लेखक परिचय

प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी, दैनिक समाचार पत्र दैनिक मत के प्रधान संपादक, कविता के क्षेत्र में प्रयोगधर्मी लेखन व नियमित स्तंभ लेखन.

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-प्रवीण गुगनानी-
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-केंद्र सरकार के गठन की पूर्व संध्या पर विशेष-

पिछले कुछ दिनों से जबकि पूरे देश में एक मत का यह वातावरण तैयार हो चुका है कि अगली लोकसभा में भाजपा मात्र सबसे बड़े दल के रूप में ही नहीं उभरेगी बल्कि स्पष्ट बहुमत भी प्राप्त करेगी. देश में एक बयार सी चल पड़ी है कि केंद्र की दिल्ली सरकार नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में ही बनेगी और बेहद स्थिर, दृढ़प्रतिज्ञ होकर तेजवंत, गुणवंत, बलवंत चरित्र से देश को प्रगति के मार्ग पर आगे ले जायेगी. यह एक अच्छी आशा है एक भारतीय के रूप में सभी यही चाहेंगे और चाहते हैं कि देश को एक स्थिर और बहुमत वाली सरकार मिलें ताकि वह अल्पमत और समर्थनों पर टिकी सरकार की विकलांग मानसिकता और दूसरों की दया दृष्टि पर जीने की सोच से परे हटकर केवल देश-विकास-समाज-लोकतंत्र और विश्व कल्याण की ओर एकांग दृष्टि गड़ाए तेजी से आगे बढ़ सके. आज देश के प्रत्येक नागरिक की शुभेक्षा यही होगी कि भारत माता का अक्षत तिलक हो और यह देवभूमि अपने परम वैभव को प्राप्त कर विश्व का नेतृत्व करें. हमारा वैश्विक नेतृत्व का इतिहास नहीं रहा किन्तु विश्व की प्रज्ञा, संज्ञा और विज्ञा के हम भारतीय स्त्रोत रहे हैं यह बात हम भी जानते हैं और शेष विश्व भी, यही वह तथ्य है जो वैश्विक शक्तियों को सक्रिय किये रहता है कि यदि कहीं भारत अपनी आंतरिक समस्याओं से मुक्त होकर उठ खड़ा हुआ तो उसके तेज, बल और बुद्धि का सामना करना असंभव होगा.

हम सभी इस तथ्य से भी एकमत ही हैं कि बहुत सी ऐसी भूमिगत विदेशी ताकतें और देश हैं जो वैश्विक राजनीति के परिप्रेक्ष्य में भारत का विकास सहन नहीं कर पाते हैं. ऐसी विदेशी शक्तियां भारत में छुपी और उसकी अन्तर्निहित प्राणशक्ति का तेज जानती है; उन्हें पता है कि यदि एक बार भारत वर्ष को कोई जागृत, चैतन्य, प्रेरक और प्रज्ञावान नेतृत्व मिल गया तो भारत के विकास को रोक पाना असंभव होगा! इस तथ्य में छिपी चेतावनी से हमारा देश-समाज भलीभांति परिचित है, और संभव है कि इस बार भी यदि लोकसभा के बहुमत में ज़रा सी भी कमी-बेशी हुई तो भारत की नई केन्द्रीय सरकार को अल्पमत सरकार बनाने के लिए ये विदेशी ताकतें एकजुट होकर चुनौती प्रस्तुत करेंगी. भगवान् न करें किन्तु यदि कहीं लोकसभा में संख्या का गणित जरा भी गड़बड़ाया तो विदेशी शक्तियां नरेन्द्र मोदी को प्रधानमन्त्री बननें से रोकने के लिए जो धन बहाएंगी उसकी कल्पना करना भी मुश्किल होगा. लोकतंत्र के चीरहरण और हत्याएं इस देश में पहले भी होती रहीं हैं, हमने सत्ता मोह का नग्न नृत्य इस देश में कई बार देखा है. विदेशी ताकतों और भारत में कमजोर केन्द्रीय नेतृत्व का स्वप्न देखने वाली शक्तियों ने प्राण-पण से प्रण कर रखा होगा और वे जान लगा देंगी यदि नरेन्द्र मोदी को और एनडीए को स्पष्ट न मिला तो! ये शक्तियां देश की बहुत जयाओं, द्रमुकों, ममताओं, नीतिशों, शरदों, मुलायमों आदि न जाने कितने ही सत्ता लोलूपों के सुर में अपना छद्म यक्षगान देश को सुननें को मजबूर कर सकती हैं. आज इस देश की आम जनता और इस देश का कण कण जिसमें यह कामना करता है कि केंद्र सरकार के गठन की इस पूर्व संध्या में भारतीय सांसदों की प्रज्ञा, संज्ञा, विज्ञा जागृत और चैतन्य होकर इनकी प्राण शक्ति पर स्वयं सरस्वती विराजें और इन्हें एक राष्ट्र हितैषी निर्णय लेने हेतु प्रेरित और संकल्पित करे.

