सुनो—
तुम भी हद करते हो।
इतने अच्छे कैसे हो सकते हो?
कैसे हो सकते हो तुम
बिन काँटों का गुलाब!
कैसे नहीं छीन पाते तुम
मेरे हिस्से का अधिकार?
कैसे याद रख लेते हो
वो सारे शब्द—
जो कभी कहे थे
मैंने, तुमने… उस वक़्त।
तुम ही कहो,
कैसे अच्छे लगते हैं तुम्हें
चिड़िया, कोयल, मैना के
खुले पर—
जब आज़ाद उड़ान से डरकर
उन्हें कुचल देना चाहते हैं सब।
कैसे पढ़ ली तुमने
मेरी हर चुप्पी की भाषा?
जब स्त्री का मौन
अक्सर कहलाता है
संदेह की परिभाषा।
सोचती हूँ—
कैसे कभी न झुकते
तुम्हारे कंधे,
कैसे बचाए रखते हो
अपने भीतर की कोमलता,
इस कठोर समय में।
बताओ—
कैसे तुमने कभी न माँगी
अग्नि-परीक्षा
मेरे अस्तित्व की?
न माँगा कोई पवित्र प्रमाण,
न खींची कोई
मर्यादा-रेखा
लक्ष्मण-सी।
सोचती हूँ—
हो क्या तुम मेरी
तप, साधना या व्रत का प्रतिफल?
या ईश्वर ने तुम्हें गढ़कर
तोड़ डाला
वह साँचा
उसी पल।
सुनो—
तुमने दिया मुझे हर सम्मान,
कभी न टूटने दिया
मेरा आत्मसम्मान।
हे मेरे तुम!
न तुम राम बने,
न कृष्ण कहाए,
फिर भी मेरे सब कष्ट
तुमने अपनाए।
मेरे दुखों का विष
तुम पी गए चुपचाप,
जैसे शिव पीते हैं
जगत का संताप।
— डॉ नेहा गौड़