लेख

पुरातत्व उत्खनन इतिहास की प्रमाणिक और वैज्ञानिक विधि

डॉ. राधेश्याम द्विवेदी 

भारत का पुरातत्व भारतीय संस्कृति और इतिहास का सबसे प्रमुख स्रोत होता है । पुरातत्व विज्ञान में अतीत के लोगों से संबंधित वैज्ञानिक शोध परक अध्ययन होता है। इसका मुख्य उद्देश्य इतिहास को समझना और उन्हें संरक्षित करना होता है। इनमें इमारतों, स्मारकों और अन्य प्राकृतिक या भौतिक अवशेषों का अध्ययन शामिल होता है। इसमें उत्खनन और अन्वेषण की बहुत ही प्रमाणिक विधि होती है। अतीत की सभ्यताओं और मानवीय गतिविधियों को समझने के लिए जमीन की एक नियंत्रित और वैज्ञानिक खुदाई की प्रक्रिया है। उत्खनन का मुख्य उद्देश्य जमीन के भीतर छिपी अज्ञात प्राचीन सभ्यताओं, संस्कृतियों और ऐतिहासिक अवशेषों को वैज्ञानिक तरीके से बाहर निकालना, उनका परीक्षण करना तथा उसके आधार पर पहले से स्थापित मान्यताओं की पुष्टि या खण्डन करना होता है। हमारे गौरवशाली अतीत को समझने और ऐतिहासिक ज्ञान को पुख्ता करने के लिए यह सबसे प्रामाणिक प्रविधि  मानी गई है।पुरातत्व विभाग इतिहासकारों द्वारा महत्वपूर्ण पहचाने गए स्मारकों या अवशेषों का संरक्षण और संवर्धन भी करता है। स्मारकों के अलावा, पुराने धातु और मिट्टी के बर्तन, मूर्तियां,मुहरें, सिक्के, अभिलेख और  कंकाल अवशेष सभी इसके विषयवस्तु बनते हैं , ये सब इतिहास का परीक्षण और पुनर्निर्माण भी करते हैं। 

भारत में पुरातात्विक उत्खनन के विभिन्न चरण :-

किसी प्राचीन सभ्यता और संस्कृति को वैज्ञानिक रूप से समझने की एक व्यवस्थित प्रक्रिया होती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा अपनाए जाने वाले पुरातात्विक उत्खनन के मुख्य चरण निम्नलिखित हैं-

1. अन्वेषण और सर्वेक्षण –

खुदाई शुरू करने से पहले, पुरातात्विक महत्व के स्थलों (जैसे- टीलों, पहाड़ियों और प्राचीन बस्तियों) की पहचान की जाती है। इसमें रिमोट सेंसिंग, हवाई फोटोग्राफी, और सतह पर बिखरी वस्तुओं का अध्ययन शामिल होता है। पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा द्वारा ’विलेज टू विलेज सर्वे’ कार्यक्रम द्वारा प्रारंभिक सर्वेक्षण किया जाता रहा है।

2. स्थल की योजना और ग्रिड बनाना –

उत्खनन के लिए चयनित स्थल को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक द्वारा अनुमति लाइसेस लेकर योजनाबद्ध तरीके से छोटे-छोटे वर्गों या आयतों में बाँटा जाता है, जिसे ‘ग्रिड’ कहते हैं। हर ग्रिड को नाम या नंबर दिया जाता है, ताकि वहां से मिलने वाली हर वस्तु की सटीक भौगोलिक स्थिति रिपोर्ट में दर्ज की जा सके।

3. लंबवत या क्षैतिज उत्खनन –

उत्खनन की तीन प्रमुख विधियां हैं – लंबवत खुदाई – इसके तहत समय-क्रम  का पता लगाने के लिए गहराई में खुदाई की जाती है। क्षैतिज खुदाई- इसमें किसी एक काल की पूरी बस्ती या संस्कृति का व्यापक स्तर पर विस्तार से पता लगाने के लिए बड़े क्षेत्र की खुदाई की जाती है।

क्वाड्रेंट (चतुर्थांश) विधि – टीलों और गोल स्मारकों (जैसे स्तूप)आदि के लिए साइट को चार हिस्सों में बाँट कर एक-एक का उत्खनन किया जाता है।

4. दस्तावेज़ीकरण और रिकॉर्डिंग –

यह उत्खनन का सबसे महत्वपूर्ण चरण होता है। मिट्टी की हर परत को हटाने से पहले और बाद में तस्वीरें खींची जाती हैं, नक्शे बनाए जाते हैं और डायरी में विस्तृत विवरण दर्ज किया जाता है।

5. वस्तुओं को निकालना और संरक्षित  करना – 

खुदाई के दौरान मिलने वाले अवशेषों (जैसे- बर्तन, सिक्के, मनके, हड्डियाँ) को विशेष उपकरणों द्वारा सावधानी पूर्वक निकाला जाता है। उसे बिना क्षति पहुंचाए साफ सुथरा किया जाता है। इसके बाद रासायनिक उपचार द्वारा उन्हें संरक्षित किया जाता है।

6. रिपोर्ट लेखन और प्रकाशन –

उत्खनन पूरा होने के बाद, सभी आँकड़ों, कलाकृतियों के विश्लेषण और कार्बन-14 (C-14) डेटिंग के परिणामों को मिलाकर एक विस्तृत वैज्ञानिक रिपोर्ट तैयार की जाती है और इसे प्रकाशित कराया जाता है। इसी के आधार पर उस क्षेत्र की पहचान और निष्कर्ष निकाला जाता है।

