अशोक कुमार झा
भारत में आरक्षण की बहस जितनी पुरानी है, उतनी ही संवेदनशील भी है। आजादी के बाद संविधान निर्माताओं ने जिस सामाजिक व्यवस्था की कल्पना की थी, उसका मूल उद्देश्य केवल राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करना नहीं था बल्कि उस समाज का निर्माण करना था जिसमें किसी व्यक्ति का जन्म उसके भविष्य का निर्धारण न करे। सदियों से सामाजिक भेदभाव और अवसरों की असमानता झेलते आए वर्गों को शिक्षा, रोजगार और शासन-व्यवस्था में आगे आने का अवसर देना इसी सामाजिक न्याय की अवधारणा का महत्वपूर्ण हिस्सा था। इसी उद्देश्य से संविधान में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और बाद में अन्य पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधानों का रास्ता बनाया गया। इसलिए आरक्षण को समझने के लिए सबसे पहले यह स्वीकार करना होगा कि इसका जन्म किसी राजनीतिक दल की चुनावी रणनीति से नहीं बल्कि भारतीय समाज की ऐतिहासिक असमानता की वास्तविकता से हुआ था।
लेकिन सात दशक से अधिक समय गुजर जाने के बाद अब यह प्रश्न पूछना भी जरूरी हो गया है कि आरक्षण व्यवस्था अपने मूल उद्देश्य तक कितनी पहुंच पाई है। क्या आरक्षण का लाभ वास्तव में समाज के सबसे अधिक वंचित व्यक्ति तक पहुंच रहा है? क्या आरक्षित वर्गों के भीतर भी कुछ अपेक्षाकृत संपन्न परिवार और समूह लगातार पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसका लाभ प्राप्त कर रहे हैं, जबकि उसी वर्ग के अत्यंत गरीब और पिछड़े परिवार अब भी शिक्षा और अवसर की पहली सीढ़ी पर खड़े हैं? क्या दूसरी तरफ ऐसे गरीब बच्चे, जो किसी आरक्षित श्रेणी में नहीं आते, केवल अपने जन्म की सामाजिक श्रेणी के कारण आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद अतिरिक्त अवसरों से वंचित रह जाते हैं? यदि इन सवालों को पूछना आरक्षण का विरोध माना जाएगा, तो सामाजिक न्याय की व्यवस्था की समीक्षा कभी संभव नहीं होगी। लोकतंत्र में किसी भी नीति की सफलता का मूल्यांकन उसके उद्देश्य से होना चाहिए, केवल उसके अस्तित्व से नहीं।
आरक्षण का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत यह होना चाहिए कि इसका लाभ उस व्यक्ति तक पहुंचे जिसे इसकी वास्तविक आवश्यकता है। हालांकि यहां एक संवैधानिक अंतर समझना बेहद जरूरी है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के आरक्षण का आधार केवल गरीबी नहीं है। इसका संबंध ऐतिहासिक सामाजिक वंचना, सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन तथा सरकारी सेवाओं में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व से है। इसलिए यह कहना कि आरक्षण केवल गरीबों के लिए होना चाहिए, संवैधानिक व्यवस्था को अत्यधिक सरल बना देना होगा। लेकिन इसके साथ यह सवाल पूरी तरह जायज है कि जब किसी आरक्षित समुदाय के भीतर कोई परिवार आर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक रूप से काफी आगे बढ़ चुका हो, तब क्या आरक्षण नीति के लाभ को उसी परिवार तक बार-बार सीमित रहने देना सामाजिक न्याय की मूल भावना के अनुरूप है?
