लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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हाल ही में आए चार राज्यों के चुनाव परिणामों में इंदिरा कांग्रेस की विफलता तथा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की प्रचंड सफलता ने साम्प्रदायिक एवं लोकलुभावन राजनीति को करारा तमाचा जड़ा है| जनता जनार्दन अब मनगढंत वादों और दावों को झुठलाने लगी है गोयाकि आम आदमी भी सत्तालोलुप राजनीतिक दलों की राजनीति को समझने लगा है और उन्हें  नकारने में भी उसे कोई गुरेज नहीं है| १२७ साल पुरानी पार्टी के लिए यह स्थिति अत्यन्त लज्जाजनक ही है| देखा जाए तो इस हालत के लिए पार्टी का शीर्ष नेतृत्व और इसकी नीतियां ही जिम्मेदार हैं| पिछले १० सालों से केंद्र में आरूढ़ कांग्रेस न तो अपने सहयोगी दलों को संतुष्ट कर पाई है और न ही भविष्य के भारत का खाका उसने जनता के समक्ष प्रस्तुत किया है| घोटालों पर घोटाले, पड़ोसी देशों की उद्दंडता पर भीरूता, जनता को मालिक के बजाए गण मानने की प्रवृत्ति जैसे अनगिनत कारक हैं जो भारत की महान छवि के साथ अन्याय कर रहे हैं| इसके उलट भाजपा की राष्ट्र को सर्वोपरि मानने की नीति, जनता ही मालिक है का उदघोष, पार्टी शासित राज्यों में सुशासन, सुराज व दृढ संकल्प ने पार्टी को आम जन में लोकप्रिय बना दिया है| इसकी बानगी पार्टी की ऒर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र भाई मोदी की देशभर में आयोजित जनसभाओं में उमड़ती भारी भीड़ से लक्षित होती है| मोदी की लोकप्रियता व गुजरात में उनकी सरकार के सुराज ने जनता को मोहित करते हुए यह विश्वास भी दिलाया है कि कमजोर और भीरु सरकार के दिन अब लद गए हैं| हालांकि कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं के अनुसार मोदी की हवा जानबूझ कर मीडिया द्वारा बनाई गई है| यदि इनके दावे पर एक बारगी यकीन कर भी लिया जाए तो क्या यह सम्भव है? कदापि नहीं| लोकतंत्र का चौथा खम्भा बिकाऊ नहीं है| मोदी हों या राहुल; उसकी नज़र में सभी एक समान हैं| हां, जो जनता की बात करता है, सुराज का संकल्प लेता है, सुशासन की तस्वीर दिखाकर उसका वादा करता है, अपने कहे को यथार्थ के धरातल पर उतारकर दिखलाता है, जनता जिसकी एक झलक पाने को उसकी ऒर खिंची चली आती है; ऐसे नेता को यदि मीडिया तवज्जो देता भी है तो कोई अति नहीं करता| मीडिया तो राहुल गांधी के दलित घर में भोजन के प्रपंच को भी स्थान देता है| तब क्यों इन कांग्रेसियों की जुबान पर ताले पड़ जाते हैं? दरअसल अपना दामन किसी को भी साफ़ लग सकता है| यह मानवीय स्वभाव भी है और कांग्रेस की दुर्गति देखकर इसमें उबाल आना स्वाभाविक है| यह कहने में कोई गुरेज नहीं होता कि कांग्रेस अब देश में एक ऐसी डूबती नाव बन गई है जिसकी सवारी करना शायद ही कोई पसंद करे? किन्तु तरस आता है उन नेताओं पर जो राहुल गांधी को नरेंद्र मोदी से बड़ा व्यक्तित्व करार देते हैं| उनके अनुसार २०१४ के लोकसभा चुनाव में राहुल का कथित करिश्मा एक बार पुनः जनता के सर चढ़कर बोलने वाला है| हालांकि यह दावा करते हुए वे हर भूल जाते हैं कि जयपुर अधिवेशन में उपाध्यक्ष पद संभालने के बाद से हुए विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों में आम जनता कांग्रेस और राहुल दोनों को नकार चुकी है| कुछ अपवादों को यदि परे रख दिया जाए तो राहुल राजनीति में अब तक अपरिपक्व ही नज़र आए हैं| पिछले वर्ष उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में चुनावी जनसभा को सम्बोधित करते वक़्त मंच से समाजवादी पार्टी के घोषणा पत्र को फाड़ने से लेकर दागियों को बचाने वाले अध्यादेश को घटिया बताकर तार-तार करने से वे अपनी पार्टी के चाटुकारों की नज़र में राष्ट्रीय नायक हो सकते हैं किन्तु आम जनता की नज़र में यह छिछोरापन ही है| मात्र बाहों पर कुर्ते को बार-बार चढ़ाकर बनावटी आक्रोश दिखाना आपको जनता का हितैषी होने का प्रमाण पत्र नहीं देता| देश के समक्ष जितने भी ज्वलंत मुद्दे आए हैं, उनमें राहुल की चुप्पी कई कयासों को जन्म देती है| फिर भी यदि चाटुकारों और चरणवंदकों की दृष्टि में वे लोकप्रियता के तमाम मापदंडों पर खरे उतरते हैं तो यह कांग्रेस पार्टी का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा|
