लेखक परिचय

प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी, दैनिक समाचार पत्र दैनिक मत के प्रधान संपादक, कविता के क्षेत्र में प्रयोगधर्मी लेखन व नियमित स्तंभ लेखन.

 मुस्लिम तीर्थ सऊदी में योग की जय जय  

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इस्लाम को जन्म देनें वाली भूमि, मुसलमानों की उद्गम भूमि सऊदी अरब ने शुद्ध वैदिक, सनातनी व हिंदू अवधारणा (कंसेप्ट) “योग” को एक खेल के रूप में मान्यता दे दी है.प्राचीन व प्रागेतिहासिक विश्वगुरु रहे भारत व हिंदूत्व हेतु यह एक छोटी सी घटना है किंतु वर्तमान परिप्रेक्ष्य के भारतीय सामजिक ताने बाने हेतु यह एक अनुकरणीय दृष्टांत है.एक आधिकारिक शासकीय घोषणा में सऊदी अरब ने न केवल योग को एक खेल के रूप में मान्यता दी है बल्कि योग को शरीर विज्ञान का अद्भूत ज्ञान पूंज बताते हुए इसकीमहिमा भी वर्णित की है. सऊदी के इस आदेश के तहत अब सऊदी अरब में योग के शिक्षण प्रशिक्षण, प्रचार, योग शिविर लगाने व इसके मेडिकल व्यावसायिक स्वरूप को भीमान्यता दे दी है. जब उधर इस्लाम के तीर्थ में योग के प्रसंशा गीत और स्वीकार्यता के आदेश लिखे जा रहे थे तब इधर भारत में भारतीय मुस्लिम झारखंड में योग की लानतमलामत कर रहे थे. झारखंड की राजधानी रांची में मुस्लिम समुदाय के लोग एक मुस्लिम लड़की राफिया नाज और उसकी मासूम बेटी के खून के प्यासे हो गए थे क्योंकि वहयोग सीखा रही थी. राफिया के योग करने और बच्चों को योग सिखाने से चिढ़े मुस्लिम युवाओं के एक समूह ने राफिया नाज और उसकी बेटी को बलात्कार और क़त्ल की धमकीदेते हुए योग बंद करने का फतवा दे दिया. विशुद्ध इस्लामिक देश सऊदी अरब में योग को एक खेल के तौर पर आधिकारिक मान्यता दे दी है, और अब वहां लाइसेंस लेकर योग सिखाया जा सकेगा. नोफ मारवाईनामक एक महिला ने ही सऊदी अरब में अभियान चलाकर योग को मान्यता दिलाई है. नोफ मरवाई को ही सऊदी अरब की पहली योग प्रशिक्षक का दर्जा भी मिल गया है. प्रश्नयह है कि जब इस्लाम के जन्म की धरती सऊदी अरब सहित कई मुस्लिम देश योग को अपना रहें हैं तो फिर भारतीय मुल्ला, मौलवियों और फतवेबाजों को योग से क्या आपत्तिहै?! स्पष्ट है कि यह आपत्ति योग से नहीं बल्कि भारतीयता से है. यह भी स्पष्ट है कि भारतीय मुस्लिम समाज के तथाकथित नेता भारत के इस्लाम को तनिक सा भी प्रगतिशील,शिक्षित व सुसंस्कृत होते हुये नहीं देखना चाहता. तभी तो सऊदी अरब में योग की स्वीकार्यता के सच को झूठलाते हुए, सच से मूंह छुपाते हुए और कुतर्क करते हुए देवबंद केउलेमा का कहना है कि सऊदी हुकूमत ने स्कूलों में वर्जिश को अनिवार्य किया है. योग तो शिर्क (गलत) है, इसलिए वहां की हुकूमत उसे कभी लागू नहीं कर सकती. फतवाऑनलाइन के चेयरमैन मौलाना मुफ्ती अरशद फारूकी भी भारत में अनावश्यक वितंडा फैला रहें है और बेसुरी जहरीली व साम्प्रदायिक राग आलाप रहें है कि सऊदी अरब केस्कूलों में किसी चीज को अनिवार्य किया गया है वो योग नहीं बल्कि वर्जिश है और शरीयत के लिहाज से योग शिर्क (वर्जित) है और सऊदी अरब अपने यहां शिर्क को कभी लागूनहीं कर सकता. और आगे बढ़ते हुए और सऊदी अरब के ज्वलंत सच को झूठलाते हुए उन्होंने कहा कि वर्जिश सही है, लेकिन योग इस्लामी नुकते नजर से गलत है, दुनिया केनक्शे में वो जो तब्दीलियां कर रहे हैं जरूरी नहीं की हम भी उन्हें माने. हम सिर्फ शरीयत को मानते और उसी पर चलते हैं, और शरीयत में योग की कोई गुंजाइश नहीं है. भारतमें कट्टरपंथी मुस्लिमों द्वारा भारतीय मूल्यों से हद दर्जे की घृणा करने और समाज में धार्मिक उन्माद का जहर फैलाने का यह कोई प्रथम अवसर नहीं है. कट्टरपंथी, धर्मान्थ औरघोर हिंदू विरोधी मुस्लिम तत्व ऐसा अक्सर करते रहते हैं. ऐसा हर बार होता है कि भारतीय मुस्लिमों द्वारा, भारत की प्राचीनता, संस्कृति, धर्म व परम्पराओं से उपजी किसीभी बात को, कुतर्कों के आधार पर  अनावश्यक ही शरियत विरोधी सिद्ध कर दिया जाता है. आज परम आवश्यकता इस बात की हो गई है कि भारत का पढ़ा लिखा, सभ्य,प्रगतिशील मुस्लिम वर्ग इस बात को समझें व इन कट्टरपंथी, तर्कहीन, अशिक्षित, लट्ठमार मुसलमानों से स्वयं को अलग करके भारत में एक नई इबारत लिखने हेतु आगे बढ़े.