खान-पान

पोषण सुरक्षा की बुनियाद है पर्याप्त प्रोटीन

अनाज की उपलब्धता से आगे बढ़कर संतुलित, विविध और किफायती आहार सुनिश्चित करना होगा, तभी बनेगा स्वस्थ और सशक्त भारत

— डॉ. प्रियंका सौरभ

किसी भी राष्ट्र की वास्तविक समृद्धि का आकलन केवल उसकी आर्थिक विकास दर, औद्योगिक उत्पादन या खाद्यान्न भंडार से नहीं किया जा सकता। राष्ट्र की प्रगति का सबसे महत्त्वपूर्ण पैमाना उसके नागरिकों का स्वास्थ्य, पोषण स्तर और कार्यक्षमता है। भारत ने खाद्यान्न उत्पादन तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं, लेकिन अब चुनौती केवल पेट भरने की नहीं, बल्कि शरीर को आवश्यक पोषक तत्त्व उपलब्ध कराने की है। इसी संदर्भ में पर्याप्त प्रोटीन का सेवन भारत की पोषण सुरक्षा का केंद्रीय विषय बनकर उभरा है। पोषण माह जैसे जनजागरूकता अभियानों का महत्त्व भी इसी व्यापक दृष्टिकोण में निहित है, जहाँ संतुलित आहार, विविध खाद्य पदार्थों और बेहतर पोषण व्यवहार पर जोर दिया जाता है।

प्रोटीन शरीर की वृद्धि, विकास और मरम्मत के लिए आवश्यक प्रमुख पोषक तत्त्व है। यह मांसपेशियों, त्वचा, ऊतकों और अनेक जैविक संरचनाओं के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शरीर में एंजाइम, कई हार्मोन और प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़े घटकों के निर्माण में भी प्रोटीन की आवश्यकता होती है। इसलिए इसकी कमी केवल शारीरिक कमजोरी तक सीमित नहीं रहती, बल्कि व्यक्ति के समग्र स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है।

बच्चों के लिए पर्याप्त प्रोटीन विशेष रूप से आवश्यक है, क्योंकि बचपन में शरीर और मस्तिष्क का तीव्र विकास होता है। संतुलित आहार की कमी से बच्चों की वृद्धि प्रभावित हो सकती है और कुपोषण का जोखिम बढ़ सकता है। गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए भी प्रोटीन आवश्यक है, क्योंकि इस अवधि में शरीर की पोषण संबंधी जरूरतें बढ़ जाती हैं। पर्याप्त पोषण माँ के स्वास्थ्य और शिशु के समुचित विकास में सहायक होता है।

प्रोटीन का संबंध केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य से नहीं, बल्कि देश की उत्पादकता से भी है। स्वस्थ नागरिक अधिक प्रभावी ढंग से शिक्षा, रोजगार और आर्थिक गतिविधियों में भाग ले सकते हैं। भारत जैसे युवा आबादी वाले देश में मानव पूँजी का विकास तभी संभव है, जब बच्चों और युवाओं को पर्याप्त पोषण मिले। इस प्रकार प्रोटीन की उपलब्धता सामाजिक कल्याण के साथ-साथ आर्थिक विकास की भी बुनियाद है।

भारत में खाद्य सुरक्षा की चर्चा लंबे समय तक गेहूँ, चावल और अन्य अनाजों की उपलब्धता के इर्द-गिर्द केंद्रित रही है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली ने करोड़ों लोगों तक खाद्यान्न पहुँचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। फिर भी पर्याप्त कैलोरी मिलने का अर्थ यह नहीं है कि शरीर को सभी आवश्यक पोषक तत्त्व भी मिल रहे हैं। घरेलू उपभोग के आँकड़े इस चुनौती की ओर संकेत करते हैं। वर्ष 2023-24 में ग्रामीण भारत के कुल प्रोटीन सेवन में अनाज का योगदान लगभग 46-47 प्रतिशत बताया गया। इससे स्पष्ट होता है कि बड़ी आबादी के भोजन में प्रोटीन का स्रोत सीमित खाद्य विविधता पर निर्भर है।