पुरातत्व उत्खनन के कालक्रम :-

पुरातत्व में कालक्रम मानव इतिहास की कहानी को समझने का मुख्य आधार है, जिसे मुख्य रूप से तीन युगों-पाषाण, कांस्य और लौह युग- में विभाजित किया जाता है। यह विभाजन औजारों की तकनीक और सामग्री पर आधारित होता है। सांस्कृतिक एवं उत्खनन का कालक्रम में पुरातत्व में स्थलों की खुदाई से प्राप्त अवशेषों, मृदभांडों (Pottery), और औजारों के आधार पर भारतीय इतिहास को मुख्य रूप से इन कालों में विभाजित किया जाता है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा भारत में हज़ारों प्राचीन स्थलों की खोज और उत्खनन किया गया है। ये स्थल भारत की प्रागैतिहासिक संस्कृतियों, सिंधु घाटी सभ्यता, मौर्य साम्राज्य और मध्य युगीन इतिहास को दर्शाते हैं।

प्रमुख स्थल और उनका विश्लेषण :- 

1.प्राचीन पाषाण काल :-

मानव का इतिहास का यह सबसेप्रारंभिक चरण होता है। इस काल में मानव क्वाटर्ज़ाइट पत्थरों के बड़े और भद्दे औजारों का उपयोग करता था। सोहन घाटी, नर्मदा घाटी और मद्रास इसके प्रमुख उत्खनन स्थल रहे हैं। अध्ययन की सुविधा के लिए इसे तीन उप भागों में बांटा जा सकता है –

पुरापाषाण (Palaeolithic), 

मध्यपाषाण (Mesolithic), 

नवपाषाण (Neolithic) और

ताम्र-पाषाण काल । 

इन्हीं कालक्रम के अनुरूप भारतीय उप महाद्वीप के कुछ प्रमुख और सबसे महत्वपूर्ण उत्खनित स्थलों को काल और क्षेत्र के अनुसार यहाँ सूचीबद्ध कर विवरण प्रस्तुत किया जा रहा है –

1). पुरापाषाण काल (2,500,000 से 10,000 ईसा पूर्व) –

यह सबसे लंबा काल था जब मानव पूर्णतः शिकारी और खाद्य-संग्रह कर्ता था। इस काल में हुए उत्खनन ने अनेक प्रारम्भिक वैज्ञानिक तकनीक और रहन सहन का रहस्योद्घाटन किया है।इस युग के प्रमुख स्थल हैं- 

भीमबेटका – 

मध्य प्रदेश का यह विश्व धरोहर स्थल  प्रसिद्ध है, यहाँ पुरापाषाण काल से लेकर मध्यपाषाण काल तक के शैलाश्रय और गुफा चित्र मिले हैं जो प्राचीन मानव की कला का प्रमाण रहे हैं। यह विश्व धरोहर स्थल  प्रागैतिहासिक मानव जीवन और गुफा चित्रों के लिए प्रसिद्ध है। यह भोपाल से लगभग 45 किमी दक्षिण-पूर्व में विंध्य पर्वतमाला की तलहटी में स्थित है । इन गुफाओं में 1,00,000 साल पहले के मानव जीवन के प्रमाण और भारत की सबसे प्राचीन शैल चित्रकला (Rock Art) मौजूद है। इन प्राचीन गुफाओं और चित्रों की खोज वर्ष 1957 में प्रसिद्ध भारतीय पुरातत्वविद् डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने की थी। इस क्षेत्र में 10 किलोमीटर के दायरे में 750 से अधिक शैलाश्रय (Rock Shelters) मौजूद हैं, जिनमें से लगभग 400 से 500 गुफाओं में प्रागैतिहासिक काल की चित्रकारी मिलती है।

अत्तिरामपक्कम – 

तमिलनाडु में स्थित यह भारत के सबसे प्राचीन पुरापाषाण कालीन स्थलों में से एक है , जहाँ से प्रारंभिक ऐशुलियन संस्कृति के साक्ष्य मिले हैं। यह तमिलनाडु राज्य के तिरुवल्लूर जिले में चेन्नई से लगभग 60 किलोमीटर दूर कोरतल्यार नदी बेसिन में स्थित है। यहाँ पाए गए प्राचीन पत्थर के औजार अशूलियन संस्कृति के हस्तकुठार और क्लीवर हैं जो लगभग 15 लाख (1.5 मिलियन) वर्ष पुराने आंके गए हैं। यहाँ निम्न पुरापाषाण से लेकर मध्य पुरापाषाण काल तक के साक्ष्य क्रमिक रूप से मिलते हैं।

हथनौरा – 

मध्य प्रदेश के नर्मदा घाटी में स्थित इस स्थल से भारत में सबसे प्राचीन ‘मानव खोपड़ी के जीवाश्म’ प्राप्त हुए हैं। यहाँ से प्राचीन पुरापाषाणकालीन उपकरण प्राप्त हुए हैं । भारतीय उपमहाद्वीप में स्थित इस प्रागैतिहासिक और पाषाण काल का इतिहास लगभग 20 लाख वर्ष पुराना है।  

      यह काल वह समय था जब मनुष्य लिपि या लेखन कला से अनजान था और पत्थरों के औजारों (पाषाण) का उपयोग करता था। यह दक्षिण एशिया का सबसे पुराना ‘अच्युलियन’  पाषाण युग स्थल है, जहाँ से लगभग 15 से 17 लाख वर्ष पुराने आदिमानवों के पत्थर के औज़ार खोजे गए है। अध्ययनों से यह सिद्ध हुआ कि यहाँ के औज़ार लगभग 15 लाख साल पुराने हैं, जो मानव प्रवास के ‘अफ्रीका से पलायन’ के पारंपरिक सिद्धांतों को नई दिशा देते हैं। यहाँ मुख्य रूप से क्वार्टजाइट (quartzite) पत्थरों से बनी हस्त- कुल्हाड़ियाँ (handaxes), क्लीवर (cleavers) और खुरचनी जैसे बेहतरीन और सममितीय औज़ार मिले हैं, जो होमिनिड्स (मानव पूर्वजों) की उच्च तकनीकी क्षमता को दर्शाते हैं। यह स्थल निम्न, मध्य और उच्च पुरापाषाण संस्कृतियों का एक लंबा और निरंतर अनुक्रम प्रस्तुत करता है, जिससे प्रारंभिक मानव के पारिस्थितिक अनुकूलन को समझने में मदद मिलती है।

