समाज

पेपरलीक के आग उगलते दौर में प्रेरक है बिहार के चंदन कुशाग्र के संघर्ष की कहानी

13 वर्ष में 70 हजार रैंक से 7 हजार रैंक तकपहुंचने का सफर

सुशील कुमार ‘नवीन’

देश आज एक गंभीर दौर से गुजर रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाओं ने लाखों युवाओं के विश्वास को झकझोरा है। सड़कों पर आक्रोश है, सोशल मीडिया आग उगल रही है। विद्यार्थियों के मन में भविष्य को लेकर ऊहापोह की स्थिति हैं। व्यवस्था की कमियों पर प्रश्न उठाना जितना आवश्यक है, दोषियों को कठोर दंड मिलना भी उतना ही और जरूरी है। लेकिन इसी समय एक और प्रश्न हमारे सामने खड़ा होता है,- क्या परिस्थितियां ही हमारा भविष्य तय करती हैं, या हमारा धैर्य और संकल्प?

आज के समय के हाईप्रोफाइल पेपर लीक मामले में बिहार के नालंदा जिले के जोरारपुर गाँव के चंदन कुशाग्र की कहानी हर छात्र के लिए एक नई उम्मीद का घोष है। प्रख्यात कवि रामधारी सिंह दिनकर की कालजयी रचना ‘रश्मिरथी’ की प्रसिद्ध पंक्तियां उनके संघर्ष पर बिल्कुल सटीक बैठती है –

  जीवन देकर जय खरीदना, जग मे यही चलन है,

   विजय दान करता न, प्राण को रखकर कोई जन है.

   मगर, प्राण रखकर प्रण, अपना आज पालता हूँ मैं,

   पूर्णाहुति के लिए विजय का हवन डालता हूँ मैं।

उम्र रही होगी, बमुश्किल 8 से 10 वर्ष। जब स्कूल में टीचर ने स्वभाविक प्रश्न किया कि बेटा! बड़े होकर क्या बनोगे? बालमन से बिना सोचे, बिना विचारे तत्क्षण जवाब मिला। जी! मैं तो डाक्टर बनूंगा। डाक्टर ही क्यों बनोगे? इस बार जवाब हृदय को और झकझोरने वाला था। …मेरे पापा चाहते हैं। और मैं उनकी यह इच्छा हर हाल में पूरी करूंगा। क्या कर पाओगे इतनी मेहनत? जवाब और भी हैरानी करने वाला था। पता है, सहज नहीं है, परंतु मैं प्रयत्न करूंगा। और उसने ये किया भी। हालात बिगड़‌ते रहे, परिस्थितियां विकट होती रहीं, परन्तु उसने हार नहीं मानी। 13 वर्ष से लगातार हर बार मेडिकल पात्रता परीक्षा दी। परिणाम विपरित रहे फिर भी निराशा को अपने उपर हावी नहीं होने दिया। और अंततः इस बार सफलता हाथ लग ही गई। 70 हजार से अधिक रैंक से शुरू सफलता के सोपान से अब 7 हजार की उच्चता के रैंक पर पहुंच गया है।

    बिहार के नालन्दा जिले के एक छोटे से गांव जोरारपुर में जन्मे 33 वर्षीय तीन बहन-भाईयों में सबसे बड़े चन्दन की प्रारम्भिक शिक्षा गांव में ही हुई। 2008 में दसवीं करने के बाद 12वीं करने में उन्हें चार वर्ष लग गए। ऐसा नहीं है कि वे पढ़ाई में कमजोर थे। 10वीं परीक्षा में मेरिट होल्डर रहे, परन्तु पारिवारिक स्थिति के चलते काम पकड़ना पड़ा। 2012 में 72 फीसदी अंकों के साथ 12वीं परीक्षा पास की।लगातार खुद की पढ़ाई के साथ-साथ अपनी दिली इच्छा की अग्नि को बुझने नहीं दिया। उनकी मेहनत की बानगी देखिए कि एक 12वीं मेडिकल का छात्र अपने समकक्ष अन्य छात्रों को ट्यूशन पढ़ाता रहा, नीट कम्पीटीशन की तैयारी करवाता रहा। उसके पढ़ाए चार बच्चे डाक्टर बन गए, पर वो खुद पिछड़ता रहा। कोरोना काल में पिता की मौत के बाद जिम्मेदारियां और बढ़ी।

