लेखक परिचय

प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी, दैनिक समाचार पत्र दैनिक मत के प्रधान संपादक, कविता के क्षेत्र में प्रयोगधर्मी लेखन व नियमित स्तंभ लेखन.

  कश्मीर की पंचामृत सरकार का विसर्जन

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प्रवीण गुगनानी सीजफायर केवल सेना व आतंवादियों में नहीं था, भाजपा व पीडीपी में भी था. संघर्ष विराम पिछले रमजान माह मात्र में नहीं था बल्कि साढ़े तीन वर्षों से चल रहा था. सीजफायर छः वर्षों के लिए किया गया था जिसे साढ़े तीन वर्षों में अब योजना बद्ध नीति से तोड़ा गया है. विराम… Read more »

प्रणब मुखर्जी का संघ मुख्यालय जाना  

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प्रवीण गुनगानी इन दिनों संघ के प्रति उत्सुकता जिज्ञासा को शत प्रतिशत बढ़ा दिया है पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने ! हुआ कुछ यूं कि संघ के व्यवस्थापकों ने नागपुर में प्रति वर्ष अपने नागपुर मुख्यालय में होने वाले संघ के तृतीय वर्ष के समापन आयोजन में, जिसे दीक्षांत समारोह भी कहा जा सकता है;… Read more »



 टीपू सुल्तानी सोच व हिंदू -लिंगायत विभाजन की पराजय

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 प्रवीण गुगनानी            कर्नाटक बना दक्षिण में भाजपा का स्वागत द्वार कर्नाटक विधानसभा चुनाव के संदर्भ में एक बात बड़ी ही स्पष्ट दिख रही थी; और वह यह थी कि कांग्रेस इस चुनाव को अपना अंतिम किला बचाने की लड़ाई के रूप में देख रही थी और भाजपा इस चुनाव में कर्नाटक को अपने दक्षिणी राज्यों… Read more »

कर्नाटक में कांग्रेस का कुटिल दांव – हिंदू लिंगायत विभाजन

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प्रवीण गुगनानी भारत में हिंदू को अल्पसंख्यक बनाने के षड्यंत्र पूर्वक प्रयास पिछले कई दशकों से चल रहें हैं. प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष चलने वाले इन षड्यंत्रों को कई रूपों में अलग अलग प्रकार से चलाया जाता है. मुस्लिम व ईसाई जनसंख्या को वभिन्न माध्यमों से बढ़ाने के अतिरिक्त एक और अन्य  तरीका अपनाया गया है हिन्दूओं को… Read more »

रामराज:  आधुनिक भारत की सर्वोपरि आवश्यकता

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राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट. ये वाक्य न जानें कहनें वाले ने किन अर्थों में किस आव्हान को करते हुए कहा था किन्तु वर्तमान भारत में यह आव्हान चरितार्थ और सुफलित होता दिखाई पड़ रहा है. तथ्य है कि भारत में जब यहाँ के एक सौ तीस करोड़ लोग बात करतें… Read more »

संत रैदास: धर्मांतरण के आदि विरोधी – घर वापसी के सूत्रधार   

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प्रवीण गुगनानी लगभग सवा छः सौ वर्ष पूर्व 1398 की माघ पूर्णिमा को काशी में जन्में संत रविदास यानि संत रैदास को निस्संदेह हम भारत में धर्मांतरण के विरोध में स्वर मुखर करनें वाली और स्वधर्म में घर वापसी करानें के प्रथम या प्रतिनिधि संत कह सकतें है. धर्मांतरण हिन्दुस्थान में सदियों से एक चिंतनीय विषय रहा… Read more »

 स्वामी विवेकानंद: भारतीय संस्कृति के वैश्विक उद्घोषक  

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स्वामी विवेकानंद जी ने भारत को व भारतत्व को कितना आत्मसात कर लिया था यह कविवर रविन्द्रनाथ टैगोर के इस कथन से समझा जा सकता है जिसमें उन्होनें कहा था कि – “यदि आप भारत को समझना चाहते हैं तो स्वामी विवेकानंद को संपूर्णतः पढ़ लीजिये”. नोबेल से सम्मानित फ्रांसीसी लेखक रोमां रोलां ने स्वामी जी के… Read more »