2). मध्यपाषाण काल –

मध्यपाषाण काल 10,000 से 4000 ईसा पूर्व काल को माना जाता है। इस काल में छोटे पत्थर के औजारों (Microliths) का प्रयोग शुरू हुआ है। बेलन घाटी,आदमगढ़ (मध्य प्रदेश) और बागोर (राजस्थान) इसके प्रमुख उदाहरण हैं। इस काल के औजार छोटे होते थे जिन्हें ‘माइक्रोलिथ’ (Microliths) कहा जाता था। मानव ने पशुपालन की शुरुआत इसी काल में की थी।

बागौर (राजस्थान) – 

कोठारी नदी के तट पर स्थित यह स्थल भारत के सबसे बड़े मध्यपाषाण स्थलों में से एक है, जहाँ पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्य मिले हैं। यह भारत का सबसे बड़ा और क्षैतिज उत्खनन (horizontally excavated) किया जाने वाला प्रागैतिहासिक स्थल है। यहाँ से भारत में पशुपालन के सबसे प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। यहाँ के निवासी भेड़, बकरी और मवेशी पालते थे । यहाँ से बड़ी संख्या में सूक्ष्म पाषाण उपकरण (Microliths) मिले हैं, जो जैस्पर और चेल्सेडनी जैसे पत्थरों से बने थे । यहाँ से सुनियोजित तरीके से दफनाए गए 5 मानव कंकाल मिले हैं, जिन्हें उत्तर-दक्षिण दिशा में लिटाया गया था । पुरातात्विक उत्खनन में यहाँ मुख्य रूप से 3 सांस्कृतिक चरण देखे गए हैं –

चरण 1 (मध्य-पाषाण काल) – लगभग 5000-2500 ईसा पूर्व के मध्य यहां शिकार और पशुपालन हुआ करता था।

चरण 2 (ताम्र-पाषाण काल)- तांबे/कांसे के औजार और हाथ से बने मिट्टी के बर्तनों का उपयोग इस समय होता था।

चरण 3 (लौह काल) – लोहे के उपकरणों और चाक से बने बर्तनों का प्रचलन इस समय में होता था।

     यहाँ मिले साक्ष्य बताते हैं कि पाषाण काल के लोग धीरे-धीरे धातु की ओर विकसित हुए और कृषि-संस्कृति तथा हड़प्पा सभ्यता के समकालीन संपर्क में आए।

आदमगढ़ (मध्य प्रदेश) – 

नर्मदा नदी के पास स्थित, यह स्थल पशुपालन के प्रारंभिक साक्ष्य और मध्यपाषाण उपकरणों के लिए जाना जाता है । आदमगढ़ की गुफाएं मध्य प्रदेश राज्य के नर्मदापुरम (होशंगाबाद) जिले में विंध्याचल पर्वत श्रेणी में स्थित है। यह गुफाएं मध्य प्रदेश की प्रमुख गुफाएं समूह में से एक है। यहां पर कुल 80 गुफाएं (रॉक शेल्टर) हैं, जिनमें से 18 से 22 गुफाओं में शैलचित्र (रॉक पेंटिंग) बने हुए है। आदमगढ़ की गुफाओं की खोज वर्ष 1922 ईस्वी में मनोरंजन घोष ने की थी। आदमगढ़ मुख्य रूप से पहाड़ियों में स्थित प्रागैतिहासिक आदमगढ़ की गुफाएं शैलाश्रयों, रॉक शेल्टर, रॉक आश्रयों, आदमगढ़ रॉक पेंटिंग, रॉक आर्ट एवं आदमगढ़ शैलचित्रों के लिए प्रसिद्ध है।

दमदमा और सराय नाहर राय

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में स्थित इन स्थलों से प्राचीनतम मानव कंकाल मिले हैं। दमदमा से एक ही कब्र में तीन मानव कंकाल , गर्त चूल्हे और हड्डी के उपकरण प्राप्त हुए हैं। सराय नाहर राय उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ घंटा घर से 25 किलोमीटर दूर गोखुर झील के किनारे स्थित है। इस पुरास्थल की खोज के. सी. ओझा ने की थी। इसका विस्तार 1800 वर्ग मीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। सराय नाहर राय में कुल 11 मानव समाधियाँ तथा 8 गर्त चूल्हों का उत्खनन प्रयागराज विश्व विद्यालय की ओर से किया गया था। यहाँ की क़ब्रें (समाधियाँ) आवास क्षेत्र के अन्दर स्थित थीं। जिनकी गहराई बहुत अधिक नही थी। यहाँ संयुक्त रूप से 2 पुरुषों एवं 2 स्त्रियों को एक साथ दफ़नाये जाने के प्रमाण मिले हैं। सराय नाहर राय से जो 15 मानव कंकाल मिले हैं, वे ह्रष्ट-पुष्ट तथा सुगठित शरीर वाले मानव समुदाय के प्रतीत होते हैं। चूल्हों के अवशेष से हिरण, बारहसिंगा, जंगली सुअर आदि पशुओं की अधजली हड्डियाँ मिली हैं। यहाँ पर चूल्हों का उपयोग पशुओं के मांस को भूनने के लिए भी किया जाता था। जो भी मानव अस्थियाँ यहाँ से मिली उनकी औसत ऊंचाई 1.8 मीटर यानि लगभग 6 फुट पाई गई। प्रत्येक मानव कंकाल के साथ पत्थरों के जो भी उपकरण दफ़नाये गए थे वो सभी मध्य पाषाण काल के माने जाते हैं। जिसे 12,000 साल से लेकर 10,000 साल के बीच का कालखंड घोषित किया गया है। विचित्र बात ये है कि यहाँ से मिट्टी के बर्तनों का कोई भी अवशेष खुदाई से नहीं प्राप्त हुआ। यानि आज से 10,000 साल पहले का मनुष्य मिट्टी के बर्तन बनाना नहीं जानता था। पूरे विश्व में पाए गए उत्खनन अवशेषों में यहाँ से मिले मानव कंकालों को सबसे प्राचीन माना जाता है।

