राजनीति

आख़िर चढ़ावा चोरी और वक्फ चोरी में फर्क क्यों करता है विपक्ष?

कमलेश पांडेय

किसी भी लोकतंत्र की सफलता राजनीतिक दलों की नेकनीयती और दूरदर्शिता पर निर्भर करती है, लेकिन जब राजनीतिक दल ही दोहरी, दोमुंही, पक्षपाती बातचीत करने लगें तो नीतियां शर्माएंगी और इनके द्वारा बनाए हुए कानून वकीलों के स्वर्ग बन जाएंगे। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत भी इन्हीं विडंबना भरी सियासी परिस्थितियों से दो चार होता आया है। 

जहां धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय, राष्ट्रभाषा, सुशासन, मौलिक सनातन संस्कृति और विकास आदि पर हमारे दलों की मतभिन्नताओं की कीमत भारतवासी चुकाते आए हैं।वहीं, आजकल भारत के सियासी गलियारों में एक प्रश्न बहुत तेजी से चर्चित/वायरल हो रहा है कि आख़िर ‘चढ़ावा चोरी’ और ‘वक्फ चोरी’ में विपक्ष फर्क क्यों करता है? 

यूँ तो यह एक राजनीतिक प्रश्न है, और इसका उत्तर किसी एक तथ्य से नहीं दिया जा सकता क्योंकि सभी विपक्षी दलों का रुख एक जैसा नहीं होता। फिर भी जनता का एक बड़ा धड़ा जो देख, सुन, कह रहा है, उसका सार-सत्य यह है कि कांग्रेस, आप, झामुमो, सपा, बसपा, राजद, टीएमसी, एनसीपी, शिवसेना, नेशनल कांफ्रेंस, डीएमके जैसे विपक्षी दल या उनके नेता मंदिरों में चढ़ावे की चोरी और वक्फ संपत्तियों से जुड़े कथित अनियमितताओं पर जो अलग-अलग स्तर की प्रतिक्रिया देते हैं, वह राजनीतिक मर्यादाओं के प्रतिकूल टिप्पणी प्रतीत होती है।

इसके पीछे कई संभावित कारण बताए जाते हैं:-

पहला, राजनीतिक प्राथमिकताएँ:

दल उन मुद्दों पर अधिक मुखर होते हैं जिन्हें वे अपने समर्थकों के लिए अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। भाजपा नीत एनडीए भी जब विपक्ष में होता है तो दुविधा भरी बातें करता है और सत्ता में आते ही अपने ही एजेंडे से या तो पलट जाता है या फिर टालमटोल वाला रवैया अपनाता है। देश में सबसे ज्यादा समय तक सत्ता में रही कांग्रेस भी विपक्ष में आते ही अपनी ही नीतियों पर कभी अंगुली उठाती है तो कभी मुद्दों को भटकाती है।

दूसरा, तथ्यों और कानूनी स्थिति का अंतर:

 अलग-अलग मामलों में उपलब्ध साक्ष्य, जांच की स्थिति और कानूनी संदर्भ भिन्न हो सकते हैं। लेकिन राजनीतिक दलों के विवेक होने चाहिए कि वह मानवता व प्राणिमात्र के कल्याण के लिए कानूनी विरोधाभास पर सवालिया निशान उठाएं और तथ्यों के साथ मतलबी खिलवाड़ कर रही नौकरशाही और कारोबारियों की सांठगांठ वाली मानसिकता को बेनकाब करें। वहीं, सिर्फ वोटबैंक के खातिर जनता के बीच मतभेद बढ़ाने वाले अनर्गल बातें फैलाने से परहेज करें, ताकि सामाजिक सद्भाव, राष्ट्रीय एकता व अखंडता को मजबूती मिले।

तीसरा, राजनीतिक रणनीति:

