कुमार कृष्णन
भारत ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में जिस परिवर्तनकारी अभियान को आगे बढ़ा रहा है, उसमें एथेनॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम (एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम) एक महत्वपूर्ण पहल बनकर उभरा है। कुछ वर्ष पहले तक पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की चर्चा केवल नीति दस्तावेजों तक सीमित थी लेकिन आज यह देश की ऊर्जा रणनीति, कृषि अर्थव्यवस्था और औद्योगिक निवेश का प्रमुख आधार बन चुकी है। सरकार का लक्ष्य आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करना, कार्बन उत्सर्जन घटाना और गन्ना तथा अन्य कृषि उत्पादों के लिए वैकल्पिक बाजार तैयार करना है। पहली दृष्टि में यह नीति बहुआयामी लाभ देती दिखाई देती है, किंतु इसके साथ कुछ ऐसे प्रश्न भी जुड़े हैं जिन्हें अनदेखा करना भविष्य में गंभीर आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय चुनौतियाँ पैदा कर सकता है।
भारत अपनी पेट्रोलियम आवश्यकताओं का अधिकांश हिस्सा आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। ऐसे में एथेनॉल सम्मिश्रण विदेशी मुद्रा की बचत और ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना गया। गन्ने के रस, शीरे, टूटे चावल, मक्का तथा अन्य कृषि उत्पादों से बनने वाला एथेनॉल पेट्रोल के साथ मिलकर जीवाश्म ईंधन की खपत कम करता है। इससे कार्बन उत्सर्जन में कमी आने की भी उम्मीद की जाती है।
इस नीति का दूसरा बड़ा पक्ष किसानों से जुड़ा है। लंबे समय तक चीनी उद्योग गन्ना किसानों के बकाया भुगतान की समस्या से जूझता रहा। एथेनॉल उत्पादन ने चीनी मिलों को आय का नया स्रोत दिया, जिससे किसानों के भुगतान में अपेक्षाकृत सुधार हुआ। विशेषकर उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और बिहार जैसे राज्यों में अनेक चीनी मिलों ने एथेनॉल उत्पादन क्षमता बढ़ाई है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में निवेश और रोजगार के नए अवसर भी बने हैं।
सरकार ने वर्ष 2025-26 तक पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल सम्मिश्रण का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति भी हुई है। अनेक राज्यों में नई डिस्टिलरियाँ स्थापित हो रही हैं और निजी निवेश बढ़ रहा है। यह परिवर्तन केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि कृषि और उद्योग के बीच नए संबंध भी स्थापित कर रहा है।
लेकिन हर बड़ी क्रांति अपने साथ कुछ जटिल प्रश्न भी लेकर आती है। सबसे पहला प्रश्न खाद्य सुरक्षा का है। यदि एथेनॉल उत्पादन के लिए बड़े पैमाने पर मक्का, गन्ना और अन्य खाद्यान्नों का उपयोग होने लगे, तो इसका असर खाद्य उपलब्धता और कीमतों पर पड़ सकता है। दुनिया के कई देशों का अनुभव बताता है कि जब कृषि उत्पादन का बड़ा हिस्सा ईंधन उद्योग की ओर मुड़ता है, तब खाद्य बाजार में अस्थिरता पैदा होने लगती है।
भारत जैसे देश में यह चिंता और भी महत्वपूर्ण है, जहाँ अभी भी बड़ी आबादी खाद्य सुरक्षा योजनाओं पर निर्भर है। यदि खाद्यान्न का उपयोग ईंधन उत्पादन में तेजी से बढ़ता है तो गरीब उपभोक्ताओं पर महँगाई का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। इसलिए ऊर्जा सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी नीति चुनौती होगी।
दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न जल संसाधनों का है। भारत में एथेनॉल उत्पादन का सबसे बड़ा आधार गन्ना है, जबकि गन्ना देश की सबसे अधिक पानी खपत करने वाली फसलों में शामिल है। ऐसे समय में जब महाराष्ट्र, कर्नाटक, बिहार और उत्तर भारत के अनेक हिस्से भूजल संकट का सामना कर रहे हैं, तब गन्ने के उत्पादन को लगातार बढ़ाना दीर्घकालिक दृष्टि से कितना टिकाऊ होगा, इस पर गंभीर विचार आवश्यक है।
जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा का स्वरूप भी तेजी से बदल रहा है। ऐसे में केवल एथेनॉल उत्पादन बढ़ाने की दृष्टि से जल-गहन खेती को प्रोत्साहित करना भविष्य में पर्यावरणीय संकट को और गहरा कर सकता है। इसलिए एथेनॉल नीति का मूल्यांकन केवल उत्पादन और निवेश के आधार पर नहीं, बल्कि जल, भूमि और प्राकृतिक संसाधनों पर उसके प्रभाव के आधार पर भी किया जाना चाहिए।
अगले भाग में एथेनॉल नीति के पर्यावरणीय, आर्थिक, खाद्य सुरक्षा, भूमि उपयोग, जैव विविधता तथा अंतरराष्ट्रीय अनुभवों का विश्लेषण किया जाएगा।
एथेनॉल नीति का तीसरा महत्वपूर्ण पक्ष भूमि उपयोग और कृषि विविधता से जुड़ा है। यदि एथेनॉल उद्योग की मांग लगातार बढ़ती रही तो किसानों का स्वाभाविक झुकाव उन्हीं फसलों की ओर होगा, जिनसे उन्हें अधिक लाभ मिलेगा। इससे परंपरागत दलहन, तिलहन और अन्य खाद्यान्न फसलों का रकबा घट सकता है। भारत पहले ही खाद्य तेलों और कुछ अन्य कृषि उत्पादों के आयात पर निर्भर है। यदि कृषि का संतुलन बिगड़ता है तो ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में उठाया गया कदम खाद्य आयात की नई निर्भरता भी पैदा कर सकता है।
इसी प्रकार मक्का आधारित एथेनॉल उत्पादन भी नई बहस को जन्म दे रहा है। पिछले कुछ वर्षों में पोल्ट्री उद्योग, पशु आहार और स्टार्च उद्योग में मक्का की मांग लगातार बढ़ी है। यदि इसका बड़ा हिस्सा एथेनॉल संयंत्रों की ओर जाने लगे, तो इन क्षेत्रों की उत्पादन लागत बढ़ सकती है। इसका प्रभाव अंततः दूध, अंडे, चिकन और अन्य खाद्य उत्पादों की कीमतों पर भी पड़ सकता है। इसलिए किसी एक क्षेत्र को लाभ पहुँचाने वाली नीति का दूसरे क्षेत्रों पर पड़ने वाला प्रभाव भी समान गंभीरता से समझना आवश्यक है।
पर्यावरणीय दृष्टि से भी एथेनॉल को पूरी तरह ‘हरित ईंधन’ मान लेना उचित नहीं होगा। यह सही है कि पेट्रोल की तुलना में एथेनॉल कार्बन उत्सर्जन कम करने में सहायक हो सकता है, लेकिन उसका वास्तविक पर्यावरणीय लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि उसका उत्पादन किस प्रकार हो रहा है। यदि इसके लिए अत्यधिक भूजल दोहन, रासायनिक उर्वरकों का बढ़ता उपयोग, वन क्षेत्रों पर दबाव या कृषि विस्तार के कारण जैव विविधता प्रभावित होती है, तो उसका समग्र पर्यावरणीय लाभ सीमित हो जाएगा।
इसी कारण विश्व के अनेक विशेषज्ञ अब केवल प्रथम पीढ़ी (फर्स्ट जेनरेशन) के एथेनॉल पर निर्भर रहने के बजाय दूसरी और तीसरी पीढ़ी के जैव ईंधनों पर बल दे रहे हैं। कृषि अवशेष, धान का पुआल, गन्ने की खोई, बांस तथा अन्य जैविक अपशिष्टों से बनने वाला एथेनॉल खाद्यान्न पर दबाव कम कर सकता है। भारत ने इस दिशा में पहल अवश्य की है, किंतु अभी इस तकनीक का व्यापक विस्तार होना बाकी है। भविष्य की ऊर्जा नीति का केंद्र भी इसी दिशा में होना चाहिए।