यहीं से आरक्षण के भीतर असमानता की बहस शुरू होती है। किसी भी बड़े सामाजिक समुदाय को एक समान आर्थिक और सामाजिक इकाई मानना वास्तविकता से आंखें मूंदना होगा। आरक्षित वर्गों के भीतर भी ऐसे परिवार हैं जो आज भी अत्यंत गरीब हैं, जिनके बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं, जिनके माता-पिता मजदूरी करते हैं और जिनके परिवार में पहली बार कोई बच्चा उच्च शिक्षा की ओर बढ़ रहा है। दूसरी तरफ उसी व्यापक श्रेणी में ऐसे परिवार भी हैं जिन्होंने कई पीढ़ियों से उच्च शिक्षा हासिल की है, सरकारी नौकरियों में स्थान बनाया है और आर्थिक रूप से मजबूत स्थिति प्राप्त कर ली है। यदि नीति के लाभ का वितरण इन दोनों परिस्थितियों के बीच कोई अंतर ही न करे, तो सबसे कमजोर व्यक्ति तक पहुंचने की संभावना कम हो सकती है।
इसी संदर्भ में “क्रीमी लेयर” की अवधारणा महत्वपूर्ण हो जाती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अन्य पिछड़े वर्गों के भीतर सामाजिक और आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत उन्नत तबका आरक्षण के लाभ पर पूरी तरह हावी न हो और अधिक वास्तविक रूप से पिछड़े लोगों के लिए अवसर उपलब्ध रहें लेकिन अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के संदर्भ में यही प्रश्न अलग संवैधानिक और सामाजिक परिस्थितियों के कारण कहीं अधिक जटिल है। इन समुदायों ने ऐतिहासिक भेदभाव की ऐसी स्थितियां झेली हैं जिन्हें केवल वर्तमान आय से नहीं मापा जा सकता। इसलिए OBC की क्रीमी लेयर व्यवस्था को SC/ST पर उसी रूप में लागू करने का प्रश्न सरल नहीं है। फिर भी यह बहस पूरी तरह बंद नहीं होनी चाहिए कि आरक्षण के लाभ का सबसे अधिक लाभ किसे मिल रहा है और जो सबसे पीछे है, वह अब भी पीछे क्यों है।
आरक्षण पर चर्चा का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष उन गरीब परिवारों का है जो किसी आरक्षित श्रेणी में नहीं आते। देश में बड़ी संख्या में ऐसे परिवार हैं जिनकी आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है। उनके बच्चे भी सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं, महंगी कोचिंग का खर्च नहीं उठा सकते, इंटरनेट और डिजिटल संसाधनों की कमी से जूझते हैं और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी सीमित साधनों में करते हैं। उनके माता-पिता भी खेतों में काम करते हैं, छोटी दुकान चलाते हैं, मजदूरी करते हैं या कम आय वाली नौकरियों में लगे हैं। उनकी गरीबी किसी भी तरह कम वास्तविक नहीं है। लेकिन यदि उनका सामाजिक वर्ग आरक्षण की किसी श्रेणी में नहीं आता, तो उनकी आर्थिक कठिनाई को अलग प्रकार की सहायता की जरूरत पड़ती है।
यहीं हमें गरीबी और सामाजिक पिछड़ेपन के बीच अंतर समझना होगा। सामाजिक पिछड़ापन एक ऐतिहासिक और संरचनात्मक समस्या है, जबकि गरीबी आर्थिक संसाधनों की कमी से जुड़ी समस्या है। दोनों एक-दूसरे से जुड़े हो सकते हैं, लेकिन दोनों एक ही चीज नहीं हैं। इसलिए भारत को ऐसी नीति चाहिए जिसमें सामाजिक रूप से ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों का संवैधानिक संरक्षण बना रहे और साथ ही आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों—चाहे वे किसी भी सामाजिक वर्ग से हों—के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त सहायता मिले।
इसी दिशा में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों यानी EWS के लिए संविधान में अलग व्यवस्था की गई। 103वें संविधान संशोधन के माध्यम से अनुच्छेद 15(6) और 16(6) जोड़े गए और EWS के लिए अधिकतम 10 प्रतिशत तक आरक्षण का प्रावधान किया गया। इससे यह स्वीकार हुआ कि आर्थिक कमजोरी भी सार्वजनिक नीति में एक महत्वपूर्ण वास्तविकता है, हालांकि इसका संवैधानिक आधार SC/ST/OBC आरक्षण से अलग है। इस व्यवस्था ने भारतीय आरक्षण बहस को एक नया आयाम दिया और यह प्रश्न सामने आया कि सामाजिक न्याय की व्यवस्था में आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन अनारक्षित वर्ग के बच्चों के लिए भी पर्याप्त अवसर कैसे सुनिश्चित किए जाएं।