3). नवपाषाण काल –

प्रागैतिहासिक काल का वह अंतिम चरण है जब मानव ने शिकार करने व भोजन इकट्ठा करने के बजाय कृषि और पशुपालन शुरू किया। इस काल लगभग 7000 ईसा पूर्व से 3000 ईसा पूर्व में मानव खाद्य संग्राहक से खाद्य उत्पादक बन गया। यहाँ से मानव ने कृषि और स्थायी बसावट शुरू की, साथ ही पहिए व पॉलिश वाले पत्थरों का आविष्कार किया। 

मेहरगढ़

पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में बोलन दर्रे के पास कच्ची के मैदान में स्थित एक प्रमुख नवपाषाणकालीन पुरातात्विक स्थल है। यह दक्षिण एशिया में प्राचीनतम कृषि और पशुपालन का सबसे पहला ज्ञात साक्ष्य प्रस्तुत करता है, जिसका समय लगभग 7000 ईसा पूर्व से 2500 ईसा पूर्व तक माना जाता है। यहाँ के लोग मुख्य रूप से गेहूं और जौ की खेती करते थे तथा भेड़, बकरियों और मवेशियों को पालतू बनाते थे। भारतीय उपमहाद्वीप में प्राचीनतम कृषि (गेहूं व जौ) और स्थायी बस्ती साक्ष्य यहीं से प्राप्त हुए हैं।  मेहरगढ़ से दुनिया में कपास (कपास के धागे) का सबसे पुराना ज्ञात साक्ष्य प्राप्त हुआ है। यहाँ के निवासियों को मिट्टी के बर्तन बनाने (जिन्हें ‘तोजाऊ’ कहा जाता है), मनके बनाने और धातु-शिल्प में महारत हासिल थी। इसके अलावा शुरुआती दंत चिकित्सा और टेराकोटा की मूर्तियां भी यहाँ से मिली हैं।

बुर्जहोम श्रीनगर

कश्मीर से लगभग 16 किमी उत्तर-पूर्व में स्थित एक प्रमुख नवपाषाणकालीन (Neolithic) पुरातात्विक स्थल है। 3000 से 1000 ईसा पूर्व के बीच की इस प्राचीन मानव बस्ती की खोज 1930 के दशक में की गई थी। यहाँ भूमिगत गड्ढों वाले घर (Pit Dwellings) मिलते हैं। यहाँ के लोग अत्यधिक ठंड से बचने के लिए ज़मीन के भीतर गोलाकार या आयताकार गड्ढों में घर बनाते थे और उन्हें घास-फूस की छतों से ढँकते थे। कश्मीर के डल झील के निकट स्थित यह स्थल अपने ‘गर्त आवास’  के लिए प्रसिद्ध है, जहाँ मानव भूमि के अंदर गड्ढों में रहते थे। बुर्जहोम के लोग गेहूँ, जौ और मसूर की खेती करते थे। वे कुत्ते, भेड़, बकरी और सुअर जैसे जानवर पालते थे। इस स्थल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ पालतू कुत्तों (या अन्य जानवरों) को उनके मालिकों के साथ दफनाए जाने के अद्वितीय साक्ष्य मिले हैं। यहाँ से हड्डी की सुइयाँ, मछली पकड़ने के कांटे, पत्थर के कुल्हाड़ी और छिद्रित चाकू प्राप्त हुए हैं। इसके अलावा, मृदभांड (बर्तन) और मनके भी मिले हैं।

चिरंद

बिहार के सारण जिले में घाघरा नदी के तट पर स्थित एक अत्यंत महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है। इस प्रागैतिहासिक स्थल से प्रचुर मात्रा में हड्डी और सींग से बने उपकरण मिले हैं। यह भारत में नवपाषाण काल (लगभग 2500 ईसा पूर्व) के सबसे प्रमुख स्थलों में से एक है। खुदाई में हड्डी के औजार, मनके और कृषि के प्राचीन साक्ष्य मिले हैं। चिरंद में बड़ी संख्या में नवपाषाणकालीन उपकरण और हथियार प्राप्त हुए हैं, जिन्हें देखकर प्रसिद्ध ब्रिटिश पुरातत्वविद् एफ.आर. एल्चिन ने इसे “भारत की नवपाषाण संस्कृति का उगता सूरज” कहा था। पुरातात्विक उत्खनन से गेहूं, चावल (धान) और जौ की बालियां मिली हैं। इससे यह प्रमाणित होता है कि यहाँ के निवासी शिकार के अलावा खेती और पशुपालन करना सीख गए थे।

  यहाँ हुई खुदाई में लगातार तीन संस्कृतियों – नवपाषाण, ताम्रपाषाण (लगभग 2000 ईसा पूर्व) और लौह काल के अवशेष मिले हैं। यहाँ के लोग सरकंडे और बांस से बने गोलाकार घरों (मिट्टी के लेप वाले) में रहते थे और आग के चूल्हों का इस्तेमाल करते थे। यह काल पाषाण क्रांति के रूप में जाना जाता है जब मानव ने कृषि और स्थायी जीवन की शुरुआत की तथा पहिए व बर्तनों का आविष्कार किया।

अदिचनाल्लूर – 

तमिलनाडु में  स्थित यह दक्षिण भारत का एक प्रमुख महापाषाणकालीन  उत्खनन स्थल है, जहाँ से बड़ी संख्या में कलश (Urns) और लौह उपकरण मिले हैं। 

यह भारत के सबसे बड़े और सबसे महत्त्वपूर्ण लौहयुगीन-महापाषाणिक कलश शवाधन स्थलों में से एक है, जो तमिलनाडु के थूथुकुडी ज़िले में थामिरबरानी नदी के किनारे स्थित है।

इस संस्कृति को एफ. जगोर द्वारा वर्ष 1876 में सर्वप्रथम खोजा गया और बाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा किये गए उत्खनन के दौरान इस स्थल से मृद्भांड, लोहे के औजार, काँसे के पात्र, सोने के आभूषण/मुकुट, मनके और मानव कंकाल अवशेषों वाले शवाधन प्राप्त हुए हैं।

