पाकिस्तान की सरकारी कंपनी के साथ मिलकर चलाती है। परियोजना की लीज 2022 में 15 साल के लिए बढ़ाई गई थी। यानी जमीन और खनिज बलूचिस्तान में हैं, लेकिन खनन और उत्पादन की कमान एक चीनी कंपनी के हाथ में है। परियोजना का लगभग पूरा उत्पादन चीन को निर्यात होता है।
सैंदक को लेकर अलग-अलग अध्ययनों में राजस्व हिस्सेदारी के आंकड़े अलग बताए गए हैं। एक अध्ययन में चीन की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत , पाकिस्तान की संघीय सरकार की 18 प्रतिशत और बलूचिस्तान की सिर्फ 2 प्रतिशत रॉयल्टी बताई गई है। इसी असमान हिस्सेदारी को बलूच राष्ट्रवादी लंबे समय से संसाधनों के शोषण का उदाहरण बताते हैं। चीन के लिए बलूचिस्तान का सबसे बड़ा आकर्षण सिर्फ सोना-तांबा नहीं है। ग्वादर पोर्ट सीपीईसी का अहम हिस्सा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान को बलूचिस्तान को सिर्फ सुरक्षा के नजरिए से देखने के बजाय एक संवेदनशील ’’राजनीतिक और मानवीय मुद्दा’’ मानना होगा। प्रांत में सुधार और स्थायी शांति तभी संभव है, जब सरकार दमनकारी नीतियां छोड़कर प्रांतीय स्वायत्तता, स्थानीय लोगों को रोजगार, निष्पक्ष संसाधन बंटवारे और वास्तविक राजनीतिक संवाद को प्राथमिकता दे।