आर्थिक दृष्टि से भी सावधानी आवश्यक है। एथेनॉल उद्योग का विस्तार बड़े निवेश, सरकारी प्रोत्साहन और स्थिर खरीद व्यवस्था पर आधारित है। यदि भविष्य में अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में भारी गिरावट आती है या तकनीकी बदलावों के कारण इलेक्ट्रिक वाहनों का प्रसार तेजी से होता है, तो एथेनॉल उद्योग की लाभप्रदता प्रभावित हो सकती है। इसलिए निवेश और उत्पादन के साथ-साथ दीर्घकालिक आर्थिक व्यवहार्यता का भी लगातार मूल्यांकन आवश्यक है।
दुनिया के अनुभव भी मिश्रित रहे हैं। ब्राज़ील को एथेनॉल उत्पादन का सफल उदाहरण माना जाता है, जहाँ गन्ने पर आधारित जैव ईंधन ने ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती दी। वहीं अमेरिका में मक्का आधारित एथेनॉल को लेकर खाद्य सुरक्षा, कृषि सब्सिडी और पर्यावरणीय प्रभावों पर लंबे समय से बहस चलती रही है। इन अनुभवों से भारत के लिए सबसे बड़ा सबक यही है कि किसी भी मॉडल की नकल करने के बजाय अपनी कृषि, जल संसाधनों और सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप संतुलित नीति विकसित की जाए।
भारत की विशेषता उसकी कृषि विविधता है। अलग-अलग राज्यों की जलवायु, मिट्टी और फसल प्रणाली एक-दूसरे से भिन्न है। इसलिए एथेनॉल नीति भी ‘एक नीति, सब पर लागू’ के बजाय क्षेत्रीय परिस्थितियों के अनुरूप होनी चाहिए। जहाँ जल उपलब्धता सीमित है, वहाँ जल-गहन फसलों को बढ़ावा देना दूरगामी दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता। वहीं जिन क्षेत्रों में कृषि अवशेष प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं, वहाँ दूसरी पीढ़ी के जैव ईंधन उद्योग को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
एथेनॉल क्रांति की सफलता अंततः इस बात पर निर्भर करेगी कि वह केवल उत्पादन बढ़ाने की नीति बनकर न रह जाए, बल्कि टिकाऊ विकास की व्यापक अवधारणा का हिस्सा बने। ऊर्जा आत्मनिर्भरता निस्संदेह भारत की आवश्यकता है, किंतु उसे खाद्य सुरक्षा, जल संरक्षण और पर्यावरणीय संतुलन की कीमत पर प्राप्त नहीं किया जा सकता। विकास की हर नीति की तरह एथेनॉल कार्यक्रम की सफलता भी संतुलन, दूरदृष्टि और वैज्ञानिक नियोजन पर निर्भर करेगी।
किसानों के लिए यह नीति एक नए अवसर के रूप में सामने आई है। गन्ना और मक्का उत्पादकों को अतिरिक्त बाजार मिला है तथा चीनी मिलों की आर्थिक स्थिति में भी सुधार हुआ है। किंतु यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इसका लाभ केवल बड़े उत्पादकों या उद्योगों तक सीमित न रहे। छोटे और सीमांत किसानों, सहकारी चीनी मिलों तथा विविध फसल उगाने वाले किसानों को भी इस परिवर्तन का समान लाभ मिलना चाहिए। यदि नीति का लाभ कुछ क्षेत्रों और कुछ वर्गों तक सिमट गया तो कृषि क्षेत्र में नई असमानताएँ जन्म ले सकती हैं।
