राजनीति

भाजपा ने टीएमसी के साथ कॉन्ग्रेस और वामपंथी दलों की लुटिया भी डुबो दी


रामस्वरूप रावतसरे

15 साल से बंगाल की सत्ता पर काबिज रहने वाली ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस के दिन अब लद गए हैं। भाजपा ने जबरदस्त पटखनी देते हुए न सिर्फ टीएमसी को हराया है बल्कि कॉन्ग्रेस और वामपंथी दलों की लुटिया डुबो दी है। ममता से पहले 34 साल तक सीपीएम के नेतृत्व में वामपंथी दलों का शासन यहाँ रहा है। उससे पहले कॉन्ग्रेस का शासन था। भाजपा पहली बार बंगाल में इतिहास रचने जा रही है।
भाजपा के जबरदस्त सफलता का श्रेय पीएम मोदी और अमित शाह की मजबूत रणनीति को जाता है। उन्होंने राज्य की कमान सीधे संभाल कर चुनावी फिजा बदल दी । राज्य बनाम केन्द्र की पॉलिटिक्स करने वाली ममता बनर्जी को मात दी और जनता को बताने में सफल रहे कि केन्द्रीय योजनाओं को ममता बनर्जी सरकार ने लागू नहीं कर राज्य की जनता का नुकसान किया। पीएम मोदी का मजबूत और भरोसेमंद चेहरा आगे कर भाजपा ने जमीन पर जमकर पसीना बहाया।
भाजपा ने संगठन को मजबूत कर एक-एक बूथ पर अलग रणनीति बनाई । बूथ मैनेजमेंट से लेकर वॉर रूम तक पर गृहमंत्री अमित शाह की नजर रही। पार्टी के कैडर तक को यह विश्वास दिलाया कि ममता बनर्जी की सरकार को बदला जा सकता है। ममता के खौफ का यह आलम था कि जनता उनके खिलाफ बोलने से कतराती थी। उस जनता ने इस बार टीएमसी के गुंडों को हराने का निश्चय किया और ममता की पार्टी के खिलाफ वोट डाला। हालाँकि टीएमसी का जमीन पर नेटवर्क हमेशा मजबूत रहा है, इसलिए चुनाव में टक्कर देखने लायक रही।
जानकारों के अनुसार टीएमसी द्वारा हर बार जनता को डराया धमकाया जाता था। इस बार चुनावों में बड़ी संख्या में अर्धसैनिक बलों की तैनाती, सीसीटीवी कैमरे लगाए गए। चुनाव को अपेक्षाकृत शांतिपूर्वक और निर्भय मतदान का संकल्प चुनाव आयोग ने पूरा किया। एसआईआर के माध्यम से वोटर लिस्ट का शुद्धिकरण को लेकर माइग्रेंट यानी प्रवासी बड़ी संख्या में बंगाल पहुँचे। लाखों प्रवासी बंगालियों ने वोट डाला। दिल्ली-एनसीआर ही नहीं कई शहरों से प्रवासी बंगाली नागरिक वापस लौटे। दो चरणों में मतदान के चुनाव आयोग के फैसले ने टीएमसी के फर्जीवाड़े को रोकने में काफी हद तक सफलता पाई। फर्जी नामों के हटने का असर चुनाव के परिणाम पर पड़ा। इसके अलावा पहले के चुनावों में टीएमसी के कैडर एक क्षेत्र से चुनाव होने के बाद दूसरे क्षेत्र में जाकर लोगों को डराते-धमकाते थे और खून खराबा करते थे लेकिन इस बार यह मौका नहीं मिला।
भाजपा की जीत में महिला वोटरों का अहम रोल रहा है। महिला सुरक्षा बंगाल में अहम मुद्दा रहा। भाजपा ने संदेशखाली और आरजीकर जैसी घटनाओं को टीएमसी के खिलाफ चुनाव में हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया। महिला सम्मान की बात की। इसके अलावा केन्द्रीय योजनाओं को लागू करने और भाजपा द्वारा 3000 रुपए हर महीना महिलाओं को देने का वादा रंग लाया। हालाँकि ममता बनर्जी ने लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं के माध्यम से 1500 रुपए हर महीना महिलाओं को दे रही है। लेकिन, महिला सम्मान और सुरक्षा के साथ-साथ महिला आरक्षण को लेकर टीएमसी का मुखर विरोध महिलाओ को भाजपा के पक्ष में खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई। कुल मिलाकर महिलाओं का आशीर्वाद भाजपा को मिला।
मुस्लिम तुष्टिकरण की टीएमसी की राजनीति ने इस बार हिन्दुओं को जोड़ा। बंगाल में करीब 30 फीसदी मुस्लिम आबादी है। परंपरागत रूप से ये टीएमसी के वोटर हैं लेकिन इस बार कई नए दावेदार मैदान में उतरे थे। एआईएमआईएम और हुमायूँ कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी ने मुस्लिम वोटों में सेंधमारी की। कॉन्ग्रेस और लेफ्ट तो पहले से मौजूद ही थी। चुनाव में हिन्दू वोटरों को एकजुट करने में भाजपा काफी हद तक सफल रही और आक्रामक रणनीति बना कर नए समीकरण पैदा किए। राज्य में करीब 68 फीसदी हिन्दू आबादी है। पिछले 15 साल से टीएमसी के राज में इन्हें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। 15 सालों से सत्ता पर काबिज ममता बनर्जी की सरकार को जनता बदलना चाहती थी। यही वजह है कि ‘परिवर्तन’ चाहने वाली बड़ी आबादी ने बाहर आकर चुपचाप भाजपा को वोट डाला। खराब कानून व्यवस्था, बेरोजगारी से परेशान लोगों ने विकास को चुना।