भारतीय मुस्लिमों के शिक्षित वर्ग को योग ही नहीं बल्कि हर विषय में, इन कट्टरपंथियों से यह बात पूछना चाहिए कि उन्हें योग से घृणा या भारतीय संस्कृति से? आज सऊदीअरब ने विशुद्ध वैदिक विचार, योग को स्वीकार्यता देकर भारतीय मुस्लिमों के समक्ष एक सकारात्मक पहल प्रस्तुत कर दी है. अब भारतीय मुस्लिम कट्टरपंथियों के फतवों वउन्मादित बातों में न आयें व योग को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार कर प्रेम, सौहाद्र व सद्भाव का एक उदाहरण प्रस्तुत करे. आज जब योग को सम्पूर्ण विश्व स्वीकार कर चुका है.संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा धरती के सबसे लम्बे व दीर्घ दिन 21 जून को “विश्व योग दिवस” की मान्यता मिल चुकी है, तब भारतीय मुस्लिमों द्वारा योग का विरोध करना कूए केमेंढक बने रहने जैसा ही कहलायेगा और उनके घोर धर्मांध होनें व धर्म के नाम पर अनावश्यक ही हर भारतीय विचार के विरोधी होने की एक ज्वलंत प्रतीक घटना भी बनजायेगी. अमेरिकी नागरिक डेविड फ्राली ने सऊदी अरब द्वारा योग को स्वीकार किये जाने के संदर्भ में भारत के मुस्लिम समुदाय व ईसाई समुदाय से बड़ा ही सटीक प्रश्न किया हैकि जब समूचा विश्व योग को एक आयुर्विज्ञान विषय मान रहा है तब केवल भारत के मुस्लिम ही इसका विरोध करते क्यों दिखलाई पड़ रहे हैं?! भारतीय मुस्लिम जगत में योग को लेकर तब ही विरोध के स्वर सामने आ गये थे जब    पहली बार विश्व भर मे 21 जून 2015 को योग दिवस प्रतिष्ठा पूर्वक मनायागया था.  भारतीय मुस्लिम योग के धार्मिक न होने के तथ्य को नरेन्द्र मोदी के उस कथन से भी समझ सकते हैं जो उन्होंने 27 सितम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपनेभाषण में कहा था कि – “योग भारत की प्राचीन परंपरा का एक अमूल्य उपहार है यह दिमाग और शरीर की एकता का प्रतीक है; मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य है;विचार, संयम और पूर्ति प्रदान करने वाला है तथा स्वास्थ्य और भलाई के लिए एक समग्र दृष्टिकोण को भी प्रदान करने वाला है. यह योग केवल व्यायाम के बारे में नहीं है,अपितु अपने भीतर एकता की भावना, दुनिया और प्रकृति की खोज के विषय में है. हमारी बदलती जीवन शैली में यह चेतना बनकर, हमें जलवायु परिवर्तन से निपटने में मददकर सकता है”. मोदी के इस कथन के बाद 11 दिसम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र में 193 सदस्यों द्वारा 21 जून को  “अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस” को मनाने के प्रस्ताव को मंजूरी मिलीथी. भारत के इस योग के प्रस्ताव को विश्व समुदाय ने मात्र  90 दिन के अंदर पूर्ण बहुमत से पारित किया, जो कि संयुक्त राष्ट्र संघ में किसी दिवस प्रस्ताव के लिए सबसे कमसमय है. आज विश्व के 177 देशों में योग को वैधानिक मान्यता मिली हुई है. आशा है योग की अन्तराष्ट्रीय मान्यता, योग के आयुर्वैज्ञानिक महत्त्व, इसकी सहज, निःशुल्क उपब्धता व महातम्य को देखते हुए भारतीय मुस्लिमों में से ही शिक्षितमुस्लिमों का एक बड़ा वर्ग योग को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार करके इस्लाम को प्रगतिवाद के मार्ग पर अग्रसर करेगा.

