समाज

शराब बन रही काल, बचने का क्या है उपाय

ज्ञान चंद पाटनी

    देश में जहरीली शराब से मौत के बढ़ते मामले चिंताजनक हैं। ताजा मामला मध्यप्रदेश का है। राज्य के सागर जिले के बंडा और शाहगढ़ तहसील के गांवों में नकली व जहरीली शराब पीने से दो दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। कई लोगों को इलाज के लिए अस्पतालों में भर्ती कराया गया है। एक माह के भीतर देश में यह दूसरी बड़ी शराब त्रासदी है जिससे समस्या की गंभीरता का पता चलता है। पिछले माह गुजरात के भावनगर जिले में नकली और जहरीली शराब पीने से एक दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी।  गत मई माह में भी महाराष्ट्र में जहरीली शराब से डेढ़ दर्जन से ज्यादा लोग कालकवलित होने का मामला सामने आया था। तमिलनाडु, राजस्थान, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार और असम में भी अवैध शराब के सेवन से मौत की कई घटनाएं हो चुकी हैं। वर्ष 2015 में मुंबई के मालवानी में जहरीली शराब से 100 लोगों की मौत हो गई थी। इसी तरह पंजाब में वर्ष 2020 में मिलावटी शराब पीने से 100 से अधिक लोग काल के ग्रास में समा गए थे। शराबबंदी के बावजूद बिहार के सारण में वर्ष 2022 में जहरीली शराब पीने से 40 लोगों की मौत ने पूरे देश को हिला दिया था। इसी तरह जून 2024 में तमिलनाडु के कल्लाकुरिची जिले में जहरीली शराब से 50 से अधिक लोगों की जान चली गई थी। जिस देश में दूषित जल और नकली दवाइयों की वजह से लोगों की मौत के मामले सामने आते रहते हैं, वहां जहरीली शराब से होने वाली मौतें किसी को आश्चर्यचकित नहीं करती। फिर, शराब की लत के शिकार लोगों के प्रति हेय दृष्टि की वजह से ऐसे मामलों में पीड़ित लोग सहानुभूति तक के लिए तरस जाते हैं।
   मध्यप्रदेश और गुजरात की शराब दुखांतिकाओं में एक खास समानता यह है कि दोनों ही मामलों में नकली ब्रांडेड शराब हादसे का कारण बनी। जाहिर है शराब माफिया अवैध रूप से निर्मित शराब की बोतलों पर ब्रांडेड शराब के लेबल लगा कर बेच रहे हैं। असली शराब में इथेनॉल होता है, जबकि नकली और अवैध शराब में औद्योगिक ग्रेड का मेथनॉल इस्तेमाल किया जाता है। यही ज्यादातर शराब त्रासदियों के लिए जिम्मेदार होता है। मध्यप्रदेश की शराब दुखांतिका के लिए भी यही जिम्मेदार माना जा रहा है। गुजरात में जिस नकली ब्रांडेड शराब पीने से हादसा हुआ उसमें करीब 38 प्रतिशत तक मेथनॉल पाया गया था। मेथनॉल का इस्तेमाल करके शराब बनाई जाती है तो वह जहरीली हो जाती है। मेथनॉल की गंध और स्वाद सामान्य शराब यानी इथेनॉल से मिलते-जुलते हो सकते हैं, जिससे मिलावट का पता लगाना मुश्किल होता है।
    संविधान में सरकार से अपेक्षा की गई है कि वह शराब के सेवन को हतोत्साहित करने के लिए प्रयास करेगी। इसलिए शराब पर अधिक से अधिक टैक्स की पैरवी की जाती है और शराबबंदी के पक्ष में भी माहौल बनाया जाता है। शराब की वजह से सेहत ही नहीं, परिवार और समाज को होने वाले नुकसान के लिहाज से तो ये दोनों कदम ठीक लगते हैं लेकिन व्यवहार में इसके दुष्परिणाम सामने आते हैं। अत्यधिक टैक्स से वैध शराब महंगी हो जाने के कारण गरीबों की पहुंच से दूर हो जाती है। कमजोर वर्ग के लोग अवैध रूप से बनने वाली सस्ती शराब खरीदने लगते हैं, जो जानलेवा साबित होती है। मध्यप्रदेश में पीड़ितों के परिजनों और स्थानीय लोगों का कहना है कि यह शराब कुछ सस्ती थी और दुकानदारों ने भरोसा दिलाया था कि यह नकली नहीं है। सस्ती के चक्कर में लोगों ने इसे खरीदा जिससे कई लोग काल के ग्रास में समा गए। शराब पर ज्यादा से ज्यादा टैक्स