(भूदान आंदोलन के 75 साल पर विशेष)
कुमार कृष्णन
जमीन चुप रहती है, लेकिन उसकी मेड़ पर इतिहास के सबसे बेचैन सवाल लिखे होते हैं। बिहार में तो जमीन केवल मिट्टी नहीं रही है। वह सामाजिक प्रतिष्ठा, आर्थिक सुरक्षा, राजनीतिक प्रभाव और कई बार गांव में मनुष्य की हैसियत तय करने वाली शक्ति रही है। इसलिए 75 वर्ष पहले जब आचार्य विनोबा भावे ने तेलंगाना के पोचमपल्ली से भूदान यात्रा शुरू की, तब उसका सबसे बड़ा अर्थ उन गांवों में खुलना था जहां जमीन का सवाल सदियों से सामाजिक संबंधों और असमानता के केंद्र में रहा था।
18 अप्रैल 1951 को पोचमपल्ली से शुरू हुई भूदान यात्रा जब 1952 में बिहार पहुंची, तो आंदोलन का स्वरूप ही बदलने लगा। विनोबा ने बिहार को केवल अपनी पदयात्रा का एक पड़ाव नहीं बनाया, बल्कि भूमि-संबंधों की जटिलता के बीच अपने प्रयोग की बड़ी प्रयोगशाला के रूप में देखा। उन्होंने बिहार में जमीन के लिए एक विशाल लक्ष्य रखा। अपनी स्मृतियों में वे बताते हैं कि यहां आने के बाद उन्होंने 50 लाख एकड़ की मांग से शुरुआत की, फिर आंकड़ों पर विचार के बाद लक्ष्य 32 लाख एकड़ तक आया।
यह लक्ष्य अपने आप में बताता है कि उस समय बिहार में भूदान को लेकर कैसी सामाजिक कल्पना पैदा हुई थी।
स्वतंत्रता के बाद बिहार एक बड़े संक्रमण से गुजर रहा था। जमींदारी उन्मूलन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी। बिहार भूमि सुधार कानून ने सामंती भूमि-संबंधों को बदलने की कोशिश की थी, लेकिन कानून से जमीन का सामाजिक चरित्र एक दिन में नहीं बदल सकता था। गांवों में बड़े भू-स्वामित्व, खेतिहर मजदूरी, बटाई, जातीय-सामाजिक वर्चस्व और भूमिहीनता के पुराने संबंध कायम थे।यही वह जमीन थी जिस पर विनोबा का नैतिक प्रयोग हुआ।
उनका रास्ता राज्य की जब्ती या वर्ग-संघर्ष का रास्ता नहीं था। वे भूमिधर के विवेक को संबोधित कर रहे थे। उनका आग्रह था कि जिसके पास जरूरत से अधिक है, वह अपनी संपत्ति में समाज का हिस्सा पहचाने। यह गांधी की ट्रस्टीशिप की अवधारणा का ग्रामीण और व्यावहारिक रूप था।
बिहार में इस विचार को जमीन मिली। श्रीकृष्ण सिंह, अनुग्रह नारायण सिंह और जयप्रकाश नारायण जैसे नेताओं तथा अनेक सर्वोदय कार्यकर्ताओं ने आंदोलन को अलग-अलग स्तर पर समर्थन दिया। गांवों में कार्यकर्ता निकले। सभाएं हुईं। बड़े भू-स्वामियों से दान की अपील हुई। भूदान का वातावरण केवल विनोबा की पदयात्रा से नहीं बल्कि बिहार के सामाजिक कार्यकर्ताओं के व्यापक नेटवर्क से बना।
1952 के सरकारी प्रकाशन में भी विनोबा के बिहार आगमन को भूदान आंदोलन के नए चरण की शुरुआत माना गया था। उस समय राज्य के कार्यकर्ताओं ने कम समय में बड़ी मात्रा में जमीन जुटाने का लक्ष्य रखा था।
बिहार के लिए भूदान इसलिए भी महत्वपूर्ण था कि यहां भूमि सुधार का प्रश्न पहले से राजनीतिक प्रश्न बन चुका था। भूदान ने उसी प्रश्न को दूसरी भाषा दी—कानून की भाषा के बजाय करुणा, स्वेच्छा और सामाजिक दायित्व की भाषा।
भूदान को केवल भावनात्मक आंदोलन समझना भी भूल होगी। बिहार ने इसे संस्थागत रूप देने की कोशिश की।
1954 का बिहार भूदान यज्ञ अधिनियम इस दृष्टि से ऐतिहासिक दस्तावेज है। कानून का उद्देश्य ही था कि भूदान के माध्यम से मिली जमीन को भूमिहीन लोगों के बीच बसाया और वितरित किया जाए। इसके लिए बिहार भूदान यज्ञ समिति का गठन किया गया और दान की गई जमीन को समिति में निहित करने तथा उसे भूमिहीनों को देने की कानूनी व्यवस्था बनाई गई।
अर्थात बिहार ने भूदान को केवल संत की अपील बनकर रहने नहीं दिया। उसने उसे कानून और प्रशासन की संरचना देने का प्रयास किया।
यहीं से भूदान की सबसे बड़ी चुनौती भी शुरू होती है।
किसी जमीन का दानपत्र बन जाना और उसका भूमिहीन परिवार के खेत में बदल जाना—दो अलग बातें थीं।
रकबा दर्ज हुआ लेकिन सीमांकन हुआ या नहीं?
