राजधानी में इन दिनों
सूरज नहीं उगता
उगता है सिर्फ ‘काला धुआँ’।
खिड़कियाँ खोलो तो
हवा नहीं ,
एक सुर्ख़-भूरे रंग का धुआँ
अपने पंजे फैलाए बैठा रहता है
जैसे कोई बूढ़ा शिकारी
हमारी हर साँस गिन रहा हो।
जंगल कटते गए
हर पेड़
मौन गवाह की तरह गिरता गया
और
विकास के नाम पर
हमारे जीवन – स्तंभ उखाड़ दिए गए।
हम मर नहीं रहे
हमें मारा जा रहा है।
इतनी चुपचाप
इतनी योजनाबद्ध तरीके से
कि चीखें भी
धुएं में घुलकर अदृश्य हो जाती है।
हवा यहां
अब हवा नहीं,
एक धीमी हत्या है!
बच्चों की आंखें भविष्य पूछती हैं
और
भविष्य?
धुंध से भरी सड़क पर
राह तलाशते खो गया है।
हमने उनके चेहरे नहीं ढके
ढंक दी है उनकी हँसी ।
काले मास्क में क़ैद वे बच्चे
जो कभी सुबह की ताज़गी को
अपना दोस्त मानते थे,
अब स्कूल जाते
हर साँस से समझौता करते हैं।
वह दिन अब दूर नहीं
जब “स्वच्छ हवा’’
सिर्फ किताबों में बची रहेगी,
बच्चे जिसे पुरानी परिभाषा की तरह पढ़ेंगे
लेकिन
कभी महसूस नहीं कर पाएंगे।
और
सत्ता?
वह गर्व से चिल्लाएगी
“देखिए, विकास! विकास!”
अगर यह विकास है,
तो विनाश की परिभाषा कौन लिखेगा?
सुना है
कई सिगरेट जितना ज़हर रोज़ ले रहे हो!
पर सच तो यह है कि
हमारी पूरी ज़िंदगी
अब किसी
अदृश्य सिगरेट का
धुआँ बन गई है।
वो ज़हर फैलाती है,
और समाधान के नाम पर
एयर-प्यूरीफायर का बाज़ार चमकाती है।
जैसे ज़हरीली हवा की माफी
किसी मशीन से मिल सकती हो।
क्या यह अंत है ?
नहीं, यह अंत नहीं ।
यह सिर्फ एक चेतावनी है!
कि
अगर हवा मर गई,
तो हम कहाँ बचे रहेंगे?
और
आने वाली पीढ़ियाँ
हमारे बारे में लिखेंगी
कि
“ये वही लोग थे
जिन्होंने धरती को जला कर
राख में सुकून ढूँढा था।”
— डॉ नेहा गौड़