नागार्जुनकोंडा –

भारत के आंध्र प्रदेश के पालनाडु जिले में नागार्जुन सागर झील के बीच स्थित एक ऐतिहासिक द्वीप और प्रसिद्ध बौद्ध स्थल है। दूसरी शताब्दी में यहाँ महायान बौद्ध धर्म के महान आचार्य नागार्जुन रहते थे। यह कभी एक बड़ा बौद्ध विश्वविद्यालय हुआ करता था।आँध्र प्रदेश का यह एक महत्वपूर्ण बौद्ध स्थल है, जहाँ से प्राचीन स्तूप, विहार और मूर्तिकला के अवशेष उत्खनन में प्राप्त हुए हैं। सातवाहन और इक्ष्वाकु राजवंशों के समय यह एक प्रमुख सांस्कृतिक और शैक्षिक केंद्र था। यहाँ श्रीलंका, चीन और बंगाल जैसे दूर-दराज के क्षेत्रों से छात्र शिक्षा प्राप्त करने आते थे। नागार्जुनसागर बांध के निर्माण के समय प्राचीन अवशेष जलमग्न हो गए थे। इन्हें सुरक्षित रखने के लिए खुदाई कर ऊंचे टीले (द्वीप) पर स्थानांतरित किया गया, जहाँ एक बौद्ध विहार के आकार का नागार्जुनकोंडा संग्रहालय बनाया गया। इसमें बुद्ध के अवशेष, मूर्तियां और प्राचीन शिलालेख सुरक्षित हैं।

4.)ताम्र-पाषाण काल –

ताम्रपाषाण काल (Chalcolithic Age), 

3500 से 1500 ईसा पूर्व यह काल नवपाषाण युग और कांस्य युग के बीच की एक महत्वपूर्ण संक्रमणकालीन अवधि है। यह लगभग 2000 ईसा पूर्व से 700 ईसा पूर्व तक का काल था। इसमें मानव ने पत्थर के साथ-साथ तांबे (पहली खोजी गई धातु) के औजारों और बर्तनों का उपयोग करना शुरू किया था।

     भारत में प्रमुख ताम्रपाषाण संस्कृतियाँ और स्थल निम्न हैं –

आहड़ संस्कृति (राजस्थान) – इसे ‘बनास संस्कृति’ भी कहा जाता है।आहड़ और गिलुंद यहाँ के प्रमुख स्थल हैं।

जोरवे संस्कृति (महाराष्ट्र) – यह बहुत विकसित थी।इसमें दैमाबाद, इनामगाँव, नेवासा और जोरवे शामिल हैं।दैमाबाद इस संस्कृति का सबसे बड़ा स्थल है।

मालवा संस्कृति (मध्य प्रदेश) – मालवा के मृदभांड (मिट्टी के बर्तन) इस काल में सबसे उत्कृष्ट माने जाते हैं।

कायथा संस्कृति (मध्य प्रदेश) – यह क्षेत्र अपनी तांबे की कलाकृतियों और मनकों के लिए प्रसिद्ध थी।

दायमाबाद

दैमाबाद महाराष्ट्र राज्य के अहमदनगर जिले के श्रीरामपुर तालुका में गोदावरी नदी की सहायक नदी प्रवारा नदी के बाएं किनारे पर स्थित एक वीरान गांव और पुरातात्विक स्थल है । इस स्थल की खोज 1958 में बीपी बोपर्दिकर ने की थी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की टीमों द्वारा अब तक तीन बार इसका उत्खनन किया जा चुका है । पहला उत्खनन 1958-59 में एम.एन. देशपांडे के निर्देशन में किया गया था। दूसरा उत्खनन 1974-75 में एस.आर. राव के नेतृत्व में किया गया था । अंत में, 1975-76 और 1978-79 के बीच उत्खनन एस.ए. साली के निर्देशन में किया गया था। दैमाबाद में हुई खोजों से पता चलता है कि उत्तर हड़प्पा संस्कृति भारत के दक्कन पठार तक फैली हुई थी। दैमाबाद कई कांस्य वस्तुओं की बरामदगी के लिए प्रसिद्ध है, जिनमें से कुछ हड़प्पा संस्कृति से प्रभावित थीं । 

इनामगांव –

महाराष्ट्र के पुणे जिले में घोड नदी के दाहिने किनारे पर स्थित एक प्रमुख ताम्रपाषाण (चालकोलिथिक) पुरातात्विक स्थल है। यह हड़प्पा-पश्चात कृषि प्रधान बस्ती लगभग 2500 साल पुरानी अपनी अनूठी दफन प्रथाओं, प्राचीन जीवनशैली और पुरातात्विक अवशेषों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यह स्थल मुख्य रूप से ताम्रपाषाण कालीन जोरवे संस्कृति लगभग 1400 ईसा पूर्व से 700 ईसा पूर्व का एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। यहाँ घर के फर्श के नीचे बच्चों को दोहरे कलश (Urn burials) में दफनाने के अद्वितीय साक्ष्य मिले हैं। इसके अलावा, आँगन वाले बड़े घरों में मुख्य (प्रमुख) लोगों के दफनाए जाने के भी अवशेष मिले हैं, जिन्हें डेक्कन कॉलेज पोस्ट-ग्रेजुएट एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट 

के संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है।  उत्खनन में गोलाकार और आयताकार घरों के अवशेष, चूल्हे और अनाज रखने के गड्ढे मिले हैं। यहाँ के लोग जौ, चावल, मसूर जैसी फसलें उगाते थे और भेड़, बकरी, सुअर तथा हिरण जैसे जानवरों का मांस खाते थे।

2. प्राचीन बौद्ध एवं महापाषाण स्थल 

इसके पुनः दो उपभाग बनते हैं –

1.)कांस्य युग / सिंधु घाटी सभ्यता का युग – इसका समय 2700 से 1500 ईसा पूर्व माना जाता है। भारत में प्रथम नगरीकरण के प्रमाण यहीं से मिलना शुरू हो जाते हैं। इन स्थलों के उत्खनन में पकी ईंटों के मकान मिले हैं। यहां सुनियोजित जल निकासी के प्रमाण मिले हैं साथ ही साथ इन स्थलों पर पर्याप्त मात्रा में मोहरें भी मिलीं हैं। 

