लेख

सांस्कृतिक पतन का विस्फोट !

डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर 

   जन्तर-मन्तर पर हाल में हुए घटनाक्रम को केवल “सांस्कृतिक एवं चारित्रिक हादसा” कहना उस गहरे राष्ट्रीय संकट को छोटा करके देखने जैसा है, जिसकी जड़ें हमारे सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षिक जीवन में दशकों से फैलती आ रही हैं। हादसा वह होता है जो अचानक घटित हो; जन्तर-मन्तर पर जो दिखाई दिया, वह अचानक फूटा हुआ गुबार नहीं, बल्कि लम्बे समय से जमा हो रहे नैतिक क्षय, भाषायी पतन और सार्वजनिक जीवन की मर्यादाहीनता का विस्फोट है।

   दिल्ली के जन्तर-मन्तर पर ‘नीट’ तथा अन्य परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और प्रश्नपत्र लीक जैसे मुद्दों को लेकर चल रहे प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध आपत्तिजनक और अभद्र भाषा के इस्तेमाल का मामला सामने आया। इस प्रकरण में पुलिस ने शिकायत के आधार पर भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया। समाचार रिपोर्टों के अनुसार, प्रदर्शन में शामिल एक युवती पर प्रधानमंत्री के विरुद्ध अपमानजनक भाषा के इस्तेमाल का आरोप लगा और बाद में उसने माफी भी माँगी।

   यहाँ सबसे पहले यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि किसी भी सरकार, प्रधानमंत्री या राजनीतिक दल की आलोचना लोकतंत्र का अनिवार्य अंग है। प्रश्नपत्र लीक, परीक्षा-व्यवस्था की गड़बड़ी, बेरोजगारी या शासन की नीतियों के विरुद्ध प्रदर्शन करना नागरिक अधिकार है। सत्ता से सवाल पूछना लोकतंत्र-विरोधी नहीं, बल्कि लोकतंत्र को जीवित रखने वाली प्रक्रिया है। किन्तु आलोचना और गाली में, विरोध और अश्लीलता में, आक्रोश और अमर्यादित आचरण में अन्तर होता है। लोकतंत्र नागरिक को बोलने का अधिकार देता है, अपनी भाषा का विवेक खो देने का लाइसेंस नहीं।

असहमति बनाम असभ्यता :

   जन्तर-मन्तर का प्रसंग किसी एक व्यक्ति, एक मञ्च या, एक संगठन तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक संकट का लक्षण है जिसमें असहमति ने अनेक बार तर्क का स्थान छोड़कर अपमान का रूप ले लिया है। आज राजनीतिक बहस का बड़ा हिस्सा विचारों के संघर्ष के बजाय व्यक्तियों के चरित्र-हनन में बदल गया है। नेता एक-दूसरे के लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, जिन्हें सामान्य पारिवारिक या सामाजिक बातचीत में बोलना भी अस्वीकार्य माना जाता था।

   जब विपक्ष का प्रमुख नेता प्रधानमंत्री के लिए ‘तू’ जैसे सम्बोधन का इस्तेमाल करता है, जब सत्ता पक्ष के समर्थक विरोधियों को देशद्रोही, गद्दार और निकम्मा कहकर खारिज करते हैं, जब संसद में नारे, आरोप और व्यक्तिगत कटाक्ष नीति-विमर्श पर भारी पड़ते हैं, तब समाज के लिए सन्देश साफ होता है—शिष्टता अब कमजोरी है और शोर ही प्रभाव का प्रमाण। सार्वजनिक जीवन में भाषा का स्तर गिरता है तो उसका असर केवल संसद या मञ्च तक सीमित नहीं रहता। वह घरों, विद्यालयों, सड़कों और सोशल मीडिया तक पहुँचता है।

   प्रधानमंत्री ने जन्तर-मन्तर प्रकरण पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि गालियाँ किसी समस्या का समाधान नहीं करतीं और उन्होंने युवाओं को दण्डित करने के बजाय उनका मार्गदर्शन करने की अपील की। उन्होंने यह भी कहा कि वे उन युवाओं को क्षमा करना चाहते हैं, जिन्होंने उनके और उनकी दिवंगत माँ के प्रति अपशब्दों का इस्तेमाल किया। यह प्रतिक्रिया राजनीतिक विवाद से अलग एक सामाजिक प्रश्न उठाती है—क्या हम अपने युवाओं को केवल दण्ड देकर सुधार सकते हैं, या उनके भीतर भाषा, संयम और उत्तरदायित्व का संस्कार भी विकसित करना होगा?

