राजनीति

संवाद, जवाबदेही और लोकतंत्र की परीक्षा

कुमार कृष्णन
भारतीय लोकतंत्र में कुछ घटनाएँ अपने तात्कालिक राजनीतिक संदर्भ से आगे बढ़कर समय की दिशा का संकेत बन जाती हैं। वे केवल विरोध-प्रदर्शन नहीं रहतीं, बल्कि समाज की बदलती चेतना का सार्वजनिक उद्घोष बन जाती हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों और युवाओं का हालिया आंदोलन भी ऐसी ही एक घटना है। पहली दृष्टि में यह आंदोलन प्रश्नपत्र लीक, प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता और भर्ती प्रक्रियाओं की पारदर्शिता से जुड़ा दिखाई देता है किंतु इसकी प्रतिध्वनि इससे कहीं व्यापक है। यह उस पीढ़ी की बेचैनी का प्रकटीकरण है, जो सूचना-प्रौद्योगिकी के युग में पली-बढ़ी है, वैश्विक लोकतांत्रिक मूल्यों से परिचित है और जो सत्ता से केवल आश्वासन नहीं बल्कि जवाबदेही की अपेक्षा करती है।
पिछले एक दशक में प्रश्नपत्र लीक की घटनाएँ अपवाद नहीं रहीं। विभिन्न सार्वजनिक रिपोर्टों और राजनीतिक दावों के अनुसार वर्ष 2014 से 2026 के बीच देश में 152 से अधिक पेपर लीक के मामले सामने आए जिनसे लगभग साढ़े सात करोड़ अभ्यर्थी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित हुए। केंद्रीय स्तर की परीक्षाओं से लेकर अनेक राज्यों की भर्ती परीक्षाएँ विवादों में घिरीं। उत्तर प्रदेश, बिहार ,राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में बार-बार सामने आए मामलों ने यह प्रश्न खड़ा किया कि क्या हमारी परीक्षा प्रणाली संगठित अपराध, भ्रष्ट नेटवर्क और प्रशासनिक विफलताओं के सामने लगातार कमजोर होती जा रही है? वर्ष 2026 में नीट-यूजी परीक्षा का रद्द होना इस संकट का सबसे चर्चित प्रतीक बन गया।
यह संकट केवल परीक्षा रद्द होने का नहीं है। प्रत्येक प्रश्नपत्र लीक के साथ लाखों युवाओं का समय, परिश्रम, आर्थिक संसाधन और सबसे बढ़कर व्यवस्था पर उनका विश्वास भी दांव पर लग जाता है। भारतीय समाज में प्रतियोगी परीक्षा केवल नौकरी प्राप्त करने का माध्यम नहीं होती; वह सामाजिक गतिशीलता, समान अवसर और संवैधानिक न्याय का प्रतीक भी होती है। जब उसी प्रक्रिया की निष्पक्षता संदेह के घेरे में आ जाए, तब संकट प्रशासनिक सीमाओं से निकलकर लोकतांत्रिक विश्वसनीयता का प्रश्न बन जाता है।
इसी पृष्ठभूमि में जंतर-मंतर का आंदोलन महत्वपूर्ण हो उठता है। इसे केवल किसी एक मंत्री के इस्तीफे या किसी एक परीक्षा के विरोध तक सीमित कर देना उसके वास्तविक अर्थ को संकुचित करना होगा। यह शिक्षा व्यवस्था, भर्ती प्रक्रियाओं, संस्थागत पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही को लेकर वर्षों से जमा हो रहे असंतोष का सार्वजनिक विस्फोट था। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसका नेतृत्व पारंपरिक राजनीतिक दलों के बजाय स्वयं युवाओं ने किया। आंदोलन की भाषा, उसके प्रतीक, उसके नारे और उसका विस्तार डिजिटल माध्यमों से हुआ। सामाजिक मीडिया, स्वतंत्र डिजिटल मंच, लघु वीडियो और प्रत्यक्ष प्रसारण इस आंदोलन के नए औजार बने। यह वह पीढ़ी है जो सूचना की उपभोक्ता भर नहीं, बल्कि उसकी निर्माता और प्रसारक भी है।
इस आंदोलन का सबसे मार्मिक दृश्य तब सामने आया जब पुलिस कार्रवाई के बीच अनेक छात्र राष्ट्रगान गाने लगे। इस दृश्य को केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया मानना पर्याप्त नहीं होगा। उसमें एक गहरा लोकतांत्रिक संदेश निहित था कि सरकार और राष्ट्र समानार्थी नहीं हैं। सत्ता से असहमति राष्ट्र से असहमति नहीं होती। भारतीय संविधान नागरिकों को केवल मतदान का अधिकार नहीं देता, बल्कि शांतिपूर्ण प्रतिरोध और असहमति व्यक्त करने का अधिकार भी प्रदान करता है। लोकतंत्र की नैतिक शक्ति इसी अधिकार की रक्षा में निहित है।