आज जबकि नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमन्त्री बनने की ओर अग्रसर हैं तब हम जानते हैं कि सीमापार आतंकवाद, अंतर्राष्ट्री य अपराध और नशीले पदार्थों की तस्कपरी सहित भारत के सामने रक्षा क्षेत्र की गंभीर चुनौतियां हैं. इसमें अब नई चुनौतियां जुड़ गयी हैं, जैसे समुद्री और साइबर-आकाशीय चुनौतियां. हमारा समीपवर्ती भू-सामरिक वातावरण ऐसा है कि उसमें पारंपरिक, सामरिक और गैर-पारंपरिक रक्षा चुनौतियां सतत सक्रिय रहती हैं. भारत का सामरिक दायरा अदन की खाड़ी से आगे बढ़कर मलाक्कार जलडमरूमध्यम तक फैल चुका है और और चुनौतियां केवल बाह्य ही नहीं बल्कि आंतरिक क्षेत्रों में बहुतायत से फ़ैल गए विदेशी घुसपैठियों के कारण द्विगुणित हो गई हैं. पाकिस्तान, चीन, अमेरिका आदि कई देशों के मंसूबे भारत के विषय में क्या है, यह सर्वज्ञात है.

विदेशी शक्तियां जानती हैं कि हमारे नागरिकों की मानव श्रम क्षमता असीमित है, किन्तु उसके पोषण एवं देखरेख के लिए भारत में सस्तीा स्वा स्य्मि सेवा,बेहतर शिक्षा, बेहतर रोजगार, भरोसेमंद संरचना और विश्वस्त नागरिक संस्थानों का अभाव है. हर साल हमारी श्रम शक्ति में एक करोड़ से अधिक लोगों का इजाफा होता है, यह तथ्य विश्व की सैन्य और बाजारू शक्तियों को भारत के विरूद्ध खड़े रहनें और उसके शोषण युक्त वातावरण को बनाए रखने के लिए प्रेरित करता है. नए रोजगार अवसर पैदा करने के लिए यह जरूरी है कि हम अपनी विकास दर को कम से कम 8 प्रतिशत प्रति वर्ष करें जो कि आज की नैराश्य भरे वातावरण में असंभव बड़ा कठिन लगने लगा है. ये विदेशी ताकतें जानती हैं कि भारत की घरेलू बचत का ग्राफ सतत नीचें आ रहा है और निवेश भी कम से कमतर होता जा रहा है. आज जब इन चुनौतियों का सामना करने के लिए एकजुटता, कौशल, प्रशिक्षण, सिद्धांत, रणनीतियों, सहमति से निर्णय लेने की समेकित संरचना और एक संकल्पित नेतृत्व और प्रधानमन्त्री की आवश्यकता है तब संभव है कि हम बहुत से जयचंदों के षड्यंत्रों से किसी कमजोर सरकार को झेलने को मजबूर न होना पड़ जाए. एक ठेठ भारतीय की भांति हमारी प्राणशक्ति भारत की अगली सरकार के सुगठित, सुमंत्रशाली, शुभकारी और समृद्धशाली होने की कामना करें. सभी की यह कामना पूर्ण हो ऐसी मेरी भी प्रभु से प्रार्थना!

2 Responses to “विदेशी नहीं चाहेंगे कि तेजवंत, गुणवंत, बलवंत बनें केंद्र सरकार”

  1. Himwant

    इंदिरा की तेजवंत, बलवंत सरकार को चूहा बनाने के लिए महा-सत्ताओं ने अनेक खेल खेले थे. जाने अनजाने अनेक लोग उनके औजार बने. लोकनायक, यशवंत और ना जाने कौन-कौन ने वही किया जो महा-सत्ताएं चाहती थी. लेकिन भारत उन अनुभवों से गुजर चुका है. भारत रूपी शरीर में उन बैक्टरियायोँ को नष्ट करने वाली एंटीजेन मौजूद है. लेकिन चुनौती बड़ी है. हमें चौकन्ना रहना होगा. पता नहीं कौन किस रूप में उनके द्वारा प्रयोग कर लिया जाए. इंदिरा के बाद मोदी का उदय भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धी है.

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  2. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन

    “विदेशी नहीं चाहेंगे कि तेजवंत, गुणवंत, बलवंत बनें केंद्र सरकार”–बिलकुल सही कहा। विशेष रूपसे महासत्ताएँ ऐसा ही चाहती हैं।
    (१)हम ही अपनी विश्वबंधुत्व की भावना से ऐसे आत्म सम्मोहित होते हैं, और, मानने लगते हैं, कि, परदेशी सत्ताएँ भी ऐसे भाईचारे में मानती होंगी।
    (२) “जिसकी लकडी उसकी भैंस” इसी को सत्य मानकर विदेशी (विशेषकर) सत्ताएँ चलती है।
    बिलकुल समयानुकूल लेख के लिए धन्यवाद।

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