रिकॉर्ड में नाम आया लेकिन कब्जा मिला या नहीं?
जमीन दान की गई लेकिन वह विवादमुक्त थी या नहीं?
यही वे प्रश्न हैं जिनके कारण बिहार में भूदान की कहानी उपलब्धियों और विफलताओं, दोनों की कहानी बन गई।
सरकारी और सर्वोदय स्रोतों में भी उस समय जुटाई गई जमीन के आंकड़ों और उनकी वास्तविक स्थिति को लेकर सवाल दर्ज हैं। एक सरकारी प्रकाशन में 1954 तक बड़ी मात्रा में भूमि दान में मिलने के दावे का उल्लेख है, साथ ही यह भी दर्ज है कि कुछ दान की गई जमीन के अस्तित्व, विवरण और वास्तविक हस्तांतरण को लेकर गंभीर आपत्तियां थीं।
इसका अर्थ यह नहीं कि भूदान विफल था। इसका अर्थ यह है कि भूदान का नैतिक अभियान और भूमि प्रशासन की वास्तविकता एक-दूसरे से टकरा गए।
भूदान ने जिस व्यक्ति को केंद्र में रखा था, वह था भूमिहीन किसान लेकिन बाद की प्रक्रिया में वही व्यक्ति सबसे कमजोर कड़ी बन गया। भूमि दान करने वाला प्रभावशाली था। प्रशासन के पास रिकॉर्ड था। समिति के पास दानपत्र था। अदालत के पास मुकदमा था लेकिन जिसके नाम पर पूरी व्यवस्था खड़ी हुई थी, उसके पास अक्सर न तो रिकॉर्ड था, न संसाधन और न प्रशासनिक पहुंच। यही कारण है कि आज भूदान की 75वीं वर्षगांठ पर बिहार के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि विनोबा ने कितनी जमीन दिलवाई थी। प्रश्न होना चाहिए—वह जमीन आज कहां है?कितनी जमीन वास्तव में भूमिहीन परिवारों को मिली?कितने परिवारों के पास आज भी उसका कब्जा है?कितनी जमीन पर खेती हो रही है?कितनी जमीन विवादों में फंसी है ?कितनी पर अतिक्रमण है?
और कितनी केवल पुराने दानपत्रों और राजस्व अभिलेखों में मौजूद है?
75वीं वर्षगांठ को बिहार यदि केवल स्मृति का अवसर बनाता है, तो भूदान की आत्मा अधूरी रह जाएगी। इसके बजाय राज्य को बिहार भूदान भूमि का व्यापक सामाजिक और प्रशासनिक ऑडिट कराना चाहिए।
सबसे पहले जिलेवार भूदान भूमि का पूरा डिजिटल और भौतिक सर्वेक्षण हो। 1950 और 1960 के दशक के दानपत्रों को वर्तमान राजस्व रिकॉर्ड से मिलाया जाए। प्रत्येक भूखंड का खाता, खसरा, रकबा, वर्तमान स्थिति, कब्जेदार और लाभार्थी की स्थिति सार्वजनिक की जाए।
दूसरा, कागज और जमीन का मिलान हो। केवल रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण पर्याप्त नहीं है। राजस्व कर्मचारी और प्रशासनिक अधिकारी खेत की मेड़ तक जाएं। यह देखा जाए कि रिकॉर्ड में दर्ज जमीन जमीन पर मौजूद भी है या नहीं।
तीसरा, जिन भूमिहीन परिवारों के नाम भूदान भूमि आवंटित हुई लेकिन जिन्हें वास्तविक कब्जा नहीं मिला, उनके मामलों की अलग सूची बने।
चौथा, जहां मूल लाभार्थी की मृत्यु हो चुकी है, वहां उसके वैध उत्तराधिकारियों की पहचान की जाए। जहां भूदान भूमि पर अतिक्रमण है, वहां कार्रवाई हो। जहां दशकों से मुकदमे लंबित हैं, वहां विशेष तंत्र बनाकर समयबद्ध समाधान किया जाए।
और पांचवां, पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक हो। बिहार के नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि उनके राज्य में भूदान के नाम पर कितनी जमीन आई थी और उसका आज क्या हुआ।यह सवाल केवल इतिहास का नहीं है।
बिहार में भूमि का सवाल आज भी सामाजिक न्याय का प्रश्न है। खेत का आकार, भूमिहीन मजदूरी, बटाई, ग्रामीण पलायन और कृषि से होने वाली आय—इन सबके पीछे भूमि-संबंधों की भूमिका है।
ऐसे समय में भूदान की विरासत को फिर से पढ़ना इसलिए जरूरी है कि उसने भूमि को केवल संपत्ति नहीं माना था। उसने संपत्ति के साथ सामाजिक जिम्मेदारी जोड़ने की कोशिश की थी।
आज बाजार में जमीन की कीमत बढ़ रही है। दूसरी ओर छोटे और सीमांत किसानों की आर्थिक कठिनाइयां बनी हुई हैं। भूमि अधिग्रहण, सड़क, उद्योग, आवास और विकास परियोजनाओं के लिए जमीन के सवाल नए रूप में सामने आते हैं। ऐसे समय में भूदान का मूल प्रश्न फिर प्रासंगिक हो जाता है—जमीन पर अधिकार का अंतिम औचित्य केवल कानूनी स्वामित्व है या उससे जुड़ी सामाजिक जिम्मेदारी भी?