यह अचानक नहीं हुआ :

   आज जन्तर-मन्तर पर मञ्च से निकली गाली पर आश्चर्य व्यक्त किया जा रहा है, जैसे वह किसी सभ्य और मर्यादित समाज पर अचानक हुआ बाहरी हमला हो। वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। देश में दशकों से भाषा का सार्वजनिक अवमूल्यन हो रहा है। चुनावी भाषणों में व्यक्तिगत हमले बढ़े हैं, टेलीविजन बहसों में चिल्लाना तर्क का विकल्प बन गया है और सोशल मीडिया पर अपमान को लोकप्रियता का साधन समझा जाने लगा है।

   गाँव की चौपाल हो या शहर की सड़क, मित्रों की बातचीत हो या इण्टरनेट की टिप्पणी—गाली का सामान्यीकरण हमारी सामाजिक चेतना में गहरे उतर चुका है। माँ-बहन की गालियाँ अब केवल अपराधी या, असामाजिक तत्वों की भाषा नहीं रह गयी हैं; वे सामान्य बातचीत, राजनीतिक नारे और मनोरञ्जन की सामग्री तक में प्रवेश कर चुकी हैं। जब समाज किसी शब्द की हिंसा को बार-बार सुनकर भी चुप रहता है, तो वह धीरे-धीरे उस हिंसा को स्वीकार करने लगता है।

   संसद जैसे सर्वोच्च लोकतांत्रिक मञ्च पर भी अमर्यादित भाषा, व्यक्तिगत आरोप और संकेतों में की जाने वाली अश्लीलता को लेकर समय-समय पर विवाद उठते रहे हैं। संसद का काम केवल कानून बनाना नहीं, बल्कि देश के सार्वजनिक संवाद का स्तर तय करना भी है। यदि वहाँ मर्यादा टूटती है, तो उसका अनुकरण राजनीतिक कार्यकर्ता, छात्र, नागरिक और मीडिया—सभी करते हैं।

शिक्षा की विफलता :

   इस संकट का सबसे गम्भीर पक्ष शिक्षा से जुड़ा है। हमने शिक्षा को डिग्री, नौकरी और परीक्षा तक सीमित कर दिया, जबकि शिक्षा का मूल उद्देश्य चरित्र, विवेक, संवेदना और उत्तरदायित्व का निर्माण था। बच्चे ने क्या पढ़ा, यह महत्वपूर्ण है; लेकिन वह कैसे बोलता है, असहमति कैसे व्यक्त करता है और क्रोध में कितना संयम रखता है—यह उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है।

   हमारे बचपन में शहर को सभ्यता और संस्कृति का प्रादर्श (मॉडल) माना जाता था। शहर से कोई व्यक्ति गाँव आता था तो बच्चों से कहा जाता था—देखो, शहर से आये हैं, इनसे सीखो। शहर का अर्थ था शिष्टाचार, स्वच्छता, साफ भाषा, अनुशासन और व्यापक दृष्टि। आज दृश्य बदल गया है। आधुनिकता का अर्थ कई बार केवल फैशन, तेज जीवन और निर्बाध अभिव्यक्ति समझ लिया गया है। मर्यादा को पिछड़ापन और संयम को कमजोरी मानने की प्रवृत्ति बढ़ी है।