सरकार को एथेनॉल उत्पादन के साथ-साथ जल संरक्षण, सूक्ष्म सिंचाई, फसल विविधीकरण और कृषि अनुसंधान पर भी समान बल देना होगा। ड्रिप सिंचाई, कम पानी वाली फसलें, वर्षा जल संचयन और बेहतर जल प्रबंधन को एथेनॉल नीति से जोड़ना समय की आवश्यकता है। साथ ही दूसरी और तीसरी पीढ़ी के जैव ईंधनों पर निवेश बढ़ाना होगा, ताकि खाद्यान्न आधारित एथेनॉल पर निर्भरता धीरे-धीरे कम हो सके।
भारत ने ‘कचरे से संपदा’ की अवधारणा को भी आगे बढ़ाया है। यदि कृषि अवशेष, नगरों के जैविक अपशिष्ट और अन्य जैविक पदार्थों से बड़े पैमाने पर जैव ईंधन तैयार किया जाए तो इससे दोहरे लाभ मिल सकते हैं। एक ओर पराली जलाने जैसी समस्या कम होगी, दूसरी ओर ऊर्जा उत्पादन का अपेक्षाकृत टिकाऊ स्रोत विकसित होगा। यही भविष्य की हरित अर्थव्यवस्था का अधिक संतुलित मार्ग हो सकता है।
नीति निर्माण में पारदर्शिता और निरंतर समीक्षा भी आवश्यक है। एथेनॉल उत्पादन का भूजल, खाद्यान्न उत्पादन, जैव विविधता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ रहा है, इसका नियमित वैज्ञानिक आकलन होना चाहिए। यदि किसी क्षेत्र में प्रतिकूल प्रभाव दिखाई दें तो समय रहते नीति में सुधार किया जाना चाहिए। विकास की सबसे बड़ी पहचान उसकी परिवर्तनशीलता और सीखने की क्षमता होती है।
भारत आज ऊर्जा परिवर्तन के एक महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है। एथेनॉल, हरित हाइड्रोजन, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और विद्युत चालित वाहन—ये सभी मिलकर भविष्य की ऊर्जा व्यवस्था का निर्माण करेंगे। इसलिए किसी एक विकल्प को अंतिम समाधान मानने के बजाय विविध ऊर्जा स्रोतों का संतुलित मिश्रण ही देश को दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा प्रदान कर सकता है।
वास्तविक चुनौती यह नहीं है कि एथेनॉल का विस्तार हो या न हो। चुनौती यह है कि उसका विस्तार किस प्रकार हो। यदि यह कार्यक्रम वैज्ञानिक अनुसंधान, पर्यावरणीय उत्तरदायित्व, जल संरक्षण, कृषि विविधता और किसानों के हितों के साथ आगे बढ़ता है, तो यह भारत की ऊर्जा क्रांति का मजबूत आधार बन सकता है। लेकिन यदि अल्पकालिक उत्पादन और निवेश की दौड़ में प्राकृतिक संसाधनों तथा खाद्य सुरक्षा की अनदेखी की गई, तो यही उपलब्धि भविष्य की समस्या भी बन सकती है।
भारत के नीति-निर्माताओं के सामने इसलिए सबसे बड़ा दायित्व संतुलन का है—ऐसा संतुलन जिसमें खेत भी सुरक्षित रहें, किसान भी समृद्ध हों, पर्यावरण भी संरक्षित रहे और देश ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर भी बने। यही संतुलित दृष्टि एथेनॉल क्रांति को केवल आर्थिक सफलता नहीं, बल्कि टिकाऊ और न्यायपूर्ण विकास की मिसाल बना सकती है।
आख़िरकार, किसी भी ऊर्जा नीति का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि उसने कितना ईंधन तैयार किया या कितनी विदेशी मुद्रा बचाई। उसकी वास्तविक सफलता इस बात में निहित है कि क्या उसने प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण किया, किसानों की आय बढ़ाई, उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा की और आने वाली पीढ़ियों के लिए विकास का टिकाऊ मार्ग प्रशस्त किया। एथेनॉल क्रांति में अपार संभावनाएँ हैं, किंतु इन संभावनाओं को स्थायी उपलब्धि में बदलने के लिए दूरदृष्टि, वैज्ञानिक विवेक और संतुलित नीति ही सबसे बड़ी आवश्यकता है।
कुमार कृष्णन