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    सपने बेचना

    sllepवे

    सपने बेच रहे हैं

    एक अरसे से

    बेच रहे हैं

    भोर के नहीं

    दोपहर के सपने

    बेच रहे हैं

    तरह तरह के

    रंग बिरंगे सपने

    बेच रहे हैं

    खूब बेच रहे हैं

    मनमाने भाव में

    बेच रहे हैं

    अपनी अपनी दुकानों से

    बेच रहे हैं

    मालामाल हो रहे हैं

    निरंकुश हो रहे हैं

    होते रहेंगे तबतक

    अधजगे खरीदते रहेंगे

    लोग  सपने  जबतक

    मिलन सिन्हा
    मिलन सिन्हाhttps://editor@pravakta
    स्वतंत्र लेखन अब तक धर्मयुग, दिनमान, कादम्बिनी, नवनीत, कहानीकार, समग्रता, जीवन साहित्य, अवकाश, हिंदी एक्सप्रेस, राष्ट्रधर्म, सरिता, मुक्त, स्वतंत्र भारत सुमन, अक्षर पर्व, योजना, नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, प्रभात खबर, जागरण, आज, प्रदीप, राष्ट्रदूत, नंदन सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अनेक रचनाएँ प्रकाशित ।

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