भारतीय राजनीति लंबे समय तक इस धारणा पर चलती रही कि आंदोलनों का नेतृत्व राजनीतिक दल करेंगे और जनता उनका अनुसरण करेगी। जंतर-मंतर ने इस स्थापित समझ को चुनौती दी है। आज का युवा किसी दल की शाखा के रूप में नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र नागरिक के रूप में अपनी बात रखना चाहता है। वह नारों से अधिक तर्क, दावों से अधिक प्रमाण और भाषणों से अधिक संवाद की अपेक्षा करता है। उसकी राजनीतिक चेतना इंटरनेट, वैश्विक विमर्श और तकनीकी दक्षता से निर्मित हुई है। इसलिए उसे केवल भावनात्मक अपीलों से लंबे समय तक प्रभावित नहीं किया जा सकता।
इसी कारण जंतर-मंतर का आंदोलन केवल दिल्ली की घटना नहीं है। यह उस बदलते भारत का संकेत है, जहाँ नई पीढ़ी लोकतंत्र को केवल चुनावों तक सीमित नहीं मानती, बल्कि उसे निरंतर जवाबदेही, पारदर्शिता और संस्थागत विश्वसनीयता की प्रक्रिया के रूप में देखती है। यही नई लोकतांत्रिक चेतना आने वाले समय में भारतीय राजनीति और शासन—दोनों की सबसे बड़ी कसौटी बनने जा रही है।
लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट तब पैदा होता है, जब नागरिकों को यह महसूस होने लगे कि उनकी बात सुनने के लिए संस्थागत संवाद पर्याप्त नहीं है और सड़क ही अंतिम विकल्प बचा है। जंतर-मंतर का आंदोलन इसी गहरे असंतोष की अभिव्यक्ति है। इसे केवल एक परीक्षा, एक प्रश्नपत्र या एक मंत्री के इर्द-गिर्द सीमित कर देना उस व्यापक संकट की अनदेखी होगी, जो वर्षों से शिक्षा व्यवस्था, भर्ती प्रक्रियाओं और सार्वजनिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को लेकर आकार ले रहा है।
युवाओं की नाराज़गी का कारण केवल बेरोज़गारी नहीं है। वे अवसरों की निष्पक्षता चाहते हैं। उनका प्रश्न यह है कि यदि प्रतियोगिता समान नहीं होगी, तो परिश्रम का मूल्य क्या रह जाएगा? वर्षों की तैयारी, आर्थिक कठिनाइयाँ, पारिवारिक उम्मीदें और मानसिक दबाव—इन सबका कोई अर्थ नहीं रह जाता, यदि अंतिम परिणाम प्रश्नपत्र लीक, परीक्षा रद्द होने या भ्रष्ट तंत्र की भेंट चढ़ जाए। यही कारण है कि आज का युवा केवल नौकरी नहीं मांग रहा, बल्कि न्यायपूर्ण प्रक्रिया की मांग कर रहा है। लोकतंत्र में यह मांग किसी विशेष वर्ग की नहीं, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त समान अवसर के अधिकार की मांग है।
यहीं यह प्रश्न भी उठता है कि क्या भारत की शिक्षा व्यवस्था का संकट केवल परीक्षा प्रणाली तक सीमित है? वरिष्ठ चिंतक प्रेम सिंह का मानना है कि ऐसा नहीं है। उनके अनुसार पिछले तीन दशकों में शिक्षा के निजीकरण, व्यावसायीकरण और बाजारीकरण ने शिक्षा के चरित्र को गहराई से बदल दिया है। शिक्षा धीरे-धीरे सामाजिक अधिकार से अधिक आर्थिक वस्तु में परिवर्तित होती गई। यदि राष्ट्रीय विमर्श केवल प्रश्नपत्र लीक या परीक्षा सुधार तक सीमित रह जाएगा, तो शिक्षा व्यवस्था के उन संरचनात्मक संकटों पर विचार अधूरा रह जाएगा, जिन्होंने असमानता और असुरक्षा दोनों को बढ़ाया है।
इसी संदर्भ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का हालिया वक्तव्य भी विचारणीय है। परिवार और मातृत्व के संदर्भ में उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी प्रश्न पूछती है और उसके साथ संवाद आवश्यक है। उन्होंने माता-पिता से आग्रह किया कि वे बच्चों को समय दें, उनकी जिज्ञासाओं का धैर्यपूर्वक समाधान करें और अपने आचरण से विश्वास अर्जित करें। यह कथन प्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक नहीं था, किंतु उसका लोकतांत्रिक अर्थ कहीं व्यापक है। यदि परिवार में संवाद आवश्यक है, तो शासन और नागरिक के बीच संवाद उससे भी अधिक आवश्यक है।
यह स्पष्ट रहना चाहिए कि डॉ. भागवत ने न तो जंतर-मंतर आंदोलन का समर्थन किया और न ही शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर कोई टिप्पणी की किंतु जिस समय देश का युवा उत्तरदायित्व, पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग कर रहा हो, उस समय संवाद पर उनका बल स्वाभाविक रूप से लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा बन जाता है। लोकतंत्र में संवाद कमजोरी नहीं, बल्कि शासन के आत्मविश्वास का प्रमाण होता है। प्रश्नों से बचने वाली व्यवस्था अंततः अपने ही नागरिकों का विश्वास खो देती है।
