आख़िर कब थमेगी महिलाओं के विरुद्ध सियासतदानों की बदजुबानी?

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   मध्यप्रदेश उपचुनाव की तपिश जैसे-जैसे बढ़ रहीं है। सियासत के रणबाकुरों की भाषा उससे भी तेज़ गति से बिगड़नी शुरू हो चुकी है। चुनाव जीतने की फितरत में सियासतदां किसी पर निजी लांछन लगाने से भी बाज नहीं आ रहें हैं। येन-केन प्रकारेण सत्ता का सुख मिलना चाहिए, फ़िर उसके लिए किसी की साख से खेलना पड़े या चरित्र से। सब करने को रणभेरी में राजनेता तैयार दिखते हैं। राजनीति में एक समय था कि शुचिता और राजधर्म की बात होती थी। आज ये बातें सिर्फ़ कोरी-लफ्फाजी से अधिक कुछ नहीं बची हैं। चुनाव अब लोकतंत्र का पर्व नहीं मानो आपसी लड़ाई का अवसर बन गया है। जिसमें किस पर कौन सबसे ज़्यादा कीचड़ उछालेंगा। इसकी होड़ लगी रहती है। कौन भाषा के निम्नतर स्तर पर जा सकता, कभी कभी तो लगता इसी से विजेता का चुनाव होना है। भारतीय लोकतंत्र में अब चुनाव प्रचार के दौरान विकास के मुद्दों की बात नहीं होती, बल्कि निजी आक्षेप पर जोर दिया जाता है। 
        मशहूर शायर फैज अहमद फैज की चंद पंक्तियां याद आती है। जिसमें वे कहते हैं कि-“बोल के लब आजाद है तेरे।” ऐसे में एक बात तो तय है जब फैज साहब ने यह पंक्तियां कही होगी तो शायद ही उनके दिलों-दिमाग मे ये बात रही हो कि लब आज़ाद का अर्थ राजनेता भाषा की सारी मर्यादा लांघने से निकालेंगे! वैसे इतिहास साक्षी है। जब-जब सियासतदानों के सुर बिगड़े हैं। तब-तब महिलाओं के दामन और चरित्र पर वार किया गया है। महिलाओं के चाल-चरित्र पर अंगुली उठाना तो जैसे राजनेताओं का राजधर्म बन गया हो। एक सभ्य लोकतंत्र तो इसकी इजाजत नहीं देता कि आधी आबादी के मान-सम्मान के साथ खेला जाएं? लेकिन संविधान और विधान की फ़िक्र कहाँ होती रहती है किसी को। स्त्री जाति तो नेताओ और पितृसत्तात्मक समाज के लिए जैसे खिलौना हो। जब जी चाहा जैसे इस्तेमाल कर लिया। यह नियति उस समाज के लिए तो कतई उचित नहीं। जो महिलाओं को पूजने में विश्वास करता रहा हो। लेकिन आज हम भले आज़ादी के सात दशक को पार कर चुके हैं। शिक्षित हो गए हैं, लेकिन हमारी सोच निम्नतर ही हुई है। तभी तो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में भी  अमर्यादित भाषा का वायरस लग चुका है। राजनीति का अर्थ यह तो कतई नहीं है, कि आप अपनी राजनीति चमकाने के लिए महिलाओं के मान-सम्मान को ही तिलाजंलि दे दें। लेकिन आज हो वही रहा है और इस निकृष्ट खेल में पीछे कोई नज़र नहीं आता। 
     चलिए मान लिया संविधान का अनुच्छेद 19-(ए) हमें बोलने की आज़ादी देता है, लेकिन इसका मतलब यह तो कतई नहीं कि आप किसी महिला का चाल-चरित्र किसी ख़ास शब्द से रेखांकित करें। इसकी इजाज़त तो संविधान भी नहीं देता। राजनीति को निजी स्वार्थ सिद्धि का जरिया बनाना है तो बनाइए सियासत के शूरवीरों, लेकिन किसी महिला का अपमान करना यह जायज़ नहीं। किसी महिला को आइटम कहना कहाँ की शोभनीय बात है? राजनेता जब ऐसे निकृष्ट बयान देते तो क्या वे अपने घर-परिवार की मां,बहन और बेटियों को भूल जाते हैं? इतना ही नहीं क्या उनके घर की महिलाओं के बारे में कोई ऐसी बयानबाजी करेगा तो वे चुपचाप सुन लेंगे? लाख टके का सवाल तो यही है। कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने इमारती देवी को “आयटम” कहा। वैसे ऐसी घटिया मानसिकता का प्रदर्शन किसी राजनेता द्वारा पहली बार नहीं किया गया है। ऐसी औछी मानसिकता का एक लम्बा इतिहास है, जो महिलाओं के खिलाफ अनर्गल प्रलाप करके अपनी गिरी हुई कुंठित मानसिकता का प्रदर्शन करते हैं। वैसे कमलनाथ ने इमारती देवी को “आइटम” कहा। उसके बाद माफ़ी मांग लेते तो भी मामला आया-गया हो जाता, लेकिन उसके बाद उन्होंने जिस हिसाब से सफ़ाई पेश की। उस बात ने कहीं न कहीं कमलनाथ की छवि को जनता-जनार्दन के सामने लाने का कार्य किया है। 
