कृषि भूमि पर केन्द्र की नीयत साफ होने की जरूरत

डॉ. मयंक चतुर्वेदी 

केन्द्र की कांग्रेसनीत संप्रग सरकार बार-बार यह दुहाई देती है कि वह आम आदमी और किसान हितैषी है लेकिन उसके द्वारा एक के बाद एक पिछले दो बार के लगातार शासन के दौरान जो 7 वर्षों में निर्णय लिये गये हैं, वह कृषकों व आम व्यक्ति के हित में कम खास व्यक्तियों, उद्योगों, संस्थानों के हितों को पोषित तथा संरक्षित करने वाले यादा रहे हैं। हाल ही में भूमि अधिग्रहित विधेयक 2011 के मसौदे को जिस रूप में केन्द्रीय मंत्रीमण्डल ने अपनी स्वीकृति प्रदान की, उससे यह बात और स्पष्ट हो जाती है।

केबीनेट की स्वीकृति के पूर्व सभी को यह भरोसा था कि भूमि अधिग्रहण बिल में केन्द्र की सरकार किसानों के हित को दरकिनार नहीं करेगी। उनके हितों का पूरा ध्यान इस बिल में रखा जायेगा, किन्तु ऐसा नहीं हो सका। कृषकों के हितों के पहले केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने इस अधिनियम में पूंजीपतियों का पहले ध्यान रखा है। मनमोहन,सोनिया सरकार ने वही किया जो उसे संवेदनाशून्य होकर करना था। सरकार भूमि अधिग्रहण विधेयक में कृषकों को भरपूर मुआवजा देने की अपनी शर्तों से पीछे हट गई है। जबकि इसके मूल प्रारूप में किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए प्रावधान किए गये थे, जिसके अंतर्गत अधिग्रहित किसान की भूमि के बदले उसे उस भूमि की 6 प्रतिशत अधिक राशि केन्द्र या राय सरकारों द्वारा दी जानी सुनिश्चित कर दी गई थी। नये प्रारूप में मुआवजे की राशि में अत्यधिक कटौती कर दी गई है। इसमें शहरी क्षेत्रों की जमीन जो कि पहले ही कई गुना मंहगी होती है, उसका बाजार मूल्य दुगना रखा गया है लेकिन ग्रामीण क्षेत्र की भूमि के लिए इसे कम करते हुए 4 गुना कर दिया गया।

सबसे बड़ी बात यह है कि केन्द्रीय मंत्रीमण्डल से मंजूर इस भूमि अधिग्रहण बिल के संसद में पास होते ही यह कानून बन जायेगा और उन सभी जमीनों पर लागू होगा, जिन्हें पहले से ही विभिन्न रायों की सरकारों ने अधिग्रहित कर रखा है, किन्तु अपने कब्जे में अभी तक नहीं लिया है। उद्योग संगठनों का इसे दबाव माना जाये या केन्द्र सरकार की मंशा में खोट कि उसने इस विधेयक की मूल प्रति में अनेक संशोधन कर डाले। यदि संसद में यह यथावत स्वीकार कर लिया गया तब 117 साल पुराने कानून में बदलाव होना सुनिश्चित है। हालांकि अंग्रेजों के बनाये कानूनों में संशोधन और बदलाव होना अच्छा संकेत माना जा सकता है, किन्तु किसी को हासिये पर चढ़ाकर किया जाने वाला बदलाव स्वस्थ लोकतंत्र के लिए घातक ही है। इस विधेयक में विसंगियां इतनी अधिक हैं कि नये बिल के मसौदे पर स्वयं कांग्रेस पार्टी के कई दिग्गज अपनी असहमती दर्शा चुके हैं। इसके विपरीत कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी की मंशा इसे इसी रूप में पास कराने की है। ऐसे में अपने महासचिव के निर्णय के विरोध में कोई कांग्रेसी नेता या सरकार में मंत्री उभरकर सामने नहीं आना चाहते। उनके द्वारा इस भू-अधिग्रहण बिल के वर्तमान स्वरूप का विरोध करना पार्टी में अपनी फजीयत कराने जैसा है।

यदि यह बिल संसद में यथावत स्वीकार कर लिया गया तो अच्छी उर्वर भूमि को भी सरकार औद्योगिक विकास के नाम पर कृषकों से छीनने के लिए स्वतंत्र हो जायेगी। जबकि पुराने नियम के अनुसार अभी आसानी से बहु फसली जमीन का अधिग्रहण नहीं किया जा सकता है। हालांकि सरकार ने इस बिल में किसानों के हितों को ध्यान में रखने वाली कुछ शर्तें भी भूमि अधिग्रहण के पहले उद्योगपतियों, व्यापारियों के लिए लगाई हैं। लेकिन देखा जाये तो यह नियम-शर्तें इतने पर्याप्त नहीं कि वह भूमि-पुत्रों से उनकी उर्वरा जमीन छीनने के बाद उसकी पूर्ति आर्थिक लाभ देकर कर दें।

वस्तुत: आज आवश्यकता इस बात की है कि केन्द्रीय मंत्रीमण्डल में स्वीकृत इस भू-अधिग्रहण बिल पर संसद में व्यापक बहस हो। इस संबंध में किसानों के हितों को पूरी तरह ध्यान में रखकर ही आगे कोई निर्णय लिया जाये, यही सरकार और किसान दोनों के हित में रहेगा।

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