अब सवाल ये है कि जिसके पढ़ाये बच्चों में चार बच्चे डाक्टर बन गए, वो पीछे क्यों रहे। इसके पीछे भी एक अलग कहानी है। जो वास्तव में उन छात्रों को नई राह दिखाने वाली है, जो थोड़ी सी असफलता पाकर थक हारकर बैठ जाते हैं। सार्थक परिणाम न आने पर आत्महत्या तक जैसा कदम उठा लेते हैं।

       चन्दन बताते हैं कि वे शुरू से ही एंजाइटी (चिन्ता विकार) से गुस्त रहे। मेहनत में कोई कभी नहीं रही। परीक्षा के समय घबराहट, बेचैनी, डर, नींद न आना की स्थिति उन्हें लगातार पीछे धकेलती रही। शुरुआत में उन्होंने अपनी इस स्थिति को सामान्य माना। खुद की ही कमी मान हर बार और लग्न से तैयारी की। इसलिए इस पर ध्यान नहीं दिया। दो वर्ष पूर्व कुछ गुरुजनों और मित्रवरों, परिजनों ने इस बारे में साइकेट्रिक से मिलने की सलाह दी। इलाज शुरू हुआ तो मनोस्थिति और दृढ़ता की राह चल पड़ी। कोटा के प्रख्यात संस्थान ई-सरल के मेरे मेन्टर रहे उमेश सर, संजीव सर, सारांश सर और उनकी टीम ने मेरी ताकत और कमजोरी को पहचान जो रास्ता दिखाया, उसी का परिणाम है कि मैं अपने पिता के सपने को अब पूरा कर पाऊंगा।

    दिल्ली में चल रहे आन्दोलन पर उनका कहना है कि पेपर लीक होना छात्रो के लिए किसी बड़ी पीड़ा से कम नहीं है। तकलीफ बहुत होती है जब मेहनत बेकार चली जाती है। मैं तो खुद इससे प्रभावित हो चुका हूं।  मेरा मानना है कि राजनीति यदि प्रभावी हो जाए तो बड़े बड़े आंदोलनों की दिशा बदल जाती है। इस्तीफों से कुछ नहीं होने वाला। भविष्य में ऐसा न हो, इस पर चिंतन हो। सजा ऐसी हो कि कोई ऐसा करने के बारे में कभी सोचे भी नहीं। इतिहास गवाह है कि अस्थायी अन्याय स्थायी प्रतिभा को कभी पराजित नहीं कर सकता। आवश्यकता केवल आंदोलन की नहीं, आत्मबल बनाए रखने की भी है। चंदन कुमार की सफलता की यह कहानी यह कहती है—”सपनों की उम्र नहीं होती, केवल उन्हें पूरा करने का साहस चाहिए।” कठोपनिषद् की उक्ति है – उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। जिसे स्वामी विवेकानंद ने भी अपनाया था कि “उठो, जागो और तब तक मत रुको, जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।”

रश्मिरथी की ये पंक्तियां चंदन साहस को और बढ़ने का कार्य करेगी –

लेकिन नौका तट छोड़ चली,

कुछ पता नहींकिस ओर चली।

यह बीच नदी की धारा है,

सूझता  कूलकिनारा है।

ले लील भले यह धार मुझे,

लौटना नहीं स्वीकार मुझे।

लेखक

सुशील कुमार ‘नवीन ‘, हिसार

वरिष्ठ साहित्यकार ,पत्रकार औ