लेखक परिचय

हिमकर श्‍याम

हिमकर श्‍याम

वाणिज्य एवं पत्रकारिता में स्नातक। प्रभात खबर और दैनिक जागरण में उपसंपादक के रूप में काम। विभिन्न विधाओं में लेख वगैरह प्रकाशित। कुछ वर्षों से कैंसर से जंग। फिलहाल इलाज के साथ-साथ स्वतंत्र रूप से रचना कर्म। मैथिली का पहला ई पेपर समाद से संबद्ध भी।

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nitishआखिरकार भाजपा और जदयू का 17 साल पुराना रिश्ता टूट गया। नीतीश कुमार को नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए आगे बढ़ाए जाने पर एतराज है। नीतीश 19 जून को विधानसभा के विशेष सत्र में बहुमत साबित करेंगे। नीतीश सरकार की सेहत पर इसका क्या असर होगा यह देखना बाकी है। गठबंधनों का बनना और बिखरना कोई नहीं बात नहीं है लेकिन एनडीए में यह टूट देश की भावी राजनीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। इस टूट का असर आनेवाले लोकसभा चुनाव और उसके बाद बननेवाली भावी सरकार पर दिखाई देगा। दलों का बेमेल गठबंधन संसदीय लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। गठबंधन की राजनीति देश को पतनशीलता के रास्ते पर ले जा रही है। सत्तारूढ़ और विपक्ष दोनों प्रमुख गठबंधनों का कुनबा सिमट रहा है और क्षेत्रीय दल लगातार मजबूत होते जा रहे हैं।

आज देश का कोई हिस्सा गंठबंधन की राजनीति  से अछूता नहीं है। पिछले दो दशकों से कोई भी दल केंद्र में अपने बलबूते सरकार नहीं बना पाया है। राष्ट्रीय पार्टियों की भूमिका सीमित होती जा रही है और क्षेत्रीय दल केंद्र की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने लगे हैं। एकदलीय बहुमतवाले सरकारों का दौर समाप्त हो चुका है। क्षेत्रीय दलों की बैसाखी के बिना केंद्रीय सत्ता पर काबिज होना बीते दिनों की बात हो गयी है। अहं के टकराव और नेताओं के निजी स्वार्थ के कारण गठबंधन की मूल भावना का अक्सर नुकसान होता रहा है। क्षेत्रीय पार्टियां अपने फायदे के लिए केंद्र को ब्लैकमेल करने का काम करती हैं। गठबंधन की राजनीति में अपनों के पराए और परायों के अपने बन जाने की संभावना हमेशा बनी रहती है। गंठबंधन की खींचतान लगभग समान रूप से देश के उन सभी राज्यों में भी लागू है जहां गंठबंधन की सरकारें कार्यरत हैं। गठबंधन में बिखराव की प्रक्रिया निर्माण के के साथ ही शुरू हो जाती है। जदयू के अलग होने के बाद 24 दलों वाले एनडीए में केवल तीन ही दल रह गये हैं। वही कांग्रेस की अगुवाई वाला यूपीए 16 दलों से सिमट कर चार दलों का गठबंधन बन गया है।

यूपीए की गिरती साख और एनडीए में दरार से तीसरे मोर्चे की सुगबुगाहट शुरू हो गयी है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार आगामी संसदीय चुनावों में यूपीए और एनडीए दोनों ही सरकार बनाने की स्थिति में नहीं होंगी। ऐसी स्थिति में क्षेत्रीय पार्टियों को दिल्ली की सत्ता हथियाने का सुनहरा मौका मिल सकता है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ‘फेडरल फ्रंट’ का राग छेड़ कर एक नये मोर्चे की सुगबुगाहट को हवा दे दी है। जिन नेताओं और दलों के ‘फेडरल फ्रंट’ में शामिल होने के कयास लगाये जा रहे हैं, उनमें ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, नवीन पटनायक, बाबूलाल मरांडी आदि शामिल हैं। चंद्रबाबू नायडू और मुलायम सिंह यादव भी इस मोर्चे में शामिल हो सकते हैं। तीसरे मोर्चे की राह में कई पेंच भी हैं। मोर्चे का नेता कौन होगा, स्वरूप क्या होगा, मुद्दे क्या होंगे, साझा कार्यक्रम क्या होंगे, भविष्य में किन दलों का साथ लिया जाएगा, यह तय करना आसान नहीं लगता है। तीसरे मोर्चें में जिन पार्टियों के सहयोगी बनने की संभावना जतायी जा रही है, उनमे एका होने की सम्भावना बहुत कम हैं। अगर मोर्चा बन भी गया, तो उसे पहले अपनी विश्वसनीयता कायम करनी होगी। तीसरे मोर्चे के गठन की सुगबुगाहट के बीच वाम दलों ने इससे इतर एक चौथे विकल्प की तलाश शुरू  कर दी है।

