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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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-रवि श्रीवास्तव-
uttar pradesh

चुनावी बिगुल बजते ही सभी राजनीतिक दल ज़नता के लुभाने के लिए अपना एक घोषणा पत्र करते हैं। जिसमें वे लोगों से वादे करते है कि सरकार आई तो इस घोषणा पत्र के अनुसार आप का और राज्य का पार्टी विकास करेगी। बात करें हम दो साल पहले हुए उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव की तो प्रदेश के अंदर हर सक्रिय राजनीतिक दलों अपना एक ऐजेण्डा बनाया था। सूबे में राद कर रही बीएसपी सरकार से प्रदेश की ज़नता थोड़ी परेशान थी। ऐसे समय का पूरा फायदा सपा ने उठाते हुए इस चुनाव में युवाओं पर दांव खेलते हुए अपना घोषणा पत्र इतना प्रभावशाली बनाया कि दूसरी पार्टियों को निस्तेनाबूत होना पड़ा। सपा के घोषणा पत्र में 12वीं पास होने पर लैपटॉप और 10वीं पास पर टेबलेट वितरण योजना, 25 से 40 साल तक के बेरोजगारों के लिए बेरोजगारी भत्ता, और कन्याओं के लिए कन्या विद्याधन योजना ने प्रदेश के युवाओं का मन जीत लिया था। इन प्रभावशाली वादों पर सपा सब पार्टियों पर भारी पड़ी और पूर्ण बहुमत से प्रदेश में अपना सरकार बनाई। ज़नता में भी इक आस बंधी थी कि इस बार ये सरकार ज़रूर प्रदेश हित में कार्य करेगी। अखिलेश सरकार की अब बारी आई थी ज़नता से किए गए वादों को पूरा करने की जो सपा ने चुनाव से पूर्व किए थे। लैपटॉप का वितरण, बेरोजगारी भत्ता, कन्या विद्याधन योजना में सरकार ने छात्राओं को चेक देकर अपनी इस योजना की पहल कर दी थी। पर 10वीं पास छात्र टेबलेट के लिए सिर्फ आस लगाए रह गए थे।