अनाज भी प्रोटीन प्रदान करते हैं, लेकिन केवल उन्हीं पर निर्भर रहना संतुलित पोषण की दृष्टि से पर्याप्त नहीं है। दालें, दूध, दही, अंडे, सोयाबीन, मेवे और बीज जैसे खाद्य पदार्थ आहार में विविधता लाते हैं तथा अलग-अलग पोषक तत्त्व उपलब्ध कराते हैं। पोषण सुरक्षा के लिए यह समझना आवश्यक है कि भोजन की मात्रा और उसकी गुणवत्ता दोनों महत्त्वपूर्ण हैं। यदि किसी परिवार को पर्याप्त अनाज मिल रहा है, लेकिन वह आर्थिक कारणों से दाल, दूध, फल, सब्जियाँ या अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थ नहीं खरीद पा रहा, तो उसकी पोषण संबंधी जरूरतें अधूरी रह सकती हैं।

प्रोटीन की पर्याप्त खपत के रास्ते में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक महँगाई है। दालों, दूध, अंडों और अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थों की कीमतें कम आय वाले परिवारों के बजट को प्रभावित करती हैं। ऐसे परिवारों को अक्सर भोजन की मात्रा और गुणवत्ता के बीच कठिन चुनाव करना पड़ता है। जब घरेलू आय का बड़ा हिस्सा आवास, शिक्षा, परिवहन और अन्य आवश्यकताओं पर खर्च हो जाता है, तब विविध आहार सुनिश्चित करना चुनौतीपूर्ण बन जाता है। इसलिए पोषण संबंधी समस्या को केवल व्यक्तिगत पसंद या जागरूकता की कमी के रूप में देखना उचित नहीं है। इसका सीधा संबंध आय, खाद्य पदार्थों की उपलब्धता और उनकी कीमतों से भी है।

इस चुनौती का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष महिलाओं और बच्चों का पोषण है। कई परिवारों में महिलाओं की भोजन संबंधी आवश्यकताओं को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं मिलती। गर्भवती महिलाओं, किशोरियों और छोटे बच्चों को विशेष पोषण की आवश्यकता होती है, लेकिन गरीबी, सामाजिक असमानता और जानकारी के अभाव के कारण उनकी जरूरतें अधूरी रह सकती हैं। बच्चों के शुरुआती वर्षों में पोषण की कमी उनके शारीरिक विकास और सीखने की क्षमता पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकती है। इसलिए पोषण नीतियों में संवेदनशील समूहों की आवश्यकताओं को केंद्र में रखना अनिवार्य है।

इसके अतिरिक्त, भोजन से संबंधित सामाजिक धारणाएँ और जागरूकता की कमी भी समस्या को बढ़ाती हैं। कई बार भोजन को केवल पेट भरने या ऊर्जा प्राप्त करने का साधन माना जाता है। संतुलित आहार में प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन, खनिज और रेशे की उचित भूमिका को पर्याप्त महत्त्व नहीं मिलता। दूसरी ओर, प्रोटीन के अच्छे स्रोतों को केवल महँगे खाद्य पदार्थों से जोड़ने की प्रवृत्ति भी प्रचलित है। वास्तव में भुना चना, सत्तू, मूँगफली, विभिन्न दालें और सोयाबीन जैसे अपेक्षाकृत किफायती विकल्प भी प्रोटीन की उपलब्धता बढ़ा सकते हैं।

भारत में प्रोटीन की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए कृषि उत्पादन और पोषण नीति के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है। दालों की उत्पादकता बढ़ाने, उन्नत बीज उपलब्ध कराने, किसानों को उचित मूल्य दिलाने और भंडारण तथा वितरण व्यवस्था मजबूत करने पर विशेष ध्यान देना चाहिए। दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ने से आयात पर निर्भरता कम करने और घरेलू बाजार में आपूर्ति को स्थिर रखने में मदद मिल सकती है। कृषि विविधीकरण को प्रोत्साहित करते हुए किसानों को ऐसी फसलों की ओर भी प्रेरित करना चाहिए, जो मिट्टी की उर्वरता, जल संरक्षण और पोषण सुरक्षा में योगदान दें।