दलों का बेमेल गठबंधन भारत के संसदीय लोकतंत्र के सामने एक विकट समस्या के रूप में खड़ा है। यहां गठबंधन का अर्थ अवसरवादियों की जमात से है। अब तक जितने भी गठबंधन बने हैं किसी में सैद्धांतिक विचारधारा देखने को नहीं मिली है। ऐसे गठबंधन का मुख्य उद्देश्य सत्ता पाना और उसे कायम रखना होता है। गठबंधन की राजनीति 1967 के विधानसभा चुनाव के बाद शुरू हुई। संघीय स्तर पर 1977 में शुरू हुई। सन् 1989 में जनता दल के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार बनी। उस समय कोई भी पार्टी अपने बूते सरकार बनाने में सफल नहीं रही थी। कांग्रेस को सत्ता से दूर करने के लिए विपक्षी दलों ने राजनीतिक धुर्वीकरण का सहारा लिया। वहीं से गठबंधन का दौर ऐसा चला कि देश मे एकल पार्टी सरकार का चलन ही एक तरह से खत्म ही हो गया। कांग्रेस का विकल्प बन कर उभरा जनतादल तालमेल के अभाव में बिखर गया। उसके विखंडन से ही लालू, मुलायम और नीतीश की पार्टियां पनपी हैं। 1996 के आम चुनाव के बाद 13 दलों ने एक मंच पर आकर संयुक्त मोर्चे का गठन किया। 1996 से 1998 के बीच रही इस मोर्चे की सरकार में एचडी देवगौड़ा और आइके गुजराल प्रधानमंत्री हुए। मोर्चे की सरकार को कांग्रेस का बाहर से सर्मथन प्राप्त था। इस मोर्चे का हश्र भी सुखद नहीं रहा। 2009 के आम चुनाव से पहले गैर कांग्रेस व गैर भाजपा दलों का प्रगतिशील गंठबंधन बनाया गया था। इस गंठबंधन का उद्देश्य यूपीए और एनडीए को केंद्र की सत्ता से बाहर रखना था, लेकिन आम चुनावों में यह गंठबंधन बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाया। गठंबधन का  उद्देश्य नकारात्मक अधिक होने के कारण गंठबंधन की गांठ खुलने में भी देर नहीं लगती। पश्चिम बंगाल और केरल, दो ऐसे राज्य हैं जहां गठबंधन की राजनीति को व्यापक सफलता मिली है। इस सफलता का सबसे बड़ा कारण है वैचारिक समानता।

ऐसा लगता है की आनेवाले समय में मोदी भारतीय राजनीति के प्रमुख धुरी होंगे। पिछले कुछ समय में सारी राजनीति मोदी के इर्द-गिर्द घूमती नजर आ रही है। कोई सांप्रदायिक बताकर उनके विरोध में खड़ा दिखता है तो कोई आधुनिकता और विकास का सूत्रधार बताकर उनके  पक्ष में नजर आता है। एनडीए से अलग होकर नीतीश कुमार नरेंद्र मोदी से सीधे टकराने का इरादा साफ कर चुके हैं। भाजपा व संघ को लग रहा है की मोदी डूबती नैया पार लगा देंगे। पार्टी के इसी सोच के कारण नरेंद्र मोदी को आगे कर लालकृष्ण आडवाणी को किनारे लगाया है। भाजपा को यह नहीं भूलना चाहिए कि आडवाणी ने ही भाजपा को देश की सत्ता संभालने लायक बनाया है। जिस पार्टी को उन्होने इस मुकाम पर पंहुचाया आज उसी के लिए वह अप्रासंगिक कैसे हो गये हैं, यह सोचने की बात है। पार्टी के आपसी मतभेदों ने सबसे अलग और अनुशासित दल होने की छवि तार-तार कर दी है। नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली भाजपा के सामने एनडीए को एकजुट रखने की चुनौती है।

आज की राजनीति में न आदर्श है और न ही नेताओं की करनी और कथनी मे समानता है। एनडीए का टूटना और यूपीए का सिमटना चिंता की बात है।  दुर्भाग्यवश हमारे देश में आज एक भी दल या मोर्चा ऐसा नहीं है जिसके साथ देश की पूरी जनता खड़ी दिखाई दे और जिसपे लोगों का भरोसा हो। दलों का गठबंधन किसी सुस्पष्ट विचारधारा पर आधारित नहीं होता। निजी महत्वाकांक्षा ही दलों को एक साथ खड़ा करती रही है, शायद इसीलिए यह कभी टिकाऊ और विश्वसनीय नहीं बन पता है। कोई मोर्चा अगर केवल निजी स्वार्थ के लिए बनता है, तो वह अस्थिर भी होगा और देश की राजनीति के लिए नुकसानदेह भी साबित होगा।