अब जबकि २०१४ के लोकसभा चुनाव में अधिक वक़्त नहीं बचा है; सुनते हैं कि १७ जनवरी को कांग्रेस विधिवत राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर सकती है| देखा जाए तो यह पहले से तय था और इस सम्भावित घोषणा पर कोई आश्चर्य भी नहीं है किन्तु सवाल यह उठता है कि देश एक बार फिर वंशवाद का दंश आखिर क्यों बर्दाश्त करे? २००४ के आम चुनाव में कांग्रेस की जीत पर पार्टी की सर्वेसर्वा होने के नाते सोनिया गांधी का प्रधानमंत्री पद पर दावा पुख्ता था| हालांकि विदेशी मूल का मुद्दा उन्हें इस पद से दूर कर गया और देश को अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मिला  किन्तु चाटुकारों की फ़ौज़ ने इसे भी उनकी अंतरात्मा की आवाज बताकर प्रचारित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी| यदि एक बार मान भी लें कि सोनिया गांधी ने अपनी अंतरात्मा की आवाज को सुना और कथित रूप से त्याग की प्रतिमूर्ति बन बैठीं तो अब उनका त्याग कहां गया? क्या वर्तमान में पुत्र मोह में वे इतनी भ्रमित हो गई हैं कि पुनः जनता पर वंशवाद थोप रही हैं? दरअसल पिछले ढाई-तीन वर्षों से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को जानबूझ कर अपदस्त और अपमानित करने का जो षड़यंत्र १० जनपथ से चल रहा है उससे तो यही जान पड़ता है| सोनिया के इशारे पर उनके ख़ास लोग भी मनमोहन सिंह की राजनीतिक पृष्ठभूमि पर सवालिया निशान लगाते रहे हैं| हालांकि १० वर्षों से प्रधानमंत्री की कुर्सी पर आसीन मनमोहन सिंह इतनी राजनीतिक समझ को पैदा कर चुके हैं कि वे सत्ता के त्रिकोण को बखूबी साध रहे हैं| सोनिया को शायद इसका अनुमान न रहा हो किन्तु मनमोहन सिंह का सत्ता केंद्र बने रहना एक बार फिर नरसिम्हाराव के कार्यकाल की याद दिलाता है| राव ने सोनिया को राजनीति के ऐसे-ऐसे पाठ पढ़ाए थे कि उन्होंने पुत्र-पुत्री समेत इटली जाने का निर्णय ले लिया था| चूंकि मनमोहन राव जितने राजनीतिक दक्ष नहीं हैं अतः राहुल की राजनीतिक नासमझी व उद्दंडता को भी अपने ऊपर झेलते रहे| उनका एहसान मानना तो दूर; सोनिया अब उनकी राजनीतिक शहादत को युवराज के पक्ष में भुनाना चाहती हैं| सत्ता को ज़हर मानने वाली सोनिया अब अचानक ही राहुल को विषपान करवाना चाहती हैं तो आखिर इसके निहितार्थ क्या हैं? देखा जाए तो यह गांधी-नेहरू वंश का सत्ता के शीर्ष पर काबिज रहने का दम्भ ही है कि राजीव के बाद अब राहुल को देश पर थोपा जा रहा है|
कांग्रेसियों के वादों और दावों के बीच यदि राहुल की सम्भावित ताजपोशी १७ जनवरी को हो जाती है तो उनका मुकाबला मोदी से होना तय है| ऐसे में सवाल उठता है कि क्या राहुल मोदी का सामना करने में सक्षम होंगे| फिलहाल तो यह दूर की कौड़ी लगता है| देश की नज़र में ही नहीं वरन विदेशी मीडिया और राजनीतिक क्षेत्र में भी राहुल की भद पिटती रही है| कुछ समय पूर्व ब्रिटेन की द इकोनॉमिस्ट पत्रिका ने राहुल की काबिलियत पर सवाल उठाते हुए उन्हें एक समस्या तक करार दे दिया था| द राहुल प्रॉब्लम शीर्षक से लिखे लेख में संसद में उनकी भागीदारी और बोलने से बचने का जिक्र करते हुए उन्हें भ्रमित व्यक्ति भी बताया गया। पत्रिका ने अभी तक सरकार में कोई बड़ी जिम्मेदारी लेने में दिलचस्पी नहीं दिखाने की राहुल की आदत को उनकी योग्यता से जोड़ दिया। पत्रिका का दावा था कि एक नेता के तौर पर राहुल अब तक अपनी योग्यता साबित करने में नाकाम रहे हैं। वह शर्मीले हैं और पत्रकारों व राजनीतिक विरोधियों से बात करते हुए झिझकते हैं। संसद में आवाज बुलंद करने में भी राहुल पीछे हैं। कोई नहीं जानता कि राहुल गांधी के पास क्या क्षमता है? अपनी पढ़ाई, लंदन में किए गए काम को छिपाने और उस पर रक्षात्मक रहने के लिए भी कांग्रेस महासचिव पर सवाल खड़े किए गए| एक भारतीय पत्रकार की राहुल पर लिखी किताब का हवाला देते हुए कहा तक कहा गया कि कांग्रेस महासचिव ने अभी तक यूथ विंग और विधानसभा चुनावों में ही पार्टी का नेतृत्व किया है। यही नहीं, दोनों ही मोर्चो पर उन्हें खास सफलता भी नहीं मिली। द इकोनॉमिस्ट पत्रिका की राहुल के बारे में चाहे जो राय हो किन्तु इससे इंकार नहीं है कि राहुल हैं है ऐसे| वे समस्याओं को बतलाते हैं पर उनका समाधान उन्हें नहीं सूझता| भविष्य के भारत का भी उनके पास कोई खाका नहीं है| कभी अपनी दादी और पिता की शहादत को भुनाने की कोशिश तो कभी १२५ करोड़ जनता का रहनुमा कहलाने की राजनीति; राहुल हर मोर्चे पर विफल साबित हुए हैं| और उनकी इतनी विफलताओं के बाद जनता आश्वस्त है कि मोदी-राहुल की टकराहट में जीत मोदी की ही होगी और उनकी खूबियों का बखान करना जायज नहीं है| जनता का अपार समर्थन ही इस तथ्य की पुष्टि कर देता है|