प्रेम सिंह का एक और सुझाव लोकतांत्रिक दृष्टि से गंभीर विचार की अपेक्षा करता है। उनका आग्रह है कि विपक्षी दल अभी से सार्वजनिक रूप से यह संकल्प लें कि यदि वे सत्ता में आएँगे तो जंतर-मंतर, रामलीला मैदान और राजघाट जैसे सार्वजनिक स्थलों को लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के लिए खुला रखेंगे; शांतिपूर्ण रैलियों और विचार-गोष्ठियों पर अनावश्यक प्रतिबंध नहीं लगाएंगे; विश्वविद्यालय परिसरों की स्वायत्तता का सम्मान करेंगे और नागरिक स्वतंत्रताओं को प्रशासनिक नियंत्रण का विषय नहीं बनाएंगे। यह किसी दल-विशेष का राजनीतिक एजेंडा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति की परीक्षा है।
दरअसल, लोकतंत्र की सबसे कठिन परीक्षा विपक्ष में नहीं, सत्ता में होती है। विरोध में रहते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन करना अपेक्षाकृत सरल है, लेकिन शासन में आने के बाद उसी अधिकार की रक्षा करना राजनीतिक परिपक्वता की वास्तविक कसौटी बन जाता है। इसलिए लोकतंत्र का भविष्य केवल वर्तमान सरकार से नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक वर्ग की लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता से तय होगा।
आज का युवा आदेशों से अधिक तर्क पर विश्वास करता है। वह सूचना की सत्यता परखता है, दस्तावेज़ पढ़ता है, डिजिटल माध्यमों से तथ्य जुटाता है और अपनी बात राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाने की क्षमता रखता है। इसलिए आज कोई भी जनांदोलन केवल सड़कों पर नहीं चलता; वह समानांतर रूप से डिजिटल मंचों पर भी आकार लेता है। सूचना पर नियंत्रण का पारंपरिक मॉडल तेजी से अप्रासंगिक होता जा रहा है। ऐसे समय में लोकतंत्र की स्थिरता का आधार दमन नहीं, बल्कि विश्वास, पारदर्शिता और निरंतर संवाद ही हो सकता है।
आज भारत एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ तकनीकी परिवर्तन, युवा आकांक्षाएँ और लोकतांत्रिक अपेक्षाएँ शासन की पारंपरिक शैली को चुनौती दे रही हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल संचार और सामाजिक माध्यमों ने नागरिकों को पहले की तुलना में अधिक जागरूक, अधिक संगठित और अधिक मुखर बनाया है। अब सूचना पर नियंत्रण कठिन है और सार्वजनिक विमर्श बहुकेंद्रीय हो चुका है। ऐसी स्थिति में किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की सबसे बड़ी शक्ति उसका बहुमत नहीं, बल्कि नागरिकों का विश्वास है। यह विश्वास केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि निष्पक्ष संस्थाओं, पारदर्शी प्रक्रियाओं और उत्तरदायी शासन से अर्जित होता है।
यहीं महात्मा गांधी का लोकतांत्रिक दर्शन असाधारण रूप से प्रासंगिक हो उठता है। गांधी ने सत्ता को कभी अंतिम सत्य नहीं माना। उनके लिए राज्य की नैतिक शक्ति जनता के विश्वास से उत्पन्न होती थी। उनका विश्वास था कि असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी नैतिक ऊर्जा है। सत्याग्रह का उद्देश्य सत्ता को पराजित करना नहीं, बल्कि उसके विवेक को जागृत करना है। जब नागरिक शांतिपूर्ण ढंग से अपने अधिकारों की रक्षा के लिए खड़े होते हैं, तब वे केवल अपने हितों की नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा की भी रक्षा करते हैं।
जंतर-मंतर के आंदोलन को भी इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। बड़ी संख्या में ऐसे युवा वहाँ उपस्थित थे जिनके हाथों में पत्थर नहीं, बल्कि संविधान की भाषा थी; जिनकी आवाज़ में हिंसा नहीं, बल्कि पारदर्शिता, जवाबदेही और संस्थागत सुधार की माँग थी। पुलिस कार्रवाई के बीच राष्ट्रगान गाना इस बात का प्रतीक था कि राष्ट्र और सरकार एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं। सरकार से असहमति राष्ट्र से असहमति नहीं होती। लोकतंत्र की यही परिपक्व समझ भारतीय संविधान की मूल भावना है।