अब आते हैं उस 50 प्रतिशत की सीमा पर, जिसके आसपास भारत में आरक्षण की सबसे बड़ी राजनीतिक और संवैधानिक बहस होती है। सबसे पहले यह तथ्य स्पष्ट होना चाहिए कि संविधान में कहीं नहीं लिखा है कि आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत होगी। संविधान सभा ने भी 50 प्रतिशत की कोई गणितीय सीमा निर्धारित नहीं की थी। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भी संविधान में 50 प्रतिशत की कोई सीमा नहीं लिखी। यह सीमा बाद में न्यायपालिका की व्याख्या से विकसित हुई। M.R. Balaji बनाम State of Mysore मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सामान्य परिस्थितियों में आरक्षण को 50 प्रतिशत से कम रखने की बात कही। इसके बाद विभिन्न मामलों में इस सिद्धांत पर बहस आगे बढ़ी और अंततः Indra Sawhney बनाम Union of India के 1992 के ऐतिहासिक फैसले में नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 50 प्रतिशत को सामान्य सीमा के रूप में महत्वपूर्ण संवैधानिक सिद्धांत का रूप दिया।
यहां यह भी समझना आवश्यक है कि सुप्रीम कोर्ट ने 50 प्रतिशत को सामाजिक न्याय के खिलाफ कोई दीवार बनाकर नहीं रखा था। अदालत के सामने समान अवसर और सकारात्मक भेदभाव के बीच संतुलन का प्रश्न था। यदि आरक्षण की मात्रा इतनी अधिक हो जाए कि खुली प्रतिस्पर्धा के अवसर अत्यधिक सीमित हो जाएं, तो संविधान में दिए गए समान अवसर के अधिकार पर प्रश्न उठ सकता है। दूसरी तरफ यदि आरक्षण बिल्कुल समाप्त कर दिया जाए तो ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को वास्तविक अवसर मिलने में कठिनाई हो सकती है। इसलिए न्यायपालिका ने दोनों संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की।
लेकिन आज इस 50 प्रतिशत की सीमा पर पुनर्विचार की मांग इसलिए भी उठती है क्योंकि भारत की सामाजिक वास्तविकताएं लगातार बदल रही हैं। कई राज्यों में आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक है या उसे बढ़ाने की मांग लंबे समय से चलती रही है। मराठा आरक्षण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 50 प्रतिशत के सिद्धांत को फिर से महत्वपूर्ण माना। दूसरी तरफ EWS आरक्षण के संवैधानिक प्रावधान और उसकी न्यायिक स्वीकृति ने यह दिखाया कि भारत का आरक्षण ढांचा स्थिर नहीं है; संविधान में संशोधन और न्यायिक व्याख्या के माध्यम से उसमें बदलाव संभव है।
इसलिए 50 प्रतिशत को लेकर बहस केवल यह नहीं होनी चाहिए कि सीमा हटाई जाए या नहीं। उससे पहले यह पूछा जाना चाहिए कि क्या हमारे पास इतना विश्वसनीय सामाजिक और आर्थिक आंकड़ा है जिससे यह तय किया जा सके कि किस वर्ग को कितना प्रतिनिधित्व वास्तव में चाहिए? क्या हम जानते हैं कि सरकारी नौकरियों, उच्च शिक्षा, न्यायपालिका, प्रशासन, विज्ञान, तकनीक और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में विभिन्न सामाजिक वर्गों का वास्तविक प्रतिनिधित्व कितना है? क्या हम यह जानते हैं कि आरक्षण का लाभ समाज के किन हिस्सों तक पहुंचा और कौन-से समूह अब भी पीछे हैं? बिना आंकड़ों के आरक्षण पर बहस अक्सर राजनीतिक दावों और भावनात्मक नारों में बदल जाती है।
आज भारत को आरक्षण की राजनीति से आगे बढ़कर अवसर की राजनीति करनी होगी। यदि मेडिकल कॉलेजों में सीटें कम हैं और लाखों बच्चे परीक्षा दे रहे हैं, तो सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि किस वर्ग को कितनी सीट मिलेगी। सवाल यह भी होना चाहिए कि मेडिकल शिक्षा की क्षमता इतनी कम क्यों है? यदि इंजीनियरिंग और उच्च शिक्षा के संस्थानों में सीमित सीटों के लिए करोड़ों युवा संघर्ष कर रहे हैं, तो देश में उच्च गुणवत्ता वाले संस्थानों की संख्या क्यों न बढ़ाई जाए? यदि सरकारी नौकरियों में सीमित पदों के लिए लाखों लोग आवेदन करते हैं, तो रोजगार के नए अवसर क्यों नहीं पैदा किए जाते?
