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    Homeसाहित्‍यकविताआक्रांता हिंगनू या हूण तोरमान,मिहिरकुल

    आक्रांता हिंगनू या हूण तोरमान,मिहिरकुल

    विनय कुमार विनायक
    हिंगनू या हूण अति बर्वर-कट्टर
    मध्य एशियाई खून
    जिसने ईसा पूर्व एक सौ पैंसठ में
    यूची कुई-शांग; कुषाण जनजाति को
    चीन क्षेत्र से मार भगाया
    किन्तु अति जनसंख्या वृद्धि दर से
    हिंगनू भी वहाँ टिक नहीं पाया
    और प्रस्थान किया पश्चिम दिशा
    दो शाखाओं में बँटकर
    एक यूराल पर्वत के पार
    यूरोप में जाकर छाया
    दूसरा आक्सस के पार
    ईरान, काबुल, कांधार जीतकर
    हिन्दुस्तान तक आया
    पहला काला हूण पुकारा गया
    दूसरा श्वेत हूण कहलाया!
    यूरोप आक्रांता हूण का नेता
    मुंजुक का बेटा अट्टिला था
    जिसने रोमन साम्राज्य को तबाह किया
    भारत आक्रांता हूण का नेता
    तोरमान और मिहिरकुल था
    हूण का मूल निवास
    वोल्गा के पूर्व चीन के पास
    वंक्षु नद; आक्सस:आमू दरिया का क्षेत्र
    जिसे अरब वाले खत्ताल,फारसी हयताल कहते
    चीनी हूण को ह्यून-यू;ह्यान-युन;हयंग-नू,
    फारसी में हुनू हयताल,संस्कृत में हूण कहते
    ये हूण हयंग-नू, तुरुष्क,मंगोल जातियों के नेता,
    यूची;कुई-शांग; कुषाण से मिलती जाति,
    खुद को हया वंश के हयंग-नु तातार कहते थे,
    जिसने चौथी-पाँचवीं शती में यूरोप
    और एशिया में हड़कंप मचा दी थी!
    चार सौ संतावन-अंठावन ईस्वी में
    टिड्डियों के दल सा हूण
    मगध के गुप्त शासन क्षेत्र में घुसा
    उस ओर से आ पड़ा था
    बर्वर हूण सरदार तोरमान,
    इस ओर से लड़ा था मासूम
    युवा स्कंद गुप्त महान!
    एक आर्य सुकुमार था पर,
    दूसरा दुर्जन क्रूर शैतान!
    फिर भी रावणी दल हारा
    जीता चंद्र गुप्त की संतान!
    तोरमान था भारत में हूण शक्ति स्थापक,
    फिर मिहिरकुल उसका बेटा
    हुआ स्यालकोट का शाशक!
    मिहिर था असहिष्णु, अति कठोर,
    किन्तु था पुरजोर शिव भक्त,
    हर हर महादेव का नारा बोलकर
    जिसकी तलवार ने छककर
    पिया बौद्ध भिक्षु जनों का रक्त!
    पांच सौ दस ईस्वी में भानुगुप्त
    और गोपराज से हूण शक्ति हारा,
    मगधराज नरसिंहगुप्त बालादित्य ने
    जब छोड़ दिया उसे कर देना,
    आ चढ़ा मिहिरकुल, बालादित्य पर
    ले टिड्डियों सी बर्वर सेना!
    लेकिन वह मगधराज बालादित्य से हारा,
    किन्तु राजमाता मगध की ममता ने
    उनके प्राण को किया उबारा!
    हो मगध से मुक्त उस अताताई ने
    कश्मीर में शरण लिया,
    होकर कृतघ्न कश्मीर राज का
    उसने प्राण हरण किया!
    ऐसे ही गान्धार की गद्दी
    उस क्रूर मिहिरकुल ने पाया,
    पांच सौ बत्तीस ईस्वी में मालव वीर
    यशोधर्मा के आगे उसने प्राण गँवाया!
    अब हूणों का जोश पड़ गया ठंडा,
    मदमत्त हाथियों से मौखरियों ने
    योग्य नेता विहीन हूणों पर लगाया डंडा!
    हूण आक्रमण का प्रथम परिणाम
    गुप्त साम्राज्य का पतन
    दूसरा श्रेष्ठतावादी आर्य हिन्दुओं में हुआ
    विदेशी रक्त का मिश्रण
    फलस्वरूप एक नव जाति संज्ञा
    ‘राजपूत’ हुआ उत्पन्न!
    —विनय कुमार विनायक
    दुमका, झारखण्ड-814101.

    विनय कुमार'विनायक'
    विनय कुमार'विनायक'
    बी. एस्सी. (जीव विज्ञान),एम.ए.(हिन्दी), केन्द्रीय अनुवाद ब्युरो से प्रशिक्षित अनुवादक, हिन्दी में व्याख्याता पात्रता प्रमाण पत्र प्राप्त, पत्र-पत्रिकाओं में कविता लेखन, मिथकीय सांस्कृतिक साहित्य में विशेष रुचि।

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