लेखक परिचय

डब्बू मिश्रा

डब्बू मिश्रा

इस्पात की धडकन का संपादक, सरकुलर मार्केट भिलाई का अध्यक्ष और अंर्तराष्ट्रीय ब्राह्मण का छत्तीसगढ राज्य प्रदेश सचिव । जनाधार बढाने का अटूट प्रयास ताकि कोई तो अपनो सा मिल जाये ताकि एक संघर्ष शुरू किया जा सके ।

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प्रवक्ता डॉट पर सूरज तिवारी ‘मलय’ का लेख पढने को मिला । लेख से बढिया तस्वीर लगी इसलिये फटाफट कापी पेस्ट करके यहां चिपका दिया । मैं पिछले तीन चार दिनों से भ्रष्टाचार पर लिखे लेख पढता रहा, उनसे संबंधित खबरें छानता रहा लेकिन हर बार इसके इतिहास में जाने में नाकाम होता रहा । फिर ऐसे ही विचार आया कि दिमाग में घुमडते सवालों की बारिश कर ही दूँ तो लिजिये पेशे खिदमत है अनुसलझे प्रश्नों की अजीब भ्रष्टाचारी सवालों में उलझता आमजन –

1 – 15 अगस्त 1947 को जवाहर लाल नेहरू को प्रधानमंत्री किसने बनाया, जबकि आम चुनाव 1952 में हुए थे ?

2 – आजादी के बाद क्रांतीकारीयों को नजरअंदाज करते हुए केवल कांग्रेस को ही देश का सच्चा हितैषी क्यों बताया गया , जबकि भारतीय क्रांतीकारी हरकतों से त्रस्त होकर और भारत की बढती आबादी को नियंत्रित ना कर पाने की भावी संभावनाएं भी एक कारण थी ब्रटिश शासन के भारत छोडने के लिये ?

3 – संघ को भगवा आतंकवादी कहने वाली कांग्रेस अपने को भ्रष्टाचार की अम्मा कहने से क्यों संकोच करती है ?

4 – अभी तक हुए देश के सभी बडे भ्रष्टाचार कांग्रेस के शासन काल में ही हुए हैं चाहे वह बोफोर्स हो या अब तक का कॉमनवेल्थ फिर भी उसे ही सत्ता का मोह क्यों ?

5 – प्रादेशिक पार्टीयों में भी कांग्रेस का साथ हमेशा भ्रष्ट दल ही क्यों देते हैं ?

अब सवालों को छोड कर काम पर लगने वाली बातों पर आ जाया जाए । सारा देश आज महंगाई और भ्रष्टाचार से हलाकान है, गृहणीयों की बातें छोडें और अपनी सोचें तो भी बहुत बुरा हाल दिखाई देता है । कहीं भी जाओ भ्रष्टाचार हर रूप में दिखलाई पड रहा है, चाहे आप सडक पर चलें या पुल पर, बच्चों के खेल मैदान में जाएं या फिर उद्यानों में, सरकारी शौचालयों का हाल देखें या फिर सरकारी अस्पतालों का .. हर जगह भ्रष्टाचार का बोलबाला है । सडकें गढ्ढों में तब्दील हो जाती हैं लेकिन किसी भी सरकारी दफ्तर पर कोई फर्क नही पडता क्योंकि हिस्सा सब जगह पहुंच चुका होता है । नालियां अधुरी बना कर रोक दी जाती हैं क्योंकि ठेकेदार को पूरा पैसा और अफसरों को पूरा कमीशन मिल चुका होता है । आप कहीं भी जाकर किसी भी जगह देखकर भ्रष्टाचार को पहचान सकते हैं । इन फैलते अमर बेल की लताओं से निपटने के लिये सारे सरकारी दावे खोख ले हो जाते हैं बडी मछलियां निकल जाती है और छोटी को पकड कर वाहवाही लुटी जाती है ।
आज जनता को चाहिये कि वह अपने अधिकारों को पहचाने यह कहना लिखना आसान है परन्तु अमल में लाना नामुकिन .. जो जनता आज तक अपने वोटो की किमत नही समझ सकी है वह अपने बाकि अधिकारों को क्या जानेगी । आने वाले समय में फिर से कांग्रेस अपना परचम लहराएगी क्योंकि लालू, मुलायम औऱ पासवान की तिकडी उसके काम आएगी

जय देश , जय भारत ?

3 Responses to “एक सच्चे राजनेता का सवाल है बाबा”

  1. dabbu mishra

    ५.- देश के पहले लोकसभा चुनाव में दबावपूर्क एक मुस्लिम नेता की चाह में मौलाना को जीताना ।
    ६.- संघ जैसे राष्ट्रवादी संगठन को आतंकवाद कहना और काश्मीरी अलगाववादियों के साथ चाय पीना ।
    ७.- सोनिया की चाटुकारीता में अपने भगवान को भूलना ।

    जय कांग्रेस

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  2. sunil patel

    सही बात कही है.
    हमारे देश में विपक्ष मजबूत नहीं रहा है, बंटा हुआ है या कहे की professional नहीं है. सबसे बड़ा विपक्ष – भाजपा को राजनितिक मेनेजमेंट का डिप्लोमा लेना होगा. १२ साल पहले लहसुन और प्याज की कीमतों के कारन सरकार गवाई थी, किन्तु आज जब महंगाई sursa की तरह मुह फाड़ कर खड़ी हुई है तो भी मौका का फायदा नहीं उठा पा रहे है.
    कांग्रेस जनता को मुद्दे से भटकाने में माहिर है – किन्तु कब तक?

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  3. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    वेशक इस देश की अधिकांस समस्याएं कांग्रेस ने ही पैदा कीं हैं किसका विकाश हुआ ?कितना हुआ ?ये तो अब भारत की जनता अच्छी तरह जान चुकी है ,अब महत्वपूर्ण ये है की उसने सबसे बड़ी भूलें कौनसी कीं हैं ..?
    एक -कांग्रेस ने जाती-धरम के आधार पर चुनाव जीतने की परम्परा का पुरजोर विरोध नहीं किया .
    दो -कांग्रेस ने मंडल कमीशन का जिन्न तैयार किया तो कमंडल बाले अपने आप निरंकुश होते चले गए
    तीन -कांग्रेसियों ने लोकतंत्रात्मक तौर तरीके से पार्टी न चलाकर एक परिवार की चाटुकारी आधारित प्रणाली से देश और पार्टी दोनों को घसीटा .
    चार -कांग्रेस ने मज़हबी नेताओं को उसी तरह इस्तेमाल किया जैसे की अमरीका ने तालिवानो या अल कायदा को इस्तेमाल किया .

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