बांग्लादेशी घुसपैठियों पर निर्णायक मूड में नमो सरकार

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अंततः संघ परिवार की नीतियों के अनुरूप बांग्लादेशी घुसपैठियों के संदर्भ में असम की सर्वानंद सरकार ने व केंद्र कीनमो सरकार ने अपना राष्ट्रवादी मास्टर प्लान लागू कर दिया है. 22 फरवरी 2014 को, लोस चुनाव के दौरान भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी ने असम के सिलचर में कहा था- ‘बांग्लादेश से दो तरह के लोगभारत में आए हैं. एक शरणार्थी हैं जबकि दूसरे घुसपैठिये. अगर हमारी सरकार बनती है तो हम बांग्लादेश से आएहिंदू शरणार्थियों को नागरिकता देने के साथ ही घुसपैठियों को यहां से बाहर खदेड़ने का भी वादा करते हैं.’ भाजपा नेअसम में लोकसभा व विधानसभा दोनों चुनावों में “जाति, माटी, भेटी” यानि जाति, जमीन और अस्तित्व की रक्षा करनेके नाम पर वोट मांगे थे. सत्ता में आने के बाद 19 जुलाई 2016 को नमो सरकार के गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने लोकसभा में ‘नागरिकता(संशोधन) विधेयक,2016’ पेश किया. यह विधेयक 1955 के उस ‘नागरिकता अधिनियम’ में बदलाव के लिए था, जिसकेजरिए किसी भी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता तय होती है. इस विधेयक में प्रावधान था कि अफगानिस्तान, बांग्लादेशऔर पकिस्तान से आने वाले हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई लोगों को ‘अवैध प्रवासी’ नहीं माना जाएगा.’इसका सीधा सा अर्थ ये था कि इसके जरिए बांग्लादेशी हिंदुओं को भारत की नागरिकता दी जानी थी. अब इस दिशा मेंठोस कदम के रूप में NRC यानि नैशनल रजिस्ट्रेशन ऑफ सिटिजन का पहला ड्राफ्ट 31 दिसंबर की रात सामने आयाहै. इस ड्राफ्ट में असम के कुल 3.29 करोड़ लोगों में से 1.9 करोड़ लोगों को जगह दी गई और उन्हें कानूनी तौर परभारत का नागरिक मान लिया गया है. वहीं बचे हुए लोगों का प्रमाणीकरण हो रहा है, जिसके बाद उनका नाम इसलिस्ट में शामिल किया जाएगा. जो व्यक्ति इस लिस्ट में अपना नाम दर्ज नहीं करवा पाएंगे या उनके पास इसके लिएज़रूरी कागजात नहीं होगें, उन्हें असम का नागरिक नहीं माना जाएगा और उन्हें देश के बाहर जाना पड़ेगा. 1971 मेंजब पाकिस्तान विभाजन ले पश्चात बांग्लादेश अस्तित्व में आया, उसके बाद से ही असम घुसपैठियों के विषय  चर्चितरहने लगा था. असम के रास्ते घुसपैठिये देश में घुसकर देश के प्रत्येक हिस्से में जाकर बसने लगे थे.  बांग्लादेश के निर्माणके दौरान बड़े पैमाने पर हिंसा हुई व वहां की एक बड़ी आबादी भारत आकर बस गई थी, इसमें हिंदुओं के अलावामुस्लिमों की भी बड़ी आबादी थी. 1971 के इस दौर में लगभग 10 लाख बांग्लादेशी असम में ही बस गए. 1971 के बादभी बड़े पैमाने पर बांग्लादेशियों का असम में आना जारी रहा. बांग्लादेश के लोगों की बढ़ती जनसंख्या ने  असम केस्थानीय लोगों में भाषायी, सांस्कृतिक व सामाजिक असुरक्षा की स्थितियां उत्पन्न कर दी. घुसपैठिये असम में नाना प्रकारसे अशांति, अव्यवस्था, अपराध  व उत्पात  मचाने लगे. 1978 में असम के मांगलोडी लोकसभा क्षेत्र के उपचुनाव केदौरान चुनाव आयोग के ध्यान में आया कि इस चुनाव में वोटरों की संख्या में कई गुना वृद्धि हो गई है. चुनावी गणित वतुष्टिकरण की नीति के चलते सरकार  ने 1979 में बड़ी संख्या में अवैध बांग्लादेशियों को भारतीय नागरिक बना लिया.असम में ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) और असम गण संग्राम परिषद के नेतृत्व में बांग्लादेशी घुसपैठियों पर सरकारी नीति के विरोध में आन्दोलन हुआ और असम भड़क गया. आसू व अगप को असम की स्थानीय जनता ने बहुतप्यार व समर्थन दिया. छात्र संगठन आसू ने असम आंदोलन के दौरान ही 18 जनवरी 1980 को केंद्र सरकार को एकNRC अपडेट करने हेतु ज्ञापन दिया. इस बड़े व हिंसक आन्दोलन की परिणति 1985 में असम में राजीव गांधी के साथ “असम समझौते” के रूप में हुई. 1999 में वाजपेयी सरकार ने इस समझौते की समीक्षा की और 17 नवंबर 1999 कोतय किया गया कि असम समझौते के तहत NRC को अपडेट किया जाना चाहिए. अटल जी की सरकार जाने के बाद2005 में मनमोहन सरकार भी इस निर्णय पर कायम रही व NRC की समीक्षा हेतु  बारपेटा और चायगांव में पायलटप्रोजेक्ट शुरू किया गया. असम के कुछ संगठनों ने इसका विरोध शुरू कर दिया और वहां हिंसा हो गई और असम कीगोगोई सरकार इसमें बेतरह विफल रही. इसके बाद नेता सर्वानंद सोनोवाल ने 2013 में बांग्लादेश के घुसपैठ के मुद्दे कोसुप्रीम कोर्ट में उठाया और न्यायालय ने NRC 1951 को अपडेट करने का आदेश दिया जिसमें 25 मार्च, 1971 से पहलेबांग्लादेश से भारत में आने वाले लोगों को स्थानीय नागरिक माने जाने की बात कही गई थी और उसके बाद के असम मेंपहुंचने वालों को बांग्लादेश वापस भेजने के आदेश दे दिए गए थे. सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय के बाद ही NRC कीसमीक्षा व अपडेशन का कार्य प्रारम्भ हुआ और 1951 की जनगणना में शामिल अल्पसंख्यकों को राज्य का नागरिक मानलिया गया. 1951 से 25 मार्च, 1971 के बीच असम में आने वाले बांग्लादेशी शरणार्थियों के पास वैध कागजात नहीं थे.एनआरसी को अपडेट करने के दौरान पंचायतों की ओर से जारी नागरिकता प्रमाणपत्र को मान्यता नहीं दी जा रही थी.इसके बाद मामला असम हाईकोर्ट में पहुंच गया. हाई कोर्ट ने लगभग 26 लाख लोगों के पहचान के दस्तावेज अवैध करारदे दिए. इसके बाद मामला एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया. असम की सर्वानंद  सरकार ने न्यायालय केआदेशानुसार 31 दिसंबर 2017 को नैशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस (एनआरसी) का पहला ड्राफ्ट जारी कर दिया जिसमेंअसम के कुल 3.29 करोड़ लोगों में से 1.9 करोड़ लोगों को कानूनी तौर पर भारत का नागरिक माना गया. यद्दपिरजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया शैलेष ने ड्राफ्ट को जारी करते हुए कहा है कि लोगों कलो घबराना नहीं चाहिए व इसकेबाद और वेरिफिकेशन होगा व और ड्राफ्ट भी जारी होगा. लिस्ट जारी होने के बाद असम सरकार के वित्त मंत्री औरनागरिकता रजिस्टर के इंचार्ज हेमंत विश्व शर्मा ने कहा कि जिन लोगों का नाम एनआरसी रजिस्टर में नहीं है, उन्हें हरहाल में देश छोड़ना होगा. अब देखना यह है कि हमारा देश एक दीर्घ प्रतीक्षा के बाद किस प्रकार और कब बांग्लादेशीघुसपैठियों की समस्या से मुक्ति पायेगा.  

