मिलावटी दूध का जानलेवा कारोबार

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-अरविंद जयतिलक-   milk
देशभर में दूध तथा उसके उत्पादों में मिलावट को लेकर उच्चतम न्यायालय का चिंतित होना और विशेश रूप से उत्तर प्रदेश सरकार को हिदायत देना कि वह मिलावट के खिलाफ कड़े कानून बनाकर इस जहरीले कारोबार में लिप्त लोगों के खिलाफ समुचित कार्रवाई करे, इस बात का प्रमाण है कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा मिलावटी दूध के कारोबार को रोकने और मिलावटखोरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की ठोस पहल नहीं हो रही है। शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार को ताकीद किया है कि वह भारतीय दंड संहिता की धारा 272 में आवश्यक संशोधन कर मिलावटखोरों को उम्रकैद तक की सजा देने का प्रावधान सुनिश्चित करें। न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति विक्रमजीत सेन की पीठ ने राज्यों द्वारा दायर हलफनामे पर भी असंतोष जताया है। कहा है कि वह बेहतर हलफनामा दाखिल करें तथा साथ ही दूध और दुग्ध पदार्थों में मिलावट और कानून के तहत की गयी कार्रवाई का भी ब्यौरा पेश करें। पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार से यह भी जानना चाहा है कि वह कितने मिलावटखोरों खिलाफ कार्रवाई की है। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा न्यायालय के संज्ञान में लाया गया है कि 2012-13 में 1237 और 2013-14 में 185 मामलों में दूध और उसके उत्पादों में मिलावट पायी गयी। इनमें से चार दर्जन से अधिक नमूनों में डिटर्जेंट, स्टार्च, वनस्पति तेल, ह्वाईटनर इत्यादि खतरनाक पदार्थों का मिश्रण पाया गया। पंजाब सरकार ने भी 785 मामलों में से 28 मामलों में मिलावट की बात स्वीकारी है। इसी तरह हरियाणा सरकार ने भी दूध और उसके उत्पादों में डिटर्जेंट और पानी की मिलावट की बात कबूली है। न्यायालय ने इस पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि कानून के दांत तो मिलावटी दूध से गिर गए हैं और राज्य सरकारें इसे रोकने के बजाए पैसा एकत्र करने में ही खुश हैं। राज्य सरकारों द्वारा यह कहे जाने पर कि वे धारा 272 में संषोधन पर विचार कर रही हैं। न्यायालय ने नाखुशी जाहिर की और पूछा कि क्या जब लोग मरने लगेंगे तब कार्रवाई होगी। गौरतलब है कि पिछले दिनों मिलावट के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और दिल्ली की सरकारों को निर्देषित किया कि वह मिलावटखोरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करें और जवाब दाखिल कर बताएं कि इस पर रोकथाम के लिए क्या कर रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्य है कि राज्य सरकारें कड़े कानून बनाने और मिलावटखोरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के बजाए न्यायालय से आंखमिचौली खेल रही हैं। न्यायालय की कड़ी फटकार के बाद भी इस निश्कर्शश पर पहुंचना मुश्किल है कि राज्य सरकारें मिलावट के काले कारोबार को रोकने के दिशा में पर्याप्त कदम उठाएंगी ही। इसलिए कि यह कोई दफा नहीं है जब न्यायालय द्वारा राज्य सरकारों को चेताया गया हो। लेकिन आश्चर्य है कि यह जानते हुए भी कि दूध सेहत के लिए अमृत है और देश का हर परिवार इसे जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल में लाता है और उसमें खतरनाक पदार्थों का मिलावट चरम पर है, के बावजूद भी संजीदगी नहीं दिखाया जा रहा है। यह तथ्य है कि बाजार में उपलब्ध दूध का एक बड़ा हिस्सा मिलावटी है और उसमें खतरनाक रसायनों का इस्तेमाल हो रहा है। इन घातक रसायनों से लोगों का शरीर कई गंभीर बीमारियों का घर बनता जा रहा है। पिछले दिनों केंद्र सरकार ने न्यायालय में दाखिल अपने हलफनामें में स्वीकारा कि देश में 68 फीसद से अधिक दूध खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरणों के मानक के अनुरुप नहीं है। उसने न्यायालय को यह जानकारी उत्तराखंड के स्वामी अच्युतानंद तीर्थ के नेतृत्व में प्रबुद्ध नागरिकों की एक जनहित याचिका के जवाब में दी। गौरतलब है कि याचिका में सिंथेटिक दूध तथा विभिन्न डेयरी उत्पादों की बिक्री पर अंकुश लगाने का अनुरोध किया गया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि सिंथेटिक और मिलावटी दूध और उसके उत्पाद यूरिया, डिटरजेंट, रिफाइंड आयल, कास्टिक सोडा और सफेद पेंट इत्यादि से तैयार हो रहे हैं। खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ने भी माना है कि दूध में घातक रसायन मिलाए जा रहे हैं। पिछले