अवसरों का विस्तार आरक्षण की बहस को कमजोर नहीं करता, बल्कि सामाजिक तनाव को कम करता है। जब सीटें और नौकरियां बहुत कम होंगी तो हर प्रतिशत की लड़ाई तीखी होगी। जब शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे तो प्रतिस्पर्धा के दबाव का स्वरूप बदलेगा। इसलिए सामाजिक न्याय की सबसे बड़ी नीति केवल आरक्षण नहीं, बल्कि सभी के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सम्मानजनक रोजगार होनी चाहिए।
यहीं प्रतिभा का सवाल भी सामने आता है। भारत के लाखों बच्चे अत्यंत प्रतिभाशाली हैं। कोई गांव के छोटे स्कूल से निकलकर राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा में सफलता प्राप्त करता है, कोई छोटे शहर से निकलकर विश्वस्तरीय वैज्ञानिक बनता है और कोई सीमित संसाधनों के बावजूद नई तकनीक विकसित करता है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी वर्ग की प्रतिभा केवल जन्म के कारण दब न जाए। लेकिन यह भी समझना होगा कि प्रतिभा को अवसर तभी मिलता है जब प्रारंभिक परिस्थितियां कम से कम कुछ हद तक समान हों। इसलिए “मेरिट” को केवल अंतिम परीक्षा के अंकों से नहीं देखा जा सकता; शिक्षा की गुणवत्ता, तैयारी के संसाधन और सामाजिक परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण हैं।
दूसरी ओर यदि कोई बच्चा वर्षों तक मेहनत करता है, कठिन परीक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन करता है और फिर उसे यह महसूस होता है कि उसके लिए अवसर सीमित हैं, तो उसकी निराशा को भी समाज को सुनना चाहिए। उसकी शिकायत को तुरंत जातिवादी या आरक्षण विरोधी कहकर खारिज करना समाधान नहीं है। उसी प्रकार आरक्षण से लाभ पाकर आगे बढ़ने वाले किसी बच्चे की सफलता को “आरक्षण की देन” कहकर उसकी प्रतिभा को कमतर आंकना भी गलत है। प्रतिभा हर वर्ग में है और संघर्ष भी हर वर्ग में है।
इसलिए हमें “आरक्षण बनाम मेरिट” की लड़ाई से बाहर निकलना होगा। असली लड़ाई वंचना बनाम अवसर की होनी चाहिए। जो वास्तव में पीछे है उसे आगे लाना सामाजिक न्याय है। जो गरीब है उसे शिक्षा और आर्थिक सहायता देना सामाजिक न्याय है। जो प्रतिभाशाली है उसे अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर देना भी सामाजिक न्याय है।
यही वह दृष्टिकोण है जिससे आरक्षण को देखा जाना चाहिए। आरक्षण को किसी जाति के खिलाफ या किसी जाति के स्थायी अधिकार के रूप में प्रस्तुत करने से सामाजिक विभाजन बढ़ता है। इसे उस संवैधानिक साधन के रूप में देखना चाहिए जिसका उद्देश्य प्रतिनिधित्व और ऐतिहासिक सामाजिक वंचना को कम करना है। लेकिन इस साधन की समय-समय पर समीक्षा भी होनी चाहिए। समाज बदल रहा है, अर्थव्यवस्था बदल रही है, शिक्षा का स्वरूप बदल रहा है और रोजगार का स्वरूप बदल रहा है। ऐसे में नीतियों की समीक्षा स्वाभाविक है।
सबसे बड़ी चुनौती यह है कि आरक्षण की चर्चा राजनीतिक वोट बैंक की गणित न बन जाए। यदि कोई राजनीतिक दल केवल किसी समुदाय को खुश करने के लिए आरक्षण बढ़ाने का वादा करता है, तो वह सामाजिक न्याय की जटिल समस्या का राजनीतिक सरलीकरण कर रहा है। इसी प्रकार यदि कोई राजनीतिक या सामाजिक समूह केवल आरक्षण समाप्त करने की बात करता है और भारत की ऐतिहासिक सामाजिक असमानता की चर्चा नहीं करता, तो वह भी समस्या के एक हिस्से को नजरअंदाज करता है।