2.)लौहयुग /वैदिक व महापाषाण काल–  इसका समय 1500 से 600 ईसा पूर्व माना जाता है।लोहे की खोज इसी काल में हुआ है साथ ही नगरीकरण के प्रमाण भी इसी काल से मिलना शुरू हुआ है। इस काल की जानकारी मुख्य रूप से चित्रित धूसर मृदभांड (PGW) और दक्षिण भारत के महापाषाण (Megaliths) स्थलों की खुदाई से प्राप्त होती है।

सिंधु घाटी / हड़प्पा संस्कृति :-

भारत के प्रमुख उत्खनित (खुदाई किए गए) पुरातात्विक स्थल देश के प्राचीन इतिहास, सिंधु घाटी सभ्यता, और विभिन्न प्राचीन संस्कृतियों की जानकारी देते हैं। सिंधु नदी की घाटी,हड़प्पा, मोहनजो-दारो, गुजरात में लोथल,राजस्थान में कालीबंगा, और राखीगढ़ी (हरियाणा) मुख्य उत्खनन स्थल सिंध और पंजाब में विभिन्न स्थलों पर किए गए विभिन्न उत्खनन सभ्यता की निरंतरता की पुष्टि करते हैं।  ये स्थल भारतीय उपमहाद्वीप में मानव सभ्यता के विकास का प्रमाण हैं। वर्ष 1921-22 में हड़प्पा में पुरातात्विक उत्खनन किया गया था। 

  सिंधु घाटी सभ्यता (उदा. हड़प्पा, मोहनजो-दारो) की खुदाई में मिले सुनियोजित शहर, उत्कृष्ट जल निकास प्रणाली (drainage system) और पक्की ईंटों के घर उस समय के उन्नत नागरिक और वास्तुशिल्प का प्रदर्शन करते हैं। इसके अलावा पाकिस्तान में भी समान आकार और योजना के एक अन्य प्राचीन शहर मोहनजो-दारो के खंडहरों की खुदाई की गई थी। भारत विभाजन के फलस्वरूप ये स्थल पाकिस्तान की शोभा बढ़ा रहे हैं। विभाजन के बाद भारत में प्रमुख उत्खनित स्थलों की सूची इस प्रकार है।

प्रमुख स्थल :-

लोथल (गुजरात) – 

यह प्राचीन काल में एक प्रमुख बंदरगाह और व्यापारिक केंद्र था।गुजरात के भाल क्षेत्र में भोगवा नदी के तट पर स्थित लोथल एक प्रमुख सिंधु घाटी सभ्यता का स्थल है। यहाँ से प्राप्त सबसे प्रमुख अवशेष विश्व का प्राचीनतम गोदीबाड़ा (डॉक्यार्ड) है, जो यह साबित करता है कि यह एक प्रमुख व्यापारिक और बंदरगाह शहर था। यहां विदेशी व्यापार की पुष्टि करने वाली मेसोपोटामिया और फारस की मुद्राएं (मोहरें), बांट और माप  के उपकरण प्राप्त हुए हैं। हड़प्पाकालीन बंदरगाह के अतिरिक्त विशिष्ट मृदभांड, उपकरण, मुहरें, बांट तथा माप एवं पाषाण उपकरण भी यहां प्राप्त हुए हैं । यहाँ के एक घर से सोने के दाने ,सेलखड़ी की चार मुहरें, सींप एवं तांबे की बनी चूड़ियों और मिट्टी का लेपित जार मिला है। शंख के कार्य करने वाले दस्तकारों व ताम्रकर्मियों के कारखाने भी यहां मिले हैं। यहाँ तीन युग्मित समाधि के भी उदाहरण मिलते हैं। साथ ही, स्त्री-पुरुष शवाधान के साक्ष्य भी प्राप्त हुए हैं। 

राखीगढ़ी (हरियाणा) –

सिंधु घाटी सभ्यता का यह स्थल राखीगढ़ी हरियाणा में यह दुनिया का सबसे बड़ा हड़प्पाकालीन स्थल है। यह सिंधु सभ्यता के सबसे बड़े और प्राचीन स्थलों में से एक है, जिसकी खुदाई में सुनियोजित शहर और व्यापारिक प्रमाण मिले हैं । यहाँ प्राचीन काल के पक्के मकान,जलनिकासी व्यवस्था और डीएनए विश्लेषण वाले मानव कंकाल मिले हैं। हाल ही मेंभारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा 8 नई कब्रों और 3 पूर्ण मानव कंकालों की खोज की गई है।यह महत्वपूर्ण अवशेष प्राचीन मानव डीएनए (DNA) विश्लेषण के लिए कोलकाता स्थित भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण को सौंपे गए हैं। इन कब्रों के साथ मिट्टी के बर्तन, शंख की चूड़ियाँ और आभूषण मिले हैं, जो उस समय के लोगों के मृत्यु उपरांत जीवन में विश्वास को दर्शाते हैं। यहां बड़े पैमाने पर मनके बनाने के केंद्र, तांबे और सोने के आभूषण, मुहरें, और सुनियोजित पक्के मकान और नालियों के साक्ष्य मिले हैं।

धोलावीरा (गुजरात) –

गुजरात के कच्छ जिले में स्थित धोलावीरा सिंधु घाटी सभ्यता का पांचवा सबसे बड़ा और उत्कृष्ट नगर है। अपनी अनूठी विशेषताओं के कारण इसे यूनेस्को ने विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है। यह शहर अपनी उन्नत जल संरक्षण प्रणाली के लिए जाना जाता है। यहाँ बारिश का पानी सहेजने के लिए विशालकाय तालाब (जलाशय), स्टेपवेल और नालियों की बेहतरीन व्यवस्था थी।अन्य हड़प्पा स्थलों के विपरीत, धोलावीरा तीन भागों (दुर्ग, मध्य नगर और निचला नगर) में विभाजित था। इसे आयताकार रूप में बसाया गया था। कच्छ के रण में स्थित यह नगरअपनी उत्कृष्ट नगर- नियोजन और जल संरक्षण प्रणालियों के लिए जाना जाता है। 