“सत्यमेव जयते” संग “शक्तिमेव जयते” का उपयुक्त समय

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संदर्भ: कमल हासन दक्षिण व मुम्बईया फिल्मों में लम्बी पारी खेल चुके कमल हासन अपने व्यक्तिगत जीवन के सम्बंधों में एक असफल व्यक्ति रहे हैं. जिन्हें हम जीवन सम्बंध कहते हैं व उनके प्रति निष्ठावान व गंभीर रहते हैं ऐसे उनके जीवन सम्बंध अत्यंत तदर्थ, अस्थायी व विवादास्पद ही नहीं बल्कि हास्यास्पद और भोंडे प्रकार के… Read more »



 केवल हिंदुत्व में ही हस्तक्षेप न्यायालय श्रीमान का!!

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संदर्भ: पटाखों पर प्रतिबंध दो तथ्य भारतीय न्याय व्यवस्था के समक्ष विनम्रता पूर्वक रखना चाहता हूँ 1. हिंदुत्व हजारों वर्षों से एक विकसित जीवन शैली रही है. और 2. यह सांस्कृतिक जीवन शैली अपना उन्नति मार्ग स्वयं ही खोजती रही है. इसे संक्षिप्त विस्तार दूं तो यह व्यक्तव्य होगा कि हिंदू जीवन शैली व इसके… Read more »

दशहरे का विरोध: विदेशी शक्तियों की नई चाल

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         प्रसिद्द साहित्यकार हजारी प्रसाद द्विवेदी ने एक प्रख्यात निबंध लिखा है – “नाखून क्यों बढ़ते हैं”. प्रस्तुत संदर्भ में यह निबंध नितांत प्रासंगिक है. वस्तुतः नाखून हमारी बर्बरता, बुराई व दुर्गुणों का प्रतीक हैं जिनका समय समय पर बढ़ना मानवीय प्रक्रिया है और इन दुर्गुणों का नाश अर्थात नाखून काट लेना ही हममे सद्गुणों… Read more »