 भले ही दल किसी मुद्दे पर बोलने या न बोलने का निर्णय संभावित राजनीतिक प्रभाव को ध्यान में रखकर भी लेते हैं लेकिन यह परिपाटी गलत है। नीतिगत मुद्दों पर उनकी सियासी दुविधा से भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि और हित दोनों प्रभावित होते हैं। भारत के राजनीतिक दलों में गैरकानूनी बातों की हिमायत करने और कार्रवाई से बच जाने का जो फैशन बढ़ा है, वह शर्मनाक स्थिति है। आखिर आप एक ही जैसे मुद्दे पर दोहरा स्टैंड कैसे ले सकते हैं? क्या वैचारिक रूप से अनपढ़ और औसत दर्जे के लोग इस सियासी मतलब परस्ती को समझ पाएंगे, शायद नहीं! इसलिए सभी दलों को कानूनी रूप से वैचारिक नजरिये के लिए जिम्मेदार ठहराने की जरूरत है।

चौथा, विचारधारात्मक दृष्टिकोण:

विभिन्न दल धार्मिक संस्थाओं और उनसे जुड़े मामलों को अलग-अलग नजरिए से देखते हैं जो धर्मनिरपेक्षता की मूल अवधारणा के प्रतिकूल है। यह नीतिगत रूप से अनैतिक है। जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और लिंग जैसे विभेद पर स्पष्ट राष्ट्रीय नीति, अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुकूल बननी चाहिए और सभी राजनीतिक दलों के लिए बाध्यकारी होनी चाहिए। इससे भटकने पर उनकी मान्यता रद्द होनी चाहिए, क्योंकि राष्ट्रीय दलों और क्षेत्रीय दलों की सियासत के लिए भारत  और भारतीयों के सुख-शांति से समझौता नहीं किया जा सकता है।

ऐसे में यदि किसी दल का रवैया वास्तव में समान प्रकृति के मामलों में असंगत दिखाई देता है, तो उसके आलोचक इसे दोहरा मापदंड कह सकते हैं। वहीं संबंधित दल अपने रुख के समर्थन में अलग तर्क दे सकते हैं। हालांकि, लोकतांत्रिक और संवैधानिक दृष्टि से आदर्श स्थिति यही है कि मंदिर, वक्फ, गुरुद्वारा, चर्च या किसी भी धार्मिक संस्था की संपत्ति या धन से जुड़े अपराधों पर कानून समान रूप से लागू हो और सभी राजनीतिक दल एक समान नैतिक मानदंड अपनाएँ। किसी भी मामले का मूल्यांकन उसके तथ्यों और जांच के आधार पर होना चाहिए, न कि संबंधित धार्मिक संस्था के आधार पर।

सवाल है कि क्या ऐसा दोहरा सियासी रुख जायज है?

वास्तव में, चढ़ावा चोरी और वक्फ चोरी में विपक्षी फर्क को मुख्यतः राजनीतिक धारणा और दलों के सार्वजनिक रुख से जुड़ा करार दिया जाता है, जिसका  कोई एक सार्वभौमिक उत्तर नहीं है। ऐसे में यदि किसी विपक्षी दल ने मंदिरों में चढ़ावे की चोरी की कड़ी निंदा की हो, लेकिन वक्फ संपत्तियों में कथित अनियमितताओं या अवैध कब्जों पर अपेक्षाकृत कम मुखर रुख अपनाया हो (या इसके उलट), तो उसके आलोचक इसे दोहरा मापदंड कह सकते हैं। वहीं संबंधित दल यह तर्क दे सकते हैं कि दोनों मामलों के तथ्य, कानूनी स्थिति या उपलब्ध साक्ष्य अलग हैं, इसलिए उनकी प्रतिक्रिया भी अलग रही। यह अनुचित है। राजनीतिक दलों को ऐसी छूट नहीं मिलनी चाहिए।