 बंगाल चुनाव में इस बार न तो कॉन्ग्रेस और न ही लेफ्ट विकल्प देने की स्थिति में थी। इसलिए जानकार मान रहे हैं कि ममता राज को उखाड़ फेंकने के लिए कॉन्ग्रेस और लेफ्ट के समर्थकों ने भी भाजपा को वोट किया। 24 परगना और उसके आसपास के क्षेत्रों में मतुआ फैक्टर काफी कारगर रहा। सीएए को लेकर इस समुदाय को भाजपा से काफी उम्मीदें हैं। ये लोग भाजपा के वोटर हैं और इन लोगों ने अपने इलाके में भाजपा के पक्ष में हवा बनाने में अहम भूमिका निभाई। स्थानीय मुद्दों के साथ साथ पीएम मोदी के चेहरे पर भरोसे का असर इस बार दिखा।
जानकारों के अनुसार पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से शोर, रैलियों और बड़े चेहरों के इर्द-गिर्द घूमती रही है लेकिन 2021 की हार के बाद भाजपा ने अपनी रणनीति को पूरी तरह बदल दिया। इस बार मुकाबला सिर्फ मंच से दिए गए भाषणों का नहीं था। पर्दे के पीछे एक ऐसी टीम काम कर रही थी, जिसने बंगाल की सियासी जमीन पर ‘साइलेंट स्ट्राइक’ की तैयारी की। यह कोई अचानक हुआ बदलाव नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी और सधी हुई इंजीनियरिंग थी। साल 2021 के विधानसभा चुनाव नतीजों ने भाजपा की कई कमजोरियों को उजागर किया था। पार्टी में गुटबाजी, बूथ लेवल पर कार्यकर्ताओं की कमी और सिर्फ केंद्रीय नेतृत्व के भरोसे रहना भारी पड़ा था। कैलाश विजयवर्गीय के समय पार्टी बढ़ी तो जरूर, लेकिन वह ढांचागत मजबूती नहीं मिल पाई जो टीएमसी जैसे कैडर बेस दल को टक्कर दे सके।
इसी कमी को पूरा करने के लिए भाजपा ने तीन दिग्गजों की एक कोर टीम तैयार की। सुनील बंसल, भूपेंद्र यादव और अमित मालवीय। इन तीनों ने मिलकर बंगाल में अनुशासन और माइक्रो मैनेजमेंट का नया अध्याय लिखा।
सुनील बंसल को भाजपा के भीतर एक कुशल संगठनकर्ता माना जाता है। उन्होंने बंगाल में किसी राजनीतिक अभियान की तरह नहीं, बल्कि एक कॉर्पारेट प्रोफेशनल की तरह काम किया। बंसल का फोकस सुर्खियों पर नहीं था। उन्होंने अपना पूरा ध्यान बूथ कमेटियों को दुरुस्त करने पर लगाया। हर जिले की रिपोर्ट सीधे दिल्ली पहुंचने लगी और डेटा सिस्टम को इतना मजबूत किया गया कि पल-पल की खबर लीडरशिप तक पहुंचने लगी।
बंसल ने यह सुनिश्चित किया कि पार्टी सिर्फ चुनाव के समय सक्रिय न दिखे। उन्होंने इसे एक स्थायी मशीनरी में बदल दिया। अब भाजपा बंगाल में सिर्फ रैलियां करने वाली पार्टी नहीं रही बल्कि हर गांव और मोहल्ले में उसकी मौजूदगी महसूस होने लगी। उनके इस सिस्टम ने कार्यकर्ताओं के भीतर फिर से वह भरोसा पैदा किया जो 2021 की हार के बाद कहीं खो गया था। अगर सुनील बंसल ने सिस्टम बनाया तो भूपेंद्र यादव ने उसे जमीन पर उतारने का काम किया। साल 2024 के अंत से ही यादव ने बंगाल में डेरा डाल दिया था। उनकी कार्यशैली बहुत शांत लेकिन बेहद दखल देने वाली रही है।
वे दिल्ली की रणनीतियों और बंगाल की हकीकत के बीच एक पुल की तरह काम करते रहे। उनकी अनुशासनप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे समय के बेहद पाबंद हैं। बंगाल में उन्होंने जातिगत समीकरणों और कम्युनिटी आउटरीच पर बारीकी से काम किया। उनकी बैठकों का दौर आधी रात तक चलता था ताकि हर सीट का सटीक आकलन किया जा सके।
आज के दौर में चुनाव सिर्फ जमीन पर नहीं, बल्कि लोगों के मोबाइल स्क्रीन पर भी लड़े जाते हैं। अमित मालवीय ने बंगाल में यही मोर्चा संभाला। उनकी भूमिका सिर्फ मैसेज भेजने तक सीमित नहीं थी। वे उम्मीदवारों के चयन से लेकर किस मुद्दे को कब बड़ा बनाना है, इस पर पूरी नजर रखते थे। उन्होंने डिजिटल नैरेटिव को जमीनी अभियान से इस तरह जोड़ा कि विरोधी टीम को संभलने का मौका ही नहीं मिला।
भाजपा की राजनीतिक सूझबूझ और संगठनात्मक रणनीति का ही परिणाम है कि टीएमसी के 15 साल के शासन  को उखाड़ फेंका। वैसे भी ममता के 15 साल के शासन से वहां की जनता ऊब चुकी थी और वह भी बदलाव चाहती थी जिसे ममता और उनके सिपहसालार समझ नहीं पाये। उन्हें लगा बंगाल में कौन हराने वाला है लेकिन जनता ने ऐसी पछाड़ दी है कि आने वाले समय में दुबारा लौटना भी शायद ही संभव हो। 

रामस्वरूप रावतसरे