आतंकियों के सहयोगी रोहिंग्याइयों के हमदर्द शाही इमाम

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बांग्लादेशी घुसपैठियों का मामला पूर्व से ही देश के समक्ष एक चुनौती बन कर खड़ा हुआ है. आसाम और अन्य कुछ पूर्वोत्तर राज्यों में सामाजिक तानेबाने व स्थानीय शांति व्यवस्था के लिए घातक ख़तरा बन चुके ये घुसपैठिये तमाम प्रकार की आपराधिक व आतंकवादी गतिविधियों में संलग्न रहते हैं. मालदा जो कि मुस्लिम बहुल जिला… Read more »

हामिद अंसारी: अभिव्यक्ति या षड्यंत्र 

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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इस देश में, चर्चा का एक जीवंत विषय रही है. किंतु पिछले तीन वर्षों से इस विषय का वितान व विस्तार कुछ विचित्र और कुछ अजब सा हुआ है. आज के समय में मीडिया के सीमित दृष्टिकोण (फोकस्ड) ने कुछ भी कहने, सुनने, लिखने को पार्टी विशेष के प्रति निष्ठा कहना प्रारंभ… Read more »

शाहबानो से शायरा बानो तक

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यह बड़ा ही शर्मनाक तथ्य है कि जो तीन तलाक पाकिस्तान जैसे कट्टरपंथी इस्लामिक देश में 1961 में प्रतिबंधित हो गया  और पच्चीसों अन्य अरब-इस्लामिक देशों में दशकों से प्रतिबंधित है वही तीन तलाक भारत में आज भी शाहबानों से लेकर शायरा बानों तक कछुआ चाल से ही पहुँच पाया है. शायरा बानो वह मुस्लिम… Read more »

बिहार प्रहसन अर्थात 2019 की पटकथा 

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इतिहास साक्षी रहा है कि बहुत से अवसरों पर गंगा किनारे बसे नगर प्राचीनतम नगर पाटलिपुत्र ने भारत के इतिहास की दशा और दिशा परिवर्तित की है। पाटलिपुत्र का एतिहासिक व तात्कालिक महत्व सदा जीवित ही नही अपितु चैतन्य व जागृत रहा है। मौर्यों के समय, गुप्तवंश के समय, मुगलों के समय, गुरु गोविंदसिंग के… Read more »

एक स्वयंसेवक का राष्ट्रपति बनना

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यूं तो भारत में राष्ट्रपति भवन का अपना एक सुसंस्कृत, विद्वतापूर्ण, व गरिमामय इतिहास रहा है( कांग्रेस के तीन चयन – फखरुद्दीन अली अहमद, ज्ञानी जैलसिंह व प्रतिभा पाटिल के अपवाद छोड़ देवें). भारत के राष्ट्रपतियों व उपराष्ट्रपतियों की इस गौरवशाली परंपरा में अब एक स्वयंसेवक के राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति बनने की नई अनूठी कड़ी… Read more »

  प्रखर राष्ट्रवाद का प्रतीक इजराइल और मोदी  

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आज भारत को अमेरिका के पश्चात सबसे अधिक हथियार प्रदाय करनें वाला देश इजराइल है. कृषि क्षेत्र में भी इजराइल बहुत अग्रणी तकनीक वाला राष्ट्र है. इजराइल की कृषि तकनीक गजब की जल बचत की तकनीक है जिसकी आवश्यकता भविष्य में समूचे विश्व को पड़ने वाली है. कृषि क्षेत्र में भारत द्वारा बनाए जा रहे 26 सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में से 15इजराइल के सहयोग से विकसित किये जा रहे हैं.