सिद्धांततः सभी राजनीतिक दलों से यह अपेक्षा की जाती है कि चाहे मंदिरों के चढ़ावे की चोरी हो, या वक्फ संपत्तियों में कथित गड़बड़ी हो, या फिर किसी अन्य धार्मिक संस्था की संपत्ति से जुड़ा अपराध—सभी मामलों में कानून समान रूप से लागू हो। राजनीतिक दल अपराध की प्रकृति के आधार पर प्रतिक्रिया दें, न कि संबंधित धार्मिक संस्था के आधार पर। ऐसे मामलों की जांच निष्पक्ष हो और दोषी पाए जाने वालों दलों व उनके सम्बन्धित नेताओं पर समान कानूनी कार्रवाई हो।

यदि किसी दल का रुख वास्तव में अलग-अलग धार्मिक संस्थाओं के मामलों में असंगत दिखाई देता है, तो यह राजनीतिक आलोचना का विषय हो सकता है। लेकिन यह निष्कर्ष कि “पूरा विपक्ष” या “सभी विपक्षी दल” ऐसा करते हैं, बिना प्रत्येक दल के बयानों और आचरण के प्रमाण के नहीं निकाला जा सकता। लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों और मीडिया की यह भूमिका है कि वे सभी दलों से समान नैतिक और कानूनी मानदंडों की अपेक्षा करें और उनके रुख पर सवाल पूछें।

सुलगता सवाल: आखिर ऐसे दलों की मान्यता क्यों नहीं रद्द होनी चाहिए?

भले ही यह एक राजनीतिक और संवेदनशील विषय है, इसलिए इसे दो अलग-अलग हिस्सों में समझना उचित होगा। यदि किसी विपक्षी दल पर यह आरोप है कि वह मंदिरों में चढ़ावे की चोरी पर एक तरह की प्रतिक्रिया देता है और वक्फ संपत्तियों पर कथित अवैध कब्जों या अनियमितताओं के मामलों पर दूसरी तरह की, तो यह राजनीतिक आलोचना का विषय हो सकता है। लोकतंत्र में किसी भी दल के रुख की आलोचना या समर्थन किया जा सकता है लेकिन यह निष्कर्ष कि “पूरा विपक्ष ऐसा करता है” या सभी दलों का रवैया एक जैसा है, तथ्य के बिना नहीं कहा जा सकता।

जहाँ तक उपर्युक्त प्रश्न का संबंध है कि “क्या ऐसे दलों की मान्यता रद्द होनी चाहिए?”, भारत में किसी राजनीतिक दल की मान्यता केवल उसके विचार, बयान या किसी मुद्दे पर अलग रुख अपनाने के कारण रद्द नहीं की जा सकती। मान्यता रद्द करने के लिए कानून और भारत निर्वाचन आयोग द्वारा निर्धारित नियम लागू होते हैं। यदि कोई दल चुनाव संबंधी कानूनों का गंभीर उल्लंघन करे, पंजीकरण की शर्तों का पालन न करे या अन्य वैधानिक आधार हों, तभी उसके विरुद्ध कार्रवाई संभव है। केवल किसी मुद्दे पर दोहरे मापदंड का आरोप, अपने आप में, मान्यता समाप्त करने का कानूनी आधार नहीं है। बहरहाल, इस स्थिति को बदलने की जरूरत है और स्पष्ट कानून बनाने की जरूरत है ताकि नीतिगत घालमेल रुके।

वहीं लोकतांत्रिक दृष्टि से अपेक्षा यह है कि मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च या वक्फ—सभी धार्मिक संस्थाओं और उनकी संपत्तियों से जुड़े अपराधों की निष्पक्ष जांच हो। चोरी, गबन या अवैध कब्जे के मामलों में कानून समान रूप से लागू हो।सभी राजनीतिक दल एक समान नैतिक और कानूनी मानदंड अपनाएँ। यदि किसी दल ने वास्तव में अलग-अलग मामलों में अलग रुख अपनाया है, तो मतदाता चुनाव में उसके रुख का राजनीतिक मूल्यांकन कर सकते हैं लेकिन उससे पहले कानूनी रूप से जिम्मेदार ठहराए जाने की भी स्पष्ट व्यवस्था बने क्योंकि किसी भी आरोप का निष्कर्ष विश्वसनीय तथ्यों और जांच के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।

कमलेश पांडेय