सरकारों ने शिक्षा में नैतिक और नागरिक प्रशिक्षण को पर्याप्त महत्व नहीं दिया। परिवारों ने बच्चों के सामने सार्वजनिक जीवन की भाषा का गिरता स्तर सामान्य बना दिया। समाज ने लोकप्रियता को संस्कार से ऊपर रख दिया। परिणाम यह है कि एक पूरी पीढ़ी सूचना से भरी हुई है, पर विवेक से खाली; बोलने में तेज है, पर सुनने में असमर्थ; अधिकारों के प्रति सजग है, पर कर्तव्यों और सीमाओं के प्रति उदासीन।

राष्ट्रीय प्रतिध्वनि :

   जन्तर-मन्तर की घटना की प्रतिध्वनि दिल्ली से बहुत दूर तक सुनाई देगी। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र, बंगाल, कर्नाटक और देश के अन्य हिस्सों में राजनीतिक भाषा और सार्वजनिक व्यवहार का जो वातावरण बन रहा है, उसमें हर मञ्च दूसरे मञ्च की नकल करता है। जो शब्द राजधानी में बोले जाते हैं, वे अगले दिन छोटे शहरों की सभाओं और सोशल मीडिया पोस्टों में दोहराये जाते हैं।

   इसलिए यह घटना केवल प्रधानमंत्री के अपमान का प्रश्न नहीं है। यह उस संवैधानिक संस्कृति का प्रश्न है जिसमें पद से असहमति हो सकती है, व्यक्ति की आलोचना हो सकती है, लेकिन भाषा में गरिमा और तथ्य का स्थान बना रहना चाहिए। प्रधानमंत्री किसी दल के नेता भर नहीं होते; वे संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति होते हैं। इसी प्रकार किसी छात्र, प्रदर्शनकारी या सामान्य नागरिक को भी भीड़ की हिंसा, ऑनलाइन उत्पीड़न या राजनीतिक प्रतिशोध का लक्ष्य नहीं बनाया जाना चाहिए।

   अभद्र भाषा की आलोचना करते समय हमें न्याय और संयम दोनों का पालन करना होगा। प्रधानमंत्री ने क्षमा और मार्गदर्शन की बात कही, जो समाज के लिए विचारणीय है। लेकिन क्षमा का अर्थ यह नहीं कि सार्वजनिक मर्यादा का प्रश्न समाप्त हो गया। और कानून का अर्थ यह भी नहीं कि हर सामाजिक संकट का समाधान केवल प्राथमिकी और गिरफ्तारी है। स्थायी समाधान परिवार, विद्यालय, राजनीतिक दल, मीडिया और समाज—सभी की साझा जिम्मेदारी से निकलेगा।

निष्कर्ष :

   जन्तर-मन्तर पर घटित घटनाक्रम को “हादसा” कहकर भूल जाना सुविधाजनक हो सकता है, लेकिन सत्य से पलायन होगा। इसे हादसा कहकर आगे बढ़ जाना ‘बौद्धिक पलायन’ है! हादसा मञ्च पर नहीं हुआ; वह तो बहुत पहले हमारी भाषा, शिक्षा, राजनीति और सामाजिक विवेक में घटित हो चुका था। जन्तर-मन्तर पर केवल उसका कुरूप और विस्फोटक चेहरा दिखाई दिया है।

   अब भी समय है कि हम आलोचना की स्वतंत्रता और अभद्रता की संस्कृति के बीच स्पष्ट रेखा खींचें। राजनीतिक दल अपने नेताओं की भाषा पर नियंत्रण करें, मीडिया बहस को तमाशा बनाने से बचे, विद्यालय नागरिकता और चरित्र को शिक्षा का हिस्सा बनाएँ तथा परिवार बच्चों के सामने संवाद की मर्यादा का उदाहरण प्रस्तुत करें। अन्यथा आने वाले वर्षों में जन्तर-मन्तर जैसे प्रसंग अपवाद नहीं, सामान्य दृश्य बन जाएँगे। तब हम हर बार इसे हादसा कहेंगे—और हर बार यह भूलते रहेंगे कि असली हादसा हमारे भीतर बहुत पहले हो चुका है।