भारत को दोनों अतियों के बीच रास्ता निकालना होगा।
आरक्षण रहे, लेकिन वास्तविक वंचितों तक पहुंचे।
सामाजिक न्याय रहे, लेकिन प्रतिभा का सम्मान भी हो।
आरक्षित वर्गों के गरीब परिवारों को मजबूत अवसर मिले।
अनारक्षित वर्गों के गरीब बच्चों को भी आर्थिक और शैक्षणिक सहायता मिले।
आरक्षण के भीतर लाभ के असमान वितरण पर आंकड़ों के आधार पर चर्चा हो।
और सबसे महत्वपूर्ण, देश में उच्च शिक्षा और रोजगार के अवसर इतने बढ़ाए जाएं कि युवाओं को कुछ हजार सरकारी पदों के लिए अपना पूरा भविष्य दांव पर न लगाना पड़े।
विदेशों की ओर भारतीय युवाओं का बढ़ता रुझान भी इसी व्यापक अवसर की समस्या से जुड़ा हुआ है। विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार जनवरी 2025 में लगभग 12.5 लाख भारतीय विद्यार्थी विदेशों में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। इन विद्यार्थियों के विदेश जाने को केवल आरक्षण के कारण होने वाला पलायन कहना सही नहीं होगा। बेहतर विश्वविद्यालय, शोध सुविधाएं, नौकरी के अवसर, वेतन, अंतरराष्ट्रीय अनुभव और विशेषज्ञता जैसे अनेक कारण इसके पीछे होते हैं। लेकिन यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि भारत अपने प्रतिभाशाली युवाओं के लिए विश्वस्तरीय अवसर कितनी तेजी से तैयार कर रहा है। यदि भारत अपने युवाओं को बेहतर शोध संस्थान, पारदर्शी भर्ती व्यवस्था, उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा और प्रतिस्पर्धी रोजगार उपलब्ध कराएगा तो प्रतिभा को देश में रोकने के लिए अलग से अभियान चलाने की जरूरत कम होगी।
भारत को अपने युवाओं से यह नहीं कहना चाहिए कि वे विदेश क्यों जाते हैं। भारत को अपने आप से यह पूछना चाहिए कि हम ऐसा क्या कर रहे हैं कि हमारे बच्चे विदेश में अवसर खोजने के लिए मजबूर या आकर्षित होते हैं?
यदि किसी विद्यार्थी को अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा या किसी अन्य देश में बेहतर शोध प्रयोगशाला मिलती है, तो वह वहां जाएगा। यदि उसे वहां अपनी प्रतिभा के अनुरूप बेहतर करियर मिलता है, तो वह वहां जाएगा। यदि भारत उसके लिए वही अवसर पैदा करेगा, तो वही विद्यार्थी भारत में रहकर देश की अर्थव्यवस्था और विज्ञान को मजबूत करेगा।
इसीलिए आरक्षण को ब्रेन ड्रेन का अकेला कारण बताना उचित नहीं होगा। लेकिन यह भी उचित नहीं कि प्रतिभा और अवसर की समस्या पर किसी भी प्रकार की चर्चा को खारिज कर दिया जाए। भारत की नीति को यह सुनिश्चित करना होगा कि सामाजिक न्याय के नाम पर कोई वास्तविक रूप से वंचित व्यक्ति पीछे न रह जाए और समान अवसर के नाम पर कोई ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदाय फिर से हाशिये पर न चला जाए।
अंततः हमें यह तय करना होगा कि आरक्षण का लक्ष्य क्या है। क्या इसका लक्ष्य हमेशा प्रतिशत बनाए रखना है? या फिर एक ऐसा समाज बनाना है जहां आने वाली पीढ़ियों को आरक्षण की आवश्यकता धीरे-धीरे कम होती जाए?