सरकारी पोषण कार्यक्रमों को भी भोजन की गुणवत्ता के दृष्टिकोण से मजबूत बनाना होगा। प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण योजना यानी पीएम-पोषण तथा आँगनवाड़ी सेवाओं के माध्यम से बच्चों तक पौष्टिक भोजन पहुँचाने के प्रयासों को स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। जहाँ उपयुक्त हो, वहाँ दालों, अंडों, दूध और अन्य स्थानीय रूप से उपलब्ध पौष्टिक खाद्य पदार्थों को शामिल करने पर विचार किया जाना चाहिए। राज्यों की खाद्य परंपराओं, धार्मिक-सांस्कृतिक विविधताओं और स्थानीय परिस्थितियों का सम्मान करते हुए भोजन के विकल्प उपलब्ध कराना आवश्यक है।

मिशन सक्षम आँगनवाड़ी एवं पोषण 2.0 जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली माताओं और बच्चों के पोषण पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। केवल भोजन वितरित करना पर्याप्त नहीं है; उसकी गुणवत्ता, नियमितता और लाभार्थियों तक वास्तविक पहुँच की निगरानी भी आवश्यक है। विद्यालयों और आँगनवाड़ी केंद्रों को पोषण शिक्षा के प्रभावी माध्यम के रूप में विकसित किया जा सकता है। बच्चों को स्थानीय पौष्टिक खाद्य पदार्थों की पहचान कराना और परिवारों को संतुलित भोजन तैयार करने के सरल तरीके बताना व्यवहार में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।

भारतीय भोजन परंपरा में प्रोटीन के अनेक किफायती और उपयोगी स्रोत पहले से मौजूद हैं। दाल-चावल, रोटी-दाल, इडली-सांभर, खिचड़ी, दही, चना और मूँगफली जैसे खाद्य पदार्थ संतुलित आहार का हिस्सा बन सकते हैं। अनाज और दलहन का संयोजन आवश्यक अमीनो अम्लों की उपलब्धता बेहतर बनाने में मदद करता है। हालाँकि, हर व्यक्ति की पोषण संबंधी जरूरतें उसकी उम्र, शारीरिक गतिविधि और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार अलग होती हैं। इसलिए किसी एक खाद्य पदार्थ या पूरक को सभी समस्याओं का समाधान मानने के बजाय विविध और संतुलित आहार को प्राथमिकता देनी चाहिए।

जनजागरूकता अभियानों को भी केवल नारों तक सीमित नहीं रखना चाहिए। पोषण माह के दौरान पंचायतों, विद्यालयों, स्वयं सहायता समूहों, स्वास्थ्यकर्मियों और स्थानीय संस्थाओं की भागीदारी से व्यावहारिक जागरूकता बढ़ाई जा सकती है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय पोषण संस्थान के आहार संबंधी दिशा-निर्देशों के अनुरूप लोगों को भोजन की विविधता, उचित मात्रा और स्थानीय विकल्पों के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए। इसके साथ ही खाद्य पदार्थों की कीमतों, पोषण कार्यक्रमों की गुणवत्ता और कमजोर वर्गों तक पहुँच का नियमित आकलन भी होना चाहिए।

भारत की पोषण सुरक्षा का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि देश खाद्यान्न उपलब्धता से आगे बढ़कर पौष्टिक भोजन तक समान पहुँच सुनिश्चित करने में कितना सफल होता है। पर्याप्त प्रोटीन केवल शरीर की आवश्यकता नहीं, बल्कि स्वस्थ बचपन, सशक्त मातृत्व, उत्पादक युवाशक्ति और समावेशी विकास की आधारशिला है। सरकार, कृषि क्षेत्र, शिक्षण संस्थानों, स्वास्थ्य सेवाओं और समाज को मिलकर ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जिसमें पौष्टिक भोजन किसी विशेष वर्ग की सुविधा न होकर प्रत्येक नागरिक का सहज अधिकार बने। जब हर परिवार की थाली में पर्याप्त मात्रा में विविध और किफायती पौष्टिक भोजन पहुँचेगा, तभी कुपोषण से मुक्ति का लक्ष्य मजबूत होगा और भारत वास्तव में स्वस्थ, सक्षम तथा समृद्ध राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ सकेगा।

  डॉ. प्रियंका सौरभ