कालीबंगा (राजस्थान) – 

राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में घग्गर (सरस्वती) नदी के तट पर स्थित कालीबंगा (काले रंग की चूड़ियाँ) एक प्रमुख प्राक्-हड़प्पा और हड़प्पाकालीन सभ्यता का स्थल है। इसकी खोज 1952 में अमलानंद घोष द्वारा की गई। यह विश्व के सबसे प्राचीन जुते हुए खेत और भूकंप के साक्ष्यों के लिए प्रसिद्ध है। यह नगर ग्रिड-पद्धति (चेस-बोर्ड) पर बसा था, जहाँ सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं। मकान मुख्य रूप से कच्ची ईंटों से बनाए जाते थे। यहाँ के घरों में जलनिकास के लिए पक्की ईंटों के बजाय लकड़ी की नालियों का प्रयोग किया जाता था, जो इसे अन्य हड़प्पा स्थलों से अलग बनाता है।

     यहाँ से जुते हुए खेतों और अग्निकुंडों के साक्ष्य मिले हैं । यहाँ से जूते हुए खेत, अग्निकुंड और चूड़ियों के अवशेष प्राप्त हुए हैं । यहाँ के चबूतरों पर सात अग्नि वेदियाँ या हवन कुंड पाए गए हैं, जो धार्मिक कर्मकांड और यज्ञ प्रथा की उपस्थिति को दर्शाते हैं।

सिनौली (उत्तर प्रदेश)-

उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में स्थित सिनौली (Sinauli) लगभग 4,000 वर्ष पुरानी (लगभग 2000-1800 ईसा पूर्व) एक प्राचीन और ऐतिहासिक ताम्रपाषाण कालीन सभ्यता का स्थल है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा यहाँ की गई खुदाई में कांस्य युगीन शाही कब्रगाह, तांबे की ढाल, तलवारें, मुकुट और बिना स्पोक्स (पहियों की तीलियों) वाले प्राचीन रथों के साक्ष्य मिले हैं, जो भारत केप्राचीन इतिहास में योद्धा संस्कृति की पुष्टि करते हैं। प्राचीन ऐतिहासिक और कांस्य/ताम्र युगीन स्थल सिनौली दिल्ली के पास स्थित इस स्थल से महाभारत काल के समय के योद्धाओं के ताबूत, रथ, और तलवारें प्राप्त हुई हैं। सिनौली संस्कृति हड़प्पा सभ्यता के पतन और क्षेत्रीय संस्कृतियों (जैसे OCP संस्कृति) के उदय के समय की है। यहाँ की दफन परंपराएं, रथों के प्रमाण और योद्धाओं की पोशाकें प्राचीन वैदिक ग्रंथों (जैसे ऋग्वेद) से काफी मेल खाती हैं। यह स्थल सिंधु घाटी सभ्यता और प्राचीन वैदिक संस्कृति के बीच के कालक्रम को जोड़ने में एक अहम कड़ी साबित हो रहा है।

आलमगीरपुर (मेरठ) –

आलमगीरपुर भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के मेरठ जिले में हिंडन नदी के तट पर स्थित सिंधु घाटी सभ्यता का सबसे पूर्वी पुरास्थल है। यह हड़प्पा काल की अंतिम अवस्था को दर्शाता है। इसे स्थानीय रूप से ‘परसराम का खेड़ा’ या ‘परशुराम का टीला’ भी कहा जाता है। खुदाई के दौरान यहाँ से तांबे के टूटे हुए ब्लेड, मिट्टी की मुहरें, मनके, चूड़ियाँ, और कूबड़ वाले बैल व सांप की मृण्मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। इसके अलावा, यहाँ से कपड़े की छाप वाले मिट्टी के बर्तन भी मिले हैं, जो उस काल के वस्त्र निर्माण को दर्शाते हैं।

हस्तिनापुर –

हस्तिनापुर उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में गंगा नदी के तट पर स्थित एक अत्यंत प्राचीन और ऐतिहासिक पूरा स्थल है। यह महाभारत काल में कौरवों और पांडवों की राजधानी थी और जैन धर्म के लिए भी एक परम पवित्र तीर्थ स्थल है।

प्रसिद्ध पुरातत्वविद् बीबी लाल की खोज में यहाँ ‘चित्रित धूसर मृदभांड’ (Painted Grey Ware) संस्कृति के अवशेष मिले हैं, जो महाभारत के समय (लगभग 1000  ईसा पूर्व) की बस्तियों की पुष्टि करते हैं।भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा इन टीलों को संरक्षित घोषित किया जा चुका है और आज भी ऐतिहासिक रहस्यों को खंगालने का कार्य जारी है।

बैराट (राजस्थान) – 

इसे राजा विराट ने बसाया था। यहाँ मौर्यकालीन बौद्ध स्तूप और प्राचीन अवशेष उत्खनित किए गए हैं।अभिलेखों के अनुसार सभ्यता 2700 ईसा पूर्व के दौरान अस्तित्व में थी।

     भारत के पुरातत्व ने दक्षिण भारतीय स्थलों जैसे आदिचना लूर, चंद्रवल्ली, ब्रह्मगिरी में खुदाई करके एक और प्रशंसनीय काम किया और प्रागैतिहासिक काल के बारे में बताया। इसके अलावा अजंता और एलोरा के रॉक कट मंदिर अपनी मूर्तियों और चित्रों के साथ उस काल की कलात्मक सुंदरता को व्यक्त करते हैं। वर्ष 1947 में भारतीय स्वतंत्रता के बाद धोलावीरा, लोथल, कालीबंगन, राखीगरी, बनवाली, कुणाल, सुरकोटडा, भगवानपुरा, नागेश्वर, कुंतसी, पादरी में सिंधु सभ्यता के लगभग 400 पुरातात्विक अवशेष पाए गए।