बेरोजगारी भत्ता में भी हाल कुछ ऐसा ही था, जिसने सरकार बनने से पहले पंजीकरण काराया उसे मिला और सरकार बनने के बाद पंजीकरण होना भी बंद हो गया था। यूपी के विधानसभा चुनाव के बाद देश में लोकसभा के चुनाव होने थे। जिसे लेकर सपा पहले से रणनीति तैयार कर रही थी। इन सारी योजनाओं का लाभ सपा लोकसभा चुनाव में उठाना चाहती थी। अपने मंसूबे में धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह को प्रधानमंत्री बनाने का सुनहरा मौका सपा इस बार के लोकसभा चुनाव में तलाश रही थी। पर प्रदेश में खराब कानून व्यवस्था से सरकार की फ़जीहत ख़राब हो रही थी। कांग्रेस से देश की ज़नता मुक्ति पाना चाहती थी। बीजेपी को रोकने का दम सपा ही भर रही थी। पर मुजफ्फरनगर का दंगा सपा के लिए अशुभ संकेत साबित हुआ। मोदी सहर के सामने सपा प्रमुख के अरमान बिखरते नज़र आ रहे थे, पर पार्टी को विधानसभा में अपने वादों पर मिली जीत का पूरा भरोसा था। वो लुभावने वादे जिसे लेकर वह सत्ता में आई थी। पर ज़नता को कुछ और ही मंजूर था। सपा की करारी हार के बाद मुलायम सिंह का सपना भी कांच की तरह टूटकर बिखर गया। इतनी बुरी हार शायद सपा प्रमुख ने सपनों में भी नही सोची थी। युवाओं को लुभाने वाली सारी योजनाएं धरी रह गई थी। जिसका पूरा ख़ामियाजा युवाओं को उठाना पड़ा जो इस बार 12वीं पास हुए थे। जिन्हें बेरोजगारी भत्ता मिल रहा था। जिन कन्याओं को विद्याधन मिलना था। लोकसभा में पराजय का कारण जानने के लिए सपा प्रमुख ने मंत्रियों और नेताओं के साथ बैठक शुरू कर दी थी। जिसमें कुछ मंत्रियों के विभाग बदल दिए है। कुछ को बाहर का रास्ता दिखाया गया। इस भीषण गर्मी में प्रदेश में बिजली को लेकर मची हाहाकार को लेकर कुछ दलों ने आरोप लगाया कि सपा अपना इस बुरी हार का बदला ले रही है। इस बीच सपा के तरफ से संकेत भी आने लगे थे कि विधानसभा में युवाओं पर लुभाने वाली योजनाएं बंद हो सकती है। और ये संकेत प्रत्यक्ष में बजल गया, बजट पेश के दौरान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कह दिया कि लैपटॉप वितरण योजना, बेरोजगारी भत्ता, और कन्या विद्याधन योजना अब बंद की जा रही है। वो छात्र जो अरमान लगाए बैठे थे सपा प्रमुख के मंसूबे की तरह उनके मंसूबे पर पानी फिर गया। सरकार ने अपने दो सालों के कार्यकाल में ही सिर्फ छात्रों को लैपटॉप देना चाहती थी। बयान तो ये आते थे कि इस वितरण से छात्रों को आगे की पढ़ाई करने में आसानी होगी। पर अब दो साल के बाद क्या जो छात्र पास हो रहे हैं उन्हें आगे की पढ़ाई के लिए लैपटॉप की ज़रूरत नही है, वैसे ही बेराजगारों के लिए जो भत्ता था वह सिर्फ इन दो सालों के लिए था, क्या उन बेरोजगारों को रोजगार मिल गया है। अब कन्या विद्याधन योजना की बात करे तो अब सरकार छात्राओं को आगे बढ़ने के लिए पढ़ाई करने का धन नही दे रही ये भी दो सालों के लिए ही था। इस लोकसभा चुनाव में इन युवाओं को सरकार से मिलने वाले फायदे की बलि चढ़ गई है। सपा ने काफी दूर की सोच रखी थी। जिन योजनाओं से विधानसभा में कामयाबी मिली उसी से आगे लोकसभा में मिलेगी, ये वही बात है कि एक तीर से दो निशाने लगाना कुछ ऐसा ही सपा ने किया था। अब वही बेरोजगार युवक जिसे सरकार रोजगार न देकर बेरोजगारी भत्ता दे रही थी, वही 12वीं पास होने वाले छात्र जिन्हें लैपटॉप मिलना रह, वही छात्राएं जो कन्या विद्याधन योजना पाने वाली थी अपने को ठगा सा महसूस कर रही है। न कहते युवाओं को लोकसभा में हार का जिम्मेदार मानते हुए इन योजनाओं को महत्वपूर्ण बताने वाली सरकार ने इसे बंद कर युवाओं लालीपॉप पकड़ा दिया।

One Response to “पहले लैपटॉप, अब लालीपॉप”

  1. mahendra gupta

    ऐसी सरकारों का अंजाम सत्ता से बाहर जाना ही होता है , यू पी की जनता का भी दुर्भाग्य है कि हाथियों के बुतों से पिंड छुड़ाया तो यह फटीचर सायकल पल्ले पड़ी जिसे धो पोंछ कर बेचने खड़ा कर दिया था और लोग ठगे गए अब इस से पिंड छुड़ाना कठिन हो रहा है शायद इस बार कमल को आजमा कर देख लें ,होना हवाना तो उनसे भी क्या है? पर अभी दो साल इंतजार करना होगा , तब तक लॉलीपॉप ही चूसने होंगे , इनका भी स्वाद न जाने कैसा हो ?

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