दिनों उसने खुले दुध और पैकेट वाले दूध में आमतौर पर होने वाली मिलावट का पता लगाने के इरादे से सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से दूध के 1791 नमूने एकत्र किए। ये नमूने ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों से लिए गए। सार्वजनिक क्षेत्र की पांच प्रयोगशालाओं में इन नमूनों के विष्लेशण से जानकारी मिली कि इनमें से 68.4 फीसद नमूने मिलावटी हैं और वे निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं हैं। देखना दिलचस्प होगा कि न्यायालय के आदेश के बाद राज्य सरकारें मिलावटी दूध को रोकने और मिलावटखोरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के लिए क्या पहल करती हैं। लेकिन इस बात की उम्मीद कम ही है कि उनकी कार्रवाई से मिलावटखोरों का हौसला पस्त होगा। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर भारत में मिलावटी दूध का गोरखधंधा चरम पर है और यह सरकार के संज्ञान में भी है। जब तब जागरुक नागरिकों द्वारा इसके खिलाफ आवाज भी उठाया जाता है। लेकिन राज्य सरकार मिलावटखोरों के खिलाफ हल्की-फुल्की कार्रवाई कर अपने कर्तव्यों का इतिश्री समझ लेती है। नतीजा यह कि दूध के काले कारोबारियों पर लगाम नहीं लग पा रहा है और लोग जहर पीने को मजबूर हैं। समझना कठिन है कि जब पिछले कई वर्शों से दूध की मांग लगातार बढ़ रही है और उत्पादन में वृद्धि न के बराबर है, फिर दूध की आपूर्ति कहां से पूरी हो रही है? इसका जवाब राज्य सरकारों के पास नहीं है। सीधा मतलब यह हुआ कि दूध के नाम पर जहर बेचा जा रहा है और सरकारें अपनी आंखे बंद की हुई हैं। मिलावटी दूध से न केवल लोगों का स्वास्थ्य बुरी तरह प्रभावित हो रहा है बल्कि इससे उत्पन रोगों के इलाज में भी लोगों को गाढ़ी कमाई लुटानी पड़ रही है। एक आंकड़े के मुताबिक देश में सामान्य संक्रामक बीमारियों से निपटने में प्रति वर्शश 80 हजार करोड़ रुपए खर्च होते हैं। इन बीमारियों के लिए काफी हद तक मिलावटी दूध भी जिम्मेदार है। ऐसा नहीं है कि राज्य सरकारों के पास मिलावट को रोकने के लिए कानून नहीं है। लेकिन यह सच्चाई है कि कानून का ईमानदारी से पालन नहीं हो रहा है। खाद्य पदार्थों में मिलावटखोरी को रोकने और उनकी गुणवत्ता को स्तरीय बनाए रखने के लिए देश में खाद्य संरक्षा और मानक कानून 2006 लागू किया गया है। लोकसभा और राज्यसभा से पारित होने के बाद 23 अगस्त 2006 को राष्ट्रपति ने इस कानून पर अपनी मुहर लगायी और 5 अगस्त 2011 को इसे अमल में लाया गया। इस कानून के मुताबिक घटिया, मिलावटी, नकली माल की बिक्री और भ्रामक विज्ञापन के मामले में संबंधित प्राधिकारी जुर्माना कर सकता है। इस कानून के तहत अप्राकृतिक व खराब गुणवत्ता वाले खाद्य पदार्थों की बिक्री पर 2 लाख रुपए, घटिया खाद्य पदार्थ की बिक्री पर 5 लाख रुपए, गलत ब्रांड खाद्य पदार्थ की बिक्री पर 3 लाख रुपए और भ्रामक विज्ञापन पर 10 लाख रुपए तक का जुर्माने का प्रावधान है। लेकिन सच्चाई है कि तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण गुनाहगारों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो पाती है और उनका हौसला बुलंद होता चला जाता है। आज जरुरत इस बात की है कि कानून का सख्ती से पालन हो और अन्य देशों की तरह खाद्य संरक्षा के मानक तय करने के साथ निगरानी के लिए एजेंसियों का गठन किया जाए। अमेरिका का खाद्य संरक्षा व्यवस्था दुनिया के बेहतरीन तंत्रों में शामिल है। इसे स्थानीय, राज्य एवं केंद्रीय स्तर पर लागू किया गया है। यहां का फूड एवं ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन फूड कोड प्रकाशित करता है। इसमें खाद्य संरक्षा के मानक तय किए गए हैं जिनका उल्लंघन गैर-कानूनी है। इसी तरह ऑस्ट्रेलिया की ऑस्ट्रेलियाई फूड अथॉरिटी उपभोक्ताओं तक शुद्ध खाद्य पदार्थ पहुंचाने के लिए खाद्य कारोबार पर खाद्य संरक्षा मानकों को प्रभावपूर्ण तरीके से लागू करने का काम करती है। जर्मनी में उपभोक्ता अधिकार और खाद्य संरक्षा विभाग इस मामले को देखता है। पूरे जर्मनी में भोज्य पदार्थ बेचने के लिए किसी तरह का प्रतिबंध नहीं है लेकिन वह कानून के मुताबिक तय मानकों के अनुरुप होना चाहिए। लेकिन भारत में स्थिति उलट है। खाद्य संरक्षा और मानक कानून मजाक बनकर रह गया है। उचित होगा कि राज्य सरकारें दूध समेत अन्य खाद्य पदार्थों में हो रही खतरनाक मिलावट पर रोकथाम लगाए और मिलावटखोरों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई करे।

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