गांधी ने हिंद स्वराज में जिस नैतिक राज्य की कल्पना की थी, उसकी बुनियाद विश्वास पर टिकी थी। यदि सार्वजनिक संस्थाएँ जनता का भरोसा खोने लगें, तो केवल प्रशासनिक कठोरता उन्हें जीवित नहीं रख सकती। परीक्षा संस्थाएँ हों, विश्वविद्यालय हों, न्यायपालिका हो या प्रशासन—इनकी विश्वसनीयता ही लोकतांत्रिक गणराज्य की वास्तविक नींव है। इसलिए परीक्षा सुधार, भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता, संस्थागत स्वायत्तता और प्रभावी जवाबदेही केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि लोकतंत्र को मजबूत करने की अनिवार्य शर्तें हैं।
दरअसल, जंतर-मंतर का संदेश केवल यह नहीं है कि प्रश्नपत्र लीक रुकने चाहिए। उसका बड़ा संदेश यह है कि लोकतंत्र में संस्थाओं की विश्वसनीयता सर्वोच्च सार्वजनिक संपत्ति होती है। एक बार यदि नागरिकों का विश्वास टूटने लगे, तो उसे पुनः स्थापित करने में वर्षों लग जाते हैं। इसलिए परीक्षा प्रणाली में तकनीकी सुधार, स्वतंत्र निगरानी तंत्र, समयबद्ध जांच, दोषियों को कठोर दंड और भर्ती एजेंसियों की संस्थागत स्वायत्तता अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता हैं।
भारत विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देशों में है। यह हमारी सबसे बड़ी जनशक्ति भी है और सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी। यदि इस पीढ़ी को निष्पक्ष अवसर, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और विश्वसनीय संस्थाएँ मिलती हैं, तो यही जनसांख्यिकीय लाभांश भारत को नई ऊँचाइयों तक ले जा सकता है। लेकिन यदि उसके प्रश्नों और आकांक्षाओं की उपेक्षा होती रही, तो वही ऊर्जा असंतोष का कारण भी बन सकती है। इसलिए आज सबसे बड़ी आवश्यकता किसी एक आंदोलन को जीतने या हारने की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं में विश्वास बहाल करने की है।
जंतर-मंतर के आंदोलन, डॉ. मोहन भागवत के संवाद संबंधी आग्रह और चिंतक प्रेम सिंह की लोकतांत्रिक चिंता—तीनों अलग-अलग पृष्ठभूमियों से आते हैं, लेकिन एक साझा निष्कर्ष की ओर संकेत करते हैं। वह निष्कर्ष यह है कि लोकतंत्र की स्थिरता का आधार केवल सत्ता नहीं, बल्कि संवाद, जवाबदेही और संस्थागत विश्वसनीयता है। प्रश्न पूछने वाले नागरिक लोकतंत्र के विरोधी नहीं, उसके सबसे बड़े संरक्षक होते हैं। परिपक्व लोकतंत्र वही है जो असहमति को संकट नहीं, सुधार का अवसर मानता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार संवाद का साहस दिखाए, विपक्ष लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के प्रति सुसंगत प्रतिबद्धता प्रदर्शित करे, न्यायपालिका संस्थागत निष्पक्षता के विश्वास को और मजबूत बनाए, विश्वविद्यालय वैचारिक स्वतंत्रता के केंद्र बनें तथा मीडिया जनसरोकारों को पर्याप्त स्थान दे। लोकतंत्र तभी जीवंत रहता है, जब उसके सभी स्तंभ अपने-अपने दायित्व का निर्वाह समान ईमानदारी से करें।
अंततः लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा चुनाव जीतने में नहीं, बल्कि नागरिकों का विश्वास जीतने में होती है। चुनाव सरकारें बनाते हैं, लेकिन विश्वास राष्ट्र का भविष्य बनाता है। जंतर-मंतर से उठी आवाज़ का सार भी यही है कि भारत का युवा केवल रोजगार नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण अवसर चाहता है; केवल विकास नहीं, बल्कि विश्वसनीय संस्थाएँ चाहता है; और केवल मजबूत सरकार नहीं, बल्कि मजबूत लोकतंत्र चाहता है। यदि इस संदेश को समय रहते समझ लिया गया, तो यह आंदोलन केवल एक विरोध-प्रदर्शन नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र के आत्ममंथन और संस्थागत पुनर्निर्माण का महत्त्वपूर्ण पड़ाव सिद्ध हो सकता है।