एक तरफ़ देश में महिलाओं के विरुद्ध अपराध का ग्राफ़ बढ़ता जा रहा। दूसरी तरफ़ जनप्रतिनिधियों की महिलाओं के सम्बंध में ऐसी आपत्तिजनक टिप्पणी। फ़िर कैसे समझा जाएं कि जनप्रतिनिधियों की फ़ौज आधी आबादी की सुरक्षा और बेहतरी के लिए सजग और तत्पर है? कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री मंत्री ने “आइटम” शब्द का उपयोग करके नारी शक्ति को अपमानित किया। तो इसके पहले महाराष्ट्र सपा के अध्यक्ष अबू आजमी ने एक बार कहा था कि यदि कोई महिला बलात्कार केस में पकड़ी जाती है तो लड़के और लड़की दोनों को सजा दी जानी चाहिए। इसके अलावा 26 जुलाई 2013 को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने स्वयं को राजनीति का पुराना जौहरी  करार देते हुए मंदसौर में अपनी ही पार्टी की एक महिला सांसद तथा राहुल गांधी की एडी मीनाक्षी नटराजन को “100 फीसदी टंच माल” करार दिया था। वहीं 11 अप्रैल 2014 को समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने सामूहिक बलात्कार के एक केस में अदालत द्वारा तीन आरोपियों को मृत्युदंड सुनाए जाने पर कहा “लड़के, लड़के हैं। गलती हो जाती है। लड़कियां पहले दोस्ती करती हैं। लड़के- लड़की में मतभेद हो जाता है तो उसे रेप का नाम दे देती हैं। क्या रेप केस में फांसी दी जाएगी? एक अन्य अवसर पर मुलायम सिंह यादव बोले केवल अमीर वर्ग से संबंधित महिलाएं ही जीवन में आगे बढ़ सकती हैं लेकिन ग्रामीण महिलाओं को कभी मौका नहीं मिलेगा क्योंकि आप इतनी आकर्षक नहीं होती।”
    एक बार गोवा के मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पारसेकर ने अपनी मांगों को लेकर आंदोलन कर रही नर्सों से कहा “आप लोग धूप में भूख हड़ताल ना करें इससे आप का रंग काला पड़ जाएगा और आपकी शादी में दिक्कत आएगी।” तो वहीं 8 अक्टूबर 2015 को कर्नाटक के गृहमंत्री के. जे. जार्ज (कांग्रेस) ने यह कहकर विवाद खड़ा कर दिया कि किसी महिला से दो व्यक्तियों द्वारा रेप को गैंगरेप नहीं कहा जा सकता। वही जेडीयू नेता शरद पवार भी बेटियों की इज्जत से कही अधिक वोट की इज्जत तक जैसे बयान अतीत में दिए हैं। शायद उन्हें बेटियों से ज़्यादा प्यारी सत्ता और कुर्सी है। तभी तो वो मत को बेटियों से पहले मानते हैं। हद्द तो तब हुई जब बीजेपी नेता कैलाश विजयवर्गीय ने महिलाओं के श्रंगार पर ही सवाल उठा दिए। उनकी नजर में महिलाओं का श्रंगार उत्तेजना भरा होता है और उन्होंनेमहिलाओं के लिए लक्ष्मण रेखा की वकालत तक कर दी। अब जिस देश के जनप्रतिनिधियों की सोच ही निकृष्ट और औछी हो महिलाओं को लेकर। वह क्या बेटी बचाएंगे और क्या बेटी पढ़ाएंगे? जब सियासत के सुरमा ऐसे बयान देंगे फ़िर आम लोगों की हिम्मत तो ख़ुद बढ़ जाएगी। फ़िर बहन-बेटियों के लिए सुरक्षित जगह कहाँ बच पाएगी? इसलिए आधी आबादी को अपनी अस्मिता की रक्षा और अपने स्वाभिमान की लाज के लिए एकजुट होना होगा और अपने हक और सम्मान की लड़ाई लड़नी होगी। तभी एक सुरक्षित और सभ्य समाज में आधी आबादी सांस ले पाएगी, वरना ये सियासत के लम्पट पुजारी तो सिर्फ़ सत्ता के रस को पहचानते बस।

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