यदि हम दूसरे लक्ष्य को स्वीकार करते हैं, तो हमें केवल आरक्षण की सीटें नहीं बढ़ानी होंगी, बल्कि समान अवसर की बुनियाद मजबूत करनी होगी। हर गांव में गुणवत्तापूर्ण स्कूल, हर गरीब बच्चे के लिए छात्रवृत्ति, उच्च शिक्षा तक आसान पहुंच, प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए सहायता, बेहतर सरकारी विश्वविद्यालय, मजबूत शोध संस्थान, रोजगार के पर्याप्त अवसर और सामाजिक भेदभाव के खिलाफ कठोर व्यवस्था—ये सब सामाजिक न्याय के वास्तविक आधार हैं।
आरक्षण उस पूरी व्यवस्था का एक हिस्सा हो सकता है, लेकिन पूरी व्यवस्था नहीं।
इसलिए आज देश के सामने सही प्रश्न यह नहीं है कि “आरक्षण चाहिए या नहीं चाहिए?” सही प्रश्न यह है कि आरक्षण किसे, कितना, कब तक और किस उद्देश्य से चाहिए? क्या उसका लाभ वास्तव में सबसे अधिक वंचित व्यक्ति तक पहुंच रहा है? क्या आरक्षित वर्गों के भीतर भी अवसरों का न्यायपूर्ण वितरण हो रहा है? क्या गरीब अनारक्षित परिवारों के बच्चों को उनकी आर्थिक कमजोरी के अनुरूप पर्याप्त सहायता मिल रही है? क्या प्रतिभा को आगे बढ़ने के पर्याप्त अवसर मिल रहे हैं? और क्या देश अपने युवाओं को इतना अच्छा भविष्य दे पा रहा है कि उन्हें बेहतर अवसर के लिए विदेश की ओर देखने की आवश्यकता कम हो?
इन सवालों के जवाब ईमानदारी से खोजे बिना आरक्षण की बहस अधूरी रहेगी।
आरक्षण किसी जाति की स्थायी जागीर नहीं होना चाहिए और न ही गरीब की पीड़ा को केवल जाति के आधार पर नजरअंदाज किया जाना चाहिए। लेकिन सामाजिक रूप से ऐतिहासिक वंचना को भी केवल वर्तमान आय के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता। भारत को इन दोनों वास्तविकताओं के बीच संवैधानिक संतुलन बनाना होगा।
आरक्षण का उद्देश्य किसी को हमेशा ऊपर रखना नहीं, बल्कि जो वास्तव में पीछे है उसे आगे आने का अवसर देना होना चाहिए और यदि कोई व्यक्ति या परिवार उस सामाजिक और आर्थिक स्थिति तक पहुंच चुका है जहां उसे विशेष सहायता की आवश्यकता नहीं रही, तो नीति-निर्माताओं को यह देखने का साहस रखना चाहिए कि अवसरों का अगला हिस्सा उस व्यक्ति तक कैसे पहुंचे जो आज भी पीछे है। दूसरी तरफ यदि कोई बच्चा गरीब है और आरक्षण की किसी श्रेणी में नहीं आता, तो उसकी गरीबी और प्रतिभा को भी नीति से बाहर नहीं किया जा सकता। उसके लिए छात्रवृत्ति, EWS, आर्थिक सहायता, मुफ्त या सस्ती शिक्षा और समान अवसर के दूसरे रास्ते मजबूत करने होंगे।
भारत की वास्तविक सफलता तब होगी जब किसी बच्चे को अपनी पहचान छिपाकर अवसर पाने की जरूरत न हो, जब किसी गरीब बच्चे को अपनी गरीबी के कारण सपना छोड़ना न पड़े और जब किसी प्रतिभाशाली विद्यार्थी को अपने भविष्य के लिए देश छोड़ना मजबूरी न लगे।
सामाजिक न्याय का अंतिम लक्ष्य आरक्षण को हमेशा बनाए रखना नहीं, बल्कि ऐसी समान अवसर वाली व्यवस्था बनाना होना चाहिए जिसमें एक दिन आरक्षण की आवश्यकता स्वयं कम हो जाए।
उस दिन भारत वास्तव में उस संविधान की भावना के करीब होगा जिसकी कल्पना समानता, न्याय और अवसर के आधार पर की गई थी।