 सबके अटल जी

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प्रसिद्द दार्शनिक सुकरात ने कहा था कि “जिस देश का राजा कवि होगा उस देश में कोई दुखी न होगा” – अटल जी के प्रधानमंत्रित्व काल में यह बात चरितार्थ हो रही थी. स्वातंत्र्योत्तर भारत के नेताओं में कुछ ही ऐसे नेता हुए हैं जो विपक्षियों से भी सम्मान पातें हों. और ऐसे जननेता तो… Read more »

 मप्र भाजपा सरकार – कन्याओं को उपहार

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भारतीय संस्कृति के मूलाधार वेदों में से अथर्व वेद में कहा गया है – यत्र नार्यन्ति पूज्यन्ते – रमन्ते तत्र देवताः। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्रफला: क्रिया।। अर्थात जहां स्त्रियों का सम्मान होता है, केवल वहीँ देवी-देवता निवास करते हैं. जिन घरों में स्त्रियों का अपमान होता है, वहां सभी प्रकार की पूजा, अनुष्ठान आदि करने के बादभी भगवान निवास नहीं करते हैं, और वहां दरिद्रता, विपन्नता व समस्याओं का चिर निवास हो जाता है.                स्त्री विमर्श भारत की संस्कृति का एक मूल अंग रहा है.पश्चिम की तरह नारी विमर्श हमारे देश में एक अलग विचारधारा नहीं रही अपितु समग्र मानवीय विकास में हमने नारी को उच्चतम स्थान देकर अपनी विकास यात्रा की है.1968 में फ्रांस के नारी मुक्ति आन्दोलन की प्रमुख व पश्चिमी नारी विमर्श की जनक सिमान द ब्वाँ ने नारी स्थिति पर कहा और सम्पूर्ण पश्चिम ने माना की “ नारी जन्म नहीं लेती बल्कि उसे… Read more »