3.ऐतिहासिक एवं मौर्य-गुप्त कालीन स्थल :-

ऐतिहासिक काल (Historical Period – 600 ईसा पूर्व से आगे):यह काल मौर्य, गुप्त, और मध्यकालीन साम्राज्यों से जुड़ा है। तक्षशिला, सारनाथ, और पाटलिपुत्र की खुदाई से इस काल के भवन, सिक्के और अभिलेख प्राप्त हुए हैं।

नालंदा – 

इस प्राचीन महाविहार और अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के अवशेष  उत्खनन से ही प्रकाश में आए हैं।यह ऐतिहासिक स्थल लगभग तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व (मौर्य काल) से लेकर 13वीं शताब्दी ईस्वी तक अस्तित्व में रहा। इसकी शुरुआत प्राचीन काल (गुप्त काल) में हुई थी ।इस महान आवासीय विश्वविद्यालय की स्थापना 5वीं सदी में गुप्त सम्राट कुमारगुप्त प्रथम द्वारा की गई थी। यह मध्यकाल तक (पांचवीं से तेरहवीं शताब्दी ईस्वी) एक प्रमुख महाविहार और अंतरराष्ट्रीय शिक्षा केंद्र के रूप में फला- फूला था।

कुम्हरार

बिहार में पटना के पास स्थित यहाँ 

शहर के प्राचीन इतिहास और प्राचीनता को देखते हुए, कई अन्वेषण और उत्खनन कार्य किए गए, जिनकी शुरुआत एल.ए. वाडेल ने 1892 में की थी। वाडेल ने पटना में बुलंदी बाग, छोटी पहाड़ी, तुलसीमंडी, महाराजगंज, रामपुर, बहादुरपुर और कुम्हरार जैसे विभिन्न स्थलों पर उत्खनन किया। कुम्हरार में उन्हें अशोक का एक टूटा हुआ स्तंभ मिला। वाडेल के बाद, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के डी.बी. स्पूनर ने 1912 से 1916 तक उत्खनन किया, जिसमें कुम्हरार में गुप्त और उत्तर-गुप्त काल की ईंट की दीवारों के अवशेष मिले। इन दीवारों के नीचे 4.57 मीटर या 15 फीट के अंतराल पर पॉलिश किए हुए बलुआ पत्थर के स्तंभों के टुकड़े मिले। उन्होंने 8 पंक्तियों में 80 स्तंभ पाए और इस प्रकार यह निष्कर्ष निकाला कि कुम्हरार स्थल मौर्यकालीन स्तंभों वाले हॉल से संबंधित था, जो पर्सेपोलिस के अचमेनिद हॉल के समान था । इस प्रकार, कुम्हरार का स्थल मौर्य वंश के 80 स्तंभों वाले सभागृह के रूप में जाना जाने लगा।

सारनाथ

काशी के पौराणिक शहर से लगभग 10 किमी दूर स्थित, प्राचीन काल से ऋषिपाटन और मृगदव नाम से भी प्रसिद्ध है। यह क्षेत्र महात्मा बुद्ध और जैन तीर्थंकर श्रेयांस नाथ जैसे महान पौराणिक कथाओं के कार्यस्थल होने के लिए भी प्रसिद्ध है। समय के साथ, मौर्य वंश, गुप्त वंश आदि जैसे विभिन्न विकृत राजवंशों में प्रमुख राजनीतिक, सांस्कृतिक, धार्मिक गतिविधियों जैसे स्तूप, विहार, अशोक स्तंभ आदि के विभिन्न रूप शामिल थे। भगवान बुद्ध द्वारा अपना पहला उपदेश देने वाले इस स्थल पर धमेख स्तूप, अशोक स्तंभ और मूलगंध कुटीर विहार उत्खनित किए गए हैं। सम्राट अशोक ने 273-232 ईसा पूर्व यहां बौद्ध संघ के प्रतीक स्वरूप विशालकाय स्तंभ स्थापित किया था। इसके ऊपर स्थापित सिंह आज भारत देश का राष्ट्रीय प्रतीक है।

बलिराजगढ़

बिहार के मधुबनी जिले में स्थित इस प्राचीन किलेबंद शहर की खुदाई में मौर्य, शुंग और पाल काल की कलाकृतियों और दीवारों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। खुदाई में प्राचीन ईंटों की दीवारें, सात परतों वाली ईंटों की संरचना, आंगन, रिंग-वेल (कुआं) और बेहतरीन जल निकासी व्यवस्था मिली है। इसके अलावा बर्तन, सिक्के, मुहरें, मिट्टी की मूर्तियां और पत्थर की गेंदें भी प्राप्त हुई हैं। यह स्थल मुख्य रूप से शुंग काल (लगभग 200 ईसा पूर्व) का है, लेकिन यहाँ मौर्य, कुषाण, गुप्त और पाल काल (700 ईसा पूर्व से 12वीं शताब्दी ईस्वी तक) के भी साक्ष्य मौजूद हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्राचीन विदेह साम्राज्य का एक प्रमुख शहरी और प्रशासनिक केंद्र रहा है।

पुरातात्विक स्थलों के उत्खनन से भारतीय संस्कृति की समृद्धता :- 

पुरातात्विक स्थलों की खुदाई (उत्खनन) से मिली सामग्री भारतीय संस्कृति की प्राचीनता, निरंतरता और भव्यता को प्रमाणित करती है। यह हमें लिखित इतिहास से आगे ले जाकर भौतिक साक्ष्य देती है, जो हमारी गौरवशाली विरासत को प्रत्यक्ष रूप से दर्शाते हैं। खुदाई से प्राप्त अवशेष हमारी उच्च कोटि की जीवनशैली, वैज्ञानिक सोच, कला और समृद्ध व्यापारिक परंपराओं को उजागर करते हैं, जो आज भी भारतीय पहचान की नींव हैं।