बिहार के संदर्भ में यह प्रश्न और गहरा है क्योंकि यहां भूमि-संबंधों का इतिहास सामाजिक संबंधों के इतिहास से अलग नहीं रहा है।
विनोबा ने बिहार में केवल जमीन नहीं मांगी। उन्होंने समाज को अपने भीतर झांकने के लिए कहा। उनका विश्वास था कि हिंसा और संघर्ष से अलग भी सामाजिक परिवर्तन का रास्ता हो सकता है।
यही कारण था कि भूदान आगे चलकर ग्रामदान में बदला। विनोबा की दृष्टि में केवल भूमिहीन को जमीन देना पर्याप्त नहीं था। गांव की सामूहिक व्यवस्था, सहयोग और साझा जिम्मेदारी भी जरूरी थी। भूदान से ग्रामदान, संपत्तिदान, श्रमदान और शांति-सेना जैसे प्रयोगों तक जाने वाली यह यात्रा उसी व्यापक सर्वोदय चिंतन का हिस्सा थी।
बिहार में इस विचार की प्रतिध्वनि इसलिए अधिक तीखी थी क्योंकि यहां गांव केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि सामाजिक शक्ति-संबंधों की सबसे छोटी इकाई भी था।
इसलिए बिहार में भूदान की असली विरासत केवल दान में मिली जमीन की संख्या में नहीं है। वह इस सवाल में है कि क्या गांव अपने सबसे कमजोर व्यक्ति के अधिकार को स्वीकार करता है।
माखनलाल चतुर्वेदी ने विनोबा को अनबोलों की बोली और अकुलाते लोगों की गुहार कहा था। दिनकर ने ‘भूमिदान’ में भूदान को आने वाली सामाजिक चेतना की आहट के रूप में देखा। इन कविताओं में उस समय के भारत की आशा दिखाई देती है।
लेकिन 75 साल बाद कविता और जमीन के बीच की दूरी को भी देखना होगा।
किसी भूमिहीन परिवार के लिए जमीन कुछ डिसमिल या कुछ एकड़ भर नहीं होती। वह घर के चूल्हे की स्थिरता है। वह बच्चों की पढ़ाई की संभावना है। वह कर्ज से मुक्ति की उम्मीद है। वह गांव में सम्मान के साथ खड़े होने का आधार है।
इसलिए बिहार में भूदान की 75वीं वर्षगांठ का सबसे सार्थक आयोजन कोई बड़ा मंच नहीं, बल्कि किसी पुराने दानपत्र को खोजकर उसके लाभार्थी तक पहुंचाना होगा।
कोई भूदान की जमीन अतिक्रमण से मुक्त हो जाए।
किसी भूमिहीन परिवार को वर्षों बाद वास्तविक कब्जा मिल जाए।
किसी पुराने रिकॉर्ड में दर्ज जमीन खेत की मेड़ पर अपने सही हकदार तक पहुंच जाए।
तभी विनोबा की पदयात्रा का अधूरा रास्ता आगे बढ़ेगा।
भूदान की असली परीक्षा किसी स्मारक, समारोह या सरकारी फाइल में नहीं है। उसकी परीक्षा बिहार के उस खेत की मेड़ पर है, जहां एक भूमिहीन परिवार पहली बार यह कह सके—
“यह जमीन कागज पर ही नहीं, सचमुच मेरी है।”
यही भूदान का सपना था। और बिहार में 75 साल बाद भी यही उसका सबसे बड़ा अधूरा सच है।
( युवराज फीचर्स )
कुमार कृष्णन