 

 

4 Responses to “अपने हुए पराए”

  1. रोहित कृष्ण

    मुझे शायद राजनीति का उतना अनुभव नहीं है, फिर भी मुझे याद है की २००४ के आम चुनाव में NDA और RJD प्रमुख पार्टियाँ थी जो मुख्यमंत्री पद के लिए एक दूसरे के आमने सामने कड़ी थीं| वहां पूर्ण बहुमत किसी को नहीं मिल पाया था और राम बिलास पासवान जी को किंग मेकर बोल गया था क्यूँकि वो जिसे भी अपना मत देते वो अपनी सरकार बनता| पर उनको लालू जी के साथ जाना गवारा नहीं था और वो नितीश जी को भाजपा से अलग होने की जिद्द पे आ गए| अंततः दुबारा चुनाव हुआ और नितीश जी की पार्टी पूर्ण बहुमत से सर्कार में आयी| उस वक़्त का मसला ये था की बिहार की जनता को बदलाव चाहिए था| एक नयी सरकार के रूप में| ये बात नितीश जी भी जानते थे और पासवान जी भी| अगर पासवान साहब ने सीधे तौर पे अपना मत दे दिया होता तो उनके फैसले को काफी सराहा भी जाता| पर ऐसा हुआ नही| और आज उनकी स्तिथि स्पष्ट है|
    आज वही हालात केंद्र में बनते दिख रहा है| अगर नितीश जी सीधे तौर पे भाजपा के साथ अपना समर्थन रखते तो कांग्रेस की सरकार से शायद जनता को छुटकारा मिल जाता| पर नितीश खुद तो प्रधान मंत्री बन नहीं पाएंगे, साथ ही उनको मोदी का साथ भी गवारा नहीं| अब इनकी स्थिति क्या हो गयी है ये खुद जाने| बस अब एक उम्मीद है की किसी तरह से भाजपा पूर्ण बहुमत में आये तो फिर इस दम्भी सरकार जिसे आम जनता की कोई फिक्र नही है उससे से छुटकारा मिले|

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  2. Dr. Dhanakar Thakur

    लेख संतुलित है. मैं प्रादेशिक दलों के खिलाफ नहीं हूँ – अब बीजेपी नही एक प्रादेशिक दल की तरह व्यवहार कर रही है नहीं तो एक मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री के रूप में उभरने की प्रक्रिया नहीं होती – प्रदेशों से ही देश बनता है यह एक सत्य है पर प्रदेश संतुलित नहीं हैं – २०-२५ लोकसभा के २५-३० प्रान्त सन्तुलित होते तो बात जम जाती . जतीयटा उबाल पर है इससे राष्ट्रीय दल भे एवंचित नहीं हैं

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  3. डॉ. मधुसूदन

    Dr. Madhusudan

    फूट डालकर और जाति, सम्प्रदाय, प्रादेशिकता को आरक्षित करने से ही यह सारी समस्याएं पैदा हुयी हैं।
    यह सारी विभाजनकारी नीतियां प्रादेशिक पार्टियों को प्राणवायु उपलब्ध करती है।
    अब पछताए होत क्या, जब चिडिया को चुगाते रहे ६५ वर्षों से?

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    • हिमकर श्याम

      मधुसूदन जी, प्रतिक्रिया के लिए आभार! आपके विचारों से पूरी तरह सहमत हूँ. क्षेत्रीय दल अपनी शक्ति प्रादेशिक और क्षेत्रीय भावनाओं के उभार से पाते हैं. स्वार्थ की राजनीति के कारण क्षेत्रीयता की भावना को उड़ान भरने का मौका मिलता है. अपने फायदे के लिए हमारे देश के नेता समाज का भावनात्मक शोषण करते रहे हैं. आजादी के बाद के 65 वर्षों का इतिहास आम आदमी के लिहाज से बेहतर नहीं रहा है. आम आदमी सांप्रदायिकता, जातीयता और क्षेत्रीयता के बीच पिसता रहता है. राजनीति की मौजूदा शैली जनतंत्र के लिए घातक साबित हो रही है. अगर राजनीति की यही दिशा रही तो आनेवाले दिनों में स्थिति क्या होगी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है. इसलिए राजनीति के चाल और चरित्र समझने और सजग रहने की जरुरत है.

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