लगाने से राजकोष जरूर भरता है लेकिन शराब पीने की प्रवृत्ति पर खास असर नहीं हो रहा। बाजार में सस्ती शराब की मांग के कारण अवैध रूप से शराब बनाने और बेचने का नेटवर्क जरूर मजबूत हो रहा है। इसलिए शराब की कीमतों को तर्कसंगत बनाया जाना चाहिए। दूसरी तरफ जब शराबबंदी लागू की जाती है, तो लोग ब्रांडेड शराब भी चोरी छिपे खरीदते हैं, जिससे नकली ब्रांडेड शराब का अवैध कारोबार भी जड़ें जमा लेता है। जैसे गुजरात में जो हादसा हुआ, उसमें पीड़ितों ने नामी ब्रांड की नकली शराब का सेवन किया था जो जहरीली थी।
   लोगों को शराब से दूर रखने, उनका स्वास्थ्य बचाने और महिलाओं की सुरक्षा के लिए शराबबंदी का समर्थन किया जाता है। संविधान का आर्टिकल 47 (राज्य के नीति-निर्देशक तत्व) राज्य को शराबबंदी लागू करने के लिए प्रोत्साहित करता है। हालांकि नीति-निर्देशक तत्व कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं हैं, लेकिन इसमें कहा गया है कि ” राज्य औषधीय उपयोग को छोड़कर नशीले पदार्थों और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नशीली दवाओं के सेवन पर रोक लगाने की कोशिश करेगा।” मुश्किल यह है कि जब शराबबंदी पूरी तरह लागू होती है तो अवैध बाजार बढ़ता है। शराब माफिया पनपता है। इसी वजह से ज्यादातर मामलों में शराबबंदी का प्रयोग विफल हुआ है। हरियाणा सरकार ने 1996 में शराबबंदी लागू की थी, लेकिन 1998 में इसे निरस्त कर दिया गया। आंध्र प्रदेश में 1994 में शराबबंदी लागू की गई, जिसे शीघ्र ही हटा लिया गया। केरल, मणिपुर और तमिलनाडु जैसे राज्यों ने भी कुछ समय के लिए शराबबंदी लागू की थी, लेकिन बाद में इसे समाप्त कर दिया गया। वर्तमान में गुजरात और बिहार में शराबबंदी जरूर लागू है, लेकिन वहां भी अवैध शराब माफिया पनप गया है। गुजरात में नामी ब्रांड की नकली शराब पीने से हुआ हादसा इसका उदाहरण है।
 मध्यप्रदेश और गुजरात के ताजा हादसे इस बात के गवाह है कि जिन राज्यों में शराबबंदी लागू है, वहां भी शराब माफिया का नेटवर्क मजबूत है और जिन राज्यों में शराबबंदी लागू नहीं है वहां भी शराब माफिया खुल कर खेल रहे हैं। इससे साफ है कि पुलिस, आबकारी विभाग और प्रशासन या तो शराब माफिया के आगे बेबस हैं या फिर मिलीभगत का खेल चल रहा है। दोनों ही स्थितियों में सरकारें अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकतीं। जब अपराधी बेखौफ हों तो जनता कैसे सुरक्षित रहेगी। सवाल यह है कि कानून का राज कायम करने की जिम्मेदारी जिन संस्थाओं पर है, वे क्या सिर्फ आम आदमी को डराने—धमकाने के लिए ही हैं।  शराब माफिया पर कठोर कार्रवाई आवश्यक है। जहरीली शराब से मौतें तभी रुकेंगी जब जहरीली शराब बनना बंद होगी। अगर प्रशासन चाहे तो कठोर कार्रवाई कर शराब के इन ठिकानों को ध्वस्त कर सकता है और जहरीली शराब बनाने पर रोक लगा सकता है।
 विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, दुनिया भर में हर साल शराब की वजह से लगभग 30 लाख लोगों की जान चली जाती है। भारत में भी हर साल शराब पीने से करीब 2.6 लाख लोगों की मौत होती है जिसमें जहरीली शराब से होने वाली मौतें भी शामिल हैं। जाहिर है, शराब की लत में फंसे लोगों के लिए उपचार और पुनर्वास कार्यक्रम चलाना जरूरी है। नशामुक्ति केंद्रों की  संख्या बढ़ाई जाए। गरीबों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर ध्यान दिया जाए। शराबखोरी के खिलाफ माहौल बनाने के लिए जनजागरण जरूरी है। लोगों को यह समझाने की जरूरत है कि शराब का सेवन कम करें या ज्यादा, यह जहर ही है।( युवराज फीचर्स )   


ज्ञान चंद पाटनी