3 Responses to “क्या राहुल पार लगाएंगे कांग्रेस की नैया?”

  1. DR.S.H.SHARMA

    Sardar Manmohan Singh has proved to be over rated economist and a failure in all fronts. He is neitherSardar nor Singh but a hand packed slve to Sonia Maino Gandhi/ Nehru Gandhi dynasty. Hehas declared many times that he will serve under Rahul if given the opportunity.How low can the prime minister of India go is a shame on all Indians. He is the most corrupt man because he has given shelter and protected the biggest scams of all time not in India but the world. He has been a disastor for the country and people of India.
    Now regarding Rahul or Raul vinncci Gandhi as he is known in his family and kitchen cabinet has no education or capability whatsoever because he was expelled from Harvard University within four months. There he could not cope with the course and was admitted through back door in a quota arrangement by Hinduja brothers of London.
    In Cambridge he failed in one subject out of four so he had just attended a course for six months.He left without qualification.
    These facts are on record and well documented by DR. Subramaiam Swami a former Professor ar Harvard University and now leader of BJP.
    He has no credentials for the top job of India except that he is son of Rajiv.
    He has proved to be disaster for Congress in Raj asjthan, Delhi, M.P. and now for India.He is a dead horse.

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  2. mahendra gupta

    राहुल अब कुछ समय में परिपक्व हो jayen तो alag बात है, अन्यथा वे भी राजीव कि तरह चोकड़ी से घिर जायेंगे.चाहे सोनिआ कितना ही संरक्षक का काम कर लें पर आखिर वे भी तो कुछ लोगों कि गिरफ्त में ही है.

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  3. mahendra gupta

    अगले चार महीने में केजरीवाल क्या कुछ कर पते हैं, जनता को कितना विश्वास दिलाने में सफल होंगे,मुकाबला इस पर निर्भर करेगा. यह त्रिपक्षीय भी हो सकता है.उएह भी सम्भव है कि केजरीवाल खुद केंद्रीय सत्ता का भोग तो न कर सकें पर उन दोनों के हाथ से प्याला बिखरवा दे.या किंग मेकर बन जाएँ.ऐसी अवस्था में भा ज पा को दूर रखने के लिए वे कांग्रेस का समर्थन करेंगे, दिल्ली का कर्ज भी उतारेंगे गालियां दे दे कर चुनाव लड़ना, जीतना और फिर उन्हीं से हाथ मिलाना भारतीय राजनीती कि पुराणी परम्परा है इसलिए यह कोई अचरज नहीं होगा..वैसे भी शायद कांग्रेस आम आदमी पार्टी को अपने ढांचे में ढाल ले और वह कांग्रेस की बी टीम बन जाये. कहावत ही है राजनीती में सब कुछ सम्भव है.

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